शिव पुराण - शतरुद्र संहिता - 16


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भगवान् शिवके भिक्षुवर्यावतारकी कथा, राजकुमार और द्विजकुमारपर कृपा

नन्दीश्वर कहते हैं – मुनिश्रेष्ठ! अब तुम भगवान् शम्भुके नारी-संदेहभंजक भिक्षु-अवतारका वर्णन सुनो, जिसे उन्होंने अपने भक्तपर दया करके ग्रहण किया था।

विदर्भ देशमें सत्यरथ नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे, जो धर्ममें तत्पर, सत्यशील और बड़े-बड़े शिवभक्तोंसे प्रेम करनेवाले थे।

धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करते हुए उनका बहुत-सा समय सुखपूर्वक बीत गया।

तदनन्तर किसी समय शाल्वदेशके राजाओंने उस राजाकी राजधानीपर आक्रमण करके उसे चारों ओरसे घेर लिया।

बलोन्मत्त शाल्वदेशीय क्षत्रियोंके साथ, जिनके पास बहुत बड़ी सेना थी, राजा सत्यरथका बड़ा भयंकर युद्ध हुआ।

शत्रुओंके साथ दारुण युद्ध करके उनकी बड़ी भारी सेना नष्ट हो गयी।

फिर दैवयोगसे राजा भी शाल्वोंके हाथसे मारे गये।

उन नरेशके मारे जानेपर मरनेसे बचे हुए सैनिक मन्त्रियोंसहित भयसे विह्वल हो भाग खड़े हुए।

मुने! उस समय विदर्भराज सत्यरथकी महारानी शत्रुओंसे घिरी होनेपर भी कोई प्रयत्न करके रातके समय अपने नगरसे बाहर निकल गयीं।

वे गर्भवती थीं; अतः शोकसे संतप्त हो भगवान् शंकरके चरणारविन्दोंका चिन्तन करती हुई वे धीरे-धीरे पूर्वदिशाकी ओर बहुत दूर चली गयीं।

सबेरा होनेपर रानीने भगवान् शंकरकी दयासे एक निर्मल सरोवर देखा।

उस समयतक वे बहुत दूरका रास्ता तय कर चुकी थीं।

सरोवरके तटपर आकर वे सुकुमारी रानी एक छायादार वृक्षके नीचे बैठ गयीं।

भाग्यवश उसी निर्जन स्थानमें वृक्षके नीचे ही रानीने उत्तम गुणोंसे युक्त शुभ मुहूर्तमें एक दिव्य बालकको जन्म दिया, जो सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न था।

दैववश उस बालककी जननी महारानीको बड़े जोरकी प्यास लगी।

तब वे पानी पीनेके लिये उस सरोवरमें उतरीं।

इतनेमें ही एक बड़े भारी ग्राहने आकर रानीको अपना ग्रास बना लिया।

वह बालक पैदा होते ही माता-पितासे हीन हो गया और भूख-प्याससे पीड़ित हो उस तालाबके किनारे जोर-जोरसे रोने लगा।

इतनेमें ही उसपर कृपा करके भगवान् महेश्वर वहाँ आ गये और उस शिशुकी रक्षा करने लगे।

उन्हींकी प्रेरणासे एक ब्राह्मणी अकस्मात् वहाँ आ गयी।

वह विधवा थी, घर-घर भीख माँगकर जीवन-निर्वाह करती थी और अपने एक वर्षके बालकको गोदमें लिये हुए उस तालाबके तटपर पहुँची थी।

उसने एक अनाथ शिशुको वहाँ क्रन्दन करते देखा।

निर्जन वनमें उस बालकको देखकर ब्राह्मणीको बड़ा विस्मय हुआ और वह मन-ही-मन विचार करने लगी – ‘अहो! यह मुझे इस समय बड़े आश्चर्यकी बात दिखायी देती है कि यह नवजात शिशु, जिसकी नाल भी अभीतक नहीं कटी है, पृथ्वीपर पड़ा हुआ है।

इसकी माँ भी नहीं है।

पिता आदि दूसरे कोई सहायक भी यहाँ नहीं दिखायी देते।

क्या कारण हो गया? न जाने यह किसका पुत्र है? इसे जाननेवाला यहाँ कोई भी नहीं है, जिससे इसके जन्मके विषयमें पूछूँ।

इसे देखकर मेरे हृदयमें करुणा उत्पन्न हो गयी है।

मैं इस बालकका अपने औरस पुत्रकी भाँति पालन-पोषण करना चाहती हूँ।

परंतु इसके कुल और जन्म आदिका ज्ञान न होनेके कारण इसे छूनेका साहस नहीं होता।’ ब्राह्मणी जब इस प्रकार विचार कर रही थी, उस समय भक्तवत्सल भगवान् शंकरने बड़ी कृपा की।

बड़ी-बड़ी लीलाएँ करनेवाले महेश्वर एक संन्यासीका रूप धारण करके सहसा वहाँ आ पहुँचे, जहाँ वह ब्राह्मणी संदेहमें पड़ी हुई थी और यथार्थ बातको जानना चाहती थी।

श्रेष्ठ भिक्षुका रूप धारण करके आये हुए करुणानिधान शिवने उससे हँसकर कहा – ‘ब्राह्मणी! अपने चित्तमें संदेह और खेदको स्थान न दो।

यह बालक परम पवित्र है।

तुम इसे अपना ही पुत्र समझो और प्रेमपूर्वक इसका पालन करो।’ ब्राह्मणी बोली – प्रभो! आप मेरे भाग्यसे ही यहाँ पधारे हैं।

इसमें संदेह नहीं कि मैं आपकी आज्ञासे इस बालकका अपने पुत्रकी ही भाँति पालन-पोषण करूँगी; तथापि मैं विशेषरूपसे यह जानना चाहती हूँ कि वास्तवमें यह कौन है, किसका पुत्र है, और आप कौन हैं, जो इस समय यहाँ पधारे हैं।

भिक्षुवर! मेरे मनमें बार-बार यह बात आती है कि आप करुणासिन्धु शिव ही हैं और यह बालक पूर्वजन्ममें आपका भक्त रहा है।

किसी कर्मदोषसे यह इस दुरवस्थामें पड़ गया है।

इसे भोगकर यह पुनः आपकी कृपासे परम कल्याणका भागी होगा।

मैं भी आपकी मायासे ही मोहित हो मार्ग भूलकर यहाँ आ गयी हूँ।

आपने ही इसके पालनके लिये मुझे यहाँ भेजा है।

भिक्षुप्रवर शिवने कहा – ब्राह्मणी! सुनो, यह बालक शिवभक्त विदर्भराज सत्यरथका पुत्र है।

सत्यरथको शाल्वदेशीय क्षत्रियोंने युद्धमें मार डाला है।

उनकी पत्नी अत्यन्त व्यग्र हो रातमें शीघ्रतापूर्वक अपने महलसे बाहर भाग आयीं।

उन्होंने यहाँ आकर इस बालकको जन्म दिया।

सबेरा होनेपर वे प्याससे पीड़ित हो सरोवरमें उतरीं।

उसी समय दैववश एक ग्राहने आकर उन्हें अपना आहार बना लिया।

ब्राह्मणीने पूछा – भिक्षुदेव! क्या कारण है कि इसके पिता राजा सत्यरथ श्रेष्ठ भोगोंके उपभोगके समय बीचमें ही शाल्वदेशीय शत्रुओंद्वारा मार डाले गये।

किस कारणसे इस शिशुकी माताको ग्राहने खा लिया? और यह शिशु जो जन्मसे ही अनाथ और बन्धुहीन हो गया, इसका क्या कारण है? मेरा अपना पुत्र भी अत्यन्त दरिद्र एवं भिक्षुक क्यों हुआ तथा मेरे इन दोनों पुत्रोंको भविष्यमें कैसे सुख प्राप्त होगा? भिक्षुवर्य शिवने कहा – इस राजकुमारके पिता विदर्भराज पूर्वजन्ममें पाण्ड् यदेशके श्रेष्ठ राजा थे।

वे सब धर्मोंके ज्ञाता थे और सम्पूर्ण पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन करते थे।

एक दिन प्रदोषकालमें राजा भगवान् शंकरका पूजन कर रहे थे और बड़ी भक्तिसे त्रिलोकीनाथ महादेवजीकी आराधनामें संलग्न थे।

उसी समय नगरमें सब ओर बड़ा भारी कोलाहल मचा।

उस उत्कट शब्दको सुनकर राजाने बीचमें ही भगवान् शंकरकी पूजा छोड़ दी और नगरमें क्षोभ फैलनेकी आशंकासे राजभवनसे बाहर निकल गये।

इसी समय राजाका महाबली मन्त्री शत्रुको पकड़कर उनके समीप ले आया।

वह शत्रु पाण्ड् यराजका ही सामन्त था।

उसे देखकर राजाने क्रोधपूर्वक उसका मस्तक कटवा दिया।

शिवपूजा छोड़कर नियमको समाप्त किये बिना ही राजाने रातमें भोजन भी कर लिया।

इसी प्रकार राजकुमार भी प्रदोषकालमें शिवजीकी पूजा किये बिना ही भोजन करके सो गया।

वही राजा दूसरे जन्ममें विदर्भराज हुआ था।

शिवजीकी पूजामें विघ्न होनेके कारण शत्रुओंने उसको सुख-भोगके बीचमें ही मार डाला।

पूर्वजन्ममें जो उसका पुत्र था, वही इस जन्ममें भी हुआ है।

शिवजीकी पूजाका उल्लंघन करनेके कारण यह दरिद्रताको प्राप्त हुआ है।

इसकी माताने पूर्वजन्ममें छलसे अपनी सौतको मार डाला था।

उस महान् पापके कारण ही वह इस जन्ममें ग्राहके द्वारा मारी गयी।

ब्राह्मणी! यह तुम्हारा पुत्र पूर्वजन्ममें उत्तम ब्राह्मण था।

इसने सारी आयु केवल दान लेनेमें बितायी है, यज्ञ आदि सत्कर्म नहीं किये हैं।

इसीलिये यह दरिद्रताको प्राप्त हुआ है।

उस दोषका निवारण करनेके लिये अब तुम भगवान् शंकरकी शरणमें जाओ।

ये दोनों बालक यज्ञोपवीत-संस्कारके पश्चात् भगवान् शिवकी आराधना करें।

भगवान् शिव इनका कल्याण करेंगे।

इस प्रकार ब्राह्मणीको उपदेश देकर भिक्षु (श्रेष्ठ संन्यासी)-का शरीर धारण करनेवाले भक्तवत्सल शिवने उसे अपने उत्तम स्वरूपका दर्शन कराया।

उन्हें साक्षात् शिव जानकर ब्राह्मणपत्नीने प्रणाम किया और प्रेमसे गद् गदवाणीद्वारा उनकी स्तुति की।

तत्पश्चात् भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये।

उनके चले जानेपर ब्राह्मणी उस बालकको लेकर अपने पुत्रके साथ घरको चली गयी।

एकचक्रा नामके सुन्दर ग्राममें उसने घर बना रखा था।

वह उत्तम अन्नसे अपने बेटे तथा राजकुमारका भी पालन-पोषण करने लगी।

यथासमय ब्राह्मणोंने उन दोनोंका यज्ञोपवीत-संस्कार कर दिया।

वे दोनों शिवकी पूजामें तत्पर रहते हुए घरपर ही बड़े हुए।

शाण्डिल्य मुनिके उपदेशसे नियमपरायण हो वे दोनों शुभ व्रत रखकर प्रदोषकालमें शंकरजीकी पूजा करते थे।

एक दिन द्विजकुमार राजकुमारको साथ लिये बिना ही नदीमें स्नान करनेके लिये गया।

वहाँ उसे निधिसे भरा हुआ एक सुन्दर कलश मिल गया।

इस प्रकार भगवान् शंकरकी पूजा करते हुए उन दोनों कुमारोंका उसी घरमें एक वर्ष व्यतीत हो गया।

तदनन्तर एक दिन राजकुमार उस ब्राह्मणकुमारके साथ वनमें गया।

वहाँ अकस्मात् एक गन्धर्वकन्या आ गयी।

उसके पिताने वह कन्या राजकुमारको दे दी।

गन्धर्व-कन्यासे विवाह करके राजकुमार निष्कण्टक राज्य भोगने लगे।

जिस ब्राह्मणपत्नीने पहले अपने पुत्रकी भाँति उसका पालन-पोषण किया था, वही उस समय राजमाता हुई और वह ब्राह्मणकुमार उसका भाई हुआ।

राजाका नाम धर्मगुप्त था।

इस प्रकार देवेश्वर शिवकी आराधना करके राजा धर्मगुप्त अपनी उस रानीके साथ विदर्भदेशमें राजोचित सुखका उपभोग करने लगा।

यह मैंने तुमसे शिवके भिक्षुवर्य अवतारका वर्णन किया है, जिन्होंने राजा धर्मगुप्तको बाल्यकालमें सुख प्रदान किया था।

यह पवित्र आख्यान पापहारी, परम-पावन, चारों पुरुषार्थोंका साधक तथा सम्पूर्ण अभीष्टको देनेवाला है।

जो प्रतिदिन एकाग्रचित्त होकर इसे सुनता या सुनाता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करके अन्तमें भगवान् शिवके धाममें जाता है।

(अध्याय ३१)


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