शिव पुराण – उमा संहिता – 12


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भगवती उमाके कालिका-अवतारकी कथा – समाधि और सुरथके समक्ष मेधाका देवीकी कृपासे मधुकैटभके वधका प्रसंग सुनाना

इसके अनन्तर छाया पुरुष, सर्ग, कश्यपवंश, मन्वन्तर, मनुवंश, सत्यव्रतादि-वंश, पितृकल्प तथा व्यासोत्पत्ति आदिका वर्णन सुननेके पश्चात् मुनियोंने सूतजीसे कहा – ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ सूतजी! हमने आपके मुखसे भगवान् शिवकी अनेक इतिहासोंसे युक्त रमणीय कथा सुनी, जो उनके नानावतारोंसे सम्बन्ध रखती है तथा मनुष्योंको भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली है।

अब हम आपसे जगज्जननी भगवती उमाका मनोहर चरित्र सुनना चाहते हैं।

परब्रह्म परमात्मा महेश्वरकी जो आद्या सनातनी शक्ति हैं, वे उमा नामसे विख्यात हैं।

वे ही त्रिलोकीको उत्पन्न करनेवाली पराशक्ति हैं।

महामते! दक्षकन्या सती और हिमवान् की पुत्री पार्वती – ये उमाके दो अवतार हमने सुने।

सूतजी! अब उनके दूसरे अवतारोंका वर्णन कीजिये।

लक्ष्मीजननी जगदम्बा उमाके गुणोंको सुननेसे कौन बुद्धिमान् पुरुष विरत हो सकता है।

ज्ञानी पुरुष भी कभी उनके कथा-श्रवणके शुभ अवसरको नहीं छोड़ते।

सूतजीने कहा – महात्माओ! तुमलोग धन्य हो और सर्वदा कृतकृत्य हो; क्योंकि परा अम्बा उमाके महान् चरित्रके विषयमें पूछ रहे हो।

जो इस कथाको सुनते, पूछते और बाँचते हैं, उनके चरणकमलोंकी धूलिको ही ऋषियोंने तीर्थ माना है।

जिनका चित्त परम संवित्-स्वरूपा श्रीउमादेवीके चिन्तनमें लीन है, वे पुरुष धन्य हैं, कृतकृत्य हैं, उनकी माता और कुल भी धन्य हैं।

जो समस्त कारणोंकी भी कारणरूपा देवेश्वरी उमाकी स्तुति नहीं करते, वे मायाके गुणोंसे मोहित तथा भाग्यहीन हैं – इसमें संशय नहीं है।

जो करुणारसकी सिन्धुस्वरूपा महादेवीका भजन नहीं करते, वे संसाररूपी घोर अन्धकूपमें पड़ते हैं।

जो देवी उमाको छोड़कर दूसरे देवी-देवताओंकी शरण लेता है, वह मानो गंगाजीको छोड़कर प्यास बुझानेके लिये मरुस्थलके जलाशयके पास जाता है।

जिनके स्मरणमात्रसे धर्म आदि चारों पुरुषार्थोंकी अनायास प्राप्ति होती है, उन देवी उमाकी आराधना कौन श्रेष्ठ पुरुष छोड़ सकता है।

पूर्वकालमें महामना सुरथने महर्षि मेधासे यही बात पूछी थी।

उस समय मेधाने जो उत्तर दिया, मैं वही बता रहा हूँ; तुमलोग सुनो।

पहले स्वारोचिष मन्वन्तरमें विरथ नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं।

उनके पुत्र सुरथ हुए, जो महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न थे।

वे दाननिपुण, सत्यवादी, स्वधर्मकुशल, विद्वान्, देवीभक्त, दयासागर तथा प्रजाजनोंका भलीभाँति पालन करनेवाले थे।

इन्द्रके समान तेजस्वी राजा सुरथके पृथ्वीपर शासन करते समय नौ ऐसे राजा हुए, जो उनके हाथसे भूमण्डलका राज्य छीन लेनेके प्रयत्नमें लगे थे।

उन्होंने भूपाल सुरथकी राजधानी कोलापुरीको चारों ओरसे घेर लिया।

उनके साथ राजाका बड़ा भयानक युद्ध हुआ।

उनके शत्रुगण बड़े प्रबल थे।

अतः युद्धमें भूपाल सुरथकी पराजय हुई।

शत्रुओंने सारा राज्य अपने अधिकारमें करके सुरथको कोलापुरीसे निकाल दिया।

राजा अपनी दूसरी पुरीमें आये और वहाँ मन्त्रियोंके साथ रहकर राज्य करने लगे।

परंतु प्रबल विपक्षियोंने वहाँ भी आक्रमण करके उन्हें पराजित कर दिया।

दैवयोगसे राजाके मन्त्री आदि गण भी उनके शत्रु बन बैठे और खजानेमें जो धन संचित था, वह सब उन विरोधी मन्त्री आदिने अपने हाथमें कर लिया।

तब राजा सुरथ शिकारके बहाने अकेले ही घोड़ेपर सवार हो नगरसे बाहर निकले और गहन वनमें चले गये।

वहाँ इधर-उधर घूमते हुए राजाने एक श्रेष्ठ मुनिका आश्रम देखा, जो चारों ओर फूलोंके बगीचे लगे होनेसे बड़ी शोभा पा रहा था।

वहाँ वेदमन्त्रोंकी ध्वनि गूँज रही थी।

सब जीव-जन्तु शान्तभावसे रहते थे।

मुनिके शिष्यों, प्रशिष्यों तथा उनके भी शिष्योंने उस आश्रमको सब ओरसे घेर रखा था।

महामते! विप्रवर मेधाके प्रभावसे उस आश्रममें महाबली व्याघ्र आदि अल्प शक्तिवाले गौ आदि पशुओंको पीड़ा नहीं देते थे।

वहाँ जानेपर मुनीश्वर मेधाने मीठे वचन, भोजन और आसनद्वारा उन परम दयालु विद्वान् नरेशका आदरसत्कार किया।

एक दिन राजा सुरथ बहुत ही चिन्तित तथा मोहके वशीभूत होकर अनेक प्रकारसे विचार कर रहे थे।

इतनेमें ही वहाँ एक वैश्य पहुँचा।

राजाने उससे पूछा – ‘भैया! तुम कौन हो और किसलिये यहाँ आये हो? क्या कारण है कि दुःखी दिखायी दे रहे हो? यह मुझे बताओ।’ राजाके मुखसे यह मधुर वचन सुनकर वैश्यप्रवर समाधिने दोनों नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए प्रेम और नम्रतापूर्ण वाणीमें इस प्रकार उत्तर दिया।

वैश्य बोला – राजन्! मैं वैश्य हूँ।

मेरा नाम समाधि है।

मैं धनीके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ।

परंतु मेरे पुत्रों और स्त्री आदिने धनके लोभसे मुझे घरसे निकाल दिया है।

अतः अपने प्रारब्धकर्मसे दुःखी हो मैं वनमें चला आया हूँ।

करुणासागर प्रभो! यहाँ आकर मैं पुत्रों, पौत्रों, पत्नी, भाई-भतीजे तथा अन्य सुहृदोंका कुशल-समाचार नहीं जान पाता।

राजा बोले – जिन दुराचारी तथा धनके लोभी पुत्र आदिने तुम्हें निकाल दिया है, उन्हींके प्रति मूर्ख जीवकी भाँति तुम प्रेम क्यों करते हो? वैश्यने कहा – राजन्! आपने उत्तम बात कही है।

आपकी वाणी सारगर्भित है, तथापि स्नेहपाशसे बँधा हुआ मेरा मन अत्यन्त मोहको प्राप्त हो रहा है।

इस तरह मोहसे व्याकुल हुए वैश्य और राजा दोनों मुनिवर मेधाके पास गये।

वैश्यसहित राजाने हाथ जोड़कर मुनिको प्रणाम किया और इस प्रकार कहा – ‘भगवन्! आप हम दोनोंके मोहपाशको काट दीजिये।

मुझे राज्यलक्ष्मीने छोड़ दिया और मैंने गहन वनकी शरण ली; तथापि राज्य छिन जानेके कारण मुझे संतोष नहीं है।

और यह वैश्य है, जिसे स्त्री आदि स्वजनोंने घरसे निकाल दिया है; तथापि उनकी ओरसे इसकी ममता दूर नहीं हो रही है।

इसका क्या कारण है? बताइये।

समझदार होनेपर भी हम दोनोंका मन मोहसे व्याकुल हो गया, यह तो बड़ी भारी मूर्खता है।

ऋषि बोले – राजन्! सनातन शक्ति-स्वरूपा जगदम्बा महामाया कही गयी हैं।

वे ही सबके मनको खींचकर मोहमें डाल देती हैं।

प्रभो! उनकी मायासे मोहित होनेके कारण ब्रह्मा आदि समस्त देवता भी परम तत्त्वको नहीं जान पाते, फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? वे परमेश्वरी ही रज, सत्त्व और तम – इन तीनों गुणोंका आश्रय ले समयानुसार सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि, पालन और संहार करती हैं।

नृपश्रेष्ठ! जिसके ऊपर वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली वरदायिनी जगदम्बा प्रसन्न होती हैं, वही मोहके घेरेको लाँघ पाता है।

राजाने पूछा – मुने! जो सबको मोहित करती हैं, वे देवी महामाया कौन हैं? और किस प्रकार उनका प्रादुर्भाव हुआ है? यह कृपा करके मुझे बताइये।

ऋषि बोले – जब सारा जगत् एकार्णवके जलमें निमग्न था और योगेश्वर भगवान् केशव शेषकी शय्या बिछाकर योगनिद्राका आश्रय ले शयन कर रहे थे, उन्हीं दिनों भगवान् विष्णुके कानोंके मलसे दो असुर उत्पन्न हुए, जो भूतलपर मधु और कैटभके नामसे विख्यात हैं।

वे दोनों विशालकाय घोर असुर प्रलयकालके सूर्यकी भाँति तेजस्वी थे।

उनके जबड़े बहुत बड़े थे।

उनके मुख दाढ़ोंके कारण ऐसे विकराल दिखायी देते थे, मानो वे सम्पूर्ण जगत् को खा जानेके लिये उद्यत हों।

उन दोनोंने भगवान् विष्णुकी नाभिसे प्रकट हुए कमलके ऊपर विराजमान ब्रह्माको देखकर पूछा – ‘अरे, तू कौन है?’ ऐसा कहते हुए वे उन्हें मार डालनेके लिये उद्यत हो गये।

ब्रह्माजीने देखा – ये दोनों दैत्य आक्रमण करना चाहते हैं और भगवान् जनार्दन समुद्रके जलमें सो रहे हैं, तब उन्होंने परमेश्वरीका स्तवन किया और उनसे प्रार्थना की – ‘अम्बिके! तुम इन दोनों दुर्जय असुरोंको मोहित करो और अजन्मा भगवान् नारायणको जगा दो।’ ऋषि कहते हैं – इस प्रकार मधु और कैटभके नाशके लिये ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर सम्पूर्ण विद्याओंकी अधिदेवी जगज्जननी महाविद्या फाल्गुन शुक्ला द्वादशीको त्रैलोक्य-मोहिनी शक्तिके रूपमें प्रकट हो महाकालीके नामसे विख्यात हुईं।

तदनन्तर आकाशवाणी हुई – ‘कमलासन! डरो मत।

आज युद्धमें मधु-कैटभको मारकर मैं तुम्हारे कण्टकका नाश करूँगी।’ यों कहकर वे महामाया श्रीहरिके नेत्र और मुख आदिसे निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके दृष्टिपथमें आ खड़ी हो गयीं।

फिर तो देवाधिदेव हृषीकेश जनार्दन जाग उठे।

उन्होंने अपने सामने दोनों दैत्य मधु और कैटभको देखा।

उन दैत्योंके साथ अतुल तेजस्वी विष्णुका पाँच हजार वर्षोंतक बाहुयुद्ध हुआ।

तब महामायाके प्रभावसे मोहित हुए उन श्रेष्ठ दानवोंने लक्ष्मीपतिसे कहा – ‘तुम हमसे मनोवांछित वर ग्रहण करो।’ नारायण बोले – यदि तुमलोग प्रसन्न हो तो मेरे हाथसे मारे जाओ।

यही मेरा वर है।

इसे दो।

मैं तुम दोनोंसे दूसरा वर नहीं माँगता।

ऋषि कहते हैं – उन असुरोंने देखा, सारी पृथ्वी एकार्णवके जलमें डूबी हुई है; तब वे केशवसे बोले – ‘हम दोनोंको ऐसी जगह मारो, जहाँ जलसे भीगी हुई धरती न हो।

‘बहुत अच्छा’ कहकर भगवान् विष्णुने अपना परम तेजस्वी चक्र उठाया और अपनी जाँघपर उनके मस्तक रखकर काट डाला।

राजन्! यह कालिकाकी उत्पत्तिका प्रसंग कहा गया है।

महामते! अब महालक्ष्मीके प्रादुर्भावकी कथा सुनो।

देवी उमा निर्विकार और निराकार होकर भी देवताओंका दुःख दूर करनेके लिये युग-युगमें साकाररूप धारण करके प्रकट होती हैं।

उनका शरीरग्रहण उनकी इच्छाका वैभव कहा गया है।

वे लीलासे इसलिये प्रकट होती हैं कि भक्तजन उनके गुणोंका गान करते रहें।

(अध्याय २८ – ४५)


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