शिव पुराण - शतरुद्र संहिता - 17


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शिवके सुरेश्वरावतारकी कथा, उपमन्युकी तपस्या और उन्हें उत्तम वरकी प्राप्ति

नन्दीश्वर कहते हैं – सनत्कुमारजी! अब मैं परमात्मा शिवके सुरेश्वरावतारका वर्णन करूँगा, जिन्होंने धौम्यके बड़े भाई उपमन्युका हितसाधन किया था।

उपमन्यु व्याघ्रपाद मुनिके पुत्र थे।

उन्होंने पूर्वजन्ममें ही सिद्धि प्राप्त कर ली थी और वर्तमान जन्ममें मुनिकुमारके रूपमें प्रकट हुए थे।

वे शैशवावस्थासे ही माताके साथ मामाके घरमें रहते थे और दैववश दरिद्र थे।

एक दिन उन्हें बहुत कम दूध पीनेको मिला।

इसलिये अपनी मातासे वे बारंबार दूध माँगने लगे।

उनकी तपस्विनी माताने घरके भीतर जाकर एक उपाय किया।

उंछवृत्तिसे लाये हुए कुछ बीजोंको सिलपर पीसा और उन्हें पानीमें घोलकर कृत्रिम दूध तैयार किया।

फिर बेटेको पुचकारकर वह उसे पीनेको दिया।

माँके दिये हुए उस नकली दूधको पीकर बालक उपमन्यु बोले – ‘यह तो दूध नहीं है।’ इतना कहकर वे फिर रोने लगे।

बेटेका रोना-धोना सुनकर माँको बड़ा दुःख हुआ।

अपने हाथसे उपमन्युकी दोनों आँखें पोंछकर उनकी लक्ष्मी-जैसी माताने कहा – ‘बेटा! हमलोग सदा वनमें निवास करते हैं।

हमें यहाँ दूध कहाँसे मिल सकता है।

भगवान् शिवकी कृपाके बिना किसीको दूध नहीं मिलता।

वत्स! पूर्वजन्ममें भगवान् शिवके लिये जो कुछ किया गया है, वर्तमान जन्ममें वही मिलता है।’ माताकी यह बात सुनकर उपमन्युने भगवान् शिवकी आराधना करनेका निश्चय किया।

वे तपस्याके लिये हिमालय पर्वतपर गये और वहाँ वायु पीकर रहने लगे।

उन्होंने आठ ईंटोंका एक मन्दिर बनाया और उसके भीतर मिट्टीके शिवलिंगकी स्थापना करके उसमें माता पार्वतीसहित शिवका आवाहन किया।

तत्पश्चात् जंगलके पत्र-पुष्प आदि ले आकर भक्तिभावसे पंचाक्षर-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक साम्ब शिवकी पूजा करने लगे।

माता पार्वती और शिवका ध्यान करके उनकी पूजा करनेके पश्चात् वे पंचाक्षर मन्त्रका जप किया करते थे।

इस तरह दीर्घकालतक उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की।

मुने! बालक उपमन्युकी तपस्यासे चराचर प्राणियोंसहित त्रिभुवन संतप्त हो उठा।

तब देवताओंकी प्रार्थनासे उपमन्युके भक्तिभावकी परीक्षा लेनेके लिये भगवान् शंकर उनके समीप पधारे।

उस समय शिवने देवराज इन्द्रका, पार्वतीने शचीका, नन्दीश्वर वृषभने ऐरावत हाथीका तथा शिवके गणोंने सम्पूर्ण देवताओंका रूप धारण कर लिया।

निकट आनेपर सुरेश्वर-रूपधारी शिवने बालक उपमन्युको वर माँगनेके लिये कहा।

उपमन्युने पहले तो शिवभक्ति माँगी, फिर अपनेको इन्द्र बताकर जब उन्होंने शिवकी निन्दा की, तब उस बालकने भगवान् शिवके अतिरिक्त दूसरे किसीसे कुछ भी लेना अस्वीकार कर दिया।

वे इन्द्रको मारकर स्वयं भी मर जानेको उद्यत हो गये।

उन्होंने जो अघोरास्त्र चलाया, उसे नन्दीने पकड़ लिया और उन्होंने अपनेको जलानेके लिये जो अग्निकी धारणा की, उसे भगवान् शिवने शान्त कर दिया।

फिर वे सब-के-सब अपने यथार्थ स्वरूपमें प्रकट हो गये।

शिवने उपमन्युको अपना पुत्र माना और उनका मस्तक सूँघकर कहा – ‘वत्स! मैं तुम्हारा पिता और ये पार्वतीदेवी तुम्हारी माता हैं।

तुम्हें आजसे सनातनकुमारत्व प्राप्त होगा।

मैं तुम्हारे लिये दूध, दही और मधुके सहस्रों समुद्र देता हूँ।

भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थोंके भी समुद्र तुम्हारे लिये सुलभ होंगे।

मैं तुम्हें अमरत्व तथा अपने गणोंका आधिपत्य प्रदान करता हूँ।’ ऐसा कहकर शम्भुने उपमन्युको बहुतसे दिव्य वर दिये।

पाशुपत-व्रत, पाशुपत-ज्ञान तथा व्रतयोगका उपदेश किया।

प्रवचनकी शक्ति दी और अपना परम पद अर्पित किया।

फिर दोनों हाथोंसे उपमन्युको हृदयसे लगाकर उनका मस्तक सूँघा और देवी पार्वतीको सौंपते हुए कहा – ‘यह तुम्हारा बेटा है।’ पार्वतीने भी बड़े प्यारसे उनके मस्तकपर अपना करकमल रखा और उन्हें अक्षय कुमारपद प्रदान किया।

शिवने संतुष्ट होकर उनके लिये पिण्डीभूत एवं अविनाशी साकार क्षीर-सागर प्रस्तुत कर दिया।

साथ ही योगसम्बन्धी ऐश्वर्य, नित्य संतोष, अक्षय ब्रह्मविद्या तथा उत्तम समृद्धि प्रदान की।

उनके कुल और गोत्रके अक्षय होनेका वरदान दिया और यह भी कहा कि मैं तुम्हारे इस आश्रमपर नित्य निवास करूँगा।

इतना कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये।

उपमन्यु वर पाकर प्रसन्नतापूर्वक घर आये।

उन्होंने मातासे सब बातें बतायीं।

सुनकर माताको बड़ा हर्ष हुआ।

उपमन्यु सबके पूजनीय और अधिक सुखी हो गये।

तात! इस प्रकार मैंने तुमसे परमेश्वर शिवके सुरेश्वरावतारका वर्णन किया है।

यह अवतार सत्पुरुषोंको सदा ही सुख देनेवाला है।

सुरेश्वरावतारकी यह कथा पापको दूर करनेवाली तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको देनेवाली है।

जो इसे भक्तिपूर्वक सुनता या सुनाता है, वह सम्पूर्ण सुखोंको भोगकर अन्तमें भगवान् शिवको प्राप्त होता है।

(अध्याय ३२)


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