शिव पुराण – उमा संहिता – 14


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शिव पुराण संहिता लिंकविद्येश्वर | रुद्र संहिता | शतरुद्र | कोटिरुद्र | उमा | कैलास | वायवीय


देवी उमाके शरीरसे सरस्वतीका आविर्भाव, उनके रूपकी प्रशंसा सुनकर शुम्भका उनके पास दूत भेजना, दूतके निराश लौटनेपर शुम्भका क्रमशः धूम्रलोचन, चण्ड, मुण्ड तथा रक्तबीजको भेजना और देवीके द्वारा उन सबका मारा जाना

ऋषि कहते हैं – पूर्वकालमें शुम्भ और निशुम्भ नामके दो प्रतापी दैत्य थे, जो आपसमें भाई-भाई थे।

उन दोनोंने चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीके राज्यपर बलपूर्वक आक्रमण किया।

उनसे पीड़ित हुए देवताओंने हिमालय पर्वतकी शरण ली और सम्पूर्ण अभीष्टोंको देनेवाली सर्वभूतजननी देवी उमाका स्तवन किया।

देवता बोले – महेश्वरि दुर्गे! आपकी जय हो।

अपने भक्तजनोंका प्रिय करनेवाली देवि! आपकी जय हो।

आप तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाली शिवा हैं।

आपको बारंबार नमस्कार है।

आप ही मोक्ष प्रदान करनेवाली परा अम्बा हैं।

आपको बारंबार नमस्कार है।

आप समस्त संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाली हैं।

आपको नमस्कार है।

कालिका और तारा-रूप धारण करनेवाली देवि! आपको नमस्कार है।

छिन्नमस्ता आपका ही स्वरूप है।

आप ही श्रीविद्या हैं।

आपको नमस्कार है।

भुवनेश्वरि! आपको नमस्कार है।

भैरवरूपिणि! आपको नमस्कार है।

आप ही बगलामुखी और धूमावती हैं।

आपको बारंबार नमस्कार है।

आप ही त्रिपुरसुन्दरी और मातंगी हैं।

आपको बारंबार नमस्कार है।

अजिता, विजया, जया, मंगला और विलासिनी – ये सभी आपके ही विभिन्न रूपोंकी संज्ञाएँ हैं।

इन सभी रूपोंमें आपको नमस्कार है।

दोग्ध्री (माता अथवा कामधेनु)-रूपमें आपको नमस्कार है।

घोर आकार धारण करनेवाली आपको नमस्कार है।

अपराजितारूपमें आपको प्रणाम है।

नित्या महाविद्याके रूपमें आपको बारंबार नमस्कार है।

आप ही शरणागतोंका पालन करनेवाली रुद्राणी हैं।

आपको बारंबार नमस्कार है।

वेदान्तके द्वारा आपके ही स्वरूपका बोध होता है।

आपको नमस्कार है।

आप परमात्मा हैं।

आपको मेरा प्रणाम है।

अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंका संचालन करनेवाली आप जगदम्बाको बारंबार नमस्कार है।* देवताओंके इस प्रकार स्तुति करनेपर वरदायिनी एवं कल्याणरूपिणी गौरी देवी बहुत प्रसन्न हुईं।

उन्होंने समस्त देवताओंसे पूछा – ‘आपलोग यहाँ किसकी स्तुति करते हैं?’ तब उन्हीं गौरीके शरीरसे एक कुमारी प्रकट हुई।

वह सब देवताओंके देखते-देखते शिवशक्तिसे आदरपूर्वक बोली – ‘माँ! ये समस्त स्वर्गवासी देवता निशुम्भ और शुम्भ नामक प्रबल दैत्योंसे अत्यन्त पीड़ित हो अपनी रक्षाके लिये मेरी स्तुति करते हैं।’ पार्वतीके शरीरकोशसे वह कुमारी निकली थी, इसलिये कौशिकी नामसे प्रसिद्ध हुई।

कौशिकी ही साक्षात् शुम्भासुरका नाश करनेवाली सरस्वती हैं।

उन्हींको उग्रतारा और महोग्रतारा भी कहा गया है।

माताके शरीरसे स्वतः प्रकट होनेके कारण वे इस भूतलपर मातंगी भी कहलाती हैं।

उन्होंने समस्त देवताओंसे कहा – ‘तुमलोग निर्भय रहो।

मैं स्वतन्त्र हूँ।

अतः किसीका सहारा लिये बिना ही तुम्हारा कार्य सिद्ध कर दूँगी।’ ऐसा कहकर वे देवी तत्काल वहाँ अदृश्य हो गयीं।

एक दिन शुम्भ और निशुम्भके सेवक चण्ड और मुण्डने देवीको देखा।

उनका मनोहर रूप नेत्रोंको सुख प्रदान करनेवाला था।

उसे देखते ही वे मोहित हो सुध-बुध खोकर पृथ्वीपर गिर पड़े, फिर होशमें आनेपर वे अपने राजाके पास गये और आरम्भसे ही सारा वृत्तान्त बताकर बोले – ‘महाराज! हम दोनोंने एक अपूर्व सुन्दरी नारी देखी है, जो हिमालयके रमणीय शिखरपर रहती है और सिंहपर सवारी करती है।’ चण्ड-मुण्डकी यह बात सुनकर महान् असुर शुम्भने देवीके पास सुग्रीव नामक अपना दूत भेजा और कहा – ‘दूत! हिमालयपर कोई अपूर्व सुन्दरी रहती है।

तुम वहाँ जाओ और उससे मेरा संदेश कहकर उसे प्रयत्नपूर्वक यहाँ ले आओ।’ यह आज्ञा पाकर दानवशिरोमणि सुग्रीव हिमालयपर गया और जगदम्बा महेश्वरीसे इस प्रकार बोला।

दूतने कहा – देवि! दैत्य शुम्भासुर अपने महान् बल और विक्रमके लिये तीनों लोकोंमें विख्यात है।

उसका छोटा भाई निशुम्भ भी वैसा ही है।

शुम्भने मुझे तुम्हारे पास दूत बनाकर भेजा है।

इसलिये मैं यहाँ आया हूँ।

सुरेश्वरि! उसने जो संदेश दिया है, उसे इस समय सुनो! ‘मैंने समरांगणमें इन्द्र आदि देवताओंको जीतकर उनके समस्त रत्नोंका अपहरण कर लिया है।

यज्ञमें देवता आदिके दिये हुए देवभागका मैं स्वयं ही उपभोग करता हूँ।

मैं मानता हूँ कि तुम स्त्रियोंमें रत्न हो, सब रत्नोंके ऊपर स्थित हो।

इसलिये तुम कामजनित रसके साथ मुझको अथवा मेरे भाईको अंगीकार करो।’ दूतके मुँहसे शुम्भका यह संदेश सुनकर भूतनाथ भगवान् शिवकी प्राणवल्लभा महामायाने इस प्रकार कहा।

देवी बोलीं – दूत! तुम सच कहते हो।

तुम्हारे कथनमें थोड़ा-सा भी असत्य नहीं है।

परंतु मैंने पहलेसे एक प्रतिज्ञा कर ली है; उसे सुनो।

जो मेरा घमंड चूर कर दे, जो मुझे युद्धमें जीत ले, उसीको मैं पति बना सकती हूँ, दूसरेको नहीं।

यह मेरी अटल प्रतिज्ञा है।

इसलिये तुम शुम्भ और निशुम्भको मेरी यह प्रतिज्ञा बता दो।

फिर इस विषयमें जैसा उचित हो, वैसा वे करें।

देवीकी यह बात सुनकर दानव सुग्रीव लौट गया।

वहाँ जाकर उसने विस्तारपूर्वक राजाको सब बातें बतायीं।

दूतकी बात सुनकर उग्र शासन करनेवाला शुम्भ कुपित हो उठा और बलवानोंमें श्रेष्ठ सेनापति धूम्राक्षसे बोला – ‘धूम्राक्ष! हिमालयपर कोई सुन्दरी रहती है।

तुम शीघ्र वहाँ जाकर जैसे भी वह यहाँ आये, उसी तरह उसे ले आओ।

असुरप्रवर! उसे लानेमें तुम्हें भय नहीं मानना चाहिये।

यदि वह युद्ध करना चाहे तो तुम्हें प्रयत्नपूर्वक उसके साथ युद्ध भी करना चाहिये।’ शुम्भकी ऐसी आज्ञा पाकर दैत्य धूम्रलोचन हिमालयपर गया और उमाके अंशसे प्रकट हुई भगवती भुवनेश्वरीसे कहा – ‘नितम्बिनि! मेरे स्वामीके पास चलो, नहीं तो तुम्हें मरवा डालूँगा।

मेरे साथ साठ हजार असुरोंकी सेना है।’ देवी बोलीं – वीर! तुम्हें दैत्यराजने भेजा है।

यदि मुझे मार ही डालोगे तो क्या करूँगी।

परंतु युद्धके बिना मेरा वहाँ जाना असम्भव है।

मेरी ऐसी ही मान्यता है।

देवीके ऐसा कहनेपर दानव धूम्रलोचन उन्हें पकड़नेके लिये दौड़ा।

परंतु महेश्वरीने ‘हूं’ के उच्चारणमात्रसे उसको भस्म कर दिया।

तभीसे वे देवी इस भूतलपर धूमावती कहलाने लगीं।

उनकी आराधना करनेपर वे अपने भक्तोंके शत्रुओंका संहार कर डालती हैं।

धूम्राक्षके मारे जानेपर अत्यन्त कुपित हुए देवीके वाहन सिंहने उसके साथ आये हुए समस्त असुरगणोंको चबा डाला।

जो मरनेसे बचे, वे भाग खड़े हुए।

इस प्रकार देवीने दैत्य धूम्रलोचनको मार डाला।

इस समाचारको सुनकर प्रतापी शुम्भने बड़ा क्रोध किया।

वह अपने दोनों ओठोंको दाँतोंसे दबाकर रह गया।

उसने क्रमशः चण्ड, मुण्ड तथा रक्तबीज नामक असुरोंको भेजा।

आज्ञा पाकर वे दैत्य उस स्थानपर गये, जहाँ देवी विराजमान थीं।

अणिमा आदि सिद्धियोंसे सेवित तथा अपनी प्रभासे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करती हुई भगवती सिंहवाहिनीको देखकर वे श्रेष्ठ दानव वीर बोले – ‘देवि! तुम शीघ्र ही शुम्भ और निशुम्भके पास चलो, अन्यथा तुम्हें गण और वाहनसहित मरवा डालेंगे।

वामे! शुम्भको अपना पति बना लो।

लोकपाल आदि भी उनकी स्तुति करते हैं।

शुम्भको पति बना लेनेपर तुम्हें उस महान् आनन्दकी प्राप्ति होगी, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है।’ उनकी ऐसी बात सुनकर परमेश्वरी अम्बा मुसकराकर सरस मधुर वाणीमें बोलीं।

देवीने कहा – अद्वितीय महेश्वर परब्रह्म परमात्मा सर्वत्र विराजमान हैं, जो सदाशिव कहलाते हैं।

वेद भी उनके तत्त्वको नहीं जानते, फिर विष्णु आदिकी तो बात ही क्या है।

उन्हीं सदाशिवकी मैं सूक्ष्म प्रकृति हूँ।

फिर दूसरेको पति कैसे बना सकती हूँ।

सिंहिनी कितनी ही कामातुर क्यों न हो जाय, वह गीदड़को कभी अपना पति नहीं बनायेगी।

हथिनी गदहेको और बाघिन खरगोशको नहीं वरेगी।

दैत्यो! तुम सब लोग झूठ बोलते हो; क्योंकि कालरूपी सर्पके फंदेमें फँसे हुए हो।

तुम या तो पातालको लौट जाओ या शक्ति हो तो युद्ध करो।

देवीका यह क्रोध पैदा करनेवाला वचन सुनकर वे दैत्य बोले – ‘हमलोग अपने मनमें तुम्हें अबला समझकर मार नहीं रहे थे।

परंतु यदि तुम्हारे मनमें युद्धकी ही इच्छा है तो सिंहपर सुस्थिर होकर बैठ जाओ और युद्धके लिये आगे बढ़ो।’ इस तरह वाद-विवाद करते हुए उनमें कलह बढ़ गया और समरांगणमें दोनों दलोंपर तीखे बाणोंकी वर्षा होने लगी।

इस तरह उनके साथ लीलापूर्वक युद्ध करके परमेश्वरीने चण्ड-मुण्डसहित महान् असुर रक्तबीजको मार डाला।

वे देववैरी असुर द्वेष बुद्धि करके आये थे, तो भी अन्तमें उन्हें उस उत्तम लोककी प्राप्ति हुई, जिसमें देवीके भक्त जाते हैं।

(अध्याय ४७) * देवा ऊचुः – जय दुर्गे महेशानि जयात्मीयजनप्रिये।

त्रैलोक्यत्राणकारिण्यै शिवायै ते नमो नमः।।

नमो मुक्तिप्रदायिन्यै पराम्बायै नमो नमः।

नमः समस्तसंसारोत्पत्तिस्थित्यन्तकारिके।।

कालिकारूपसम्पन्ने नमस्ताराकृते नमः।

छिन्नमस्तास्वरूपायै श्रीविद्यायै नमोऽस्तु ते।।

भुवनेशि नमस्तुभ्यं नमस्ते भैरवाकृते।

नमोऽस्तु बगलामुख्यै धूमावत्यै नमो नमः।।

नमस्त्रिपुरसुन्दर्यै मातङ्ग‍यै ते नमो नमः।

अजितायै नमस्तुभ्यं विजयायै नमो नमः।।

जयायै मङ्गलायै ते विलासिन्यै नमो नमः।

दोग्ध्रीरूपे नमस्तुभ्यं नमो घोराकृतेऽस्तु ते।।

नमोऽपराजिताकारे नित्याकारे नमो नमः।

शरणागतपालिन्यै रुद्राण्यै ते नमो नमः।।

नमो वेदान्तवेद्यायै नमस्ते परमात्मने।

अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायिकायै नमो नमः।।

(शि० पु० उ० सं० ४७।३ – १०)


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