शिव पुराण - शतरुद्र संहिता - 19


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किरातावतारके प्रसंगमें मूक नामक दैत्यका शूकररूप धारण करके अर्जुनके पास आना, शिवजीका किरातवेषमें प्रकट होना और अर्जुन तथा किरातवेषधारी शिवद्वारा उस दैत्यका वध

नन्दीश्वरजी कहते हैं – मुने! तदनन्तर अर्जुन व्यासजीके उपदेशानुसार विधिपूर्वक स्नान तथा न्यास आदि करके परम भक्तिके साथ शिवजीका ध्यान करने लगे।

उस समय वे एक श्रेष्ठ मुनिकी भाँति एक ही पैरके बलपर खड़े हो सूर्यकी ओर एकाग्र दृष्टि करके खड़े-खड़े मन्त्र जप कर रहे थे।

इस प्रकार वे परम प्रेमपूर्वक मन-ही-मन शिवजीका स्मरण करके शम्भुके सर्वोत्कृष्ट पंचाक्षरमन्त्रका जप करते हुए घोर तप करने लगे।

उस तपस्याका ऐसा उत्कृष्ट तेज प्रकट हुआ, जिससे देवगण विस्मित हो गये।

पुनः वे शिवजीके पास गये और समाहित चित्तसे बोले।

देवताओंने कहा – सर्वेश! एक मनुष्य आपके लिये तपस्यामें निरत है।

प्रभो! वह व्यक्ति जो कुछ चाहता है, उसे आप दे क्यों नहीं देते? नन्दीश्वरजी कहते हैं – मुने! यों कहकर देवताओंने अनेक प्रकारसे उनकी स्तुति की।

फिर उनके चरणोंकी ओर दृष्टि लगाकर वे विनम्रभावसे खड़े हो गये।

तब उदारबुद्धि एवं प्रसन्नात्मा महाप्रभु शिवजी उस वचनको सुनकर ठठाकर हँस पड़े और देवताओंसे इस प्रकार बोले।

शिवजीने कहा – देवताओ! अब तुमलोग अपने स्थानको लौट जाओ।

मैं सब तरहसे तुमलोगोंका कार्य सम्पन्न करूँगा।

यह बिलकुल सत्य है, इसमें संदेहकी गुंजाइश नहीं है।

नन्दीश्वरजी कहते हैं – मुने! शम्भुके उस वचनको सुनकर देवताओंको पूर्णतया निश्चय हो गया।

तब वे सब अपने स्थानको लौट गये।

इसी समय मूक नामक दैत्य शूकरका रूप धारण करके वहाँ आया।

विप्रेन्द्र! उसे उस समय मायावी दुरात्मा दुर्योधनने अर्जुनके पास भेजा था।

वह जहाँ अर्जुन स्थित थे, उसी मार्गसे अत्यन्त वेगपूर्वक पर्वतशिखरोंको उखाड़ता, वृक्षोंको छिन्न-भिन्न करता तथा अनेक प्रकारके शब्द करता हुआ आया।

तब अर्जुनकी भी दृष्टि उस मूक नामक असुरपर पड़ी, वे शिवजीके पादपद्मोंका स्मरण करके यों विचार करने लगे।

अर्जुनने (मन-ही-मन) कहा – ‘यह कौन है और कहाँसे आ रहा है? यह तो क्रूरकर्मा दिखायी पड़ रहा है।

निश्चय ही यह मेरा अनिष्ट करनेके लिये आ रहा है।

इसमें तनिक भी संशय नहीं है; क्योंकि जिसका दर्शन होनेपर अपना मन प्रसन्न हो जाय, वह निश्चय ही अपना हितैषी है और जिसके दीखनेपर मन व्याकुल हो जाय, वह शत्रु ही है।

आचारसे कुलका, शरीरसे भोजनका, वार्तालापसे शास्त्रज्ञानका और नेत्रसे स्नेहका परिचय मिलता है।

आकारसे, चालढालसे, चेष्टासे, बोलनेसे तथा नेत्र और मुखके विकारसे मनके भीतरका भाव जाना जाता है।

नेत्र चार प्रकारके कहे गये हैं – उज्ज्वल, सरस, तिरछे और लाल।

विद्वानोंने इनका भाव भी पृथक्-पृथक् बतलाया है।

नेत्र मित्रका संयोग होनेपर उज्ज्वल, पुत्रदर्शनके समय सरस, कामिनीके प्राप्त होनेपर वक्र और शत्रुके दीख जानेपर लाल हो जाते हैं।

(इस नियमके अनुसार) इसे देखते ही मेरी सारी इन्द्रियाँ कलुषित हो उठी हैं, अतः यह निस्संदेह शत्रु ही है और मार डालनेयोग्य है।

इधर मेरे लिये गुरुजीकी आज्ञा भी ऐसी है कि राजन्! जो तुम्हें कष्ट देनेके लिये उद्यत हो, उसे तुम बिना किसी प्रकारका विचार किये अवश्य मार डालना तथा मैंने इसीलिये आयुध भी तो धारण कर रखा है।’ यों विचारकर अर्जुन बाणका संधान करके वहीं डटकर खड़े हो गये।

इसी बीच भक्तवत्सल भगवान् शंकर अर्जुनकी रक्षा, उनकी भक्तिकी परीक्षा और उस दैत्यका नाश करनेके लिये शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचे।

उस समय उनके साथ गणोंका यूथ भी था और वे महान् अद्भुत सुशिक्षित भीलका रूप धारण किये हुए थे।

उनकी काछ बँधी थी और उन्होंने वस्त्रखण्डोंसे ईशानध्वज बाँध रखा था।

उनके शरीरपर श्वेत धारियाँ चमक रही थीं, पीठपर बाणोंसे भरा हुआ तरकश बँधा था और वे स्वयं धनुष-बाण धारण किये हुए थे।

उनका गण-यूथ भी वैसी ही साज-सज्जासे युक्त था।

इस प्रकार शिव भिल्लराज बने हुए थे।

वे सेनाध्यक्ष होकर तरह-तरहके शब्द करते हुए आगे बढ़े।

इतनेमें सूअरकी गुर्राहटका शब्द दसों दिशाओंमें गूँज उठा।

उस शब्दसे पर्वत आदि सभी जड पदार्थ झन्ना उठे।

तब उस वनेचरके शब्दसे घबराकर अर्जुन सोचने लगे – ‘अहो! क्या ये भगवान् शिव तो नहीं हैं, जो यहाँ शुभ करनेके लिये पधारे हैं; क्योंकि मैंने पहलेसे ही ऐसा सुन रखा है।

पुनः श्रीकृष्ण और व्यासजीने भी ऐसा ही कहा है तथा देवताओंने भी बारंबार स्मरण करके ऐसी ही घोषणा की है कि शिवजी कल्याणकर्ता और सुखदाता हैं।

वे मुक्ति प्रदान करनेके कारण मुक्तिदाता कहे जाते हैं।

उनका नामस्मरण करनेसे मनुष्योंका निश्चय ही कल्याण होता है।

जो लोग सर्वभावसे उनका भजन करते हैं, उन्हें स्वप्नमें भी दुःखका दर्शन नहीं होता।

यदि कदाचित् कुछ दुःख आ ही जाता है तो उसे कर्मजनित समझना चाहिये।

सो भी बहुतकी आशंका होनेपर भी थोड़ा होता है।

अथवा उसे विशेषरूपसे प्रारब्धका ही दोष मानना चाहिये।

अथवा कभी-कभी भगवान् शंकर अपनी इच्छासे थोड़ा या अधिक दुःख भुगताकर फिर निस्संदेह उसे दूर कर देते हैं।

वे विषको अमृत और अमृतको विष बना देते हैं।

यों जैसी उनकी इच्छा होती है, वैसा वे करते हैं।

भला, उन समर्थको कौन मना कर सकता है।

अन्यान्य प्राचीन भक्तोंकी भी ऐसी ही धारणा थी, अतः भावी भक्तोंको सदा इसी विचारपर अपने मनको स्थिर रखना चाहिये।

लक्ष्मी रहे अथवा चली जाय, मृत्यु आँखोंके सामने ही क्यों न उपस्थित हो जाय, लोग निन्दा करें अथवा प्रशंसा; परंतु शिवभक्तिसे दुःखोंका विनाश होता ही है।

शंकर अपने भक्तोंको, चाहे वे पापी हों या पुण्यात्मा, सदा सुख देते हैं।

यदि कभी वे परीक्षाके लिये भक्तको कष्टमें डाल देते हैं तो अन्तमें दयालुस्वभाव होनेके कारण वे ही उसके सुखदाता भी होते हैं।

फिर तो वह भक्त उसी प्रकार निर्मल हो जाता है, जैसे आगमें तपाया हुआ सोना शुद्ध हो जाता है।

इसी तरहकी बातें मैंने पहले भी मुनियोंके मुखसे सुन रखी हैं; अतः मैं शिवजीका भजन करके उसीसे उत्तम सुख प्राप्त करूँगा।’ अर्जुन यों विचार कर ही रहे थे, तबतक बाणका लक्ष्यभूत वह सूअर वहाँ आ पहुँचा।

उधर शिवजी भी उस सूअरके पीछे लगे हुए दीख पड़े।

उस समय उन दोनोंके मध्यमें वह शूकर अद् भुत शिखर-सा दीख रहा था।

उसकी बड़ी महिमा भी कही गयी है।

तब भक्तवत्सल भगवान् शंकर अर्जुनकी रक्षाके लिये बड़े वेगसे आगे बढ़े।

इसी समय उन दोनोंने उस शूकरपर बाण चलाया।

शिवजीके बाणका लक्ष्य उसका पुच्छभाग था और अर्जुनने उसके मुखको अपना निशाना बनाया था।

शिवजीका बाण उसके पुच्छभागसे प्रवेश करके मुखके रास्ते निकल गया और शीघ्र ही भूमिमें विलीन हो गया।

तथा अर्जुनका बाण उसके पिछले भागसे निकलकर बगलमें ही गिर पड़ा।

तब वह शूकररूपधारी दैत्य उसी क्षण मरकर भूतलपर गिर पड़ा।

उस समय देवताओंको महान् हर्ष प्राप्त हुआ।

उन्होंने पहले तो जय-जयकार करते हुए पुष्पोंकी वृष्टि की, फिर वे बारंबार नमस्कार करके स्तुति करने लगे।

उस समय उन दोनोंने दैत्यके उस क्रूर रूपकी ओर दृष्टिपात किया।

उसे देखकर शिवजीका मन संतुष्ट हो गया और अर्जुनको महान् सुख प्राप्त हुआ।

तत्पश्चात् अर्जुन मन-ही-मन विशेषरूपसे सुखका अनुभव करते हुए कहने लगे – ‘अहो! यह श्रेष्ठ दैत्य परम अद् भुत रूप धारण करके मुझे मारनेके लिये ही आया था, परंतु शिवजीने ही मेरी रक्षा की है।

निस्संदेह उन परमेश्वरने ही आज (इसे मारनेके लिये) मेरी बुद्धिको प्रेरित किया है।’ ऐसा विचारकर अर्जुनने शिवनामसंकीर्तन किया और फिर बारंबार उनके चरणोंमें प्रणाम करके उनकी स्तुति की।

(अध्याय ३९)


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