शिव पुराण - शतरुद्र संहिता - 15


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भगवान् शिवके अवधूतेश्वरावतारकी कथा और उसकी महिमाका वर्णन

नन्दीश्वर कहते हैं – सनत्कुमार! अब तुम परमेश्वर शिवके अवधूतेश्वर नामक अवतारका वर्णन सुनो, जिसने इन्द्रके घमंडको चूर-चूर कर दिया था।

पहलेकी बात है, इन्द्र सम्पूर्ण देवताओं तथा बृहस्पतिजीको साथ लेकर भगवान् शिवका दर्शन करनेके लिये कैलास पर्वतपर गये।

उस समय बृहस्पति और इन्द्रके शुभागमनकी बात जानकर भगवान् शंकर उन दोनोंकी परीक्षा लेनेके लिये अवधूत बन गये।

उनके शरीरपर कोई वस्त्र नहीं था।

वे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी होनेके कारण महाभयंकर जान पड़ते थे।

उनकी आकृति बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी।

वे राह रोककर खड़े थे।

बृहस्पति और इन्द्रने शिवके समीप जाते समय देखा, एक अद्भुत शरीरधारी पुरुष रास्तेके बीचमें खड़ा है।

इन्द्रको अपने अधिकारपर बड़ा गर्व था।

इसलिये वे यह न जान सके कि ये साक्षात् भगवान् शंकर हैं।

उन्होंने मार्गमें खड़े हुए पुरुषसे पूछा – ‘तुम कौन हो? इस नग्न अवधूतवेशमें कहाँसे आये हो? तुम्हारा नाम क्या है? सब बातें ठीक-ठीक बताओ।

देर न करो।

भगवान् शिव अपने स्थानपर हैं या इस समय कहीं अन्यत्र गये हैं? मैं देवताओं तथा गुरुजीके साथ उन्हींके दर्शनके लिये जा रहा हूँ।’ इन्द्रके बारंबार पूछनेपर भी महान् कौतुक करनेवाले अहंकारहारी महायोगी त्रिलोकीनाथ शिव कुछ न बोले।

चुप ही रहे।

तब अपने ऐश्वर्यका घमंड रखनेवाले देवराज इन्द्रने रोषमें आकर उस जटाधारी पुरुषको फटकारा और इस प्रकार कहा।

इन्द्र बोले – अरे मूढ़! दुर्मते! तू बार-बार पूछनेपर भी उत्तर नहीं देता? अतः तुझे वज्रसे मारता हूँ।

देखूँ कौन तेरी रक्षा करता है।

ऐसा कह उस दिगम्बर पुरुषकी ओर क्रोधपूर्वक देखते हुए इन्द्रने उसे मार डालनेके लिये वज्र उठाया।

यह देख भगवान् शंकरने शीघ्र ही उस वज्रका स्तम्भन कर दिया।

उनकी बाँह अकड़ गयी।

इसलिये वे वज्रका प्रहार न कर सके।

तदनन्तर वह पुरुष तत्काल ही क्रोधके कारण तेजसे प्रज्वलित हो उठा, मानो इन्द्रको जलाये देता हो।

भुजाओंके स्तम्भित हो जानेके कारण शचीवल्लभ इन्द्र क्रोधसे उस सर्पकी भाँति जलने लगे, जिसका पराक्रम मन्त्रके बलसे अवरुद्ध हो गया हो।

बृहस्पतिने उस पुरुषको अपने तेजसे प्रज्वलित होता देख तत्काल ही यह समझ लिया कि ये साक्षात् भगवान् हर हैं।

फिर तो वे हाथ जोड़ प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे।

स्तुतिके पश्चात् उन्होंने इन्द्रको उनके चरणोंमें गिरा दिया और कहा – ‘दीनानाथ महादेव! यह इन्द्र आपके चरणोंमें पड़ा है।

आप इसका और मेरा उद्धार करें।

हम दोनोंपर क्रोध नहीं, प्रेम करें।

महादेव! शरणागत इन्द्रकी रक्षा कीजिये।

आपके ललाटसे प्रकट हुई यह आग इन्हें जलानेके लिये आ रही है।’ बृहस्पतिकी यह बात सुनकर अवधूत-वेषधारी करुणासिन्धु शिवने हँसते हुए कहा – ‘अपने नेत्रसे रोषवश बाहर निकली हुई अग्निको मैं पुनः कैसे धारण कर सकता हूँ।

क्या सर्प अपनी छोड़ी हुई केंचुलको फिर ग्रहण करता है?’ बृहस्पति बोले – देव! भगवन्! भक्त सदा ही कृपाके पात्र होते हैं।

आप अपने भक्तवत्सल नामको चरितार्थ कीजिये और इस भयंकर तेजको कहीं अन्यत्र डाल दीजिये।

रुद्रने कहा – देवगुरो! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ।

इसलिये उत्तम वर देता हूँ।

इन्द्रको जीवनदान देनेके कारण आजसे तुम्हारा एक नाम जीव भी होगा।

मेरे ललाटवर्ती नेत्रसे जो यह आग प्रकट हुई है, इसे देवता नहीं सह सकते।

अतः इसको मैं बहुत दूर छोड़ूँगा, जिससे यह इन्द्रको पीड़ा न दे सके।

ऐसा कहकर अपने तेजःस्वरूप उस अद्भुत अग्निको हाथमें लेकर भगवान् शिवने क्षार समुद्रमें फेंक दिया।

वहाँ फेंके जाते ही भगवान् शिवका वह तेज तत्काल एक बालकके रूपमें परिणत हो गया, जो सिन्धुपुत्र जलन्धर नामसे विख्यात हुआ।

फिर देवताओंकी प्रार्थनासे भगवान् शिवने ही असुरोंके स्वामी जलन्धरका वध किया था।

अवधूतरूपसे ऐसी सुन्दर लीला करके लोककल्याणकारी शंकर वहाँसे अन्तर्धान हो गये।

फिर सब देवता अत्यन्त निर्भय एवं सुखी हुए।

इन्द्र और बृहस्पति भी उस भयसे मुक्त हो उत्तम सुखके भागी हुए।

जिसके लिये उनका आना हुआ था, वह भगवान् शिवका दर्शन पाकर कृतार्थ हुए।

इन्द्र और बृहस्पति प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थानको चले गये।

सनत्कुमार! इस प्रकार मैंने तुमसे परमेश्वर शिवके अवधूतेश्वर नामक अवतारका वर्णन किया है, जो दुष्टोंको दण्ड एवं भक्तोंको परम आनन्द प्रदान करनेवाला है।

यह दिव्य आख्यान पापका निवारण करके यश, स्वर्ग, भोग, मोक्ष तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फलकी प्राप्ति करानेवाला है।

जो प्रतिदिन एकाग्रचित्त हो इसे सुनता या सुनाता है, वह इह लोकमें सम्पूर्ण सुखोंका उपभोग करके अन्तमें शिवकी गति प्राप्त कर लेता है।

(अध्याय ३०)


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