शिव पुराण - शतरुद्र संहिता - 8


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शिव पुराण संहिता लिंकविद्येश्वर | रुद्र संहिता | शतरुद्र | कोटिरुद्र | उमा | कैलास | वायवीय


शिवजीका शुचिष्मतीके गर्भसे प्राकट्य, ब्रह्माद्वारा बालकका संस्कार करके ‘गृहपति’ नाम रखा जाना, नारदजीद्वारा उसका भविष्य-कथन, पिताकी आज्ञासे गृहपतिका काशीमें जाकर तप करना, इन्द्रका वर देनेके लिये प्रकट होना, गृहपतिका उन्हें ठुकराना, शिवजीका प्रकट होकर उन्हें वरदान देकर दिक्पालपद प्रदान करना तथा अग्नीश्वरलिंग और अग्निका माहात्म्य

नन्दीश्वरजी कहते हैं – मुने! घर आकर उस ब्राह्मणने बड़े हर्षके साथ अपनी पत्नीसे वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया।

उसे सुनकर विप्रपत्नी शुचिष्मतीको महान् आनन्द प्राप्त हुआ।

वह अत्यन्त प्रेमपूर्वक अपने भाग्यकी सराहना करने लगी।

तदनन्तर समय आनेपर ब्राह्मणद्वारा विधिपूर्वक गर्भाधान कर्म सम्पन्न किये जानेपर वह नारी गर्भवती हुई।

फिर उन विद्वान् मुनिने गर्भके स्पन्दन करनेसे पूर्व ही पुंस्त्वकी वृद्धिके लिये गृह्यसूत्रमें वर्णित विधिके अनुसार सम्यक्-रूपसे पुंसवन-संस्कार किया।

तत्पश्चात् आठवाँ महीना आनेपर कृपालु विश्वानरने सुखपूर्वक प्रसव होनेके अभिप्रायसे गर्भके रूपकी समृद्धि करनेवाला सीमन्त-संस्कार सम्पन्न कराया।

तदुपरान्त ताराओंके अनुकूल होनेपर जब बृहस्पति केन्द्रवर्ती हुए और शुभ ग्रहोंका योग आया, तब शुभ लग्नमें भगवान् शंकर, जिनके मुखकी कान्ति पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान है तथा जो अरिष्टरूपी दीपकको बुझानेवाले, समस्त अरिष्टोंके विनाशक और भूः, भुवः, स्वः – तीनों लोकोंके निवासियोंको सब तरहसे सुख देनेवाले हैं, उस शुचिष्मतीके गर्भसे पुत्ररूपमें प्रकट हुए।

उस समय गन्धको वहन करनेवाले वायुके वाहन मेघ दिशारूपी बधुओंके मुखपर वस्त्र-से बन गये अर्थात् चारों ओर काली घटा उमड़ आयी।

वे घनघोर बादल उत्तम गन्धवाले पुष्पसमूहोंकी वर्षा करने लगे।

देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं।

चारों ओर दिशाएँ निर्मल हो गयीं।

प्राणियोंके मनोंके साथ-साथ सरिताओंका जल निर्मल हो गया।

प्राणियोंकी वाणी सर्वथा कल्याणी और प्रियभाषिणी हो उठी।

सम्पूर्ण प्रसिद्ध ऋषि-मुनि तथा देवता, यक्ष, किंनर, विद्याधर आदि मंगल द्रव्य ले-लेकर पधारे।

स्वयं ब्रह्माजीने नम्रतापूर्वक उसका जातकर्म-संस्कार किया और उस बालकके रूप तथा वेदका विचार करके यह निश्चय किया कि इसका नाम गृहपति होना चाहिये।

फिर ग्यारहवें दिन उन्होंने नामकरणकी विधिके अनुसार वेदमन्त्रोंका उच्चारण करते हुए उसका ‘गृहपति’ ऐसा नामकरण किया।

तत्पश्चात् सबके पितामह ब्रह्मा चारों वेदोंमें कथित आशीर्वादात्मक मन्त्रोंद्वारा उसका अभिनन्दन करके हंसपर आरूढ़ हो अपने लोकको चले गये।

तदुपरान्त शंकर भी लौकिकी गतिका आश्रय ले उस बालककी उचित रक्षाका विधान करके अपने वाहनपर चढ़कर अपने धामको पधार गये।

इसी प्रकार श्रीहरिने भी अपने लोककी राह ली।

इस प्रकार सभी देवता, ऋषि-मुनि आदि भी प्रशंसा करते हुए अपने-अपने स्थानको पधार गये।

तदनन्तर ब्राह्मण देवताने यथासमय सब संस्कार करते हुए बालकको वेदाध्ययन कराया।

तत्पश्चात् नवाँ वर्ष आनेपर माता-पिताकी सेवामें तत्पर रहनेवाले विश्वानर-नन्दन गृहपतिको देखनेके लिये वहाँ नारदजी पधारे।

बालकने माता-पितासहित नारदजीको प्रणाम किया।

फिर नारदजीने बालककी हस्तरेखा, जिह्वा, तालु आदि देखकर कहा – ‘मुनि विश्वानर! मैं तुम्हारे पुत्रके लक्षणोंका वर्णन करता हूँ, तुम आदरपूर्वक उसे श्रवण करो।

तुम्हारा यह पुत्र परम भाग्यवान् है, इसके सम्पूर्ण अंगोंके लक्षण शुभ हैं।

किंतु इसके सर्वगुणसम्पन्न, सम्पूर्ण शुभलक्षणोंसे समन्वित और चन्द्रमाके समान सम्पूर्ण निर्मल कलाओंसे सुशोभित होनेपर भी विधाता ही इसकी रक्षा करें।

इसलिये सब तरहके उपायोंद्वारा इस शिशुकी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि विधाताके विपरीत होनेपर गुण भी दोष हो जाता है।

मुझे शंका है कि इसके बारहवें वर्षमें इसपर बिजली अथवा अग्निद्वारा विघ्न आयेगा।’ यों कहकर नारदजी जैसे आये थे, वैसे ही देवलोकको चले गये।

सनत्कुमारजी! नारदजीका कथन सुनकर पत्नीसहित विश्वानरने समझ लिया कि यह तो बड़ा भयंकर वज्रपात हुआ।

फिर वे ‘हाय! मैं मारा गया’ यों कहकर छाती पीटने लगे और पुत्रशोकसे व्याकुल होकर गहरी मूर्च्छाके वशीभूत हो गये।

उधर शुचिष्मती भी दुःखसे पीड़ित हो अत्यन्त ऊँचे स्वरसे हाहाकार करती हुई ढाढ़ मारकर रो पड़ी, उसकी सारी इन्द्रियाँ अत्यन्त व्याकुल हो उठीं।

तब पत्नीके आर्तनादको सुनकर विश्वानर भी मूर्च्छा त्यागकर उठ बैठे और ‘ऐं! यह क्या है? क्या हुआ?’ यों उच्चस्वरसे बोलते हुए कहने लगे – ‘गृहपति! जो मेरा बाहर विचरनेवाला प्राण, मेरी सारी इन्द्रियोंका स्वामी तथा मेरे अन्तरात्मामें निवास करनेवाला है, कहाँ है?’ तब माता-पिताको इस प्रकार अत्यन्त शोकग्रस्त देखकर शंकरके अंशसे उत्पन्न हुआ वह बालक गृहपति मुसकराकर बोला।

गृहपतिने कहा – माताजी तथा पिताजी! बताइये इस समय आपलोगोंके रोनेका क्या कारण है? किसलिये आपलोग फूट-फूटकर रो रहे हैं? कहाँसे ऐसा भय आपलोगोंको प्राप्त हुआ है? यदि मैं आपकी चरणरेणुओंसे अपने शरीरकी रक्षा कर लूँ तो मुझपर काल भी अपना प्रभाव नहीं डाल सकता; फिर इस तुच्छ, चंचल एवं अल्प बलवाली मृत्युकी तो बात ही क्या है।

माता-पिताजी! अब आपलोग मेरी प्रतिज्ञा सुनिये – ‘यदि मैं आपलोगोंका पुत्र हूँ तो ऐसा प्रयत्न करूँगा जिससे मृत्यु भी भयभीत हो जायगी।

मैं सत्पुरुषोंको सब कुछ दे डालनेवाले सर्वज्ञ मृत्युंजयकी भलीभाँति आराधना करके महाकालको भी जीत लूँगा – यह मैं आप लोगोंसे बिलकुल सत्य कह रहा हूँ।’ नन्दीश्वरजी कहते हैं – मुने! तब वे द्विजदम्पति, जो शोकसे संतप्त हो रहे थे, गृहपतिके ऐसे वचन, जो अकालमें हुई अमृतकी घनघोर वृष्टिके समान थे, सुनकर संतापरहित हो कहने लगे – ‘बेटा! तू उन शिवकी शरणमें जा, जो ब्रह्मा आदिके भी कर्ता, मेघवाहन, अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले और विश्वकी रक्षामणि हैं।’ नन्दीश्वरजी कहते हैं – मुने! माता-पिताकी आज्ञा पाकर गृहपतिने उनके चरणोंमें प्रणाम किया।

फिर उनकी प्रदक्षिणा करके और उन्हें बहुत तरहसे आश्वासन दे वे वहाँसे चल पड़े और उस काशीपुरीमें जा पहुँचे, जो ब्रह्मा और नारायण आदि देवोंके लिये (भी) दुष्प्राप्य, महाप्रलयके संतापका विनाश करनेवाली और विश्वनाथद्वारा सुरक्षित थी तथा जो कण्ठप्रदेशमें हारकी तरह पड़ी हुई गंगासे सुशोभित तथा विचित्र गुणशालिनी हरपत्नी गिरिजासे विभूषित थी।

वहाँ पहुँचकर वे विप्रवर पहले मणिकर्णिकापर गये।

वहाँ उन्होंने विधिपूर्वक स्नान करके भगवान् विश्वनाथका दर्शन किया।

फिर बुद्धिमान् गृहपतिने परमानन्दमग्न हो त्रिलोकीके प्राणियोंकी प्राणरक्षा करनेवाले शिवको प्रणाम किया।

उस समय उनकी अंजलि बँधी थी और सिर झुका हुआ था।

वे बारंबार उस शिवलिंगकी ओर देखकर हृदयमें हर्षित हो रहे थे (और यह सोच रहे थे कि) यह लिंग निस्संदेह स्पष्टरूपसे आनन्दकन्द ही है।

(वे कहने लगे – ) अहो! आज मुझे जो सर्वव्यापी श्रीमान् विश्वनाथका दर्शन प्राप्त हुआ, इसलिये इस चराचर त्रिलोकीमें मुझसे बढ़कर धन्यवादका पात्र दूसरा कोई नहीं है।

जान पड़ता है, मेरा भाग्योदय होनेसे ही उन दिनोंमें महर्षि नारदने आकर वैसी बात कही थी, जिसके कारण आज मैं कृतकृत्य हो रहा हूँ।

नन्दीश्वरजी कहते हैं – मुने! इस प्रकार आनन्दामृतरूपी रसोंद्वारा पारण करके गृहपतिने शुभ दिनमें सर्वहितकारी शिवलिंगकी स्थापना की और पवित्र गंगाजलसे भरे हुए एक सौ आठ कलशोंद्वारा शिवजीको स्नान कराकर ऐसे घोर नियमोंको स्वीकार किया, जो अकृतात्मा पुरुषोंके लिये दुष्कर थे।

नारदजी! इस प्रकार एकमात्र शिवमें मन लगाकर तपस्या करते हुए उस महात्मा गृहपतिकी आयुका एक वर्ष व्यतीत हो गया।

तब जन्मसे बारहवाँ वर्ष आनेपर नारदजीके कहे हुए उस वचनको सत्य-सा करते हुए वज्रधारी इन्द्र उनके निकट पधारे और बोले – ‘विप्रवर! मैं इन्द्र हूँ और तुम्हारे शुभ व्रतसे प्रसन्न होकर आया हूँ।

अब तुम वर माँगो, मैं तुम्हारी मनोवांछा पूर्ण कर दूँगा।’ तब गृहपतिने कहा – मघवन्! मैं जानता हूँ, आप वज्रधारी इन्द्र हैं; परंतु वृत्रशत्रो! मैं आपसे वर याचना करना नहीं चाहता, मेरे वरदायक तो शंकरजी ही होंगे।

इन्द्र बोले – शिशो! शंकर मुझसे भिन्न थोड़े ही हैं।

अरे! मैं देवराज हूँ, अतः तुम अपनी मूर्खताका परित्याग करके वर माँग लो, देर मत करो।

गृहपतिने कहा – पाकशासन! आप अहल्याका सतीत्व नष्ट करनेवाले दुराचारी पर्वतशत्रु ही हैं न।

आप जाइये; क्योंकि मैं पशुपतिके, अतिरिक्त किसी अन्य देवके सामने स्पष्टरूपसे प्रार्थना करना नहीं चाहता।

नन्दीश्वरजी कहते हैं – मुने! गृहपतिके उस वचनको सुनकर इन्द्रके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये।

वे अपने भयंकर वज्रको उठाकर उस बालकको डराने-धमकाने लगे।

तब बिजलीकी ज्वालाओंसे व्याप्त उस व्रजको देखकर बालक गृहपतिको नारदजीके वाक्य स्मरण हो आये।

फिर तो वे भयसे व्याकुल होकर मूर्च्छित हो गये।

तदनन्तर अज्ञानान्धकारको दूर भगानेवाले गौरीपति शम्भु वहाँ प्रकट हो गये और अपने हस्तस्पर्शसे उसे जीवनदान देते हुए-से बोले – ‘वत्स! उठ, उठ।

तेरा कल्याण हो।’ तब रात्रिके समय मुँदे हुए कमलकी तरह उसके नेत्रकमल खुल गये और उसने उठकर अपने सामने सैकड़ों सूर्योंसे भी अधिक प्रकाशमान शम्भुको उपस्थित देखा।

उनके ललाटमें तीसरा नेत्र चमक रहा था, गलेमें नीला चिह्न था, ध्वजापर वृषभका स्वरूप दीख रहा था, वामांगमें गिरिजादेवी विराजमान थीं।

मस्तकपर चन्द्रमा सुशोभित था।

बड़ी-बड़ी जटाओंसे उनकी अद्भुत शोभा हो रही थी।

वे अपने आयुध त्रिशूल और आजगव धनुष धारण किये हुए थे।

कपूरके समान गौरवर्णका शरीर अपनी प्रभा बिखेर रहा था, वे गजचर्म लपेटे हुए थे।

उन्हें देखकर शास्त्रकथित लक्षणों तथा गुरु-वचनोंसे जब गृहपतिने समझ लिया कि ये महादेव ही हैं, तब हर्षके मारे उनके नेत्रोंमें आँसू छलक आये, गला रुँध गया और शरीर रोमांचित हो उठा।

वे क्षणभरतक अपने-आपको भूलकर चित्रकूट एवं त्रिपुत्रक पर्वतकी भाँति निश्चल खड़े रह गये।

जब वे स्तवन करने, नमस्कार करने अथवा कुछ भी कहनेमें समर्थ न हो सके, तब शिवजी मुसकराकर बोले।

ईश्वरने कहा – गृहपते! जान पड़ता है, तुम वज्रधारी इन्द्रसे डर गये हो।

वत्स! तुम भयभीत मत होओ; क्योंकि मेरे भक्तपर इन्द्र और वज्रकी कौन कहे, यमराज भी अपना प्रभाव नहीं डाल सकते।

यह तो मैंने तुम्हारी परीक्षा ली है और मैंने ही तुम्हें इन्द्ररूप धारण करके डराया है।

भद्र! अब मैं तुम्हें वर देता हूँ – आजसे तुम अग्निपदके भागी होओगे।

तुम समस्त देवताओंके लिये वरदाता बनोगे।

अग्ने! तुम समस्त प्राणियोंके अंदर जठराग्निरूपसे विचरण करोगे।

तुम्हें दिक्पालरूपसे धर्मराज और इन्द्रके मध्यमें राज्यकी प्राप्ति होगी।

तुम्हारे द्वारा स्थापित यह शिवलिंग तुम्हारे नामपर ‘अग्नीश्वर’ नामसे प्रसिद्ध होगा।

यह सब प्रकारके तेजोंकी वृद्धि करनेवाला होगा।

जो लोग इस अग्नीश्वर-लिंगके भक्त होंगे, उन्हें बिजली और अग्निका भय नहीं रह जायगा, अग्निमान्द्य नामक रोग नहीं होगा और न कभी उनकी अकालमृत्यु ही होगी।

काशीपुरीमें स्थित सम्पूर्ण समृद्धियोंके प्रदाता अनीश्वरकी भलीभाँति अर्चना करनेवाला भक्त यदि प्रारब्धवश किसी अन्य स्थानमें भी मृत्युको प्राप्त होगा तो भी वह वह्निलोकमें प्रतिष्ठित होगा।

नन्दीश्वरजी कहते हैं – मुने! यों कहकर शिवजीने गृहपतिके बन्धुओंको बुलाकर उनके माता-पिताके सामने उस अग्निका दिक् पतिपदपर अभिषेक कर दिया और स्वयं उसी लिंगमें समा गये।

तात! इस प्रकार मैंने तुमसे परमात्मा शंकरके गृहपति नामक अग्न्यवतारका, जो दुष्टोंको पीड़ित करनेवाला है, वर्णन कर दिया।

जो सुदृढ़ पराक्रमी जितेन्द्रिय पुरुष अथवा सत्त्वसम्पन्न स्त्रियाँ अग्निप्रवेश कर जाती हैं, वे सब-के-सब अग्निसरीखे तेजस्वी होते हैं।

इसी प्रकार जो ब्राह्मण अग्निहोत्र-परायण, ब्रह्मचारी तथा पंचाग्निका सेवन करनेवाले हैं, वे अग्निके समान वर्चस्वी होकर अग्निलोकमें विचरते हैं।

जो शीतकालमें शीतनिवारणके निमित्त बोझ-की-बोझ लकड़ियाँ दान करता है अथवा जो अग्निकी इष्टि करता है, वह अग्निके संनिकट निवास करता है।

जो श्रद्धापूर्वक किसी अनाथ मृतकका अग्निसंस्कार कर देता है अथवा स्वयं शक्ति न होनेपर दूसरेको प्रेरित करता है, वह अग्निलोकमें प्रशंसित होता है।

द्विजातियोंके लिये परम कल्याणकारक एक अग्नि ही है।

वही निश्चितरूपसे गुरु, देवता, व्रत, तीर्थ अर्थात् सब कुछ है।

जितनी अपावन वस्तुएँ हैं, वे सब अग्निका संसर्ग होनेसे उसी क्षण पावन हो जाती हैं; इसीलिये अग्निको पावक कहा जाता है।

यह शम्भुकी प्रत्यक्ष तेजोमयी दहनात्मिका मूर्ति है, जो सृष्टि रचनेवाली, पालन करनेवाली और संहार करनेवाली है।

भला, इसके बिना कौन-सी वस्तु दृष्टिगोचर हो सकती है।

इनके द्वारा भक्षण किये हूए धूप, दीप, नैवेद्य, दूध, दही, घी और खाँड़ आदिका देवगण स्वर्गमें सेवन करते हैं।

(अध्याय १४-१५)


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