शिव पुराण – उमा संहिता – 6


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यमलोकके मार्गमें सुविधा प्रदान करनेवाले विविध दानोंका वर्णन

व्यासजी बोले – प्रभो! पापी मनुष्य बड़े दुःखसे यमलोकके मार्गमें जाते हैं।

अब आप मुझे उन धर्मोंका परिचय दीजिये, जिनसे जीव सुखपूर्वक यममार्गपर यात्रा करते हैं।

सनत्कुमारजीने कहा – मुने! अपना किया हुआ शुभाशुभ कर्म बिना विचारे विवश होकर भोगना पड़ता है।

अब मैं उन धर्मोंका वर्णन करता हूँ, जो सुख देनेवाले हैं।

इस लोकमें जो श्रेष्ठ कर्म करनेवाले, कोमलचित्त और दयालु पुरुष हैं, वे भयंकर यममार्गपर सुखसे यात्रा करते हैं।

जो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको जूता और खड़ाऊँ दान करता है, वह मनुष्य विशाल घोड़ेपर सवार हो बड़े सुखसे यमलोकको जाता है।

छत्र दान करनेसे मनुष्य उस मार्गपर उसी तरह छाता लगाकर चलते हैं, जैसे यहाँ छातेवाले लोग चलते हैं।

शिविकाका दान करनेसे मनुष्य रथके द्वारा सुखसे यात्रा करते हैं।

शय्या और आसनका दान करनेसे दाता यमलोकके मार्गमें विश्राम करते हुए सुखपूर्वक जाता है।

जो बगीचे लगाते और छायादार वृक्षका आरोपण करते हैं अथवा सड़कके किनारे वृक्षारोपण करते हैं, वे धूपमें भी बिना कष्ट उठाये यमलोकको जाते हैं।

जो मनुष्य फुलवाड़ी लगाते हैं, वे पुष्पक विमानसे यात्रा करते हैं।

देवमन्दिर बनानेवाले उस मार्गपर घरके भीतर क्रीड़ा करते हैं।

जो यतियोंके आश्रमका निर्माण कराते हैं और अनाथोंके लिये घर बनवाते हैं, वे भी घरके भीतर क्रीड़ा करते हैं।

जो देवता, अग्नि, गुरु, ब्राह्मण, माता और पिताकी पूजा करते हैं, वे मनुष्य स्वयं ही पूजित हो अपनी इच्छाके अनुकूल मार्गद्वारा सुखसे यात्रा करते हैं।

दीपदान करनेवाले मनुष्य सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए जाते हैं।

गृहदान करनेसे दाता रोग-शोकसे रहित हो सुखपूर्वक यात्रा करते हैं।

गुरुजनोंकी सेवा करनेवाले मानव विश्राम करते हुए जाते हैं।

बाजा देनेवाले उसी तरह सुखसे यात्रा करते हैं, मानो अपने घर जा रहे हों।

गोदान करनेवाले लोग सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुओंसे भरे-पूरे मार्गद्वारा जाते हैं।

मनुष्य उस मार्गपर इस लोकमें दिये हुए अन्न-पानको ही पाता है।

जो किसीको पैर धोनेके लिये जल देता है, वह ऐसे मार्गसे जाता है, जहाँ जलकी सुविधा हो।

जो आदरणीय पुरुषोंके पैरोंमें उबटन लगाता है, वह घोड़ेकी पीठपर बैठकर यात्रा करता है।

व्यासजी! जो पाद्य, अभ्यंग (अंगराग), दीपक, अन्न और घर दान करता है, उसके पास यमराज कभी नहीं जाते।

सुवर्ण और रत्नका दान करनेसे मनुष्य दुर्गम संकटों और स्थानोंको लाँघता हुआ जाता है।

चाँदी, गाड़ी ढोनेवाले बैल और फूलोंकी माला दान करनेसे दाता सुखपूर्वक यमलोकमें जाता है।

इस तरहके दानोंसे मनुष्य सुखपूर्वक यमलोककी यात्रा करते हैं और स्वर्गमें सदा भाँति-भाँतिके भोग पाते हैं।

सब दानोंमें अन्नदानको ही उत्तम बताया गया है; क्योंकि यह तत्काल तृप्ति प्रदान करनेवाला, मनको प्रिय लगनेवाला तथा बल और बुद्धिको बढ़ानेवाला है।

मुनिश्रेष्ठ! अन्नदानके समान दूसरा कोई दान नहीं है; क्योंकि अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते हैं और अन्नके अभावमें मर जाते हैं।

अतएव अन्नदानसे महान् पुण्य बताया गया है; क्योंकि अन्नके बिना भूखकी आगसे तप्त हुए समस्त प्राणी मर जाते हैं।

अतः अन्नकी ही सब लोग प्रशंसा करते हैं; क्योंकि अन्नमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है।

अन्नके समान दान न तो हुआ है और न होगा।

मुने! यह सम्पूर्ण जगत् अन्नसे ही धारण किया जाता है।

लोकमें अन्नको बलकारक बताया गया है; क्योंकि अन्नमें ही प्राण प्रतिष्ठित हैं।* प्राप्त हुए अन्नकी कभी निन्दा न करे और न किसी तरह उसे फेंके ही।

कुत्ते और चाण्डालके लिये भी किया हुआ अन्नदान कभी नष्ट नहीं होता।

जो मनुष्य थके-माँदे और अपरिचित पथिकको अन्न देता है और देते समय कष्टका अनुभव नहीं करता, वह समृद्धिका भागी होता है।

महामुने! जो देवताओं, पितरों, ब्राह्मणों और अतिथियोंको अन्नसे तृप्त करता है, उसे महान् पुण्य-फलकी प्राप्ति होती है।

अन्न और जलका दान शूद्र और ब्राह्मणके लिये भी समानरूपसे महत्त्व रखता है।

अन्नकी इच्छावाले पुरुषसे उसका गोत्र, शाखा, स्वाध्याय और देश नहीं पूछना चाहिये।

अन्न साक्षात् ब्रह्मा है, अन्न साक्षात् विष्णु और शिव है।

इसलिये अन्नके समान दान न हुआ है और न होगा! जो पहले बड़ा भारी पाप करके भी पीछे अन्नका दान करनेवाला हो जाता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें जाता है।

अन्न, जल, घोड़ा, गौ, वस्त्र, शय्या, छत्र और आसन – इन आठ वस्तुओंके दान यमलोकके लिये उत्तम माने गये हैं।

इस प्रकार दान-विशेषसे मनुष्य विमानपर बैठकर धर्मराजके नगरमें जाता है; इसलिये सबको दान करना चाहिये।

महामुने! जो इस प्रसंगको सुनता अथवा श्राद्धमें ब्राह्मणोंको सुनाता है, उसके पितरोंको अक्षय अन्नदान प्राप्त होता है।

(अध्याय ११) * सर्वेषामेव दानानामन्नदानं परं स्मृतम्।

सद्यः प्रीतिकरं हृद्यं बलबुद्धिविवर्धनम्।।

नान्नदानसमं दानं विद्यते मुनिसत्तम।

अन्नाद्भवन्ति भूतानि तदभावे म्रियन्ति च।।

अतएव महत्पुण्यमन्नदाने प्रकीर्तितम्।

तथा क्षुधाग्निना तप्ता म्रियन्ते सर्वदेहिनः।।

अन्नमेव प्रशंसन्ति सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम्।

अन्नेन सदृशं दानं न भूतं न भविष्यति।।

अन्नेन धार्यते सर्वं विश्वं जगदिदं मुने।

अन्नमूर्जस्करं लोके प्राणा ह्यन्ने प्रतिष्ठिताः।।

(शि० पु० उ० सं० ११।१७-१८, २४, २९-३०)


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