शिव पुराण - शतरुद्र संहिता - 5


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नन्दीश्वरावतारका वर्णन यहाँतक बयालीस अवतारोंका वर्णन किया गया।

अब नन्दीश्वरावतारका वर्णन किया जाता है।

सनत्कुमारजीने पूछा – प्रभो! आप महादेवके अंशसे उत्पन्न होकर पीछे शिवको कैसे प्राप्त हुए थे? वह सारा वृत्तान्त मैं सुनना चाहता हूँ, उसे वर्णन करनेकी कृपा करें।

नन्दीश्वर बोले – सर्वज्ञ सनत्कुमारजी! मैं जिस प्रकार महादेवके अंशसे जन्म लेकर शिवको प्राप्त हुआ, उस प्रसंगका वर्णन करता हूँ; तुम सावधानीपूर्वक श्रवण करो।

शिलाद नामक एक धर्मात्मा मुनि थे।

पितरोंके आदेशसे उन्होंने अयोनिज सुव्रत मृत्युहीन पुत्रकी प्राप्तिके लिये तप करके देवेश्वर इन्द्रको प्रसन्न किया।

परंतु देवराज इन्द्रने ऐसा पुत्र प्रदान करनेमें अपनेको असमर्थ बताकर सर्वेश्वर महाशक्तिसम्पन्न महादेवकी आराधना करनेका उपदेश दिया।

तब शिलाद भगवान् महादेवको प्रसन्न करनेके लिये तप करने लगे।

उनके तपसे प्रसन्न होकर महादेव वहाँ पधारे और महासमाधिमग्न शिलादको थपथपाकर जगाया।

तब शिलादने शिवका स्तवन किया और भगवान् शिवके उन्हें वर देनेको प्रस्तुत होनेपर उनसे कहा – ‘प्रभो! मैं आपके ही समान मृत्युहीन अयोनिज पुत्र चाहता हूँ।’ तब शिवजी प्रसन्न होकर मुनिसे बोले।

शिवजीने कहा – तपोधन विप्र! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने, मुनियोंने तथा बड़े-बड़े देवताओंने मेरे अवतार धारण करनेके लिये तपस्याद्वारा मेरी आराधना की थी।

इसलिये मुने! यद्यपि मैं सारे जगत् का पिता हूँ, फिर भी तुम मेरे पिता बनोगे और मैं तुम्हारा अयोनिज पुत्र होऊँगा तथा मेरा नाम नन्दी होगा।

नन्दीश्वरजी कहते हैं – मुने! यों कहकर कृपालु शंकरने अपने चरणोंमें प्रणिपात करके सामने खड़े हुए शिलाद मुनिकी ओर कृपादृष्टिसे देखा और उन्हें ऐसा आदेश दे वे तुरंत ही उमासहित वहीं अन्तर्धान हो गये।

महादेवजीके चले जानेके पश्चात् महामुनि शिलादने अपने आश्रममें आकर ऋषियोंसे वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया।

कुछ समय बीत जानेके बाद जब यज्ञवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मेरे पिताजी यज्ञ करनेके लिये यज्ञक्षेत्रको जोत रहे थे, उसी समय मैं शम्भुकी आज्ञासे यज्ञके पूर्व ही उनके शरीरसे उत्पन्न हो गया।

उस समय मेरे शरीरकी प्रभा युगान्तकालीन अग्निके समान थी।

तब सारी दिशाओंमें प्रसन्नता छा गयी और शिलाद मुनिकी भी बड़ी प्रशंसा हुई।

उधर शिलादने भी जब मुझ बालकको प्रलयकालीन सूर्य और अग्निके सदृश प्रभाशाली, त्रिनेत्र, चतुर्भुज, प्रकाशमान, जटामुकुटधारी, त्रिशूल आदि आयुधोंसे युक्त, सर्वथा रुद्ररूपमें देखा, तब वे महान् आनन्दमें निमग्न हो गये और मुझ प्रणम्यको नमस्कार करते हुए कहने लगे।

शिलाद बोले – सुरेश्वर! चूँकि तुमने नन्दी नामसे प्रकट होकर मुझे आनन्दित किया है, इसलिये मैं तुम आनन्दमय जगदीश्वरको नमस्कार करता हूँ।

नन्दीश्वरजी कहते हैं – मुने! तदनन्तर जैसे निर्धनको निधि प्राप्त हो जानेसे प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार मेरी प्राप्तिसे हर्षित होकर पिताजीने महेश्वरकी भलीभाँति वन्दना की और फिर मुझे लेकर वे शीघ्र ही अपनी पर्णशालाको चल दिये।

महामुने! जब मैं शिलादकी कुटियामें पहुँच गया, तब मैंने अपने उस रूपका परित्याग करके मनुष्यरूप धारण कर लिया।

तदनन्तर शालंकायन-नन्दन पुत्रवत्सल शिलादने मेरे जातकर्म आदि सभी संस्कार सम्पन्न किये।

फिर पाँचवें वर्षमें पिताजीने मुझे सांगोपांग सम्पूर्ण वेदोंका तथा अन्यान्य शास्त्रोंका भी अध्ययन कराया।

सातवाँ वर्ष पूरा होनेपर शिवजीकी आज्ञासे मित्र और वरुण नामके मुनि मुझे देखनेके लिये पिताजीके आश्रमपर पधारे।

शिलाद मुनिने उनकी पूरी आवभगत की।

जब वे दोनों महात्मा मुनीश्वर आनन्दपूर्वक आसनपर विराज गये, तब मेरी ओर बारंबार निहारकर बोले।

मित्र और वरुणने कहा – ‘तात शिलाद! यद्यपि तुम्हारा पुत्र नन्दी सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थोंका पारगामी विद्वान् है, तथापि इसकी आयु बहुत थोड़ी है।

हमने बहुत तरहसे विचार करके देखा, परंतु इसकी आयु एक वर्षसे अधिक नहीं दीखती।’ उन विप्रवरोंके यों कहनेपर पुत्रवत्सल शिलाद नन्दीको छातीसे लिपटाकर दुःखार्त हो फूट-फूटकर रोने लगे।

तब पिता और पितामहको मृतककी भाँति भूमिपर पड़ा हुआ देख नन्दी शिवजीके चरणकमलोंका स्मरण करके प्रसन्नतापूर्वक पूछने लगा – ‘पिताजी! आपको कौन-सा ऐसा दुःख आ पड़ा है, जिसके कारण आपका शरीर काँप रहा है और आप रो रहे हैं? आपको वह दुःख कहाँसे प्राप्त हुआ है, मैं इसे ठीक-ठीक जानना चाहता हूँ।’ पिताने कहा – बेटा! तुम्हारी अल्पायुके दुःखसे मैं अत्यन्त दुःखी हो रहा हूँ।

(तुम्हीं बताओ) मेरे इस कष्टको कौन दूर कर सकता है? मैं उसकी शरण ग्रहण करूँ।

पुत्र बोला – पिताजी! मैं आपके सामने शपथ करता हूँ और यह बिलकुल सत्य बात कह रहा हूँ कि चाहे देवता, दानव, यम, काल तथा अन्यान्य प्राणी – ये सब-के-सब मिलकर मुझे मारना चाहें, तो भी मेरी बाल्यकालमें मृत्यु नहीं होगी, अतः आप दुःखी मत हों।

पिताने पूछा – मेरे प्यारे लाल! तुमने ऐसा कौन-सा तप किया है अथवा तुम्हें कौन-सा ऐसा ज्ञान, योग या ऐश्वर्य प्राप्त है, जिसके बलपर तुम इस दारुण दुःखको नष्ट कर दोगे? पुत्रने कहा – तात! मैं न तो तपसे मृत्युको हटाऊँगा और न विद्यासे।

मैं महादेवजीके भजनसे मृत्युको जीत लूँगा, इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है।

नन्दीश्वरजी कहते हैं – मुने! यों कहकर मैंने सिर झुकाकर पिताजीके चरणोंमें प्रणाम किया और फिर उनकी प्रदक्षिणा करके उत्तम वनकी राह ली।

(अध्याय ६)


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