शिव पुराण - शतरुद्र संहिता - 21


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शिवजीके द्वादश ज्योतिर्लिंगावतारोंका सविस्तर वर्णन

नन्दीश्वरजी कहते हैं – मुने! अब तुम सर्वव्यापी भगवान् शंकरके बारह अन्य ज्योतिर्लिंगस्वरूपी अवतारोंका वर्णन श्रवण करो, जो अनेक प्रकारके मंगल करनेवाले हैं।

(उनके नाम ये हैं – ) सौराष्ट्रमें सोमनाथ, श्रीशैलपर मल्लिकार्जुन, उज्जयिनीमें महाकाल, ओंकारमें अमरेश्वर, हिमालयपर केदार, डाकिनीमें भीमशंकर, काशीमें विश्वनाथ, गौतमीके तटपर त्र्यम्बकेश्वर, चिताभूमिमें वैद्यनाथ, दारुकवनमें नागेश्वर, सेतुबन्धपर रामेश्वर और शिवालयमें घुश्मेश्वर।

मुने! परमात्मा शम्भुके ये ही वे बारह अवतार हैं।

ये दर्शन और स्पर्श करनेसे मनुष्योंको सब प्रकारका आनन्द प्रदान करते हैं।

मुने! उनमें पहला अवतार सोमनाथका है।

यह चन्द्रमाके दुःखका विनाश करनेवाला है।

इनका पूजन करनेसे क्षय और कुष्ठ आदि रोगोंका नाश हो जाता है।

यह सोमेश्वर नामक शिवावतार सौराष्ट्र नामक पावन प्रदेशमें लिंगरूपसे स्थित है।

पूर्वकालमें चन्द्रमाने इनकी पूजा की थी।

वहीं सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला एक चन्द्रकुण्ड है, जिसमें स्नान करनेसे बुद्धिमान् मनुष्य सम्पूर्ण रोगोंसे मुक्त हो जाता है।

परमात्मा शिवके सोमेश्वर नामक महालिंगका दर्शन करनेसे मनुष्य पापसे छूट जाता है और उसे भोग और मोक्ष सुलभ हो जाते हैं।

तात! शंकरजीका मल्लिकार्जुन नामक दूसरा अवतार श्रीशैलपर हुआ।

वह भक्तोंको अभीष्ट फल प्रदान करनेवाला है।

मुने! भगवान् शिव परम प्रसन्नतापूर्वक अपने निवासभूत कैलासगिरिसे लिंगरूपमें श्रीशैलपर पधारे हैं।

पुत्र-प्राप्तिके लिये इनकी स्तुति की जाती है।

मुने! यह जो दूसरा ज्योतिर्लिंग है, वह दर्शन और पूजन करनेसे महा सुख-कारक होता है और अन्तमें मुक्ति भी प्रदान कर देता है – इसमें तनिक भी संशय नहीं है।

तात! शंकरजीका महाकाल नामक तीसरा अवतार उज्जयिनी नगरीमें हुआ।

वह अपने भक्तोंकी रक्षा करनेवाला है।

एक बार रत्नमालनिवासी दूषण नामक असुर, जो वैदिक धर्मका विनाशक, विप्रद्रोही तथा सब कुछ नष्ट करनेवाला था, उज्जयिनीमें जा पहुँचा।

तब वेद नामक ब्राह्मणके पुत्रने शिवजीका ध्यान किया।

फिर तो शंकरजीने तुरंत ही प्रकट होकर हुंकारद्वारा उस असुरको भस्म कर दिया।

तत्पश्चात् अपने भक्तोंका सर्वथा पालन करनेवाले शिव देवताओंके प्रार्थना करनेपर महाकाल नामक ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे वहीं प्रतिष्ठित हो गये।

इन महाकाल नामक लिंगका प्रयत्नपूर्वक दर्शन और पूजन करनेसे मनुष्यकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और अन्तमें उसे परम गति प्राप्त होती है।

परम आत्मबलसे सम्पन्न परमेश्वर शम्भुने भक्तोंको अभीष्ट फल प्रदान करनेवाला ओंकार नामक चौथा अवतार धारण किया।

मुने! विन्ध्यगिरिने भक्तिपूर्वक विधि-विधानसे शिवजीका पार्थिवलिंग स्थापित किया।

उसी लिंगसे विन्ध्यका मनोरथ पूर्ण करनेवाले महादेव प्रकट हुए।

तब देवताओंके प्रार्थना करनेपर भुक्ति-मुक्तिके प्रदाता भक्तवत्सल लिंगरूपी शंकर वहाँ दो रूपोंमें विभक्त हो गये।

मुनीश्वर! उनमें एक भाग ओंकारमें ओंकारेश्वर नामक उत्तम लिंगके रूपमें प्रतिष्ठित हुआ और दूसरा पार्थिव-लिंग परमेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ।

मुने! इन दोनोंमें जिस किसीका भी दर्शन-पूजन किया जाय, उसे भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेवाला समझना चाहिये।

महामुने! इस प्रकार मैंने तुम्हें इन दोनों महादिव्य ज्योतिर्लिंगोंका वर्णन सुना दिया।

परमात्मा शिवके पाँचवें अवतारका नाम है केदारेश।

वह केदारमें ज्योतिर्लिंगरूपसे स्थित है।

मुने! वहाँ श्रीहरिके जो नर-नारायण नामक अवतार हैं, उनके प्रार्थना करनेपर शिवजी हिमगिरिके केदारशिखरपर स्थित हो गये।

वे दोनों उस केदारेश्वर लिंगकी नित्य पूजा करते हैं।

वहाँ शम्भु दर्शन और पूजन करनेवाले भक्तोंको अभीष्ट प्रदान करते हैं।

तात! सर्वेश्वर होते हुए भी शिव इस खण्डके विशेषरूपसे स्वामी हैं।

शिवजीका यह अवतार सम्पूर्ण अभीष्टोंको प्रदान करनेवाला है।

महाप्रभु शम्भुके छठे अवतारका नाम भीमशंकर है।

इस अवतारमें उन्होंने बड़ी-बड़ी लीलाएँ की हैं और भीमासुरका विनाश किया है।

कामरूप देशके अधिपति राजा सुदक्षिण शिवजीके भक्त थे।

भीमासुर उन्हें पीड़ित कर रहा था।

तब शंकरजीने अपने भक्तको दुःख देनेवाले उस अद् भुत असुरका वध करके उनकी रक्षा की।

फिर राजा सुदक्षिणके प्रार्थना करनेपर स्वयं शंकरजी डाकिनीमें भीमशंकर नामक ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे स्थित हो गये।

मुने! जो समस्त ब्रह्माण्डस्वरूप तथा भोग-मोक्षका प्रदाता है, वह विश्वेश्वर नामक सातवाँ अवतार काशीमें हुआ।

मुक्तिदाता सिद्धस्वरूप स्वयं भगवान् शंकर अपनी पुरी काशीमें ज्योतिर्लिंगरूपमें स्थित हैं।

विष्णु आदि सभी देवता, कैलासपति शिव और भैरव नित्य उनकी पूजा करते हैं।

जो काशी-विश्वनाथके भक्त हैं और नित्य उनके नामोंका जप करते रहते हैं, वे कर्मोंसे निर्लिप्त होकर कैवल्यपदके भागी होते हैं।

चन्द्रशेखर शिवका जो त्र्यम्बक नामक आठवाँ अवतार है, वह गौतम ऋषिके प्रार्थना करनेपर गौतमी नदीके तटपर प्रकट हुआ था।

गौतमकी प्रार्थनासे उन मुनिको प्रसन्न करनेके लिये शंकरजी प्रेमपूर्वक ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे वहाँ अचल होकर स्थित हो गये।

अहो! उन महेश्वरका दर्शन और स्पर्श करनेसे सारी कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं।

तत्पश्चात् मुक्ति भी मिल जाती है।

शिवजीके अनुग्रहसे शंकरप्रिया परम पावनी गंगा गौतमके स्नेहवश वहाँ गौतमी नामसे प्रवाहित हुईं।

उनमें नवाँ अवतार वैद्यनाथ नामसे प्रसिद्ध है।

इस अवतारमें बहुत-सी विचित्र लीलाएँ करनेवाले भगवान् शंकर रावणके लिये आविर्भूत हुए थे।

उस समय रावणद्वारा अपने लाये जानेको ही कारण मानकर महेश्वर ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे चिताभूमिमें प्रतिष्ठित हो गये।

उस समयसे वे त्रिलोकीमें वैद्यनाथेश्वर नामसे विख्यात हुए।

वे भक्तिपूर्वक दर्शन और पूजन करनेवालेको भोग-मोक्षके प्रदाता हैं।

मुने! जो लोग इन वैद्यनाथेश्वर शिवके माहात्म्यको पढ़ते अथवा सुनते हैं, उन्हें यह भुक्ति-मुक्तिका भागी बना देता है।

दसवाँ नागेश्वरावतार कहलाता है।

यह अपने भक्तोंकी रक्षाके लिये प्रादुर्भूत हुआ था।

यह सदा दुष्टोंको दण्ड देता रहता है।

इस अवतारमें शिवजीने दारुक नामक राक्षसको, जो धर्मघाती था, मारकर वैश्योंके स्वामी अपने सुप्रिय नामक भक्तकी रक्षा की थी।

तत्पश्चात् बहुत-सी लीलाएँ करनेवाले वे परात्पर प्रभु शम्भु लोकोंका उपकार करनेके लिये अम्बिकासहित ज्योतिर्लिंगस्वरूपसे स्थित हो गये।

मुने! नागेश्वर नामक उस शिवलिंगका दर्शन तथा अर्चन करनेसे राशि-के-राशि महान् पातक तुरंत विनष्ट हो जाते हैं।

मुने! शिवजीका ग्यारहवाँ अवतार रामेश्वरावतार कहलाता है।

वह श्रीरामचन्द्रका प्रिय करनेवाला है।

उसे श्रीरामने ही स्थापित किया था।

जिन भक्तवत्सल शंकरने परम प्रसन्न होकर श्रीरामको प्रेमपूर्वक विजयका वरदान दिया, वे ही लिंगरूपमें आविर्भूत हुए।

मुने! तब श्रीरामके अत्यन्त प्रार्थना करनेपर वे सेतुबन्धपर ज्योतिर्लिंगरूपसे स्थित हो गये! उस समय श्रीरामने उनकी भलीभाँति सेवा-पूजा की।

रामेश्वरकी अद् भुत महिमाकी भूतलपर किसीसे तुलना नहीं की जा सकती।

यह सर्वदा भुक्ति-मुक्तिकी प्रदायिनी तथा भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाली है।

जो मनुष्य सद्भक्तिपूर्वक रामेश्वरलिंगको गंगाजलसे स्नान करायेगा, वह जीवन्मुक्त ही है।

वह इस लोकमें जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ हैं, ऐसे सम्पूर्ण भोगोंको भोगनेके पश्चात् परम ज्ञानको प्राप्त होगा।

फिर उसे कैवल्य मोक्ष मिल जायगा।

घुश्मेश्वरावतार शंकरजीका बारहवाँ अवतार है।

वह नाना प्रकारकी लीलाओंका कर्ता, भक्तवत्सल तथा घुश्माको आनन्द देनेवाला है।

मुने! घुश्माका प्रिय करनेके लिये भगवान् शंकर दक्षिणदिशामें स्थित देवशैलके निकटवर्ती एक सरोवरमें प्रकट हुए।

मुने! घुश्माके पुत्रको सुदेह्यने मार डाला था।

(उसे जीवित करनेके लिये घुश्माने शिवजीकी आराधना की।) तब उनकी भक्तिसे संतुष्ट होकर भक्तवत्सल शम्भुने उनके पुत्रको बचा लिया।

तदनन्तर कामनाओंके पूरक शम्भु घुश्माकी प्रार्थनासे उस तड़ागमें ज्योतिर्लिंगरूपसे स्थित हो गये! उस समय उनका नाम घुश्मेश्वर हुआ।

जो मनुष्य उस शिवलिंगका भक्तिपूर्वक दर्शन तथा पूजन करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण सुखोंको भोगकर अन्तमें मुक्ति-लाभ करता है।

सनत्कुमारजी! इस प्रकार मैंने तुमसे इस बारह दिव्य ज्योतिर्लिंगोंका वर्णन किया।

ये सभी भोग और मोक्षके प्रदाता हैं।

जो मनुष्य ज्योतिर्लिंगोंकी इस कथाको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा भोग-मोक्षको प्राप्त करता है।

इस प्रकार मैंने इस शतरुद्रनामकी संहिताका वर्णन कर दिया।

यह शिवके सौ अवतारोंकी उत्तम कीर्तिसे सम्पन्न तथा सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंको देनेवाली है।

जो मनुष्य इसे नित्य समाहितचित्तसे पढ़ता अथवा सुनता है, उसकी सारी लालसाएँ पूर्ण हो जाती हैं और अन्तमें उसे निश्चय ही मुक्ति मिल जाती है। (अध्याय ४२)

।। शतरुद्रसंहिता सम्पूर्ण।।


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