शिव पुराण – उमा संहिता – 5


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विभिन्न पापोंके कारण मिलनेवाली नरकयातनाका वर्णन तथा कुक्कुरबलि, काकबलि एवं देवता आदिके लिये दी हुई बलिकी आवश्यकता एवं महत्ताका प्रतिपादन

सनत्कुमारजी कहते हैं – व्यासजी! इन सब भयानक पीड़ादायक नरकोंमें पापी जीवोंको अत्यन्त भीषण नरकयातना भोगनी पड़ती है।

जो मिथ्या आगम (पाखण्डियोंके शास्त्र)-में प्रवृत्त होता है, वह द्विजिह्व नामक नरकमें जाता है और जिह्वाके आकारमें आधे कोसतक फैले हुए तीक्ष्ण हलोंद्वारा वहाँ उसे विशेष पीड़ा दी जाती है।

जो क्रूर मनुष्य माता-पिता और गुरुको डाँटता है, उसके मुँहमें कीड़ोंसे युक्त विष्ठा ठूँसकर उसे खूब पीटा जाता है।

जो मनुष्य शिवमन्दिर, बगीचे, बावड़ी, कूप, तड़ाग तथा ब्राह्मणके स्थानको नष्ट-भ्रष्ट कर देते और वहाँ स्वेच्छानुसार रमण करते हैं, वे नाना प्रकारके भयंकर कोल्हू आदिके द्वारा पेरे और पकाये जाते हैं तथा प्रलयकाल-पर्यन्त नरकाग्नियोंमें पकते रहते हैं।

परस्त्रीगामी पुरुष उस-उस रूपसे ही व्यभिचार करते हुए मारे-पीटे जाते हैं।

पुरुष अपने पहले-जैसे शरीरको धारण करके लोहेकी बनी और खूब तपायी हुई नारीका गाढ़ आलिंगन करके सब ओरसे जलते रहते हैं।

वे उस दुराचारिणी स्त्रीका गाढ़ आलिंगन करते और रोते हैं।

जो सत्पुरुषोंकी निन्दा सुनते हैं, उनके कानोंमें लोहे या ताँबे आदिकी बनी हुई कीलें आगसे खूब तपाकर भर दी जाती हैं; इनके सिवा जस्ते, शीशे और पीतलको गलाकर पानीके समान करके उनके कानमें भरा जाता है।

फिर बारंबार गरम दूध और खूब तपाया हुआ तेल उनके कानोंमें डाला जाता है।

फिर उन कानोंपर वज्रका-सा लेप कर दिया जाता है।

इस तरह क्रमशः उनके कानोंको उपर्युक्त वस्तुओंसे भरकर उनको नरकोंमें यातनाएँ दी जाती हैं।

क्रमशः सभी नरकोंमें सब ओर ये यातनाएँ प्राप्त होती हैं और सभी नरकोंकी यातनाएँ बड़ा कष्ट देनेवाली होती हैं।

जो माता-पिताके प्रति भौंहें टेढ़ी करते अथवा उनकी ओर उद्दण्डतापूर्वक दृष्टि डालते या हाथ उठाते हैं, उनके मुखोंको अन्ततक लोहेकी कीलोंसे दृढ़तापूर्वक भर दिया जाता है।

जो मनुष्य लुभाकर स्त्रियोंकी ओर अपलक दृष्टिसे देखते हैं, उनकी आँखोंमें तपाकर आगके समान लाल की हुई सुइयाँ भर दी जाती हैं।

जो देवता, अग्नि, गुरु तथा ब्राह्मणोंको अग्रभाग निवेदन किये बिना ही भोजन कर लेते हैं, उनकी जिह्वा और मुखमें लोहेकी सैकड़ों कीलें तपाकर ठूँस दी जाती हैं।

जो लोग धर्मका उपदेश करनेवाले महात्मा कथावाचककी निन्दा करते हैं, देवता, अग्नि और गुरुके भक्तोंकी तथा सनातन धर्मशास्त्रकी भी खिल्लियाँ उड़ाते हैं, उनकी छाती, कण्ठ, जिह्वा, दाँतोंकी संधि, तालु, ओठ, नासिका, मस्तक तथा सम्पूर्ण अंगोंकी संधियोंमें आगके समान तपायी हुई तीन शाखावाली लोहेकी कीलें मुद् गरोंसे ठोकी जाती हैं।

उस समय उन्हें बहुत कष्ट होता है।

तत्पश्चात् सब ओरसे उनके घावोंपर तपाया हुआ नमक छिड़क दिया जाता है।

फिर उस शरीरमें सब ओर बड़ी भारी यातनाएँ होती हैं।

जो पापी शिव-मन्दिरके पास अथवा देवताके बगीचोंमें मल-मूत्रका त्याग करते हैं, उनके लिंग और अण्डकोशको लोहेके मुद् गरोंसे चूर-चूर कर दिया जाता है तथा आगसे तपायी हुई सुइयाँ उसमें भर दी जाती हैं, जिससे मन और इन्द्रियोंको महान् दुःख होता है।

जो धन रहते हुए भी तृष्णाके कारण उसका दान नहीं करते और भोजनके समय घरपर आये हुए अतिथिका अनादर करते हैं, वे पापका फल पाकर अपवित्र नरकमें गिरते हैं।१ जो कुत्तों और गौओंको उनका भाग अर्थात् बलि न देकर स्वयं भोजन कर लेते हैं, उनके खुले हुए मुँहमें दो कीलें ठोक दी जाती हैं।

‘यमराजके मार्गका अनुसरण करनेवाले जो श्याम और शबल (साँवले तथा चितकबरे) दो कुत्ते हैं, मैं उनके लिये यह अन्नका भाग देता हूँ, वे इस बलिको ग्रहण करें।’ ‘पश्चिम, वायव्य, दक्षिण और नैर्ऋत्य दिशामें रहनेवाले जो पुण्यकर्मा कौए हैं, वे मेरी इस दी हुई बलिको ग्रहण करें।२ इस अभिप्रथाके दो मन्त्रोंसे क्रमशः कुत्ते और कौएको बलि देनी चाहिये।

जो लोग यत्नपूर्वक भगवान् शंकरकी पूजा करके विधिवत् अग्निमें आहुति दे शिवसम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा बलि समर्पित करते हैं, वे यमराजको नहीं देखते और स्वर्गमें जाते हैं।

इसलिये प्रतिदिन बलि देनी चाहिये।

एक चौकोर मण्डप बनाकर उसे गन्ध आदिसे अधिवासित करे।

फिर ईशानकोणमें धन्वन्तरिके लिये और पूर्व-दिशामें इन्द्रके लिये बलि दे।

दक्षिणदिशामें यमके लिये, पश्चिमदिशामें सुदक्षोमके लिये और दक्षिणदिशामें पितरोंके लिये बलि देकर पुनः पूर्वदिशामें अर्यमाको अन्नका भाग अर्पित करे।

द्वारदेशमें धाता और विधाताके लिये बलि निवेदन करे।

तदनन्तर कुत्तों, कुत्तोंके स्वामी और पक्षियोंके लिये भूतलपर अन्न डाल दे।

देवता, पितर, मनुष्य, प्रेत, भूत, गुह्यक, पक्षी, कृमि और कीट – ये सभी गृहस्थसे अपनी जीविका चलाते हैं।

स्वाहाकार, स्वधाकार, वषट् कार तथा हन्तकार – ये धर्ममयी धेनुके चार स्तन हैं।

स्वाहाकार नामक स्तनका पान देवता करते हैं, स्वधाका पितर लोग, वषट् कारका दूसरे-दूसरे देवता और भूतेश्वर तथा हन्तकार नामक स्तनका सदा ही मनुष्यगण पान करते हैं।

जो मानव श्रद्धा-पूर्वक इस धर्ममयी धेनुका सदा ठीक समयपर पालन करता है, वह अग्निहोत्री हो जाता है।

जो स्वस्थ रहते हुए भी उसका त्याग कर देता है, वह अन्धकारपूर्ण नरकमें डूबता है।

इसलिये उन सबको बलि देनेके पश्चात् द्वारपर खड़ा हो क्षणभर अतिथिकी प्रतीक्षा करे।

यदि कोई भूखसे पीड़ित अतिथि या उसी गाँवका निवासी पुरुष मिल जाय तो उसे अपने भोजनसे पहले यथाशक्ति शुभ अन्नका भोजन कराये।

जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौटता है, उसे वह अपना पाप दे बदलेमें उसका पुण्य लेकर चला जाता है।*
(अध्याय ९-१०) १- धने सत्यपि ये दानं न प्रयच्छन्ति तृष्णया।।

अतिथि चावमन्यन्ते काले प्राप्ते गृहाश्रमे।

तस्मात् ते दुष्कृतं प्राप्य गच्छन्ति निरयेऽशुचौ।।

(शि० पु० उ० सं० १०।३१-३२) २- द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ यममार्गानुरोधकौ।

यौ स्तस्ताभ्यां प्रयच्छामि तौ गृह्णीतामिमं बलिम्।।

ऐन्द्रवारुणवायव्या याम्या नैर्ऋत्यकास्तथा।

वायसाः पुण्यकर्माणस्ते प्रगृह्णन्तु मे बलिम्।।

(शि० पु० उ० सं० १०।३५-३६) * अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रति निवर्तते।

स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा पुण्यमादाय गच्छति।।

(शि० पु० उ० सं० १०।४८)


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