शिव पुराण – वायवीय संहिता – पूर्वखण्ड – 17


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परम धर्मका प्रतिपादन, शैवागमके अनुसार पाशुपत ज्ञान तथा उसके साधनोंका वर्णन

ऋषियोंने पूछा – वायुदेव! वह कौन-सा श्रेष्ठ अनुष्ठान है, जो मोक्षस्वरूप ज्ञानको अपरोक्ष कर देता है? उसको और उसके साधनोंको आज आप हमें बतानेकी कृपा करें।

वायुने कहा – भगवान् शिवका बताया हुआ जो परम धर्म है, उसीको श्रेष्ठ अनुष्ठान कहा गया है।

उसके सिद्ध होनेपर साक्षात् मोक्षदायक शिव अपरोक्ष हो जाते हैं।

वह परम धर्म पाँचों पर्वोंके कारण क्रमशः पाँच प्रकारका जानना चाहिये।

उन पर्वोंके नाम हैं – क्रिया, तप, जप, ध्यान और ज्ञान।

ये उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं, उन उत्कृष्ट साधनोंसे सिद्ध हुआ धर्म परम धर्म माना गया है।

जहाँ परोक्ष ज्ञान भी अपरोक्ष ज्ञान होकर मोक्षदायक होता है।

वैदिक धर्म दो प्रकारके बताये गये हैं – परम और अपरम।

धर्म-शब्दसे प्रतिपाद्य अर्थमें हमारे लिये श्रुति ही प्रमाण है।

योगपर्यन्त जो परम धर्म है, वह श्रुतियोंके शिरोभूत उपनिषद् में वर्णित है और जो अपरम धर्म है, वह उसकी अपेक्षा नीचे श्रुतिके मुख-भागसे अर्थात् संहिता-मन्त्रोंद्वारा प्रतिपादित हुआ है।

जिसमें पशु (बद्ध) जीवोंका अधिकार नहीं है, वह वेदान्तवर्णित धर्म ‘परम धर्म’ माना गया है।

उससे भिन्न जो यज्ञ-यागादि हैं, उसमें सबका अधिकार होनेसे वह साधारण या ‘अपरम धर्म’ कहलाता है।

जो अपरम धर्म है, वही परम धर्मका साधन है।

धर्म-शास्त्र आदिके द्वारा उसका सम्यक् रूपसे विस्तारपूर्वक सांगोपांग निरूपण हुआ है।

भगवान् शिवके द्वारा प्रतिपादित जो परम धर्म है, उसीका नाम श्रेष्ठ अनुष्ठान है।

इतिहास और पुराणोंद्वारा उसका किसी प्रकार विस्तार हुआ है, परंतु शैव-शास्त्रोंद्वारा उसके विस्तारका सांगोपांग निरूपण किया गया है।

वहीं उसके स्वरूपका सम्यक् रूपसे प्रतिपादन हुआ है।

साथ ही उसके संस्कार और अधिकार भी सम्यक् रूपसे विस्तारपूर्वक बताये गये हैं।

शैव-आगमके दो भेद हैं – श्रौत और अश्रौत।

जो श्रुतिके सार तत्त्वसे सम्पन्न है वह श्रौत है; और जो स्वतन्त्र है, वह अश्रौत माना गया है।

स्वतन्त्र शैवागम पहले दस प्रकारका था, फिर अठारह प्रकारका हुआ।

वह कायिका आदि संज्ञाओंसे सिद्ध होकर सिद्धान्त नाम धारण करता है।

श्रुतिसारमय जो शैव-शास्त्र है, उसका विस्तार सौ करोड़ श्लोकोंमें किया गया है।

उसीमें उत्कृष्ट ‘पाशुपत व्रत’ और ‘पाशुपत ज्ञान-का वर्णन किया गया है।

युग-युगमें होनेवाले शिष्योंको उसका उपदेश देनेके लिये भगवान् शिव स्वयं ही योगाचार्यरूपसे जहाँ-तहाँ अवतीर्ण हो उसका प्रचार करते हैं।

इस शैव-शास्त्रको संक्षिप्त करके उसके सिद्धान्तका प्रवचन करनेवाले मुख्यतः चार महर्षि हैं – रुरु, दधीच, अगस्त्य और महायशस्वी उपमन्यु।

उन्हें संहिताओंका प्रवर्तक ‘पाशुपत’ जानना चाहिये।

उनकी संतान-परम्परामें सैकड़ों-हजारों गुरुजन हो चुके हैं।

पाशुपत सिद्धान्तमें जो परम धर्म बताया गया है, वह चर्या* आदि चार पादोंके कारण चार प्रकारका माना गया है।

उन चारोंमें जो पाशुपत योग है, वह दृढ़तापूर्वक शिवका साक्षात्कार करानेवाला है।

इसलिये पाशुपत योग ही श्रेष्ठ अनुष्ठान माना गया है।

उसमें भी ब्रह्माजीने जो उपाय बताया है, उसका वर्णन किया जाता है।

भगवान् शिवके द्वारा परिकल्पित जो ‘नामाष्टकमय योग’ है, उसके द्वारा सहसा ‘शैवी प्रज्ञा’ का उदय होता है।

उस प्रज्ञाद्वारा पुरुष शीघ्र ही सुस्थिर परम ज्ञान प्राप्त कर लेता है।

जिसके हृदयमें वह ज्ञान प्रतिष्ठित हो जाता है, उसके ऊपर भगवान् शिव प्रसन्न होते हैं।

उनके कृपा-प्रसादसे वह परम योग सिद्ध होता है, जो शिवका अपरोक्ष दर्शन कराता है।

शिवके अपरोक्ष ज्ञानसे संसार-बन्धनका कारण दूर हो जाता है।

इस प्रकार संसारसे मुक्त हुआ पुरुष शिवके समान हो जाता है।

यह ब्रह्माजीका बताया हुआ उपाय है।

उसीका पृथक् वर्णन करते हैं।

शिव, महेश्वर, रुद्र, विष्णु, पितामह (ब्रह्मा), संसारवैद्य, सर्वज्ञ और परमात्मा – ये मुख्यतः आठ नाम हैं।

ये आठों मुख्य नाम शिवके प्रतिपादक हैं।

इनमेंसे आदि पाँच नाम क्रमशः शान्त्यतीता आदि पाँच कलाओंसे सम्बन्ध रखते हैं और उन पाँच उपाधियोंको ग्रहण करनेसे सदाशिव आदिके बोधक होते हैं।

उपाधिकी निवृत्ति होनेपर इन भेदोंकी निवृत्ति हो जाती है।

वह पद ही नित्य है।

किंतु उस पदपर प्रतिष्ठित होनेवाले अनित्य कहे गये हैं।

पदोंका परिवर्तन होनेपर पदवाले पुरुष मुक्त हो जाते हैं।

परिवर्तनके अनन्तर पुनः दूसरे आत्माओंको उस पदकी प्राप्ति बतायी जाती है और उन्हींके वे आदि पाँच नाम नियत होते हैं।

उपादान आदि योगसे अन्य तीन नाम (संसारवैद्य, सर्वज्ञ और परमात्मा) भी त्रिविध उपाधिका प्रतिपादन करते हुए शिवमें ही अनुगत होते हैं।

अनादि मलका संसर्ग उनमें पहलेसे ही नहीं है तथा वे स्वभावतः अत्यन्त शुद्धस्वरूप हैं, इसलिये ‘शिव’ कहलाते हैं अथवा वे ईश्वर समस्त कल्याणमय गुणोंके एकमात्र घनीभूत विग्रह हैं।

इसलिये शिवतत्त्वके अर्थको जाननेवाले श्रेष्ठ महात्मा उन्हें शिव कहते हैं।

तेईस तत्त्वोंसे परे जो प्रकृति बतायी गयी है, उससे भी परे पचीसवें तत्त्वके स्थानमें पुरुषको बताया गया है, जिसे वेदके आदिमें ओंकाररूप कहा गया है।

ओंकार और पुरुषमें वाच्य-वाचक-भाव सम्बन्ध है।

उसके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान एकमात्र वेदसे ही होता है।

वे ही वेदान्तमें प्रतिष्ठित हैं।

किंतु वह प्रकृतिसे संयुक्त है; अतः उससे भी परे जो परम पुरुष है, उसका नाम ‘महेश्वर’ है; क्योंकि प्रकृति और पुरुष दोनोंकी प्रवृत्ति उसीके अधीन है अथवा यह जो अविनाशी त्रिगुणमय तत्त्व है, इसे प्रकृति समझना चाहिये।

इस प्रकृतिको माया कहते हैं।

यह माया जिनकी शक्ति है, उन मायापतिका नाम ‘महेश्वर’ है।

महेश्वरके सम्बन्धसे जो माया अथवा प्रकृतिमें क्षोभ उत्पन्न करते हैं, वे अनन्त या ‘विष्णु’ कहे गये हैं।

वे ही कालात्मा और परमात्मा आदि नामोंसे पुकारे जाते हैं।

उन्हींको स्थूल और सूक्ष्मरूप भी कहा गया है।

दुःख अथवा दुःखके हेतुका नाम ‘सत्’ है।

जो प्रभु उसका द्रावण करते हैं – उसे मार भगाते हैं, उन परम कारण शिवको साधु पुरुष ‘रुद्र’ कहते हैं।

कला, काल आदि तत्त्वोंसे लेकर भूतोंमें पृथ्वी-पर्यन्त जो छत्तीस* तत्त्व हैं, उन्हींसे शरीर बनता है।

उस शरीर, इन्द्रिय आदिमें जो तन्द्रारहित हो व्यापकरूपसे स्थित हैं, वे भगवान् शिव ‘रुद्र’ कहे गये।

जगत् के पितारूप जो मूर्त्यात्मा हैं, उन सबके पिताके रूपमें भगवान् शिव विराजमान हैं; इसलिये वे ‘पितामह’ कहे गये हैं।

जैसे रोगोंके निदानको जाननेवाला वैद्य तदनुकूल उपायों और दवाओंसे रोगको दूर कर देता है, उसी तरह ईश्वर लययोगाधिकारसे सदा जड-मूलसहित संसार-रोगकी निवृत्ति करते हैं; अतः सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता विद्वान् उन्हें ‘संसारवैद्य’ कहते हैं।

दस विषयोंके ज्ञानके लिये दसों इन्द्रियोंके होते हुए भी जीव तीनों कालोंमें होनेवाले स्थूल-सूक्ष्म पदार्थोंको पूर्णरूपसे नहीं जानते; क्योंकि मायाने ही उन्हें मलसे आवृत्त कर दिया है।

परंतु भगवान् सदाशिव सम्पूर्ण विषयोंके ज्ञानके साधनभूत इन्द्रियादिके न होनेपर भी जो वस्तु जिस रूपमें स्थित है, उसे उसी रूपमें ठीक-ठीक जानते हैं; इसलिये वे ‘सर्वज्ञ’ कहलाते हैं।

जो इन सभी उत्तम गुणोंसे नित्य संयुक्त होनेके कारण सबके आत्मा हैं, जिनके लिये अपनेसे अतिरिक्त किसी दूसरे आत्माकी सत्ता नहीं है, वे भगवान् शिव स्वयं ही ‘परमात्मा’ हैं।

आचार्यकी कृपासे इन आठों नामोंका अर्थसहित उपदेश पाकर शिव आदि पाँच नामोंद्वारा निवृत्ति आदि पाँचों कलाओंकी ग्रन्थिका क्रमशः छेदन और गुणके अनुसार शोधन करके गुणित, उद् घातयुक्त और अनिरुद्ध प्राणोंद्वारा हृदय, कपठ, तालु, भूमध्य और ब्रह्मरन्ध्रसे युक्त पुर्यष्टकका भेदन करके सुषुम्णा नाड़ीद्वारा अपने आत्माको सहस्रार चक्रके भीतर ले जाय।

उसका शुभ्रवर्ण है।

वह तरुण सूर्यके सदृश रक्तवर्ण केसरके द्वारा रंजित और अधोमुख है।

उसके पचास दलोंमें स्थित ‘अ’ से लेकर ‘क्ष’ तक सबिन्दु अक्षर-कर्णिकाके बीचमें गोलाकार चन्द्रमण्डल है।

यह चन्द्रमण्डल छत्राकारमें स्थित है।

उसने एक ऊर्ध्वमुख द्वादश-दल कमलको आवृत कर रखा है।

उस कमलकी कर्णिकामें विद्युत्-सदृश अकथादि त्रिकोण यन्त्र है।

उस यन्त्रके चारों ओर सुधासागर होनेके कारण वह मणिद्वीपके आकारका हो गया है।

उस द्वीपके मध्यभागमें मणिपीठ है।

उसके बीचमें नाद बिन्दुके ऊपर हंसपीठ है।

उसपर परम शिव विराजमान हैं।

उक्त चन्द्रमण्डलके ऊपर शिवके तेजमें अपने आत्माको संयुक्त करे।

इस प्रकार जीवको शिवमें लीन करके शाक्त अमृतवर्षाके द्वारा अपने शरीरके अभिषिक्त होनेकी भावना करे।

तत्पश्चात् अमृतमय विग्रहवाले अपने आत्माको ब्रह्मरन्ध्रसे उतारकर हृदयमें द्वादश-दल कमलके भीतर स्थित चन्द्रमासे परे श्वेत कमलपर अर्द्धनारीश्वर रूपमें विराजमान मनोहर आकृतिवाले निर्मल देव भक्तवत्सल महादेव शंकरका चिन्तन करे।

उनकी अंगकान्ति शुद्धस्फटिक मणिके समान उज्ज्वल है।

वे शीतल प्रभासे युक्त और प्रसन्न हैं।

इस प्रकार मन-ही-मन ध्यान करके शान्तचित्त हुआ मनुष्य शिवके आठ नामोंद्वारा ही भावमय पुष्पोंसे उनकी पूजा करे।

पूजनके अन्तमें पुनः प्राणायाम करके चित्तको भलीभाँति एकाग्र रखते हुए शिव-नामाष्टकका जप करे।

फिर भावनाद्वारा नाभिमें आठ आहुतियोंका हवन करके पूर्णाहुति एवं नमस्कारपूर्वक आठ फूल चढ़ाकर अन्तिम अर्चना पूरी करके चुल्लूमें लिये हुए जलकी भाँति अपने-आपको शिवके चरणोंमें समर्पित कर दे।

इस प्रकार करनेसे शीघ्र ही मंगलमय पाशुपत ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है और साधक उस ज्ञानकी सुस्थिरता पा लेता है।

साथ ही वह परम उत्तम पाशुपत-व्रत एवं परम योगको पाकर मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है।

(अध्याय ३२) * इन पदोंका सम्मिलित अर्थ इस प्रकार है – हाँ, वह सत्य है, अमृतमय है और सौम्य है।

* चर्या, विद्या, क्रिया और योग – ये चार पाद हैं।

* कला, काल, नियति, विद्या, राग, प्रकृति और गुण – ये सात तत्त्व, पंचतन्मात्रा, दस इन्द्रियाँ, चार अन्तःकरण, पाँच शब्द आदि विषय तथा आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी ये छत्तीस तत्त्व हैं।


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