गुरु महिमा – संत कबीर के दोहे अर्थ सहित


सतगुरु का जीवन में महत्व

गुरु या गोविन्द, पहले किसे प्रणाम करें?

गुरु गोविंद दोऊँ खड़े,
काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने,
गोविंद दियो बताय॥
Or
बलिहारी गुरु आपणे, जिन गोविन्द दिया दिखाय॥

गुरु गोविंद दोऊँ खड़े – गुरु और गोविन्द (भगवान), दोनों एक साथ खड़े है।

काके लागूं पांय – पहले किसके चरण-स्पर्श करें (प्रणाम करे)?

बलिहारी गुरु आपने – पहले गुरु को प्रणाम करूँगा क्योंकि, आपने (गुरु ने),

गोविंद दियो बताय – गोविंद तक पहुंचने का मार्ग बताया है।


ज्ञान और सत्य के लिए गुरु की शरण क्यों जरूरी है?

गुरु बिन ज्ञान न उपजै,
गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को,
गुरु बिन मिटै न दोष॥

गुरु बिन ज्ञान न उपजै, – गुरु के बिना ज्ञान मिलना कठिन है,

गुरु बिन मिलै न मोष – गुरु के बिना मोक्ष नहीं।

गुरु बिन लखै न सत्य को – गुरु के बिना सत्य को पह्चानना असंभव है, और

गुरु बिन मिटे न दोष – गुरु बिना दोष का अर्थात मन के विकारों का मिटना मुश्किल है।


गुरु की आज्ञा और उनके बताये मार्ग

यदि गुरु की आज्ञा नहीं मानी, तो….

गुरु आज्ञा मानै नहीं,
चलै अटपटी चाल।
लोक वेद दोनों गए,
आए सिर पर काल॥

गुरु आज्ञा मानै नहीं – जो मनुष्य, गुरु की आज्ञा नहीं मानता है, और

चलै अटपटी चाल – गलत मार्ग पर चलता है,

लोक वेद दोनों गए – वह, लोक और वेद दोनों से ही, पतित हो जाता है , और

  • लोक अर्थात दुनिया और वेद अर्थात धर्म

आए सिर पर काल – दुःख और कष्टों से, घिरा रहता है।


सतगुरु के बताएं मार्ग पर चलना जरूरी है, क्योंकि…..

गुरु शरणगति छाडि के,
करै भरोसा और।
सुख संपती को कह चली,
नहीं नरक में ठौर॥

गुरु शरणगति छाडि के – जो व्यक्ति सतगुरु की शरण छोड़कर और उनके बताये मार्ग पर न चलकर,

करै भरोसा और – अन्य बातो में विश्वास करता है,

सुख संपती को कह चली – उसे जीवन में दुखो का सामना करना पड़ता है और

नहीं नरक में ठौर – उसे नरक में भी जगह नहीं मिलती।


गुरु किस प्रकार शिष्य के मन के विकार दूर करते है?

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है,
गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट।
अंतर हाथ सहार दै,
बाहर बाहै चोट॥

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, – गुरु कुम्हार के समान है और शिष्य मिट्टी के घडे के समान है।

गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट – गुरु कठोर अनुशासन किन्तु मन में प्रेम भावना रखते हुए, शिष्य के खोट को अर्थात मन के विकारों को दूर करते है।

अंतर हाथ सहार दै – जैसे कुम्हार घड़े के भीतर से हाथ का सहारा देता है,

बाहर बाहै चोट – और बाहर चोट मारकर घड़े को सुन्दर आकार देता है।


पारस पत्थर और गुरु में क्या अंतर है?

गुरु पारस को अन्तरो,
जानत हैं सब संत।
वह लोहा कंचन करे,
ये करि लेय महंत॥

गुरु पारस को अन्तरो – गुरु और पारस पत्थर के अंतर को,

जानत हैं सब संत – सभी संत (विद्वान, ज्ञानीजन) भलीभाँति जानते हैं।

वह लोहा कंचन करे – पारस पत्थर सिर्फ लोहे को सोना बनाता है,

ये करि लेय महंत – किन्तु गुरु, शिष्य को ज्ञान की शिक्षा देकर अपने समान गुनी और महान बना लेते है।


गुरु सबसे बड़े दाता अर्थात दानी

गुरु समान दाता नहीं,
याचक सीष समान।
तीन लोक की सम्पदा,
सो गुरु दिन्ही दान॥

गुरु समान दाता नहीं – गुरु के समान कोई दाता (दानी) नहीं है।

याचक सीष समान – शिष्य के समान कोई याचक (माँगनेवाला) नहीं है।

तीन लोक की सम्पदा – ज्ञान रूपी अनमोल संपत्ति, जो तीनो लोको की संपत्ति से भी बढ़कर है,

सो गुरु दिन्ही दान – शिष्य के मांगने से गुरु उसे यह संपत्ति, अर्थात ज्ञान रूपी सम्पदा दान में दे देते है।


मोह माया के लुभावने बंधनो से छूटने के लिए गुरु की कृपा जरूरी

कबीर माया मोहिनी,
जैसी मीठी खांड।
सतगुरु की किरपा भई,
नहीं तौ करती भांड॥

कबीर माया मोहिनी – माया (संसार का आकर्षण) बहुत ही मोहिनी है, लुभावनी है,

जैसी मीठी खांड – जैसे मीठी शक्कर या मिसरी।

सतगुरु की किरपा भई – सतगुरु की कृपा हो गयी (इसलिए माया के इस मोहिनी रूप से बच गया),

नहीं तौ करती भांड – नहीं तो यह मुझे भांड बना देती।

  • (भांड अर्थात – विदूषक, मसख़रा, गंवार, उजड्ड)

माया ही मनुष्य को, संसार के जंजाल में उलझाए रखती है।

संसार के मोहजाल में फंसकर
अज्ञानी मनुष्य मन में अहंकार, इच्छा,
राग और द्वेष के विकारों को उत्पन्न करता रहता है।

विकारों से भरा मन
माया के प्रभाव से उपर नहीं उठ सकता है और
जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसा रहता है।

कबीरदासजी कहते है,
सतगुरु की कृपा से मनुष्य
माया के इस मोहजाल से छूट सकता है।


सतगुरु – जैसे अमृत की खान – ज्ञान रूपी अनमोल संपत्ति देनेवाले

यह तन विष की बेलरी,
गुरु अमृत की खान।
सीस दिये जो गुरु मिलै,
तो भी सस्ता जान॥

यह तन विष की बेलरी – यह शरीर सांसारिक विषयो की बेल है।

गुरु अमृत की खान – सतगुरु विषय और विकारों से रहित है, इसलिए वे अमृत की खान है।

  • मन के विकार (अहंकार, आसक्ति, द्वेष आदि), विष के समान होते है। इसलिए शरीर जैसे विष की बेल है।

सीस दिये जो गुर मिलै – ऐसे सतगुरु यदि शीश यानी की सर्वस्व अर्पण करने पर भी मिल जाए,

तो भी सस्ता जान – तो भी यह सौदा सस्ता ही समझना चाहिए।

अपना सर्वस्व समर्पित करने पर भी ऐसे सतगुरु से भेंट हो जाए,
जो विषय विकारों से मुक्त है,
तो भी यह सौदा सस्ता ही समझना चाहिए।

क्योंकि, गुरु से ही हमें ज्ञान रूपी अनमोल संपत्ति मिल सकती है,
जो तीनो लोको की संपत्ति से भी बढ़कर है।


सतगुरु की महिमा अपरंपार है

सतगुरू की महिमा अनंत,
अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघाडिया,
अनंत दिखावणहार॥

सतगुरु महिमा अनंत है – सद्गुरु की महिमा का अन्त नहीं है।

अनंत किया उपकार – उन्होंने मुझ पर अनंत उपकार किये है।

लोचन अनंत उघारिया – उन्होंने मेरे ज्ञान के चक्षु खोल दिए,

अनंत दिखावन हार – और मुझे, अनंत (ईश्वर) के दर्शन करा दिए।

भावार्थ:
सद्गुरु की महिमा अनंत है और
उनके उपकारों का भी कोई अन्त नहीं है।

गुरु ने ही मेरे अनन्त लोचन
अर्थात ज्ञान के चक्षु खोल दिये, और
मुझे अनंत यानी की ईश्वर के दर्शन करा दिए।

ज्ञान चक्षु खुलने पर ही मनुष्य को ईश्वर के दर्शन हो सकते है।

मनुष्य आंखों से नहीं
परन्तु भीतर के ज्ञान के चक्षु से ही
निराकार परमात्मा को देख सकता है।


सतगुरु के गुण अनगिनत है

सब धरती कागद करूँ,
लिखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूँ,
गुरु गुण लिखा न जाय॥

सब धरती कागद करूं – सारी धरती को कागज बना लिया जाए,

लिखनी सब बनराय – सब वनों की (जंगलो की) लकडियो को कलम बना ली जाए,

सात समुद्र का मसि करूं – सात समुद्रों को स्याही बना ली जाए,

गुरु गुण लिखा न जाय – तो भी गुरु के गुण लिखे नहीं जा सकते, गुरु की महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता।

क्योंकि, गुरु की महिमा अपरंपार है।


अहंकार त्यागकर ही, गुरु से ज्ञान प्राप्त हो सकता है

गुरु सों ज्ञान जु लीजिए,
सीस दीजिए दान।
बहुतक भोंदू बह गए,
राखि जीव अभिमान॥

गुरु सों ज्ञान जु लीजिए – गुरु से ज्ञान पाने के लिए,

सीस दीजिए दान – तन और मन, पूर्ण श्रद्धा से गुरु के चरणों में समर्पित कर दो।

राखि जीव अभिमान – जो अपने तन, मन और धन का अभिमान नहीं छोड़ पाते है,

बहुतक भोंदु बहि गये – ऐसे कितने ही मूर्ख (भोंदु) और अभिमानी लोग संसार के माया के प्रवाह में बह जाते है।

वे संसार के माया जाल में उलझ कर रह जाते है और उद्धार से वंचित रह जाते है।


ज्ञान प्राप्ति के लिए, निरंतर ध्यान और भक्ति

गुरु मूरति गति चंद्रमा,
सेवक नैन चकोर।
आठ पहर निरखत रहे,
गुरु मूरति की ओर॥

गुरु मूरति गति चंद्रमा – गुरु की मूर्ति जैसे चन्द्रमा, और

सेवक नैन चकोर – शिष्य के नेत्र जैसे चकोर पक्षी।

  • चकोर पक्षी चन्द्रमा को निरंतर निहारता रहता है, वैसे ही हमें,

गुरु मूरति की ओर – गुरु ध्यान में और गुरु भक्ति में,

आठ पहर निरखत रहे – आठो पहर रत रहना चाहिए।

  • निरखत, निरखना – अर्थात ध्यान से देखना

सतगुरु को कभी दुःख नहीं पहुँचाना चाहिए, क्योंकि ….

कबीर ते नर अन्ध हैं,
गुरु को कहते और।
हरि के रुठे ठौर है,
गुरु रुठे नहिं ठौर॥

कबीर ते नर अन्ध हैं – संत कबीर कहते है की वे मनुष्य, नेत्रहीन (अन्ध) के समान है,

गुरु को कहते और – जो गुरु के महत्व को नहीं जानते।

हरि के रुठे ठौर है – भगवान के रूठने पर मनुष्य को स्थान (ठौर) मिल सकता है,

गुरु रुठे नहिं ठौर – लेकिन गुरु के रूठने पर कही स्थान नहीं मिल सकता।


आछे दिन पाछे गए,
गुरु सों किया न हेत।
अब पछतावा क्या करै,
चिड़ियाँ चुग गईं खेत॥

आछे दिन पाछे गये – अच्छे दिन बीत गए, अर्थात मनुष्य सुख के दिन सिर्फ मौज मस्ती में बिता देता है।

गुरु सों किया न हेत – गुरु की भक्ति नहीं की, गुरु के वचन नहीं सुने।

अब पछितावा क्या करे – अब पछताने से क्या होगा,

चिड़िया चुग गई खेत – जब चिड़ियाँ खेत चुग गई अर्थात जब अवसर चला गया।



संत कबीर के दोहे – अर्थ सहित


Kabirdas ke Dohe – Guru Mahima

सतगुरु के समान हित चाहनेवाला कहीं भी नहीं मिलेगा

सतगुरु सम कोई नहीं,
सात दीप नौ खण्ड।
तीन लोक न पाइये,
अरु इक्कीस ब्रह्म्ण्ड॥

सतगुरु सम कोई नहीं, – सम्पूर्ण संसार में सद्गुरू के समान हितकारी कोई अन्य नहीं है।

सात दीप नौ खण्ड। – सातों व्दीप और नौ खण्डों में ढूंढनें पर भी गुरु के समान कोई नहीं मिलेगा।

तीन लोक न पाइये, – तीनों लोकों में भी सद्गुरु के समान आप किसी को नहीं पायेंगे।

अरु इक्कीस ब्रह्म्ण्ड॥ – और इक्कीस ब्रह्मणडो में भी सतगुरु जैसा भला करनेवाला नहीं मिलेगा।


सतगुरु तो सतभाव है,
जो अस भेद बताय।
धन्य शीष धन भाग तिहि,
जो ऐसी सुधि पाय॥

सतगुरु तो सतभाव है – सद् गुरु सत्य भाव का भेद बताने वाला है।

जो अस भेद बताय – सतगुरु सत्य और असत्य का भेद

धन्य शीष धन भाग तिहि – वह शिष्य धन्य है तथा उसका भाग्य भी धन्य है

जो ऐसी सुधि पाय – जो गुरु के द्वारा अपने स्वरुप की सुधि पा गया है, बताकर अपने शिष्य को धन्य कर देता है


गुरु सत्य असत्य का भेद बताकर, शिष्य को धन्य कर देता है

सतगुरु तो सतभाव है,
जो अस भेद बताय।
धन्य शीष धन भाग तिहि,
जो ऐसी सुधि पाय॥

सतगुरु तो सतभाव है – सद्गुरु तो सत्यभाव है, यानी की वह सत्य को, सत्य के भाव को जानता है, इसलिए

जो अस भेद बताय – सतगुरु ही सत्य और असत्य का भेद बता सकता है।

धन्य शीष धन भाग तिहि – वह शिष्य धन्य है तथा उसका भाग्य भी धन्य है,

जो ऐसी सुधि पाय – जो गुरु के द्वारा सत्य असत्य का फर्क जानकर अपने स्वरुप की सुधि पा गया है।


गुरु मुरति आगे खडी,
दुतिया भेद कछु नाहि।
उन्ही कूं परनाम करि,
सकल तिमिर मिटी जाहिं॥

गुरु की आज्ञा आवै,
गुरु की आज्ञा जाय।
कहैं कबीर सो संत हैं,
आवागमन नशाय॥


भक्ति पदारथ तब मिलै,
जब गुरु होय सहाय।
प्रेम प्रीति की भक्ति जो,
पूरण भाग मिलाय॥

गुरु को सिर राखिये,
चलिये आज्ञा माहिं।
कहैं कबीर ता दास को,
तीन लोक भय नहिं॥


गुरुमुख गुरु चितवत रहे,
जैसे मणिहिं भुवंग।
कहैं कबीर बिसरें नहीं,
यह गुरुमुख को अंग॥

कबीर ते नर अंध है,
गुरु को कहते और।
हरि के रूठे ठौर है,
गुरु रूठे नहिं ठौर॥


भक्ति-भक्ति सब कोई कहै,
भक्ति न जाने भेद।
पूरण भक्ति जब मिलै,
कृपा करे गुरुदेव॥

गुरु बिन माला फेरते,
गुरु बिन देते दान।
गुरु बिन सब निष्फल गया,
पूछौ वेद पुरान॥


कबीर गुरु की भक्ति बिन,
धिक जीवन संसार।
धुवाँ का सा धौरहरा,
बिनसत लगै न बार॥

कबीर गुरु की भक्ति करु,
तज निषय रस चौंज।
बार-बार नहिं पाइए,
मानुष जनम की मौज॥


काम क्रोध तृष्णा तजै,
तजै मान अपमान।
सतगुरु दाया जाहि पर,
जम सिर मरदे मान॥

कबीर गुरु के देश में,
बसि जानै जो कोय।
कागा ते हंसा बनै,
जाति वरन कुल खोय॥


आछे दिन पाछे गए,
गुरु सों किया न हेत।
अब पछतावा क्या करै,
चिड़ियाँ चुग गईं खेत॥

अमृत पीवै ते जना,
सतगुरु लागा कान।
वस्तु अगोचर मिलि गई,
मन नहिं आवा आन॥


बलिहारी गुरु आपनो,
घड़ी-घड़ी सौ सौ बार।
मानुष से देवत किया,
करत न लागी बार॥

गुरु आज्ञा लै आवही,
गुरु आज्ञा लै जाय।
कहै कबीर सो सन्त प्रिय,
बहु विधि अमृत पाय॥


भूले थे संसार में,
माया के साँग आय।
सतगुरु राह बताइया,
फेरि मिलै तिहि जाय॥

बिना सीस का मिरग है,
चहूँ दिस चरने जाय।
बांधि लाओ गुरुज्ञान सूं,
राखो तत्व लगाय॥


गुरु नारायन रूप है,
गुरु ज्ञान को घाट।
सतगुरु बचन प्रताप सों,
मन के मिटे उचाट॥

गुरु समरथ सिर पर खड़े,
कहा कमी तोहि दास।
रिद्धि सिद्धि सेवा करै,
मुक्ति न छोड़े पास॥


तीरथ गये ते एक फल,
सन्त मिले फल चार।
सतगुरु मिले अनेक फल,
कहें कबीर विचार॥

सतगुरु खोजो सन्त,
जोव काज को चाहहु।
मिटे भव को अंक,
आवा गवन निवारहु॥


सतगुरु शब्द उलंघ के,
जो सेवक कहूँ जाय।
जहाँ जाय तहँ काल है,
कहैं कबीर समझाय॥

सतगुरु को माने नही,
अपनी कहै बनाय।
कहै कबीर क्या कीजिये,
और मता मन जाय॥


सतगुरु मिला जु जानिये,
ज्ञान उजाला होय।
भ्रम का भांड तोड़ि करि,
रहै निराला होय॥

सतगुरु मिले जु सब मिले,
न तो मिला न कोय।
माता-पिता सुत बाँधवा,
ये तो घर घर होय॥


चौंसठ दीवा जोय के,
चौदह चन्दा माहिं।
तेहि घर किसका चाँदना,
जिहि घर सतगुरु नाहिं॥

सुख दुख सिर ऊपर सहै,
कबहु न छोड़े संग।
रंग न लागै का,
व्यापै सतगुरु रंग॥


यह सतगुरु उपदेश है,
जो मन माने परतीत।
करम भरम सब त्यागि के,
चलै सो भव जल जीत॥

जाति बरन कुल खोय के,
भक्ति करै चितलाय।
कहैं कबीर सतगुरु मिलै,
आवागमन नशाय॥


जेहि खोजत ब्रह्मा थके,
सुर नर मुनि अरु देव।
कहै कबीर सुन साधवा,
करु सतगुरु की सेव॥


Kabir Dohe – List


कबीर के दोहे – सुमिरन (ईश्वर का स्मरण)- अर्थ सहित


ईश्वर का स्मरण अर्थात सुमिरन पर कबीर के दोहे

दुःख से बचने का सरल उपाय – सुख में ईश्वर को याद रखो

दु:ख में सुमिरन सब करै,
सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करै,
तो दु:ख काहे को होय॥

दु:ख में सुमिरन सब करै – आमतौर पर मनुष्य ईश्वर को दुःख में याद करता है।

सुख में करै न कोय – सुख में ईश्वर को भूल जाते है।

जो सुख में सुमिरन करै – यदि सुख में भी इश्वर को याद करे

तो दु:ख काहे को होय – तो दुःख निकट आएगा ही नहीं।


मुक्ति का सरल उपाय – हर श्वास में ईश्वर का सुमिरन

काह भरोसा देह का,
बिनसी जाय छिन मांहि।
सांस सांस सुमिरन करो
और जतन कछु नाहिं॥

काह भरोसा देह का – इस शरीर का क्या भरोसा है,

बिनसी जाय छिन मांहि – किसी भी क्षण यह (शरीर) हमसे छीन सकता है।

सांस सांस सुमिरन करो – इसलिए हर साँस में ईश्वर को याद करो,

और जतन कछु नाहिं – इसके अलावा मुक्ति का कोई दूसरा मार्ग नहीं है।


ईश्वर के ध्यान के अलावा बाकी सब दुःख है

कबीर सुमिरन सार है,
और सकल जंजाल।
आदि अंत मधि सोधिया,
दूजा देखा काल॥

कबीर सुमिरन सार है – कबीरदासजी कहते हैं कि सुमिरन (ईश्वर का ध्यान) ही मुख्य है,

और सकल जंजाल – बाकी सब मोह माया का जंजाल है।

आदि अंत मधि सोधिया – शुरू में, अंत में और मध्य में, जांच परखकर देखा है,

दूजा देखा काल – सुमिरन के अलावा, बाकी सब काल (दुःख) है।

  • सार अर्थात -essence – सारांश, तत्त्व, मूलतत्त्व

मुक्ति अर्थात मोक्ष के लिए क्या करें?

राम नाम सुमिरन करै,
सतगुरु पद निज ध्यान।
आतम पूजा जीव दया,
लहै सो मुक्ति अमान॥

राम नाम सुमिरन करै – जो मनुष्य राम नाम का सुमिरन करता है, ईश्वर को याद करता है,

सतगुरु पद निज ध्यान – सतगुरु के चरणों का निरंतर ध्यान करता है,

आतम पूजा – अंतर्मन से ईश्वर को पूजता है,

जीव दया – सभी जीवो पर दया करता है,

लहै सो मुक्ति अमान – वह इस संसार से मुक्ति (मोक्ष) पाता है।


ईश्वर के दर्शन के लिए सबसे सहज मार्ग क्या है?

सुमिरण मारग सहज का,
सतगुरु दिया बताय।
सांस सांस सुमिरण करूं,
इक दिन मिलसी आय॥

सुमिरण मारग सहज का – सुमिरण का मार्ग बहुत ही सहज और सरल है,

सतगुरु दिया बताय – जो मुझे सतगुरु ने बता दिया है

सांस सांस सुमिरण करूं – अब मै, हर साँस में, प्रभु को याद करता हूँ

इक दिन मिलसी आय – एक दिन निश्चित ही, मुझे ईश्वर के दर्शन होंगे


मन में ईश्वर का स्मरण कैसे रहना चाहिए?

सुमिरण की सुधि यौ करो,
जैसे कामी काम।
एक पल बिसरै नहीं,
निश दिन आठौ जाम॥

सुमिरण की सुधि यौ करो – ईश्वर को इस प्रकार याद करो,

जैसे कामी काम – जैसे कामी पुरुष, हर समय विषयो के बारे में सोचता है।

एक पल बिसरै नहीं – एक पल भी व्यर्थ मत गँवाओं, व्यर्थ मत जाने दो।

निश दिन आठौ जाम – रात, दिन, आठों पहर, प्रभु परमेश्वर को याद करो।

  • पहर का अर्थ अगले दोहे में दिया गया है

मनुष्य की दिनचर्या में, ईश्वर के ध्यान का समय

पाँच पहर धन्धे गया,
तीन पहर गया सोय।
एक पहर हरि नाम बिन,
मुक्ति कैसे होय॥

पाँच पहर धन्धे गया – पाँच पहर धन्धा करते हुए बिता दिए

तीन पहर गया सोय – तीन पहर सोने में बिता दिए

एक पहर हरि नाम बिन – एक पहर भी भगवान के नाम का स्मरण नहीं किया

मुक्ति कैसे होय – तो भला किस प्रकार मुक्ति होगी

  • पहर अर्थात – एक दिन का आठवाँ भाग,
  • यानी की तीन घंटे का समय
  • एक दिन में आठ पहर होते है –
  • तीन तीन घंटे के आठ पहर, चैबीस घंटे।

भावार्थ: –
कबीरदासजी कहते है की
दिन के आठ पहर में से पाँच पहर
धंधा और दुनिया के कार्य करते हुए बिता दिए और
दिन के तीन पहर सोने में बिता दिए।

इस प्रकार दिन के आठों पहर का समय गुजार दिया,
किन्तु एक पहर भी भगवान का सुमिरन नहीं किया,
ईश्वर का ध्यान और नाम स्मरण नहीं किया,
तो मुक्ति किस प्रकार मिलेगी।


ज्ञान और भक्ति, ईश्वर के सुमिरन के लिए जरूरी

बिना साँच सुमिरन नहीं,
बिन भेदी भक्ति न सोय।
पारस में परदा रहा,
कस लोहा कंचन होय॥

बिना सांच सुमिरन नहीं – बिना ज्ञान के प्रभु का स्मरण (सुमिरन) नहीं हो सकता और

बिन भेदी भक्ति न सोय – भक्ति का भेद जाने बिना सच्ची भक्ति नहीं हो सकती।

पारस में परदा रहा – जैसे पारस में थोडा सा भी खोट हो,

कस लोहा कंचन होय – तो वह लोहे को सोना नहीं बना सकता।

  • यदि मन में विकारों का खोट हो,
    तो मनुष्य सच्चे मन से सुमिरन नहीं कर सकता।

भवसागर से उबरने के लिए सुमिरन, और डूबने के लिए अहंकार

दर्शन को तो साधु हैं,
सुमिरन को गुरु नाम।
तरने को आधीनता,
डूबन को अभिमान॥

दर्शन को तो साधु हैं – दर्शन के लिए सन्तों का दर्शन श्रेष्ठ हैं और

सुमिरन को गुरु नाम – सुमिरन के लिए (चिन्तन के लिए) गुरु व्दारा बताये गये नाम एवं गुरु के वचन उत्तम है।

तरने को आधीनता – भवसागर (संसार रूपी भव) से पार उतरने के लिए आधीनता अर्थात विनम्र होना, अति आवश्यक है,

डूबन को अभिमान – लेकिन डूबने के लिए तो अभिमान, अहंकार ही पर्याप्त है। (इसलिए अहंकार नहीं करना चाहिए)


जीवन रहते जितना राम नाम लूट सकते है, लूट लो

लूट सके तो लूट ले,
राम नाम की लूट।
पाछे फिर पछ्ताओगे,
प्राण जाहिं जब छूट॥

लूट सके तो लूट ले – अगर लूट सको तो लूट लो,

राम नाम की लूट – अभी राम नाम की लूट है।

  • अभी समय है, तुम भगवान का जितना नाम लेना चाहते हो ले लो

पाछे फिर पछ्ताओगे – यदि नहीं लुटे, तो बाद में पछताना पड़ेगा,

प्राण जाहिं जब छूट – जब प्राण छुट जायेंगे।


विकारों से भरे मन को शुद्ध करने के लिए, सुमिरन रुपी पारस पत्थर

आदि नाम पारस अहै,
मन है मैला लोह।
परसत ही कंचन भया,
छूटा बंधन मोह॥

आदि नाम पारस अहै – ईश्वर का स्मरण पारस के समान है।

मन है मैला लोह – विकारों से भरा मन अर्थात मैला मन, लोहे के समान है।

परसत ही कंचन भया – जैसे पारस के संपर्क से लोहा कंचन (सोना) बन जाता है,

  • वैसे ही ईश्वर के नाम से मन शुद्ध हो जाता है।

छूटा बंधन मोह – और मनुष्य मोह माया के बन्धनों से छूट जाता है।


हीरे जैसा अनमोल जीवन, कब कौड़ी जैसा व्यर्थ हो जाता है?

रात गंवाई सोय के,
दिवस गंवाया खाय।
हीरा जन्म अमोल था,
कोड़ी बदले जाय॥

रात गंवाई सोय के – रात सोकर गँवा दी और

दिवस गंवाया खाय – दिन खाने पीने में गँवा दिया।

हीरा जन्म अमोल था – हीरे जैसा अमूल्य जीवन

कोड़ी बदले जाय – कौड़ी के मोल बेच दिया, व्यर्थ जाने दिया।

भावार्थ: –
मनुष्य को जन्म मिलने के बाद, उसे अपने उद्धार के लिए,
मुक्ति के लिए, बंधनों से छूटने के लिए प्रयत्न करने चाहिए।

लेकिन यदि मनुष्य दिन रात
सिर्फ खाने, पीने और सोने में बिता दे,
तो यह हीरे जैसा अनमोल जीवन,
व्यर्थ चला जाएगा यानी की कौड़ी के दामों बिक जाएगा।



Kabir Dohe – List


कबीर के दोहे – सुमिरन

कबीरा सोया क्या करे,
उठि न भजे भगवान।
जम जब घर ले जायेंगे,
पड़ी रहेगी म्यान॥

नींद निशानी मौत की,
उठ कबीरा जाग।
और रसायन छांड़ि के,
नाम रसायन लाग॥

जीना थोड़ा ही भला,
हरि का सुमिरन होय।
लाख बरस का जीवना,
लेखै धरै न कोय॥

जो कोय सुमिरन अंग को,
पाठ करे मन लाय।
भक्ति ज्ञान मन ऊपजै,
कहै कबीर समुझाय॥

निज सुख आतम राम है,
दूजा दुःख अपार।
मनसा वाचा करमना,
कबीर सुमिरन सार॥


सहकामी सुमिरन करै,
पावै उत्तम धाम।
निहकामी सुमिरन करै,
पावै अविचल राम॥

सन्त सेव गुरु बन्दगी,
गुरु सुमिरन वैराग।
ये ता तबही पाइये,
पूरन मस्तक भाग॥

सुख मे सुमिरन ना किया,
दु:ख में किया याद।
कह कबीर ता दास की,
कौन सुने फरियाद॥

सुमरित सुरत जगाय कर,
मुख के कछु न बोल।
बाहर का पट बन्द कर,
अन्दर का पट खोल॥
Or
सुमिरन सुरति लगाय के,
मुख ते कछू न बोल।
बाहर के पट देय के,
अंतर के पट खोल॥

थोड़ा सुमिरन बहुत सुख,
जो करि जानै कोय।
हरदी लगै न फिटकरी,
चोखा ही रंग होय॥


सुमिरण की सुधि यौ करो,
ज्यौं गागर पनिहारि।
हालै डीलै सुरति में,
कहैं कबीर बिचारी॥

सुमरण की सुब्यों करो,
ज्यों गागर पनिहार।
होले-होले सुरत में,
कहैं कबीर विचार॥

सुमरण से मन लाइए,
जैसे पानी बिन मीन।
प्राण तजे बिन बिछड़े,
सन्त कबीर कह दीन॥

सुमिरन में मन लाइए,
जैसे नाद कुरंग।
कहैं कबीर बिसरे नहीं,
प्रान तजे तेहि संग॥


सुमिरन सों मन जब लगै,
ज्ञानांकुस दे सीस।
कहैं कबीर डोलै नहीं,
निश्चै बिस्वा बीस॥

सुमिरन सों मन लाइए,
जैसे दीप पतंग।
प्राण तजे छिन एक में,
जरत न मोरै अंग॥

हिरदे सुमिरनि नाम की,
मेरा मन मसगूल।
छवि लागै निरखत रहूँ,
मिटि गये संसै सूल॥

कहता हूँ कहि जात हूँ,
सुनता है सब कोय।
सुमिरन सों भल होयगा,
नातर भला न होय॥

कबीर माला काठ की,
पहिरी मुगद डुलाय।
सुमिरन की सुधि है नहीं,
डीगर बांधी गाय॥


नाम जपे अनुराग से,
सब दुख डारै धोय।
विश्वासे तो गुरू मिले,
लोहा कंचन होय॥

जब जागै तब नाम जप,
सोवत नाम संभार।
ऊठत बैठत आतमा,
चालत नाम चितार॥

ओठ कंठ हाले नहीं,
जीभ न नाम उचार।
गुप्तहि सुमिरन जो लखे,
सोई हंस हमार॥

अंतर जपिये रामजी,
रोम रोम रकार।
सहजे धुन लागी रहे,
येही सुमिरन सार॥

मनुवा तो गाफ़िल भया,
सुमिरन लागै नांहि।
घनी सहेगा सासना,
जम के दरगह मांहि॥


सुमिरन ऐसो कीजिये,
खरे निशाने चोट।
सुमिरन ऐसो कीजिये,
हाले जीभ न होठ॥

वाद करै सो जानिये,
निगुरे का वह काम।
सन्तों को फ़ुरसत नहीं,
सुमिरन करते नाम॥

कबीर सुमिरन अंग को,
पाठ करे मन लाय।
विद्याहिन विद्या लहै,
कहै कबीर समुझाय॥

जो कोय सुमिरन अंग को,
निसि बासर करै पाठ।
कहै कबीर सो संतजन,
संधै औघट घाट॥


भक्ति भजन हरि नाम है,
दूजा दुःख अपार।
मनसा वाचा कर्मना,
कबीर सुमिरन सार॥

जागन में सोवन करै,
सोवन में लव लाय।
सुरति डोर लागी रहे,
तार तूटि नहि जाय॥

नाम रटत अस्थिर भया,
ज्ञान कथत भया लीन।
सुरति सब्द एकै भया,
जल ही ह्वैगा मीन॥

सब मंत्रन का बीज है,
सत्तनाम ततसार।
जो कोई जन हिरदै धरे,
सो जन उतरै पार॥

कबीर मन निश्चल करो,
सत्तनाम गुन गाय।
निश्चल बिना न पाईये,
कोटिक करो उपाय॥

वाद विवादा मत करो, करु
नित एक विचार।
नाम सुमिर चित्त लाय के,
सब करनी में सार॥

अंतर हरि हरि होत है,
मुख की हाजत नाहि।
सहजे धुनि लागी रहे,
संतन के घट मांहि॥


Kabir Dohe – List

संत कबीर के दोहे – भक्ति – अर्थ सहित


सच्ची भक्ति क्यों जरूरी है?

क्रोध, लालच और इच्छाएं – भक्ति के मार्ग में बाधक

कामी क्रोधी लालची,
इनसे भक्ति ना होय।
भक्ति करै कोई सूरमा,
जाति बरन कुल खोय॥

कामी क्रोधी लालची – जिन लोगों में काम, क्रोध और लालच रहता है. अर्थात जो लोग कामी, क्रोधी और लालची है,

  • कामी – सांसारिक चीजों में और विषय वासनाओ में लिप्त रहता है,
  • क्रोधी – दुसरो से द्वेष करता रहता है और
  • लालची – निरंतर संग्रह करने में व्यस्त रहता है

इनसे भक्ति न होय – उन लोगो से भक्ति नहीं हो सकती।

तो ईश्वर की भक्ति कौन कर सकता है?

भक्ति करै कोई सूरमा – भक्ति तो कोई पुरुषार्थी, शूरवीर ही कर सकता है, जो

जादि बरन कुल खोय – जाति, वर्ण, कुल और अहंकार का त्याग कर सकता है।


मुक्ति या मोक्ष के लिए – भक्ति और गुरु के वचन जरूरी

भक्ति बिन नहिं निस्तरे,
लाख करे जो कोय।
शब्द सनेही होय रहे,
घर को पहुँचे सोय॥

भक्ति बिन नहिं निस्तरे – भक्ति के बिना मुक्ति संभव नहीं है

लाख करे जो कोय – चाहे कोई लाख प्रयत्न कर ले।

शब्द सनेही होय रहे – जो सतगुरु के वचनों को (शब्दों को) ध्यान से सुनता है और उनके बताये मार्ग पर चलता है,

घर को पहुँचे सोय – वे ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते है।


सच्ची भक्ति के लिए, भक्ति का भेद जानना जरूरी

भक्ति भक्ति सब कोई कहै,
भक्ति न जाने भेद।
पूरण भक्ति जब मिलै,
कृपा करे गुरुदेव॥

भक्ति भक्ति सब कोई कहै – भक्ति भक्ति हर कोई कहता है, अर्थात सभी लोग भक्ति करना चाहते हैं,

भक्ति न जाने भेद – लेकिन, भक्ति कैसे की जाए, यह भेद नहीं जानते।

पूरण भक्ति जब मिलै – पूर्ण भक्ति अर्थात सच्ची भक्ति तभी हो सकती है,

कृपा करे गुरुदेव – जब सतगुरु की कृपा होती है।


भक्ति और मुक्ति से मिलनेवाला सुख, सिर्फ सच्चे भक्त को ही मिलता है

भक्ति जु सीढ़ी मुक्ति की,
चढ़े भक्त हरषाय।
और न कोई चढ़ि सकै,
निज मन समझो आय॥

भक्ति जु सिढी मुक्ति की – भक्ति, मुक्ति वह सीढी है,

चढ़े भक्त हरषाय – जिस पर चढ़कर भक्त को अपार ख़ुशी मिलती है।

और न कोई चढ़ी सकै – दूसरा कोई भी मनुष्य जो सच्ची भक्ति नहीं कर सकता, इस पर नहीं चढ़ सकता है,

निज मन समझो आय – यह समझ लेना चाहिए।


अहंकार, आसक्ति जैसे विकारों से भरा मन, सच्ची भक्ति नहीं कर सकता

बिना साँच सुमिरन नहीं,
बिन भेदी भक्ति न सोय।
पारस में परदा रहा,
कस लोहा कंचन होय॥

बिना सांच सुमिरन नहीं – बिना ज्ञान के प्रभु का स्मरण (सुमिरन) नहीं हो सकता और

बिन भेदी भक्ति न सोय – भक्ति का भेद जाने बिना सच्ची भक्ति नहीं हो सकती।

पारस में परदा रहा – जैसे पारस में थोडा सा भी खोट हो,

कस लोहा कंचन होय – तो वह लोहे को सोना नहीं बना सकता।

  • यदि मन में विकारों का खोट हो,
    जैसे अहंकार, आसक्ति, द्वेष, आदि
    तो सच्चे मन से भक्ति नहीं हो सकती

कबीर के दोहे – भक्ति

भक्ति महल बहु ऊँच है,
दूरहि ते दरशाय।
जो कोई जन भक्ति करे,
शोभा बरनि न जाय॥

जब लग नाता जगत का,
तब लग भक्ति न होय।
नाता तोड़े हरि भजे,
भगत कहावें सोय॥

भक्ति भक्ति सब कोइ कहै,
भक्ति न जाने मेव।
पूरण भक्ति जब मिलै,
कृपा करे गुरुदेव॥

और कर्म सब कर्म है,
भक्ति कर्म निहकर्म।
कहैं कबीर पुकारि के,
भक्ति करो तजि भर्म॥

भक्ति दुहेली गुरुन की,
नहिं कायर का काम।
सीस उतारे हाथ सों,
ताहि मिलै निज धाम॥

गुरु भक्ति अति कठिन है,
ज्यों खाड़े की धार।
बिना साँच पहुँचे नहीं,
महा कठिन व्यवहार॥

आरत है गुरु भक्ति करूँ,
सब कारज सिध होय।
करम जाल भौजाल में,
भक्त फँसे नहिं कोय॥

भाव बिना नहिं भक्ति जग,
भक्ति बिना नहीं भाव।
भक्ति भाव इक रूप है,
दोऊ एक सुभाव॥

भक्ति भाव भादौं नदी,
सबै चली घहराय।
सरिता सोई सराहिये,
जेठ मास ठहराय॥


Kabir Dohe – List


कबीर के दोहे – मन का फेर – अर्थ सहित


हाथ की माला और मन की माला में फर्क

माला फेरत जुग गया,
मिटा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे,
मन का मनका फेर॥

माला फेरत जुग गया – कबीरदासजी कहते है की, हे मनुष्य, तुमने हाथ में माला लेकर फेरते हुए कई युग बिता दिए

मिटा न मन का फेर – फिर भी संसार के विषयो के प्रति मोह और आसक्ति का अंत नहीं हुआ।

कर का मनका डारि दे – इसलिए हाथ की माला को छोड़कर

  • कर यानी हाथ और मनका मतलब माला

मन का मनका फेर – मन को ईश्वर के ध्यान में लगाओ।

  • मन का मनका – मन में ईश्वर के नाम की माला, मन से ईश्वर को याद करना

मन, माया, आशा, तृष्णा और शरीर का सम्बन्ध

माया मरी न मन मरा,
मर मर गये शरीर।
आशा तृष्णा ना मरी,
कह गये दास कबीर॥

माया मरी न मन मरा – न माया मरी और ना मन मरा

मर मर गये शरीर – सिर्फ शरीर ही बारंबार जन्म लेता है और मरता है।

आशा तृष्णा ना मरी – क्योंकि मनुष्य की आशा और तृष्णा नष्ट नहीं होती।

कह गये दास कबीर – कबीर दास जी कहते हैं – आशा और तृष्णा जैसे विकारों से मुक्त हुए बिना मनुष्य की मुक्ति या मोक्ष संभव नहीं है।

  • तृष्णा – craving, greed – लालच, लोभ, तीव्र इच्छा

बाहर के स्नान से ज्यादा जरूरी, भीतर से मन को साफ करना

न्हाये धोये क्या हुआ,
जो मन का मैल न जाय।
मीन सदा जल में रहै,
धोये बास न जाय॥

न्हाये धोये क्या हुआ – सिर्फ नहाने धोने से (शरीर को सिर्फ बाहर से साफ़ करने से) क्या होगा?

जो मन मैल न जाय – यदि मन मैला ही रह गया, अर्थात मन के विकार नहीं निकाल सके।

मीन सदा जल में रहै – मछली हमेशा जल में रहती है,

धोए बास न जाय – इतना धुलकर भी उसकी दुर्गन्ध (बास) नहीं जाती।


यदि मन शांत हो जाए, तो क्या होगा?

जग में बैरी कोय नहीं,
जो मन शीतल होय।
या आपा को डारि दे,
दया करे सब कोय॥

जग में बैरी कोय नहीं – संसार में हमारा कोई शत्रु (बैरी) नहीं हो सकता,

जो मन शीतल होय – यदि हमारा मन शांत हो तो।

या आपा को डारि दे – यदि हम मन से मान-अभिमान (आपा) और अहंकार को छोड़ दे,

दया करे सब कोय – तो हम सब पर दया करेंगे और सभी हमसे प्रेम करने लगेंगे।


तन से योगी की अपेक्षा, मन से योगी बनना ज्यादा जरूरी

तन को जोगी सब करै,
मन को करै न कोय।
सहजै सब विधि पाइये,
जो मन जोगी होय॥

तन को जोगी सब करै – तन से (योगी के वस्त्र पहनकर) कोई भी योगी बन सकता है,

मन को करै न कोय – मन से योगी (मन से आसक्तियों को त्यागकर योगी) कोई नहीं बनता।

सहजै सब सिधि पाइये – उस मनुष्य को सहज ही सब सिद्धिया मिल जाती है,

जो मन जोगी होय – जो मन से योगी बन जाता है यानी की जो मन को शांत कर लेता है।


कबीर के दोहे – मन का फेर – अर्थ सहित

बुरा जो देखन मैं चला,
बुरा न मिलिया कोय।
जो मन देखा आपना,
मुझ से बुरा न कोय॥

ऐसी वाणी बोलिए,
मन का आपा खोये।
औरन को शीतल करे,
आपहुं शीतल होए॥

फल कारण सेवा करे,
करे न मन से काम।
कहे कबीर सेवक नहीं,
चाहे चौगुना दाम॥

मन दिना कछु और ही,
तन साधून के संग।
कहे कबीर कारी दरी,
कैसे लागे रंग॥

सुमिरन मन में लाइए,
जैसे नाद कुरंग।
कहे कबीरा बिसर नहीं,
प्राण तजे ते ही संग॥

कबीर मन पंछी भय,
वहे ते बाहर जाए।
जो जैसी संगत करे,
सो तैसा फल पाए॥

धीरे-धीरे रे मना,
धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा,
ॠतु आए फल होय॥


Kabir Dohe – List


कबीर के दोहे – संगति


संगति पर संत कबीरदासजी के दोहे

मन के विकारों को दूर करने के लिए,अच्छे विचारों वाले लोगों की संगत

कबीर संगत साधु की,
नित प्रति कीजै जाय।
दुरमति दूर बहावसी,
देसी सुमति बताय॥

कबीर संगत साधु की – संत कबीर कहते हैं कि, सज्जन लोगों की संगत

नित प्रति कीजै जाय – प्रतिदिन करनी चाहिए। ज्ञानी सज्जनों की संगत में, प्रतिदिन जाना चाहिए।

दुरमति दूर बहावसी – इससे दुर्बुद्धि (दुरमति), दूर हो जाती है, मन के विकार, नष्ट हो जाते है और

देसी सुमति बताय – सदबुद्धि (सुमति), आती है।


बुरे विचार वाले लोगों के साथ, कभी ना जाए

कबीर संगत साधु की,
जौ की भूसी खाय।
खीर खांड भोजन मिले,
साकट संग न जाए॥

कबिर संगति साधु की – कबीरदासजी कहते हैं कि साधु की संगत में रहकर यदि

जो कि भूसी खाय – जौ की भूसी का भोजन भी मिले, तो भी उसे प्रेम से ग्रहण करना चाहिए।

  • जौ की भूसी का भोजन अर्थात स्वादहीन भोजन, सादा भोजन

खीर खांड भोजन मिले – लेकिन दुष्ट के साथ यदि खीर और मिष्ठान आदि स्वादिष्ट भोजन भी मिले,

साकत संग न जाय – तो भी उसके साथ यानी की दुष्ट स्वभाव वाले के साथ कभी नहीं जाना चाहिए।


संत लोगों की संगत, पारस पत्थर के समान

संगत कीजै साधु की,
कभी न निष्फल होय।
लोहा पारस परसते,
सो भी कंचन होय॥

संगत कीजै साधु की – संत कबीर कहते है की सन्तो की संगत करना चाहिए,

कभी न निष्फल होय – क्योंकि वह कभी निष्फल नहीं होती।

  • संतो की संगति का फल अवश्य प्राप्त होता है

लोहा पारस परसते – जैसे पारस के स्पर्श से, लोहा भी

सो भी कंचन होय – सोना बन जाता है।

  • वैसे ही संतो के वचनों को ध्यानपूर्वक सुनने और
    उन का पालन करने से,
    मनुष्य के मन के विकार नष्ट हो जाते है और
    वह भी सज्जन बन जाता है

कबीर के दोहे – संगति

संगति सों सुख्या ऊपजे,
कुसंगति सो दुख होय।
कह कबीर तहँ जाइये,
साधु संग जहँ होय॥

कबीरा मन पँछी भया,
भये ते बाहर जाय।
जो जैसे संगति करै,
सो तैसा फल पाय॥

सज्जन सों सज्जन मिले,
होवे दो दो बात।
गहदा सो गहदा मिले,
खावे दो दो लात॥

मन दिया कहुँ और ही,
तन साधुन के संग।
कहैं कबीर कोरी गजी,
कैसे लागै रंग॥

साधु संग गुरु भक्ति अरू,
बढ़त बढ़त बढ़ि जाय।
ओछी संगत खर शब्द रू,
घटत-घटत घटि जाय॥

साखी शब्द बहुतै सुना,
मिटा न मन का दाग।
संगति सो सुधरा नहीं,
ताका बड़ा अभाग॥

साधुन के सतसंग से,
थर-थर काँपे देह।
कबहुँ भाव कुभाव ते,
जनि मिटि जाय सनेह॥

हरि संगत शीतल भया,
मिटी मोह की ताप।
निशिवासर सुख निधि,
लहा अन्न प्रगटा आप॥

जा सुख को मुनिवर रटैं,
सुर नर करैं विलाप।
जो सुख सहजै पाईया,
सन्तों संगति आप॥

कबीरा कलह अरु कल्पना,
सतसंगति से जाय।
दुख बासे भागा फिरै,
सुख में रहै समाय॥

संगत कीजै साधु की,
होवे दिन-दिन हेत।
साकुट काली कामली,
धोते होय न सेत॥

सन्त सुरसरी गंगा जल,
आनि पखारा अंग।
मैले से निरमल भये,
साधू जन को संग॥


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कबीर के दोहे


कबीरदासजी के गुरु की महिमा पर दोहे और उनके सरल अर्थो के लिए, क्लिक करे

कबीर के दोहे – गुरु महिमा – अर्थ सहित


कबीरदास के दोहे

दु:ख में सुमिरन सब करै,
सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करै,
तो दु:ख काहे को होय॥

दु:ख में सुमिरन सब करै – मनुष्य ईश्वर को दुःख में याद करता है।
सुख में करै न कोय – सुख में ईश्वर को भूल जाते है
जो सुख में सुमिरन करै – यदि सुख में भी इश्वर को याद करे
तो दु:ख काहे को होय – तो दुःख निकट आएगा ही नहीं


गुरु गोविंद दोऊँ खड़े,
काके लागूं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने,
गोविंद दियो बताय॥

गुरु गोविंद दोऊ खड़े – गुरु और गोविन्द (भगवान) दोनों एक साथ खड़े है
काके लागूं पाँय – पहले किसके चरण-स्पर्श करें (प्रणाम करे)?
बलिहारी गुरु – कबीरदासजी कहते है, पहले गुरु को प्रणाम करूँगा
आपने गोविन्द दियो बताय – क्योंकि, आपने (गुरु ने) गोविंद तक पहुचने का मार्ग बताया है।


लूट सके तो लूट ले,
राम नाम की लूट।
पाछे फिर पछ्ताओगे,
प्राण जाहिं जब छूट॥

लूट सके तो लूट ले – अगर लूट सको तो लूट लो
राम नाम की लूट – अभी राम नाम की लूट है,
अभी समय है, तुम भगवान का जितना नाम लेना चाहते हो ले लो
पाछे फिर पछ्ताओगे – यदि नहीं लुटे तो बाद में पछताना पड़ेगा
प्राण जाहिं जब छूट – जब प्राण छुट जायेंगे


सतगुरू की महिमा अनंत,
अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघाडिया,
अनंत दिखावणहार॥

सतगुरु महिमा अनंत है – सतगुरु की महिमा अनंत हैं
अनंत किया उपकार – उन्होंने मुझ पर अनंत उपकार किये है
लोचन अनंत उघारिया – उन्होंने मेरे ज्ञान के चक्षु (अनन्त लोचन) खोल दिए
अनंत दिखावन हार – और मुझे अनंत (ईश्वर) के दर्शन करा दिए।


कामी क्रोधी लालची,
इनसे भक्ति ना होय।
भक्ति करै कोई सूरमा,
जादि बरन कुल खोय॥

कामी क्रोधी लालची
कामी – विषय वासनाओ में लिप्त रहता है,
क्रोधी – दुसरो से द्वेष करता है
लालची – निरंतर संग्रह करने में व्यस्त रहता है
इनते भक्ति न होय – इन लोगो से भक्ति नहीं हो सकती
भक्ति करै कोई सूरमा – भक्ति तो कोई शूरवीर (सुरमा) ही कर सकता है,
जादि बरन कुल खोय – जो जाति, वर्ण, कुल और अहंकार का त्याग कर सकता है


कहैं कबीर देय तू,
जब लग तेरी देह।
देह खेह हो जायगी,
कौन कहेगा देह॥

कहैं कबीर देय तू – कबीर कहते हैं, दान-पुण्य करते रहो,
जब लग तेरी देह – जब तक शरीर (देह) में प्राण हैं
देह खेह हो जायगी – जब यह शरीर धुल में मिल जाएगा (मृत्यु के बाद पंच तत्व में मिल जाएगा)
खेह – धूल, राख, धूल मिट्टी
कौन कहेगा देह – तब दान का अवसर नहीं मिलेगा
इसलिए मनुष्य ने जब तक शरीर में प्राण है तब तक दान अवश्य करना चाहिए


माया मरी न मन मरा,
मर मर गये शरीर।
आशा तृष्णा ना मरी,
कह गये दास कबीर॥

माया मरी न मन मरा – न माया मरी और ना मन मरा
मर मर गये शरीर – सिर्फ शरीर ही बार बार जन्म लेता है और मरता है
आशा तृष्णा ना मरी – क्योंकि मनुष्य की आशा और तृष्णा नष्ट नहीं होती
तृष्णा – craving, greed – लालच, लोभ, तीव्र इच्छा
कह गये दास कबीर – कबीर दास जी कहते हैं
आशा और तृष्णा जैसे विकारों से मुक्त हुए बिना मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्र से छुटकारा नहीं मिल सकता


माला फेरत जुग गया,
मिटा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे,
मन का मनका फेर॥

माला फेरत जुग गया – कबीरदासजी कहते है की तुमने हाथ में माला लेकर फेरते हुए कई वर्ष बिता दिए
मिटा न मन का फेर – फिर भी मन को शांत न कर सके
संसार के विषयो के प्रति मोह और आसक्ति को ना मिटा सके
कर का मनका डारि दे – इसलिए हाथ (कर) की माला (मनका) को छोड़कर
मन का मनका फेर – मन को ईश्वर के ध्यान में लगाओ.
मन का मनका – मन में इश्वर के नाम की माला, मन से ईश्वर को याद करना


कबीर ते नर अन्ध हैं,
गुरु को कहते और।
हरि के रुठे ठौर है,
गुरु रुठे नहिं ठौर॥

कबीर ते नर अन्ध हैं – संत कबीर कहते है की वे मनुष्य नेत्रहीन (अन्ध) के समान है
गुरु को कहते और – जो गुरु के महत्व को नहीं जानते
हरि के रुठे ठौर है – भगवान के रूठने पर मनुष्य को स्थान (ठौर) मिल सकता है
गुरु रुठे नहिं ठौर – लेकिन, गुरु के रूठने पर कही स्थान नहीं मिल सकता


दरशन कीजै साधु का,
दिन में कइ कइ बार।
आसोजा का भेह ज्यों,
बहुत करे उपकार॥

दरशन कीजै साधु का – संतो के दर्शन
दिन में कइ कइ बार – दिन में बार-बार करो
जब भी अवसर मिले, साधू-संतो के दर्शन करे
आसोजा का भेह ज्यों – जैसे आश्विन महीने की वर्षा
बहुत करे उपकार – फसल के लिए फायदेमंद है
वैसे ही संतो के दर्शन मनुष्य के लिए बहुत ही हितकारी है


बार-बार नहिं करि सके,
पाख-पाख करि लेय।
कहैं कबीर सो भक्त जन,
जन्म सुफल करि लेय॥

बार-बार नहिं करि सके – यदि साधू-संतो के दर्शन बार बार न हो पाते हो, तो
पाख-पाख करिलेय – पंद्रह दिन में एक बार अवश्य कर ले
कहैं कबीर सो भक्त जन – कबीरदासजी कहते है की, ऐसे भक्तजन
जो नित्य संतो के दर्शन करता है और उनकी वाणी सुनता है
जन्म सुफल करि लेय – भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ता हुआ अपना जन्म सफल कर लेता है


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कबीर के दोहे – गुरु महिमा – अर्थ सहित


आया था किस काम को,
तु सोया चादर तान।
सुरत सम्भाल ए गाफिल,
अपना आप पहचान॥

साईं इतना दीजिये,
जा मे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ,
साधु ना भूखा जाय॥

तिनका कबहुँ ना निंदये,
जो पाँव तले होय।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े,
पीर घानेरी होय॥

बडा हुआ तो क्या हुआ,
जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नही,
फल लागे अति दूर॥

आय हैं सो जाएँगे,
राजा रंक फकीर।
एक सिंहासन चढ़ि चले,
एक बँधे जात जंजीर॥

काल करे सो आज कर,
आज करे सो अब।
पल में प्रलय होएगी,
बहुरि करेगा कब॥

गुरु गोबिंद दोऊ खड़े,
का के लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपणे,
गोबिंद दियो मिलाय॥

धीरे-धीरे रे मना,
धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा,
ॠतु आए फल होय॥

जाति न पूछो साधु की,
पूछि लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का,
पड़ा रहन दो म्यान॥

दुर्लभ मानुष जन्म है,
देह न बारम्बार।
तरुवर ज्यों पत्ती झड़े,
बहुरि न लागे डार॥

कबीर के दोहे – 2


कबीरा ते नर अँध है,
गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है,
गुरु रूठे नहीं ठौर॥

पाँच पहर धन्धे गया,
तीन पहर गया सोय।
एक पहर हरि नाम बिन,
मुक्ति कैसे होय॥

शीलवन्त सबसे बड़ा,
सब रतनन की खान।
तीन लोक की सम्पदा,
रही शील में आन॥

गुरु कीजिए जानि के,
पानी पीजै छानि।
बिना विचारे गुरु करे,
परे चौरासी खानि॥

कामी, क्रोधी, लालची,
इनसे भक्ति न होय।
भक्ति करे कोइ सूरमा,
जाति वरन कुल खोय॥

जागन में सोवन करे,
साधन में लौ लाय।
सूरत डोर लागी रहे,
तार टूट नाहिं जाय॥

साधु ऐसा चहिए,
जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहे,
थोथ देइ उड़ाय॥

जहाँ दया तहाँ धर्म है,
जहाँ लोभ तहाँ पाप।
जहाँ क्रोध तहाँ पाप है,
जहाँ क्षमा तहाँ आप॥

सतगुरू की महिमा अनंत,
अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघाडिया,
अनंत दिखावणहार॥

यह तन विषय की बेलरी,
गुरु अमृत की खान।
सीस दिये जो गुरु मिलै,
तो भी सस्ता जान॥

शब्द गुरु का शब्द है,
काया का गुरु काय।
भक्ति करै नित शब्द की,
सत्गुरु यौं समुझाय॥

सुमरित सुरत जगाय कर,
मुख के कछु न बोल।
बाहर का पट बन्द कर,
अन्दर का पट खोल॥

जो गुरु ते भ्रम न मिटे,
भ्रान्ति न जिसका जाय।
सो गुरु झूठा जानिये,
त्यागत देर न लाय॥

गुरु लोभ शिष लालची,
दोनों खेले दाँव।
दोनों बूड़े बापुरे,
चढ़ि पाथर की नाँव॥

मैं अपराधी जन्म का,
नख-सिख भरा विकार।
तुम दाता दु:ख भंजना,
मेरी करो सम्हार॥

सुमिरन में मन लाइए,
जैसे नाद कुरंग।
कहैं कबीर बिसरे नहीं,
प्रान तजे तेहि संग॥

साधू गाँठ न बाँधई
उदर समाता लेय।
आगे पाछे हरी खड़े
जब माँगे तब देय॥

जहाँ आपा तहाँ आपदां,
जहाँ संशय तहाँ रोग।
कह कबीर यह क्यों मिटे,
चारों धीरज रोग॥

सात समंदर की मसि करौं
लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं
हरि गुण लिखा न जाइ॥

माया छाया एक सी,
बिरला जाने कोय।
भगता के पीछे लगे,
सम्मुख भागे सोय॥

Guru Mahima – Kabir Dohe with Meaning


Kabir Dohe Bhajan

गुरु महिमा – संत कबीर के दोहे अर्थसहित

गुरु गोविंद दोऊँ खड़े,
काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने,
गोविंद दियो बताय॥
  • गुरु गोविंद दोऊ खड़े – गुरु और गोविन्द (भगवान) दोनों एक साथ खड़े है
  • काके लागूं पाँय – पहले किसके चरण-स्पर्श करें (प्रणाम करे)?
  • बलिहारी गुरु – कबीरदासजी कहते है, पहले गुरु को प्रणाम करूँगा
  • आपने गोविन्द दियो बताय – क्योंकि, आपने (गुरु ने) गोविंद तक पहुचने का मार्ग बताया है।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय
गुरु आज्ञा मानै नहीं,
चलै अटपटी चाल।
लोक वेद दोनों गए,
आए सिर पर काल॥
  • गुरु आज्ञा मानै नहीं – जो मनुष्य गुरु की आज्ञा नहीं मानता है,
  • चलै अटपटी चाल – और गलत मार्ग पर चलता है
  • लोक वेद दोनों गए – वह लोक (दुनिया) और वेद (धर्म) दोनों से ही पतित हो जाता है
  • आए सिर पर काल – और दुःख और कष्टों से घिरा रहता है
गुरु नारायन रूप है, गुरु ज्ञान को घाट।
गुरु बिन ज्ञान न उपजै,
गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को,
गुरु बिन मिटे न दोष॥
  • गुरु बिन ज्ञान न उपजै – गुरु के बिना ज्ञान मिलना कठिन है
  • गुरु बिन मिलै न मोष – गुरु के बिना मोक्ष नहीं
  • गुरु बिन लखै न सत्य को – गुरु के बिना सत्य को पह्चानना असंभव है
  • गुरु बिन मिटे न दोष – गुरु बिना दोष का (मन के विकारों का) मिटना मुश्किल है
गुरु बिन ज्ञान न उपजै
गुरु कुम्हार शिष कुंभ है,
गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट।
अंतर हाथ सहार दै,
बाहर बाहै चोट॥
  • गुरु कुम्हार – गुरु कुम्हार के समान है
  • शिष कुंभ है – शिष्य मिट्टी के घडे के समान है
  • गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट – गुरु कठोर अनुशासन किन्तु मन में प्रेम भावना रखते हुए शिष्य के खोट को (मन के विकारों को) दूर करते है
  • अंतर हाथ सहार दै – जैसे कुम्हार घड़े के भीतर से हाथ का सहारा देता है
  • बाहर बाहै चोट – और बाहर चोट मारकर घड़े को सुन्दर आकार देता है
गुरु कुम्हार शिष कुंभ है

Sant Kabir Dohe – 1


Sant Kabir Dohe – 2

Kabir Dohe – Guru ki Mahima

गुरु पारस को अन्तरो,
जानत हैं सब संत।
वह लोहा कंचन करे,
ये करि लेय महंत॥
  • गुरु पारस को अन्तरो – गुरु और पारस पत्थर के अंतर को
  • जानत हैं सब संत – सभी संत (विद्वान, ज्ञानीजन) भलीभाँति जानते हैं।
  • वह लोहा कंचन करे – पारस पत्थर सिर्फ लोहे को सोना बनाता है
  • ये करि लेय महंत – किन्तु गुरु शिष्य को ज्ञान की शिक्षा देकर अपने समान गुनी और महान बना लेते है।

Kabirdas ke Dohe – Guru Mahima

गुरु समान दाता नहीं,
याचक सीष समान।
तीन लोक की सम्पदा,
सो गुरु दिन्ही दान॥
  • गुरु समान दाता नहीं – गुरु के समान कोई दाता (दानी) नहीं है
  • याचक सीष समान – शिष्य के समान कोई याचक (माँगनेवाला) नहीं है
  • तीन लोक की सम्पदा – ज्ञान रूपी अनमोल संपत्ति, जो तीनो लोको की संपत्ति से भी बढ़कर है
  • सो गुरु दिन्ही दान – शिष्य के मांगने से गुरु उसे यह (ज्ञान रूपी सम्पदा) दान में दे देते है
गुरु समान दाता नहीं
गुरु शरणगति छाडि के,
करै भरोसा और।
सुख संपती को कह चली,
नहीं नरक में ठौर॥
  • गुरु शरणगति छाडि के – जो व्यक्ति सतगुरु की शरण छोड़कर और उनके बत्ताए मार्ग पर न चलकर
  • करै भरोसा और – अन्य बातो में विश्वास करता है
  • सुख संपती को कह चली – उसे जीवन में दुखो का सामना करना पड़ता है और
  • नहीं नरक में ठौर – उसे नरक में भी जगह नहीं मिलती
कबीर माया मोहिनी,
जैसी मीठी खांड।
सतगुरु की किरपा भई,
नहीं तौ करती भांड॥
  • कबीर माया मोहिनी – माया (संसार का आकर्षण) बहुत ही मोहिनी है, लुभावनी है
  • जैसी मीठी खांड – जैसे मीठी शक्कर या मीठी मिसरी
  • सतगुरु की किरपा भई – सतगुरु की कृपा हो गयी (इसलिए माया के इस मोहिनी रूप से बच गया)
  • नहीं तौ करती भांड – नहीं तो यह मुझे भांड बना देती।
  • (भांड – विदूषक, मसख़रा, गंवार, उजड्ड)
  • माया ही मनुष्य को संसार के जंजाल में उलझाए रखती है। संसार के मोहजाल में फंसकर अज्ञानी मनुष्य मन में अहंकार, इच्छा, राग और द्वेष के विकारों को उत्पन्न करता रहता है।
  • विकारों से भरा मन, माया के प्रभाव से उपर नहीं उठ सकता है और जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसा रहता है।
  • कबीरदासजी कहते है, सतगुरु की कृपा से मनुष्य माया के इस मोहजाल से छूट सकता है।
यह तन विष की बेलरी,
गुरु अमृत की खान।
सीस दिये जो गुरु मिलै,
तो भी सस्ता जान॥
  • यह तन विष की बेलरी – यह शरीर सांसारिक विषयो की बेल है।
  • गुरु अमृत की खान – सतगुरु विषय और विकारों से रहित है इसलिए वे अमृत की खान है
  • मन के विकार (अहंकार, आसक्ति, द्वेष आदि) विष के समान होते है। इसलिए शरीर जैसे विष की बेल है।
  • सीस दिये जो गुर मिलै – ऐसे सतगुरु यदि शीश (सर्वस्व) अर्पण करने पर भी मिल जाए
  • तो भी सस्ता जान – तो भी यह सौदा सस्ता ही समझना चाहिए।
  • अपना सर्वस्व समर्पित करने पर भी ऐसे सतगुरु से भेंट हो जाए, जो विषय विकारों से मुक्त है। तो भी यह सौदा सस्ता ही समझना चाहिए। क्योंकि, गुरु से ही हमें ज्ञान रूपी अनमोल संपत्ति मिल सकती है, जो तीनो लोको की संपत्ति से भी बढ़कर है।
सतगुरू की महिमा अनंत,
अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघाडिया,
अनंत दिखावणहार॥
  • सतगुरु महिमा अनंत है – सतगुरु की महिमा अनंत हैं
  • अनंत किया उपकार – उन्होंने मुझ पर अनंत उपकार किये है
  • लोचन अनंत उघारिया – उन्होंने मेरे ज्ञान के चक्षु (अनन्त लोचन) खोल दिए
  • अनंत दिखावन हार – और मुझे अनंत (ईश्वर) के दर्शन करा दिए।
  • ज्ञान चक्षु खुलने पर ही मनुष्य को इश्वर के दर्शन हो सकते है। मनुष्य आंखों से नहीं परन्तु भीतर के ज्ञान के चक्षु से ही निराकार परमात्मा को देख सकता है।
सब धरती कागद करूँ,
लिखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूँ,
गुरु गुण लिखा न जाय॥
  • सब धरती कागद करूं – सारी धरती को कागज बना लिया जाए
  • लिखनी सब बनराय – सब वनों की (जंगलो की) लकडियो को कलम बना ली जाए
  • सात समुद्र का मसि करूं – सात समुद्रों को स्याही बना ली जाए
  • गुरु गुण लिखा न जाय – तो भी गुरु के गुण लिखे नहीं जा सकते (गुरु की महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता)। क्योंकि, गुरु की महिमा अपरंपार है।

Sant Kabir Dohe – Guru Mahima

गुरु सों ज्ञान जु लीजिए,
सीस दीजिए दान।
बहुतक भोंदू बह गए,
राखि जीव अभिमान॥
  • गुरु सों ज्ञान जु लीजिए – गुरु से ज्ञान पाने के लिए
  • सीस दीजिए दान – तन और मन पूर्ण श्रद्धा से गुरु के चरणों में समर्पित कर दो।
  • राखि जीव अभिमान – जो अपने तन, मन और धन का अभिमान नहीं छोड़ पाते है
  • बहुतक भोंदु बहि गये – ऐसे कितने ही मूर्ख (भोंदु) और अभिमानी लोग संसार के माया के प्रवाह में बह जाते है। वे संसार के माया जाल में उलझ कर रह जाते है और उद्धार से वंचित रह जाते है।
गुरु मूरति गति चंद्रमा,
सेवक नैन चकोर।
आठ पहर निरखत रहे,
गुरु मूरति की ओर॥
  • गुरु मूरति गति चंद्रमा – गुरु की मूर्ति जैसे चन्द्रमा और
  • सेवक नैन चकोर – शिष्य के नेत्र जैसे चकोर पक्षी। (चकोर पक्षी चन्द्रमा को निरंतर निहारता रहता है, वैसे ही हमें)
  • गुरु मूरति की ओर – गुरु ध्यान में और गुरु भक्ति में
  • आठ पहर निरखत रहे – आठो पहर रत रहना चाहिए।
    (निरखत, निरखना – ध्यान से देखना)
कबीर ते नर अन्ध हैं,
गुरु को कहते और।
हरि के रुठे ठौर है,
गुरु रुठे नहिं ठौर॥
  • कबीर ते नर अन्ध हैं – संत कबीर कहते है की वे मनुष्य नेत्रहीन (अन्ध) के समान है
  • गुरु को कहते और – जो गुरु के महत्व को नहीं जानते
  • हरि के रुठे ठौर है – भगवान के रूठने पर मनुष्य को स्थान (ठौर) मिल सकता है
  • गुरु रुठे नहिं ठौर – लेकिन, गुरु के रूठने पर कही स्थान नहीं मिल सकता

आछे दिन पाछे गए,
गुरु सों किया न हेत।
अब पछतावा क्या करै,
चिड़ियाँ चुग गईं खेत॥
  • आछे दिन पाछे गये – अच्छे दिन बीत गए
    • मनुष्य सुख के दिन सिर्फ मौज मस्ती में बिता देता है
  • गुरु सों किया न हेत – गुरु की भक्ति नहीं की, गुरु के वचन नहीं सुने
  • अब पछितावा क्या करे – अब पछताने से क्या होगा
  • चिड़िया चुग गई खेत – जब चिड़ियाँ खेत चुग गई (जब अवसर चला गया)

Satguru Bhajans

Kabir Dohe and Bhajans

Kabirdas ke Dohe – Guru Mahima

गुरु मुरति आगे खडी,
दुतिया भेद कछु नाहि।
उन्ही कूं परनाम करि,
सकल तिमिर मिटी जाहिं॥


गुरु की आज्ञा आवै,
गुरु की आज्ञा जाय।
कहैं कबीर सो संत हैं,
आवागमन नशाय॥


भक्ति पदारथ तब मिलै,
जब गुरु होय सहाय।
प्रेम प्रीति की भक्ति जो,
पूरण भाग मिलाय॥


गुरु को सिर राखिये,
चलिये आज्ञा माहिं।
कहैं कबीर ता दास को,
तीन लोक भय नहिं॥


गुरुमुख गुरु चितवत रहे,
जैसे मणिहिं भुवंग।
कहैं कबीर बिसरें नहीं,
यह गुरुमुख को अंग॥


कबीर ते नर अंध है,
गुरु को कहते और।
हरि के रूठे ठौर है,
गुरु रूठे नहिं ठौर॥


भक्ति-भक्ति सब कोई कहै,
भक्ति न जाने भेद।
पूरण भक्ति जब मिलै,
कृपा करे गुरुदेव॥


गुरु बिन माला फेरते,
गुरु बिन देते दान।
गुरु बिन सब निष्फल गया,
पूछौ वेद पुरान॥


कबीर गुरु की भक्ति बिन,
धिक जीवन संसार।
धुवाँ का सा धौरहरा,
बिनसत लगै न बार॥


कबीर गुरु की भक्ति करु,
तज निषय रस चौंज।
बार-बार नहिं पाइए,
मानुष जनम की मौज॥


काम क्रोध तृष्णा तजै,
तजै मान अपमान।
सतगुरु दाया जाहि पर,
जम सिर मरदे मान॥


कबीर गुरु के देश में,
बसि जानै जो कोय।
कागा ते हंसा बनै,
जाति वरन कुल खोय॥


आछे दिन पाछे गए,
गुरु सों किया न हेत।
अब पछतावा क्या करै,
चिड़ियाँ चुग गईं खेत॥


अमृत पीवै ते जना,
सतगुरु लागा कान।
वस्तु अगोचर मिलि गई,
मन नहिं आवा आन॥


बलिहारी गुरु आपनो,
घड़ी-घड़ी सौ सौ बार।
मानुष से देवत किया,
करत न लागी बार॥


गुरु आज्ञा लै आवही,
गुरु आज्ञा लै जाय।
कहै कबीर सो सन्त प्रिय,
बहु विधि अमृत पाय॥


भूले थे संसार में,
माया के साँग आय।
सतगुरु राह बताइया,
फेरि मिलै तिहि जाय॥


बिना सीस का मिरग है,
चहूँ दिस चरने जाय।
बांधि लाओ गुरुज्ञान सूं,
राखो तत्व लगाय॥


गुरु नारायन रूप है,
गुरु ज्ञान को घाट।
सतगुरु बचन प्रताप सों,
मन के मिटे उचाट॥


गुरु समरथ सिर पर खड़े,
कहा कमी तोहि दास।
रिद्धि सिद्धि सेवा करै,
मुक्ति न छोड़े पास॥

Kabir Bhajan and Dohe

Sant Kabir ke Dohe – Sumiran + Meaning


कबीर के दोहे – सुमिरन + अर्थसहित

Sumiran – Kabir ke Dohe – (Arth sahit)


दु:ख में सुमिरन सब करै,
सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करै,
तो दु:ख काहे को होय॥

अर्थ (Meaning in Hindi):

  • दु:ख में सुमिरन सब करै – आमतौर पर मनुष्य ईश्वर को दुःख में याद करता है।
  • सुख में करै न कोय – सुख में ईश्वर को भूल जाते है
  • जो सुख में सुमिरन करै – यदि सुख में भी इश्वर को याद करे
  • तो दु:ख काहे को होय – तो दुःख निकट आएगा ही नहीं

काह भरोसा देह का,
बिनसी जाय छिन मांहि।
सांस सांस सुमिरन करो
और जतन कछु नाहिं॥

अर्थ (Meaning in Hindi):

  • कहा भरोसा देह का – इस शरीर का क्या भरोसा है
  • बिनसी जाय छिन मांहि – किसी भी क्षण यह (शरीर) हमसे छीन सकता है (1), इसलिए
  • सांस सांस सुमिरन करो – हर साँस में ईश्वर को याद करो
  • और जतन कछु नाहिं – इसके अलावा मुक्ति का कोई दूसरा मार्ग नहीं है

कबीर सुमिरन सार है,
और सकल जंजाल।
आदि अंत मधि सोधिया,
दूजा देखा काल॥

अर्थ (Meaning in Hindi):

  • कबीर सुमिरन सार है – कबीरदासजी कहते हैं कि सुमिरन (ईश्वर का ध्यान) ही मुख्य है,
  • और सकल जंजाल – बाकी सब मोह माया का जंजाल है
  • आदि अंत मधि सोधिया – शुरू में, अंत में और मध्य में जांच परखकर देखा है,
  • दूजा देखा काल – सुमिरन के अलावा बाकी सब काल (दुःख) है
    (सार – essence – सारांश, तत्त्व, मूलतत्त्व)

राम नाम सुमिरन करै,
सतगुरु पद निज ध्यान।
आतम पूजा जीव दया,
लहै सो मुक्ति अमान॥

अर्थ (Meaning in Hindi):

  • राम नाम सुमिरन करै – जो मनुष्य राम नाम का सुमिरन करता है (इश्वर को याद करता है)
  • सतगुरु पद निज ध्यान – सतगुरु के चरणों का निरंतर ध्यान करता है
  • आतम पूजा – अंतर्मन से ईश्वर को पूजता है
  • जीव दया – सभी जीवो पर दया करता है
  • लहै सो मुक्ति अमान – वह इस संसार से मुक्ति (मोक्ष) पाता है।

सुमिरण मारग सहज का,
सतगुरु दिया बताय।
सांस सांस सुमिरण करूं,
इक दिन मिलसी आय॥

अर्थ (Meaning in Hindi):

  • सुमिरण मारग सहज का – सुमिरण का मार्ग बहुत ही सहज और सरल है
  • सतगुरु दिया बताय – जो मुझे सतगुरु ने बता दिया है
  • सांस सांस सुमिरण करूं – अब मै हर साँस में प्रभु को याद करता हूँ
  • इक दिन मिलसी आय – एक दिन निश्चित ही मुझे ईश्वर के दर्शन होंगे

सुमिरण की सुधि यौ करो,
जैसे कामी काम।
एक पल बिसरै नहीं,
निश दिन आठौ जाम॥

अर्थ (Meaning in Hindi):

  • सुमिरण की सुधि यौ करो – ईश्वर को याद इस प्रकार करो
  • जैसे कामी काम – जैसे कामी पुरुष हर समय विषयो के बारे में सोचता है
  • एक पल बिसरै नहीं – एक पल भी व्यर्थ मत गवाओ
  • निश दिन आठौ जाम – रात, दिन, आठों पहर प्रभु परमेश्वर को याद करो

बिना साँच सुमिरन नहीं,
बिन भेदी भक्ति न सोय।
पारस में परदा रहा,
कस लोहा कंचन होय॥

अर्थ (Meaning in Hindi):

  • बिना सांच सुमिरन नहीं – बिना ज्ञान के प्रभु का स्मरण (सुमिरन) नहीं हो सकता और
  • बिन भेदी भक्ति न सोय – भक्ति का भेद जाने बिना सच्ची भक्ति नहीं हो सकती
  • पारस में परदा रहा – जैसे पारस में थोडा सा भी खोट हो
  • कस लोहा कंचन होय – तो वह लोहे को सोना नहीं बना सकता.
    • यदि मन में विकारों का खोट हो तो मनुष्य सच्चे मन से सुमिरन नहीं कर सकता

दर्शन को तो साधु हैं,
सुमिरन को गुरु नाम।
तरने को आधीनता,
डूबन को अभिमान॥

अर्थ (Meaning in Hindi):

  • दर्शन को तो साधु हैं – दर्शन के लिए सन्तों का दर्शन श्रेष्ठ हैं और
  • सुमिरन को गुरु नाम – सुमिरन के लिए (चिन्तन के लिए) गुरु व्दारा बताये गये नाम एवं गुरु के वचन उत्तम है
  • तरने को आधीनता – भवसागर (संसार रूपी भव) से पार उतरने के लिए आधीनता अर्थात विनम्र होना अति आवश्यक है
  • डूबन को अभिमान – लेकिन डूबने के लिए तो अभिमान, अहंकार ही पर्याप्त है (अर्थात अहंकार नहीं करना चाहिए)

लूट सके तो लूट ले,
राम नाम की लूट।
पाछे फिर पछ्ताओगे,
प्राण जाहिं जब छूट॥

अर्थ (Meaning in Hindi):

  • लूट सके तो लूट ले – अगर लूट सको तो लूट लो
  • राम नाम की लूट – अभी राम नाम की लूट है,
    • अभी समय है, तुम भगवान का जितना नाम लेना चाहते हो ले लो
  • पाछे फिर पछ्ताओगे – यदि नहीं लुटे तो बाद में पछताना पड़ेगा
  • प्राण जाहिं जब छूट – जब प्राण छुट जायेंगे

आदि नाम पारस अहै,
मन है मैला लोह।
परसत ही कंचन भया,
छूटा बंधन मोह॥

अर्थ (Meaning in Hindi):

  • आदि नाम पारस अहै – ईश्वर का स्मरण पारस के समान है
  • मन है मैला लोह – विकारों से भरा मन (मैला मन) लोहे के समान है
  • परसत ही कंचन भया – पारस के संपर्क से लोहा कंचन (सोना) बन जाता है
    • ईश्वर के नाम से मन शुद्ध हो जाता है
  • छूटा बंधन मोह – और मनुष्य मोह माया के बन्धनों से छूट जाता है

कबीरा सोया क्या करे,
उठि न भजे भगवान।
जम जब घर ले जायेंगे,
पड़ी रहेगी म्यान॥


पाँच पहर धन्धे गया,
तीन पहर गया सोय।
एक पहर हरि नाम बिन,
मुक्ति कैसे होय॥


नींद निशानी मौत की,
उठ कबीरा जाग।
और रसायन छांड़ि के,
नाम रसायन लाग॥


रात गंवाई सोय के,
दिवस गंवाया खाय।
हीरा जन्म अमोल था,
कोड़ी बदले जाय॥

Sant Kabir Bhajans and Dohe

Sant Kabir ke Dohe – Sumiran

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Sant Kabir ke Dohe – Sumiran

Dukh mein sumiran sab karai,
sukh mein karai na koy.
Jo sukh mein sumiran karai,
to dukh kaahe ko hoy.


Kaah bharosa deh ka,
binasi jaay chhin maanhi.
Saans saans sumiran karo
Aur jatan kachhu naahin.


Kabir sumiran saar hai,
aur sakal janjaal.
Aadi ant madhi sodhiya,
dooja dekha kaal.


Raam naam sumiran karai,
satguru pad nij dhyaan.
Aatam pooja jiv daya,
lahai so mukti amaan.


Sumiran maarag sahaj ka,
satguru diya bataay.
Saans saans sumiran karoon,
ik din milasi aay.


Sumiran ki sudhi yau karo,
jaise kaami kaam.
Ek pal bisarai nahin,
nish din aathau yaam.


Bina saanch sumiran nahi,
bin bhedi bhakti na soy.
Paaras mein pardaa rahaa,
kas loha kanchan hoy.


Darshan ko to saadhu hain,
sumiran ko guru naam.
Tarne ko aadhinta,
dooban ko abhimaan.


Loot sake to loot le,
Ram naam ki loot.
Paachhe phir pachhtaoge,
praan jaahi jab chhoot.


Aadi naam paaras ahai,
man hai maila loh.
Parasat hi kanchan bhaya,
chhoota bandhan moh.


Kabira soya kya kare,
uthi na bhaje bhagavaan.
Jam jab ghar le jaayenge,
padi rahegi myaan.


Paanch pahar dhandhe gaya,
tin pahar gaya soy.
Ek pahar hari naam bin,
mukti kaise hoy.


Nind nishaani maut ki,
uth kabira jaag.
Aur rasaayan chhaandi ke,
naam rasaayan laag.


Raat ganvai soy ke,
divas ganvaaya khaay.
Hira janm amol tha,
kodi badale jaay.

Sant Kabir ke Dohe – Bhakti + Meaning in Hindi


संत कबीर के दोहे – भक्ति – अर्थ सहित

Bhakti – Kabir ke Dohe – (Arth sahit)


कामी क्रोधी लालची,
इनसे भक्ति ना होय।
भक्ति करै कोई सूरमा,
जाति बरन कुल खोय॥

अर्थ (Meaning in Hindi):

  • कामी क्रोधी लालची – कामी (विषय वासनाओ में लिप्त रहता है), क्रोधी (दुसरो से द्वेष करता है) और लालची (निरंतर संग्रह करने में व्यस्त रहता है)
  • इनते भक्ति न होय – इन लोगो से भक्ति नहीं हो सकती
  • भक्ति करै कोई सूरमा – भक्ति तो कोई पुरुषार्थी, शूरवीर ही कर सकता है, जो
  • जादि बरन कुल खोय – जाति, वर्ण, कुल और अहंकार का त्याग कर सकता है

भक्ति बिन नहिं निस्तरे,
लाख करे जो कोय।
शब्द सनेही होय रहे,
घर को पहुँचे सोय॥

अर्थ (Meaning in Hindi):

  • भक्ति बिन नहिं निस्तरे – भक्ति के बिना मुक्ति संभव नहीं है
  • लाख करे जो कोय – चाहे कोई लाख प्रयत्न कर ले
  • शब्द सनेही होय रहे – जो सतगुरु के वचनों को (शब्दों को) ध्यान से सुनता है और उनके बताये मार्ग पर चलता है
  • घर को पहुँचे सोय – वे ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते है

भक्ति भक्ति सब कोई कहै,
भक्ति न जाने भेद।
पूरण भक्ति जब मिलै,
कृपा करे गुरुदेव॥

अर्थ (Meaning in Hindi):

  • भक्ति भक्ति सब कोई कहै – भक्ति भक्ति हर कोई कहता है (सभी सभी लोग भक्ति करना चाहते हैं), लेकिन
  • भक्ति न जाने भेद – भक्ति कैसे की जाए यह भेद नहीं जानते
  • पूरण भक्ति जब मिलै – पूर्ण भक्ति (सच्ची भक्ति) तभी हो सकती है
  • कृपा करे गुरुदेव – जब सतगुरु की कृपा होती है (1)

भक्ति जु सीढ़ी मुक्ति की,
चढ़े भक्त हरषाय।
और न कोई चढ़ि सकै,
निज मन समझो आय॥

अर्थ (Meaning in Hindi):

  • भक्ति जु सिढी मुक्ति की – भक्ति मुक्ति वह सीढी है
  • चढ़े भक्त हरषाय – जिस पर चढ़कर भक्त को अपार ख़ुशी मिलती है
  • और न कोई चढ़ी सकै – दूसरा कोई (जो मनुष्य सच्ची भक्ति नहीं कर सकता) इस पर नहीं चढ़ सकता है
  • निज मन समझो आय – यह समझ लेना चाहिए

भक्ति महल बहु ऊँच है,
दूरहि ते दरशाय।
जो कोई जन भक्ति करे,
शोभा बरनि न जाय॥


जब लग नाता जगत का,
तब लग भक्ति न होय।
नाता तोड़े हरि भजे,
भगत कहावें सोय॥


भक्ति भक्ति सब कोइ कहै,
भक्ति न जाने मेव।
पूरण भक्ति जब मिलै,
कृपा करे गुरुदेव॥


बिना साँच सुमिरन नहीं,
बिन भेदी भक्ति न सोय।
पारस में परदा रहा,
कस लोहा कंचन होय॥

अर्थ (Meaning in Hindi):

  • बिना सांच सुमिरन नहीं – बिना ज्ञान के प्रभु का स्मरण (सुमिरन) नहीं हो सकता और
  • बिन भेदी भक्ति न सोय – भक्ति का भेद जाने बिना सच्ची भक्ति नहीं हो सकती
  • पारस में परदा रहा – जैसे पारस में थोडा सा भी खोट हो
  • कस लोहा कंचन होय – तो वह लोहे को सोना नहीं बना सकता.
    • यदि मन में विकारों का खोट हो (जैसे अहंकार, आसक्ति, द्वेष), तो सच्चे मन से भक्ति नहीं हो सकती

और कर्म सब कर्म है,
भक्ति कर्म निहकर्म।
कहैं कबीर पुकारि के,
भक्ति करो तजि भर्म॥


भक्ति दुहेली गुरुन की,
नहिं कायर का काम।
सीस उतारे हाथ सों,
ताहि मिलै निज धाम॥


गुरु भक्ति अति कठिन है,
ज्यों खाड़े की धार।
बिना साँच पहुँचे नहीं,
महा कठिन व्यवहार॥


आरत है गुरु भक्ति करूँ,
सब कारज सिध होय।
करम जाल भौजाल में,
भक्त फँसे नहिं कोय॥


भाव बिना नहिं भक्ति जग,
भक्ति बिना नहीं भाव।
भक्ति भाव इक रूप है,
दोऊ एक सुभाव॥


भक्ति भाव भादौं नदी,
सबै चली घहराय।
सरिता सोई सराहिये,
जेठ मास ठहराय॥

Sant Kabir Bhajans and Dohe

Bhakti – Kabir ke Dohe

Kaami krodhi lallchi,
inase bhakti na hoy.
Bhakti karai koi soorama,
jaati baran kul khoy.


Bhakti bin nahi nistare,
laakh kare jo koy.
Shabd sanehi hoy rahe,
ghar ko pahunche soy.


Bhakti bhakti sab koi kahai,
bhakti na jaane bhed.
Pooran bhakti jab milai,
kripa kare gurudev.


Bhakti ju sidhi mukti ki,
chadhe bhakt harashaay.
Aur na koi chadhi sakai,
nij man samajho aay.


Bhakti mahal bahu oonch hai,
doorahi te darashaay.
Jo koi jan bhakti kare,
shobha barani na jaay.


Jab lag naata jagat ka,
tab lag bhakti na hoy.
Naata tode Hari bhaje,
bhagat kahaaven soy.


Bina saanch sumiran nahin,
bin bhedi bhakti na soy.
Paaras mein parada raha,
kas loha kanchan hoy.


Aur karm sab karm hai,
bhakti karm nihakarm.
Kahai Kabir pukaari ke,
bhakti karo taji bharm.


Bhakti duheli guru ki,
nahi kaayar ka kaam.
Sis utaare haath so,
taahi milai nij dhaam.


Guru bhakti ati kathin hai,
jyon khaade ki dhaar.
Bina saanch pahunche nahin,
maha kathin vyavahaar.


Aarat hai Guru bhakti karoo,
sab kaaraj sidh hoy.
Karam jaal bhaujaal mein,
bhakt phanse nahi koy.


Bhaav bina nahi bhakti jag,
bhakti bina nahi bhaav.
Bhakti bhaav ik roop hai,
dooo ek subhaav.


Bhakti bhaav bhaado nadi,
sabai chali ghaharaay.
Sarita soi saraahiye,
jeth maas thaharaay.