शिव पुराण – उमा संहिता – 10


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शिव पुराण संहिता लिंकविद्येश्वर | रुद्र संहिता | शतरुद्र | कोटिरुद्र | उमा | कैलास | वायवीय


कालको जीतनेका उपाय, नवधा शब्दब्रह्म एवं तुंकारके अनुसंधान और उससे प्राप्त होनेवाली सिद्धियोंका वर्णन देवी

पार्वतीने कहा – प्रभो! कालसे आकाशका भी नाश होता है।

वह भयंकर काल बड़ा विकराल है।

वह स्वर्गका भी एकमात्र स्वामी है।

आपने उसे दग्ध कर दिया था, परंतु अनेक प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा जब उसने आपकी स्तुति की, तब आप फिर संतुष्ट हो गये और वह काल पुनः अपनी प्रकृतिको प्राप्त हुआ – पूर्णतः स्वस्थ हो गया।

आपने उससे बातचीतमें कहा – ‘काल! तुम सर्वत्र विचरोगे, किन्तु लोग तुम्हें देख नहीं सकेंगे।’ आप प्रभुकी कृपादृष्टि होने और वर मिलनेसे वह काल जी उठा तथा उसका प्रभाव बहुत बढ़ गया।

अतः महेश्वर! क्या यहाँ ऐसा कोई साधन है, जिससे उस कालको नष्ट किया जा सके? यदि हो तो मुझे बताइये; क्योंकि आप योगियोंमें शिरोमणि और स्वतन्त्र प्रभु हैं।

आप परोपकारके लिये ही शरीर धारण करते हैं।

शिव बोले – देवि! श्रेष्ठ देवता, दैत्य, यक्ष, राक्षस, नाग और मनुष्य – किसीके द्वारा भी कालका नाश नहीं किया जा सकता; परंतु जो ध्यानपरायण योगी हैं, वे शरीरधारी होनेपर भी सुखपूर्वक कालको नष्ट कर देते हैं।

वरारोहे! यह पांचभौतिक शरीर सदा उन भूतोंके गुणोंसे युक्त ही उत्पन्न होता है और उन्हींमें इसका लय होता है।

मिट्टीकी देह मिट्टीमें ही मिल जाती है।

आकाशसे वायु उत्पन्न होती है, वायुसे तेजस्तत्त्व प्रकट होता है, तेजसे जलका प्राकट्य बताया गया है और जलसे पृथ्वीका आविर्भाव होता है।

पृथ्वी आदि भूत क्रमशः अपने कारणमें लीन होते हैं।

पृथ्वीके पाँच, जलके चार, तेजके तीन और वायुके दो गुण होते हैं।

आकाशका एकमात्र शब्द ही गुण है।

पृथ्वी आदिमें जो गुण बताये गये हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं – शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध।

जब भूत अपने गुणको त्याग देता है, तब नष्ट हो जाता है और जब गुणको ग्रहण करता है, तब उसका प्रादुर्भाव हुआ बताया जाता है।

देवेश्वरि! इस प्रकार तुम पाँचों भूतोंके यथार्थ स्वरूपको समझो।

देवि! इस कारण कालको जीतनेकी इच्छावाले योगीको चाहिये कि वह प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक अपने-अपने कालमें उसके अंशभूत गुणोंका चिन्तन करे।

योगवेत्ता पुरुषको चाहिये कि सुखद आसनपर बैठकर विशुद्ध श्वास (प्राणायाम)-द्वारा योगाभ्यास करे।

रातमें जब सब लोग सो जायँ, उस समय दीपक बुझाकर अन्धकारमें योग धारण करे।

तर्जनी अँगुलीसे दोनों कानोंको बंद करके दो घड़ीतक दबाये रखे।

उस अवस्थामें अग्निप्रेरित शब्द सुनायी देता है।

इससे संध्याके बादका खाया हुआ अन्न क्षणभरमें पच जाता है और सम्पूर्ण रोगों तथा ज्वर आदि बहुत-से उपद्रवोंका शीघ्र नाश कर देता है।

जो साधक प्रतिदिन इसी प्रकार दो घड़ीतक शब्दब्रह्मका साक्षात्कार करता है, वह मृत्यु तथा कामको जीतकर इस जगत् में स्वच्छन्द विचरता है और सर्वज्ञ एवं समदर्शी होकर सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्राप्त कर लेता है।

जैसे आकाशमें वर्षासे युक्त बादल गरजता है, उसी प्रकार उस शब्दको सुनकर योगी तत्काल संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।

तदनन्तर योगियोंद्वारा प्रतिदिन चिन्तन किया जाता हुआ वह शब्द क्रमशः सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर हो जाता है।

देवि! इस प्रकार मैंने तुम्हें शब्दब्रह्मके चिन्तनका क्रम बताया है।

जैसे धान चाहनेवाला पुरुष पुआलको छोड़ देता है, उसी तरह मोक्षकी इच्छावाला योगी सारे बन्धनोंको त्याग देता है।

इस शब्दब्रह्मको पाकर भी जो दूसरी वस्तुकी अभिलाषा करते हैं, वे मुक्केसे आकाशको मारते और भूख-प्यासकी कामना करते हैं।

यह शब्दब्रह्म ही सुखद, मोक्षका कारण, बाहर-भीतरके भेदसे रहित, अविनाशी और समस्त उपाधियोंसे रहित परब्रह्म है।

इसे जानकर मनुष्य मुक्त हो जाते हैं।

जो लोग कालपाशसे मोहित हो शब्दब्रह्मको नहीं जानते, वे पापी और कुबुद्धि मनुष्य मौतके फंदेमें फँसे रहते हैं।

मनुष्य तभीतक संसारमें जन्म लेते हैं, जबतक सबके आश्रयभूत परमतत्त्व (परब्रह्म परमात्मा)-की प्राप्ति नहीं होती।

परमतत्त्वका ज्ञान हो जानेपर मनुष्य जन्म-मृत्युके बन्धनसे मुक्त हो जाता है।

निद्रा और आलस्य साधनाका बहुत बड़ा विघ्न है।

इस शत्रुको यत्नपूर्वक जीतकर सुखद आसनपर आसीन हो प्रतिदिन शब्दब्रह्मका अभ्यास करना चाहिये।

सौ वर्षकी अवस्थावाला वृद्ध पुरुष आजीवन इसका अभ्यास करे तो उसका शरीररूपी स्तम्भ मृत्युको जीतनेवाला हो जाता है और उसे प्राणवायुकी शक्तिको बढ़ानेवाला आरोग्य प्राप्त होता है।

वृद्ध पुरुषमें भी ब्रह्मके अभ्याससे होनेवाले लाभका विश्वास देखा जाता है, फिर तरुण मनुष्यको इस साधनासे पूर्ण लाभ हो इसके लिये तो कहना ही क्या है।

यह शब्दब्रह्म न ओंकार है, न मन्त्र है, न बीज है, न अक्षर है।

यह अनाहत नाद (बिना आघातके अथवा बिना बजाये ही प्रकट होनेवाला शब्द) है।

इसका उच्चारण किये बिना ही चिन्तन होता है।

यह शब्दब्रह्म परम कल्याणमय है।

प्रिये! शुद्ध बुद्धिवाले पुरुष यत्नपूर्वक निरन्तर इसका अनुसंधान करते हैं।

अतः नौ प्रकारके शब्द बताये गये हैं, जिन्हें प्राणवेत्ता पुरुषोंने लक्षित किया है।

मैं उन्हें प्रयत्न करके बता रहा हूँ।

उन शब्दोंको नादसिद्धि भी कहते हैं।

वे शब्द क्रमशः इस प्रकार हैं – घोष, कांस्य (झाँझ आदि), शृंग (सिंगा आदि), घण्टा, वीणा आदि, बाँसुरी, दुन्दुभि, शंख और नवाँ मेघगर्जन – इन नौ प्रकारके शब्दोंको त्यागकर तुंकारका अभ्यास करे।

इस प्रकार सदा ही ध्यान करनेवाला योगी पुण्य और पापोंसे लिप्त नहीं होता है।

देवि! योगाभ्यासके द्वारा सुननेका प्रयत्न करनेपर भी जब योगी उन शब्दोंको नहीं सुनता और अभ्यास करते-करते मरणासन्न हो जाता है, तब भी वह दिन-रात उस अभ्यासमें ही लगा रहे।

ऐसा करनेसे सात दिनोंमें वह शब्द प्रकट होता है, जो मृत्युको जीतनेवाला है।

देवि! वह शब्द नौ प्रकारका है।

उसका मैं यथार्थरूपसे वर्णन करता हूँ।

पहले तो घोषात्मक नाद प्रकट होता है, जो आत्मशुद्धिका उत्कृष्ट साधन है।

वह उत्तम नाद सब रोगोंको हर लेनेवाला तथा मनको वशीभूत करके अपनी ओर खींचनेवाला है।

दूसरा कांस्य-नाद है, जो प्राणियोंकी गतिको स्तम्भित कर देता है।

वह विष, भूत और ग्रह आदि सबको बाँधता है – इसमें संशय नहीं है।

तीसरा शृंग-नाद है, जो अभिचारसे सम्बन्ध रखनेवाला है।

उसका शत्रुके उच्चाटन और मारणमें नियोग एवं प्रयोग करे।

चौथा घण्टा-नाद है; जिसका साक्षात् परमेश्वर शिव उच्चारण करते हैं।

वह नाद सम्पूर्ण देवताओंको आकृष्ट कर लेता है, फिर भूतलके मनुष्योंकी तो बात ही क्या है।

यक्षों और गन्धर्वोंकी कन्याएँ उस नादसे आकृष्ट हो योगीको उसकी इच्छाके अनुसार महासिद्धि प्रदान करती हैं तथा उसकी अन्य कामनाएँ भी पूर्ण करती हैं।

पाँचवाँ नाद वीणा है, जिसे योगी पुरुष ही सदा सुनते हैं।

देवि! उस वीणा-नादसे दूर-दर्शनकी शक्ति प्राप्त होती है।

वंशीनादका ध्यान करनेवाले योगीको सम्पूर्ण तत्त्व प्राप्त हो जाता है।

दुन्दुभिका चिन्तन करनेवाला साधक जरा और मृत्युके कष्टसे छूट जाता है।

देवेश्वरि! शंखनादका अनुसंधान होनेपर इच्छानुसार रूप धारण करनेकी शक्ति प्राप्त हो जाती है।

मेघनादके चिन्तनसे योगीको कभी विपत्तिका सामना नहीं करना पड़ता।

वरानने! जो प्रतिदिन एकाग्रचित्तसे ब्रह्मरूपी तुंकारका ध्यान करता है, उसके लिये कुछ भी असाध्य नहीं होता।

उसे मनोवांछित सिद्धि प्राप्त हो जाती है।

वह सर्वज्ञ, सर्वदर्शी और इच्छानुसार रूपधारी होकर सर्वत्र विचरण करता है, कभी विकारोंके वशीभूत नहीं होता।

वह साक्षात् शिव ही है, इसमें संशय नहीं है।

परमेश्वरि! इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष शब्दब्रह्मके नवधा स्वरूपका पूर्णतया वर्णन किया है।

अब और क्या सुनना चाहती हो? (अध्याय २६)


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