शिव पुराण - शतरुद्र संहिता - 4


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शिवजीद्वारा दसवेंसे लेकर अट्ठाईसवें योगेश्वरावतारोंका वर्णन शिवजी कहते हैं – ब्रह्मन्! दसवें द्वापरमें त्रिधामा नामके मुनि व्यास होंगे।

वे हिमालयके रमणीय शिखर पर्वतोत्तम भृगुतुंगपर निवास करेंगे।

वहाँ भी मेरे श्रुतिविदित चार पुत्र होंगे।

उनके नाम होंगे – भृंग, बलबन्धु, नरामित्र और तपोधन केतुशृंग।

ग्यारहवें द्वापरमें जब त्रिवृत नामक व्यास होंगे, तब मैं कलियुगमें गंगा-द्वारमें तप नामसे प्रकट होऊँगा।

वहाँ भी मेरे लम्बोदर, लम्बाक्ष, केशलम्ब और प्रलम्बक नामक चार दृढ़व्रती पुत्र होंगे।

बारहवीं चतुर्युगीके द्वापरयुगमें शततेजा नामके वेदव्यास होंगे।

उस समय मैं द्वापरके समाप्त होनेपर कलियुगमें हेमकंचुकमें जाकर अत्रि नामसे अवतार लूँगा और व्यासकी सहायताके लिये निवृत्तिमार्गको प्रतिष्ठित करूँगा।

महामुने! वहाँ भी मेरे सर्वज्ञ, समबुद्धि, साध्य और शर्व नामक चार उत्तम योगी पुत्र होंगे।

तेरहवें द्वापरयुगमें जब धर्मस्वरूप नारायण व्यास होंगे, तब मैं पर्वतश्रेष्ठ गन्धमादनपर वालखिल्याश्रममें महामुनि बलि नामसे उत्पन्न हूँगा।

वहाँ भी मेरे सुधामा, काश्यप, वसिष्ठ और विरजा नामक चार सुन्दर पुत्र होंगे।

चौदहवीं चतुर्युगीके द्वापरयुगमें जब रक्ष नामक व्यास होंगे, उस समय मैं अंगिराके वंशमें गौतम नामसे उत्पन्न होऊँगा।

उस कलियुगमें भी अत्रि, वशद, श्रवण और श्नविष्कट मेरे पुत्र होंगे।

पंद्रहवें द्वापरमें जब त्रय्यारुणि व्यास होंगे, उस समय मैं हिमालयके पृष्ठ-भागमें स्थित वेदशीर्ष नामक पर्वतपर सरस्वतीके उत्तरतटका आश्रय ले वेदशिरा नामसे अवतार ग्रहण करूँगा।

उस समय महापराक्रमी वेदशिर ही मेरा अस्त्र होगा।

वहाँ भी मेरे चार दृढ़ पराक्रमी पुत्र होंगे।

उनके नाम होंगे – कुणि, कुणिबाहु, कुशरीर और कुनेत्रक।

सोलहवें द्वापरयुगमें जब व्यासका नाम देव होगा, तब मैं योग प्रदान करनेके लिये परम पुण्यमय गोकर्णवनमें गोकर्ण नामसे प्रकट होऊँगा।

वहाँ भी मेरे काश्यप, उशना, च्यवन और बृहस्पति नामक चार पुत्र होंगे।

वे जलके समान निर्मल और योगी होंगे तथा उसी मार्गके आश्रयसे शिवलोकको प्राप्त हो जायँगे।

सतरहवीं चतुर्युगीके द्वापरयुगमें देवकृतंजय व्यास होंगे, उस समय मैं हिमालयके अत्यन्त ऊँचे एवं रमणीय शिखर महालय पर्वतपर गुहावासी नामसे अवतार धारण करूँगा; क्योंकि हिमालय शिवक्षेत्र कहलाता है।

वहीं उतथ्य, वामदेव, महायोग और महाबल नामके मेरे पुत्र भी होंगे।

अठारहवीं चतुर्युगीके द्वापरयुगमें जब ऋतंजय व्यास होंगे, तब मैं हिमालयके उस सुन्दर शिखरपर, जिसका नाम शिखण्डी पर्वत है और जहाँ महान् पुण्यमय सिद्धक्षेत्र तथा सिद्धोंद्वारा सेवित शिखण्डीवन भी है शिखण्डी नामसे उत्पन्न होऊँगा।

वहाँ भी वाचःश्रवा, रुचीक, श्यावास्य और यतीश्वर नामक मेरे चार तपस्वी पुत्र होंगे।

उन्नीसवें द्वापरमें महामुनि भरद्वाज व्यास होंगे।

उस समय भी मैं हिमालयके शिखरपर माली नामसे उत्पन्न होऊँगा और मेरे सिरपर लंबी-लंबी जटाएँ होंगी।

वहाँ भी मेरे सागरके-से गम्भीर स्वभाववाले हिरण्यनामा, कौसल्य, लोकाक्षि और प्रधिमि नामक पुत्र होंगे।

बीसवीं चतुर्युगीके द्वापरमें होनेवाले व्यासका नाम गोतम होगा।

तब मैं भी हिमवान् के पृष्ठभागमें स्थित पर्वतश्रेष्ठ अट्टहासपर, जो सदा देवता, मनुष्य, यक्षेन्द्र, सिद्ध और चारणोंद्वारा अधिष्ठित रहता है, अट्टहास नामसे अवतार धारण करूँगा।

उस युगके मनुष्य अट्टहासके प्रेमी होंगे।

उस समय भी मेरे उत्तम योगसम्पन्न चार पुत्र होंगे।

उनके नाम होंगे – सुमन्त, वर्वरि, विद्वान् कबन्ध और कुणिकन्धर।

इक्कीसवें द्वापरयुगमें जब वाचःश्रवा नामके व्यास होंगे, तब मैं दारुक नामसे प्रकट होऊँगा।

इसलिये उस शुभ स्थानका नाम ‘दारुवन’ पड़ जायगा।

वहाँ भी मेरे प्लक्ष, दार्भायणि, केतुमान् तथा गौतम नामके चार परम योगी पुत्र उत्पन्न होंगे।

बाईसवीं चतुर्युगीके द्वापरमें जब शुष्मायण नामक व्यास होंगे, तब मैं भी वाराणसीपुरीमें लांगली भीम नामक महा-मुनिके रूपमें अवतरित होऊँगा।

उस कलियुगमें इन्द्रसहित समस्त देवता मुझ हलायुधधारी शिवका दर्शन करेंगे।

उस अवतारमें भी मेरे भल्लवी, मधु, पिंग और श्वेतकेतु नामक चार परम धार्मिक पुत्र होंगे।

तेईसवीं चतुर्युगीमें जब तृणबिन्दु मुनि व्यास होंगे, तब मैं सुन्दर कालिंजरगिरि-पर श्वेत नामसे प्रकट होऊँगा।

वहाँ भी मेरे उशिक, बृहदश्व, देवल और कवि नामसे प्रसिद्ध चार तपस्वी पुत्र होंगे।

चौबीसवीं चतुर्युगीमें जब ऐश्वर्यशाली यक्ष व्यास होंगे तब उस युगमें मैं नैमिषक्षेत्रमें शूली नामक महायोगी होकर उत्पन्न हूँगा।

उस युगमें भी मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे।

उनके नाम होंगे – शालिहोत्र, अग्निवेश, युवनाश्व और शरद्वसु।

पचीसवें द्वापरमें जब व्यास शक्ति नामसे प्रसिद्ध होंगे, तब मैं भी प्रभावशाली एवं दण्डधारी महायोगीके रूपमें प्रकट हूँगा।

मेरा नाम मुण्डीश्वर होगा।

उस अवतारमें भी छगल, कुण्डकर्ण, कुम्भाण्ड और प्रवाहक मेरे तपस्वी शिष्य होंगे।

छब्बीसवें द्वापरमें जब व्यासका नाम पराशर होगा, तब मैं भद्रवट नामक नगरमें सहिष्णु नामसे अवतार लूँगा।

उस समय भी उलूक, विद्युत्, शम्बूक और आश्वलायन नामवाले चार तपस्वी शिष्य होंगे।

सत्ताईसवें द्वापरमें जब जातूकर्ण्य व्यास होंगे, तब मैं भी प्रभासतीर्थमें सोमशर्मा नामसे प्रकट हूँगा।

वहाँ भी अक्षपाद, कुमार, उलूक और वत्स नामसे प्रसिद्ध मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे।

अट्ठाईसवें द्वापरमें जब भगवान् श्रीहरि पराशरके पुत्ररूपमें द्वैपायन नामक व्यास होंगे, तब पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण अपने छठे अंशसे वसुदेवके श्रेष्ठ पुत्रके रूपमें उत्पन्न होकर वासुदेव कहलायेंगे।

उसी समय योगात्मा मैं भी लोकोंको आश्चर्यमें डालनेके लिये योगमायाके प्रभावसे ब्रह्मचारीका शरीर धारण करके प्रकट होऊँगा।

फिर श्मशानभूमिमें मृतकरूपसे पड़े हुए अविच्छिन्न शरीरको देखकर मैं ब्राह्मणोंके हित-साधनके लिये योगमायाके आश्रयसे उसमें घुस जाऊँगा और फिर तुम्हारे तथा विष्णुके साथ मेरुगिरकी पुण्यमयी दिव्य गुहामें प्रवेश करूँगा।

ब्रह्मन्! वहाँ मेरा नाम लकुली होगा।

इस प्रकार मेरा यह कायावतार उत्कृष्ट सिद्धक्षेत्र कहलायेगा और यह जबतक पृथ्वी कायम रहेगी, तबतक लोकमें परम विख्यात रहेगा।

उस अवतारमें भी मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे।

उनके नाम कुशिक, गर्ग, मित्र और पौरुष्य होंगे।

वे वेदोंके पारगामी ऊर्ध्वरेता ब्राह्मण योगी होंगे और माहेश्वर योगको प्राप्त करके शिवलोकको चले जायँगे।

उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनियो! इस प्रकार परमात्मा शिवने वैवस्वत मन्वन्तरके सभी चतुर्युगियोंके योगेश्वरावतारोंका सम्यक्-रूपसे वर्णन किया था।

विभो! अट्ठाईस व्यास क्रमशः एक-एक करके प्रत्येक द्वापरमें होंगे और योगेश्वरावतार प्रत्येक कलियुगके प्रारम्भमें।

प्रत्येक योगेश्वरावतारके साथ उनके चार अविनाशी शिष्य भी होंगे, जो महान् शिवभक्त और योगमार्गकी वृद्धि करनेवाले होंगे।

इन पशुपतिके शिष्योंके शरीरोंपर भस्म रमी रहेगी, ललाट त्रिपुण्ड्रसे सुशोभित रहेगा और रुद्राक्षकी माला ही इनका आभूषण होगा।

ये सभी शिष्य धर्मपरायण, वेद-वेदांगके पारगामी विद्वान् और सदा बाहर-भीतरसे लिंगार्चनमें तत्पर रहनेवाले होंगे।

ये शिवजीमें भक्ति रखकर योगपूर्वक ध्यानमें निष्ठा रखनेवाले और जितेन्द्रिय होंगे।

विद्वानोंने इनकी संख्या एक सौ बारह बतलायी है।

इस प्रकार मैंने अट्ठाईस युगोंके क्रमसे मनुसे लेकर कृष्णावतारपर्यन्त सभी अवतारोंके लक्षणोंका वर्णन कर लिया।

जब श्रुतिसमूहोंका वेदान्तके रूपमें प्रयोग होगा, तब उस कल्पमें कृष्णद्वैपायन व्यास होंगे।

यों महेश्वरने ब्रह्माजीपर अनुग्रह करके योगेश्वरावतारोंका वर्णन किया और फिर वे देवेश्वर उनकी ओर दृष्टिपात करके वहीं अन्तर्धान हो गये।

(अध्याय ५)


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