शिव पुराण – वायवीय संहिता – उत्तरखण्ड – 26


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शिव पुराण संहिता लिंकविद्येश्वर | रुद्र संहिता | शतरुद्र | कोटिरुद्र | उमा | कैलास | वायवीय


आवरणपूजाकी विस्तृत विधि तथा उक्त विधिसे पूजनकी महिमाका वर्णन

उपमन्यु कहते हैं – यदुनन्दन! पहले शिवा और शिवके दायें और बायें भागमें क्रमशः गणेश और कार्तिकेयका गन्ध आदि पाँच उपचारोंद्वारा पूजन करे।

फिर इन सबके चारों ओर ईशानसे लेकर सद्योजातपर्यन्त पाँच ब्रह्ममूर्तियोंका शक्तिसहित क्रमशः पूजन करे।

यह प्रथम आवरणमें किया जानेवाला पूजन है।

उसी आवरणमें हृदय आदि छः अंगों तथा शिव और शिवाका अग्निकोणसे लेकर पूर्वदिशापर्यन्त आठ दिशाओंमें क्रमशः पूजन करे।

वहीं वामा आदि शक्तियोंके साथ वाम आदि आठ रुद्रोंकी पूर्वादि दिशाओंमें क्रमशः पूजा करे।

यह पूजन वैकल्पिक है।

यदुनन्दन! यह मैंने तुमसे प्रथम आवरणका वर्णन किया है।

अब प्रेमपूर्वक दूसरे आवरणका वर्णन किया जाता है, श्रद्धापूर्वक सुनो।

पूर्व-दिशावाले दलमें अनन्तका और उनके वामभागमें उनकी शक्तिका पूजन करे।

दक्षिणदिशावाले दलमें शक्तिसहित सूक्ष्म-देवकी पूजा करे।

पश्चिमदिशाके दलमें शक्तिसहित शिवोत्तमका, उत्तरदिशावाले दलमें शक्तियुक्त एकनेत्रका, ईशानकोणवाले दलमें एकरुद्र और उनकी शक्तिका, अग्नि-कोणवाले दलमें त्रिमूर्ति और उनकी शक्तिका, नैर्ऋत्यकोणके दलमें श्रीकण्ठ और उनकी शक्तिका तथा वायव्यकोणवाले दलमें शक्तिसहित शिखण्डीशका पूजन करे।

समस्त चक्रवर्तियोंकी भी द्वितीय आवरणमें ही पूजा करनी चाहिये।

तृतीय आवरणमें शक्तियोंसहित अष्टमूर्तियोंका पूर्वादि आठों दिशाओंमें क्रमशः पूजन करे।

भव, शर्व, ईशान, रुद्र, पशुपति, उग्र, भीम और महादेव – ये क्रमशः आठ मूर्तियाँ हैं।

इसके बाद उसी आवरणमें शक्तियोंसहित महादेव आदि ग्यारह मूर्तियोंकी पूजा करनी चाहिये।

महादेव, शिव, रुद्र, शंकर, नीललोहित, ईशान, विजय, भीम, देवदेव, भवोद्भव तथा कपर्दीश (या कपालीश) – ये ग्यारह मूर्तियाँ हैं।

इनमेंसे जो प्रथम आठ मूर्तियाँ हैं, उनका अग्निकोणवाले दलसे लेकर पूर्वदिशापर्यन्त आठ दिशाओंमें पूजन करना चाहिये।

देवदेवको पूर्वदिशाके दलमें स्थापित एवं पूजित करे और ईशानका पुनः अग्निकोणमें स्थापन-पूजन करे।

फिर इन दोनोंके बीचमें भवोद्भवकी पूजा करे और उन्हींके बाद कपालीश या कपर्दीशका स्थापन-पूजन करना चाहिये।

उस तृतीय आवरणमें फिर वृषभराजका पूर्वमें, नन्दीका दक्षिणमें, महाकालका उत्तरमें, शास्ताका अग्निकोणके दलमें, मातृकाओंका दक्षिणदिशाके दलमें, गणेशजीका नैर्ऋत्यकोणके दलमें, कार्तिकेयका पश्चिमदलमें, ज्येष्ठाका वायव्यकोणके दलमें, गौरीका उत्तरदलमें, चण्डका ईशानकोणमें तथा शास्ता एवं नन्दीश्वरके बीचमें मुनीन्द्र वृषभका यजन करे।

महाकालके उत्तरभागमें पिंगलका, शास्ता और मातृकाओंके बीचमें भृंगीश्वरका, मातृकाओं तथा गणेशजीके बीचमें वीरभद्रका, स्कन्द और गणेशजीके बीचमें सरस्वतीदेवीका, ज्येष्ठा और कार्तिकेयके बीचमें शिवचरणोंकी अर्चना करनेवाली श्रीदेवीका, ज्येष्ठा और गणाम्बा (गौरी)-के बीचमें महामोटीकी पूजा करे।

गणाम्बा और चण्डके बीचमें दुर्गादेवीकी पूजा करे।

इसी आवरणमें पुनः शिवके अनुचरवर्गकी पूजा करे।

इस अनुचरवर्गमें रुद्रगण, प्रमथगण और भूतगण आते हैं।

इन सबके विविध रूप हैं और ये सब-के-सब अपनी शक्तियोंके साथ हैं।

इनके बाद एकाग्रचित्त हो शिवाके सखीवर्गका भी ध्यान एवं पूजन करना चाहिये।

इस प्रकार तृतीय आवरणके देवताओंका विस्तारपूर्वक पूजन हो जानेपर उसके बाह्यभागमें चतुर्थ आवरणका चिन्तन एवं पूजन करे।

पूर्वदलमें सूर्यका, दक्षिणदलमें चतुर्मुख ब्रह्माका, पश्चिमदलमें रुद्रका और उत्तरदिशाके दलमें भगवान् विष्णुका पूजन करे।

इन चारों देवताओंके भी पृथक्-पृथक् आवरण हैं।

इनके प्रथम आवरणमें छहों अंगों तथा दीप्ता आदि शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये।

दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अमोघा और विद्युता – इनकी क्रमशः पूर्व आदि आठ दिशाओंमें स्थिति है।

द्वितीय आवरणमें पूर्वसे लेकर उत्तरतक क्रमशः चार मूर्तियोंकी और उनके बाद उनकी शक्तियोंकी पूजा करे।

आदित्य, भास्कर, भानु और रवि – ये चार मूर्तियाँ क्रमशः पूर्वादि चारों दिशाओंमें पूजनीय हैं।

तत्पश्चात् अर्क, ब्रह्मा, रुद्र तथा विष्णु – ये चार मूर्तियाँ भी पूर्वादि दिशाओंमें पूजनीय हैं।

पूर्वदिशामें विस्तरा, दक्षिणदिशामें सुतरा, पश्चिमदिशामें बोधिनी और उत्तरदिशामें आप्यायिनीकी पूजा करे।

ईशानकोणमें उषाकी, अग्निकोणमें प्रभाकी, नैर्ऋत्यकोणमें प्राज्ञाकी और वायव्यकोणमें संध्याकी पूजा करे।

इस तरह द्वितीय आवरणमें इन सबकी स्थापना करके विधिवत् पूजा करनी चाहिये।

तृतीय आवरणमें सोम, मंगल, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ बुध, विशालबुद्धि बृहस्पति, तेजोनिधि शुक्र, शनैश्चर तथा धूम्रवर्णवाले भयंकर राहु-केतुका पूर्वादि दिशाओंमें पूजन करे अथवा द्वितीय आवरणमें द्वादश आदित्योंकी पूजा करनी चाहिये और तृतीय आवरणमें द्वादश राशियोंकी।

उसके बाह्य भागमें सात-सात गणोंकी सब ओर पूजा करनी चाहिये।

ऋषियों, देवताओं, गन्धर्वों, नागों, अप्सराओं, ग्रामणियों, यक्षों, यातुधानों, सात छन्दोमय अश्वों तथा वालखिल्योंका पूजन करे।

इस तरह तृतीय आवरणमें सूर्यदेवका पूजन करनेके पश्चात् तीन आवरणोंसहित ब्रह्माजीका पूजन करे।

पूर्वदिशामें हिरण्यगर्भका, दक्षिणमें विराट् का, पश्चिमदिशामें कालका और उत्तरदिशामें पुरुषका पूजन करे।

हिरण्यगर्भ नामक जो पहले ब्रह्मा हैं, उनकी अंगकान्ति कमलके समान है।

काल जन्मसे ही अंजनके समान काले हैं और पुरुष स्फटिकमणिके समान निर्मल हैं।

त्रिगुण, राजस, तामस तथा सात्त्विक – ये चारों भी पूर्वादि दिशाके क्रमसे प्रथम आवरणमें ही स्थित हैं।

द्वितीय आवरणमें पूर्वादि दिशाओंके दलोंमें क्रमशः सनत्कुमार, सनक, सनन्दन और सनातनका पूजन करना चाहिये।

तत्पश्चात् तीसरे आवरणमें ग्यारह प्रजापतियोंकी पूजा करे।

उनमेंसे प्रथम आठका तो पूर्व आदि आठ दिशाओंमें पूजन करे, फिर शेष तीनका पूर्व आदिके क्रमसे अर्थात् पूर्व, दक्षिण एवं पश्चिममें स्थापन-पूजन करे।

दक्ष, रुचि, भृगु, मरीचि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अत्रि, कश्यप और वसिष्ठ – ये ग्यारह विख्यात प्रजापति हैं।

इनके साथ इनकी पत्नियोंका भी क्रमशः पूजन करना चाहिये।

प्रसूति, आकूति, ख्याति, सम्भूति, धृति, स्मृति, क्षमा, संनति, अनसूया, देवमाता अदिति तथा अरुन्धती – ये सभी ऋषिपत्नियाँ पतिव्रता, सदा शिव-पूजनपरायणा, कान्तिमती और प्रिय-दर्शना (परम सुन्दरी) हैं।

अथवा प्रथम आवरणमें चारों वेदोंका पूजन करे, फिर द्वितीय आवरणमें इतिहास-पुराणोंकी अर्चना करे तथा तृतीय आवरणमें धर्मशास्त्र-सहित सम्पूर्ण वैदिक विद्याओंका सब ओर पूजन करना चाहिये।

चार वेदोंको पूर्वादि चार दिशाओंमें पूजना चाहिये, अन्य ग्रन्थोंको अपनी रुचिके अनुसार आठ या चार भागोंमें बाँटकर सब ओर उनकी पूजा करनी चाहिये।

इस प्रकार दक्षिणमें तीन आवरणोंसे युक्त ब्रह्माजीकी पूजा करके पश्चिममें आवरणसहित रुद्रका पूजन करे।

ईशान आदि पाँच ब्रह्म और हृदय आदि छः अंगोंको रुद्रदेवका प्रथम आवरण कहा गया है।

द्वितीय आवरण विद्येश्वरमय१ है।

तृतीय आवरणमें भेद है।

अतः उसका वर्णन किया जाता है।

उस आवरणमें पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे त्रिगुणादि चार मूर्तियोंकी पूजा करनी चाहिये।

पूर्वदिशामें पूर्णरूप शिव नामक महादेव पूजित होते हैं, इनकी ‘त्रिगुण’ संज्ञा है (क्योंकि ये त्रिगुणात्मक जगत् के आश्रय हैं)।

दक्षिणदिशामें ‘राजस’ पुरुषके नामसे प्रसिद्ध सृष्टिकर्ता ब्रह्माका पूजन किया जाता है, ये ‘भव’ कहलाते हैं।

पश्चिम-दिशामें ‘तामस’ पुरुष अग्निकी पूजा की जाती है, इन्हींको संहारकारी हर कहा गया है।

उत्तरदिशामें ‘सात्त्विक’ पुरुष सुख-दायक विष्णुका पूजन किया जाता है।

ये ही विश्वपालक ‘मृड’ हैं।

इस प्रकार पश्चिमभागमें शम्भुके शिवरूपका, जो पचीस तत्त्वोंका साक्षी छब्बीसवाँ२ तत्त्व-रूप है, पूजन करके उत्तरदिशामें भगवान् विष्णुका पूजन करना चाहिये।

इनके प्रथम आवरणमें वासुदेवको पूर्वमें, अनिरुद्धको दक्षिणमें, प्रद्युम्नको पश्चिममें और संकर्षणको उत्तरमें स्थापित करके इनकी पूजा करनी चाहिये।

यह प्रथम आवरण बताया गया।

अब द्वितीय शुभ आवरण बताया जाता है।

मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, तीनोंमेंसे एक राम, आप श्रीकृष्ण और हयग्रीव – ये द्वितीय आवरणमें पूजित होते हैं।

तृतीय आवरणमें पूर्वभागमें चक्रकी पूजा करे, दक्षिणभागमें कहीं भी प्रतिहत न होनेवाले नारायणास्त्रका यजन करे, पश्चिममें पांचजन्यका और उत्तरमें शार्ङ्गधनुषकी पूजा करे।

इस प्रकार तीन आवरणोंसे युक्त साक्षात् विश्व नामक परम हरि महाविष्णुकी, जो सदा सर्वत्र व्यापक हैं, मूर्तिमें भावना करके पूजा करे।

इस तरह विष्णुके चतुर्व्यूहक्रमसे चार मूर्तियोंका पूजन करके क्रमशः उनकी चार शक्तियोंका पूजन करे।

प्रभाका अग्निकोणमें, सरस्वतीका नैर्ऋत्यकोणमें, गणाम्बिकाका वायव्यकोणमें तथा लक्ष्मीका ईशानकोणमें पूजन करे।

इसी प्रकार भानु आदि मूर्तियों और उनकी शक्तियोंका पूजन करके उसी आवरणमें लोकेश्वरोंकी पूजा करे।

उनके नाम इस प्रकार हैं – इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, सोम, कुबेर तथा ईशान।

इस प्रकार चौथे आवरणकी विधिपूर्वक पूजा सम्पन्न करके बाह्यभागमें महेश्वरके आयुधोंकी अर्चना करे।

ईशानकोणमें तेजस्वी त्रिशूलकी, पूर्वदिशामें वज्रकी, अग्निकोणमें परशुकी, दक्षिणमें बाणकी, नैर्ऋत्यकोणमें खड्गकी, पश्चिममें पाशकी, वायव्यकोणमें अंकुशकी और उत्तरदिशामें पिनाककी पूजा करे।

तत्पश्चात् पश्चिमाभिमुख रौद्ररूपधारी क्षेत्रपालका अर्चन करे।

इस तरह पंचम आवरणकी पूजाका सम्पादन करके समस्त आवरण देवताओंके बाह्यभागमें अथवा पाँचवें आवरणमें ही मातृकाओंसहित महावृषभ नन्दिकेश्वरका पूर्वदिशामें पूजन करे।

तदनन्तर समस्त देवयोनियोंकी चारों ओर अर्चना करे।

इसके सिवा जो आकाशमें विचरनेवाले ऋषि, सिद्ध, दैत्य, यक्ष, राक्षस, अनन्त आदि नागराज, उन-उन नागेश्वरोंके कुलमें उत्पन्न हुए अन्य नाग, डाकिनी, भूत, वेताल, प्रेत और भैरवोंके नायक, नाना योनियोंमें उत्पन्न हुए अन्य पातालवासी जीव, नदी, समुद्र, पर्वत, वन, सरोवर, पशु, पक्षी, वृक्ष, कीट आदि क्षुद्र योनिके जीव, मनुष्य, नाना प्रकारके आकारवाले मृग, क्षुद्र जन्तु, ब्रह्माण्डके भीतरके लोक, कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्डके बाहरके असंख्य भुवन और उनके अधीश्वर तथा दसों दिशाओंमें स्थित ब्रह्माण्डके आधारभूत रुद्र हैं और गुणजनित, मायाजनित, शक्तिजनित तथा उससे भी परे जो कुछ भी शब्दवाच्य जड-चेतनात्मक प्रपंच है, उन सबको शिवा और शिवके पार्श्वभागमें स्थित जानकर उनका सामान्यरूपसे यजन करे।

वे सब लोग हाथ जोड़कर मन्द मुसकानयुक्त मुखसे सुशोभित होते हुए प्रेमपूर्वक महादेव और महादेवीका दर्शन कर रहे हैं, ऐसा चिन्तन करना चाहिये।

इस तरह आवरण-पूजा सम्पन्न करके विक्षेपकी शान्तिके लिये पुनः देवेश्वर शिवकी अर्चना करनेके पश्चात् पंचाक्षर-मन्त्रका जप करे।

तदनन्तर शिव और पार्वतीके सम्मुख उत्तम व्यंजनोंसे युक्त तथा अमृतके समान मधुर, शुद्ध एवं मनोहर महाचरुका नैवेद्य निवेदन करे।

यह महाचरु बत्तीस आढक (लगभग तीन मन आठ सेर)-का हो तो उत्तम है और कम-से-कम एक आढक (चार सेर)-का हो तो निम्न श्रेणीका माना गया है।

अपने वैभवके अनुसार जितना हो सके, महाचरु तैयार करके उसे श्रद्धापूर्वक निवेदित करे।

तदनन्तर जल और ताम्बूल-इलायची आदि निवेदन करके आरती उतारकर शेष पूजा समाप्त करे।

यागके उपयोगमें आनेवाले द्रव्य, भोजन, वस्त्र आदिको उत्तम श्रेणीका ही तैयार कराकर दे।

भक्तिमान् पुरुष वैभव होते हुए धनव्यय करनेमें कंजूसी न करे।

जो शठ या कंजूस है और पूजाके प्रति उपेक्षाकी भावना रखता है, वह यदि कृपणतावश कर्मको किसी अंगसे हीन कर दे तो उसके वे काम्य कर्म सफल नहीं होते, ऐसा सत्पुरुषोंका कथन है।

इसलिये मनुष्य यदि फलसिद्धिका इच्छुक हो तो उपेक्षाभावको त्यागकर सम्पूर्ण अंगोंके योगसे काम्य कर्मोंका सम्पादन करे।

इस तरह पूजा समाप्त करके महादेव और महादेवीको प्रणाम करे।

फिर भक्तिभावसे मनको एकाग्र करके स्तुतिपाठ करे।

स्तुतिके पश्चात् साधक उत्सुकतापूर्वक कम-से-कम एक सौ आठ बार और सम्भव हो तो एक हजारसे अधिक बार पंचाक्षरी विद्याका जप करे।

तत्पश्चात् क्रमशः विद्या और गुरुकी पूजा करके अपने अभ्युदय और श्रद्धाके अनुसार यज्ञमण्डपके सदस्योंका भी पूजन करे।

फिर आवरणोंसहित देवेश्वर शिवका विसर्जन करके यज्ञके उपकरणोंसहित वह सारा मण्डल गुरुको अथवा शिवचरणाश्रित भक्तोंको दे दे।

अथवा उसे शिवके ही उद्देश्यसे शिवके क्षेत्रमें समर्पित कर दे।

अथवा समस्त आवरण-देवताओंका यथोचित रीतिसे पूजन करके सात प्रकारके होमद्रव्योंद्वारा शिवाग्निमें इष्ट-देवताका यजन करे।

यह तीनों लोकोंमें विख्यात योगेश्वर नामक योग है।

इससे बढ़कर कोई योग त्रिभुवनमें कहीं नहीं है।

संसारमें कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो इससे साध्य न हो।

इस लोकमें मिलनेवाला कोई फल हो या परलोकमें, इसके द्वारा सब सुलभ हैं।

यह इसका फल नहीं है, ऐसा कोई नियन्त्रण नहीं किया जा सकता; क्योंकि सम्पूर्ण श्रेयोरूप साध्यका यह श्रेष्ठ साधन है।

यह निश्चितरूपसे कहा जा सकता है कि पुरुष जो कुछ फल चाहता है, वह सब चिन्तामणिके समान इससे प्राप्त हो सकता है।

तथापि किसी क्षुद्र फलके उद्देश्यसे इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये; क्योंकि किसी महान् से लघु फलकी इच्छा रखनेवाला पुरुष स्वयं लघुतर हो जाता है।

महादेवजीके उद्देश्यसे महान् या अल्प जो भी कर्म किया जाय, वह सब सिद्ध होता है।

अतः उन्हींके उद्देश्यसे कर्मका प्रयोग करना चाहिये।

शत्रु तथा मृत्युपर विजय पाना आदि जो फल दूसरोंसे सिद्ध होनेवाले नहीं हैं, उन्हीं लौकिक या पारलौकिक फलोंके लिये विद्वान् पुरुष इसका प्रयोग करे।

महापातकोंमें, महान् रोगसे भय आदिमें तथा दुर्भिक्ष आदिमें यदि शान्ति करनेकी आवश्यकता हो तो इसीसे शान्ति करे।

अधिक बढ़-बढ़कर बातें बनानेसे क्या लाभ? इस योगको महेश्वर शिवने शैवोंके लिये बड़ी भारी आपत्तिका निवारण करनेवाला अपना निजी अस्त्र बताया है।

अतः इससे बढ़कर यहाँ अपना कोई रक्षक नहीं है, ऐसा समझकर इस कर्मका प्रयोग करनेवाला पुरुष शुभ फलका भागी होता है।

जो प्रतिदिन पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर स्तोत्रमात्रका पाठ करता है, वह भी अभीष्ट प्रयोजनका अष्टमांश फल पा लेता है।

जो अर्थका अनुसंधान करते हुए पूर्णिमा, अष्टमी अथवा चतुर्दशीको उपवासपूर्वक स्तोत्रका पाठ करता है, उसे आधा अभीष्ट फल प्राप्त हो जाता है।

जो अर्थका अनुसंधान करते हुए लगातार एक मासतक स्तोत्रका पाठ करता है और पूर्णिमा, अष्टमी एवं चतुर्दशीको व्रत रखता है, वह सम्पूर्ण अभीष्ट फलका भागी होता है।

(अध्याय ३०) * कला, काल, नियति, विद्या, राग, प्रकृति और गुण – ये सात तत्त्व, पंचभूत, पंचतन्मात्रा, दस इन्द्रियाँ, चार अन्तःकरण और पाँच शब्द आदि विषय – ये छत्तीस तत्त्व हैं।

ये सब तत्त्व जीवके शरीरमें होते हैं।

परमेश्वरके शरीरको शाक्त (शक्तिस्वरूप एवं चिन्मय) तथा मन्त्रमय बताया गया है।

इन दो तत्त्वोंको जोड़ लेनेसे अड़तीस कलाएँ होती हैं।

समस्त जड-चेतन परमेश्वरका स्वरूप होनेसे उनकी मूर्तिको अड़तीस कलामयी बताया गया है।

अथवा पाँच स्वर और तैंतीस व्यंजनरूप होनेसे उनके शरीरको अड़तीस कलामय कहा गया है।

१- पाशुपत-दर्शनमें विद्येश्वरोंकी संख्या आठ बतायी गयी है।

उनके नाम इस प्रकार हैं – अनन्त, सूक्ष्म, शिवोत्तम, एकनेत्र, एकरुद्र, त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ और शिखण्डी।

इनको क्रमशः पूर्व आदि दिशाओंमें स्थापित करके इनकी पूजा करे।

द्वितीय आवरणमें इन्हींकी पूजा बतायी गयी है।

२- सांख्योक्त २४ प्राकृत तत्त्वोंके साक्षी जीवको पचीसवाँ तत्त्व कहा गया है; जो इससे भी परे हैं, वे सर्वसाक्षी परमात्मा शिव छब्बीसवें तत्त्वरूप हैं।


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