शिव पुराण – उमा संहिता – 9


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मृत्युकाल निकट आनेके कौन-कौनसे लक्षण हैं, इसका वर्णन इसके पश्चात् द्वीपों, लोकों और मनुओंका परिचय देकर संग्रामके फल, शरीर एवं स्त्री-स्वभाव आदिका वर्णन किया गया

तदनन्तर कालके विषयमें व्यासजीके पूछनेपर सनत्कुमारजीने कहा – मुनिश्रेष्ठ! पूर्वकालमें पार्वतीजीने नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ सुनकर परमेश्वर शिवको प्रणाम करके उनसे यही बात पूछी थी।

पार्वती बोलीं – भगवन्! मैंने आपकी कृपासे सम्पूर्ण मत जान लिया।

देव! जिन मन्त्रोंद्वारा जिस विधिसे जिस प्रकार आपकी पूजा होती है, वह भी मुझे ज्ञात हो गया।

किंतु प्रभो! अब भी एक संशय रह गया है।

वह संशय है कालचक्रके सम्बन्धमें।

देव! मृत्युका क्या चिह्न है? आयुका क्या प्रमाण है? नाथ! यदि मैं आपकी प्रिया हूँ तो मुझे ये सब बातें बताइये।

महादेवजीने कहा – प्रिये! यदि अकस्मात् शरीर सब ओरसे सफेद या पीला पड़ जाय और ऊपरसे कुछ लाल दीखे तो यह जानना चाहिये कि उस मनुष्यकी मृत्यु छः महीनेके भीतर हो जायगी।

शिवे! जब मुँह, कान, नेत्र और जिह्वाका स्तम्भन हो जाय, तब भी छः महीनेके भीतर ही मृत्यु जाननी चाहिये।

भद्रे! जो रुरु मृगके पीछे होनेवाली शिकारियोंकी भयानक आवाजको भी जल्दी नहीं सुनता, उसकी मृत्यु भी छः महीनेके भीतर ही जाननी चाहिये।

जब सूर्य, चन्द्रमा या अग्निके सांनिध्यसे प्रकट होनेवाले प्रकाशको मनुष्य नहीं देखता, उसे सब कुछ काला-काला – अन्धकाराच्छन्न ही दिखायी देता है, तब उसका जीवन छः माससे अधिक नहीं होता।

देवि! प्रिये! जब मनुष्यका बायाँ हाथ लगातार एक सप्ताहतक फड़कता ही रहे, तब उसका जीवन एक मास ही शेष है – ऐसा जानना चाहिये।

इसमें संशय नहीं है।

जब सारे अंगोंमें अँगड़ाई आने लगे और तालु सूख जाय, तब वह मनुष्य एक मासतक ही जीवित रहता है – इसमें संशय नहीं है।

त्रिदोषमें जिसकी नाक बहने लगे, उसका जीवन पंद्रह दिनसे अधिक नहीं चलता।

मुँह और कण्ठ सूखने लगे तो यह जानना चाहिये कि छः महीने बीतते-बीतते इसकी आयु समाप्त हो जायगी।

भामिनि! जिसकी जीभ फूल जाय और दाँतोंसे मवाद निकलने लगे, उसकी भी छः महीनेके भीतर ही मृत्यु हो जाती है।

इन चिह्नोंसे मृत्युकालको समझना चाहिये।

सुन्दरि! जल, तेल, घी तथा दर्पणमें भी जब अपनी परछाईं न दिखायी दे या विकृत दिखायी दे, तब कालचक्रके ज्ञाता पुरुषको यह जान लेना चाहिये कि उसकी भी आयु छः माससे अधिक शेष नहीं है।

देवेश्वरि! अब दूसरी बात सुनो, जिससे मृत्युका ज्ञान होता है।

जब अपनी छायाको सिरसे रहित देखे अथवा अपनेको छायासे रहित पाये, तब वह मनुष्य एक मास भी जीवित नहीं रहता।

पार्वती! ये मैंने अंगोंमें प्रकट होनेवाले मृत्युके लक्षण बताये हैं।

भद्रे! अब बाहर प्रकट होनेवाले लक्षणोंका वर्णन करता हूँ, सुनो! देवि! जब चन्द्रमण्डल या सूर्यमण्डल प्रभाहीन एवं लाल दिखायी दे, तब आधे मासमें ही मनुष्यकी मृत्यु हो जाती है।

अरुन्धती, महायान, चन्द्रमा – इन्हें जो न देख सके अथवा जिसे ताराओंका दर्शन न हो, ऐसा पुरुष एक मासतक जीवित रहता है।

यदि ग्रहोंका दर्शन होनेपर भी दिशाओंका ज्ञान न हो – मनपर मूढ़ता छायी रहे तो छः महीनेमें निश्चय ही मृत्यु हो जाती है।

यदि उतथ्य नामक ताराका, ध्रुवका अथवा सूर्यमण्डलका भी दर्शन न हो सके, रातमें इन्द्रधनुष और मध्याह्नमें उल्कापात होता दिखायी दे तथा गीध और कौवे घेरे रहें तो उस मनुष्यकी आयु छः महीनेसे अधिककी नहीं है।

यदि आकाशमें सप्तर्षि तथा स्वर्गमार्ग (छायापथ) न दिखायी दे तो कालज्ञ पुरुषोंको उस पुरुषकी आयु छः मास ही शेष समझनी चाहिये।

जो अकस्मात् सूर्य और चन्द्रमाको राहुसे ग्रस्त देखता है और सम्पूर्ण दिशाएँ जिसे घूमती दिखायी देती हैं, वह अवश्य ही छः महीनेमें मर जाता है।

यदि अकस्मात् नीली मक्खियाँ आकर पुरुषको घेर लें तो वास्तवमें उसकी आयु एक मास ही शेष जाननी चाहिये।

यदि गीध, कौवा अथवा कबूतर सिरपर चढ़ जाय तो वह पुरुष शीघ्र ही एक मासके भीतर ही मर जाता है, इसमें संशय नहीं है। (अध्याय १७ – २५)


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