शिव पुराण - शतरुद्र संहिता - 14


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भगवान् शिवके कृष्णदर्शन नामक अवतारकी कथा

नन्दीश्वर कहते हैं – सनत्कुमारजी! भगवान् शम्भुके एक उत्तम अवतारका नाम कृष्णदर्शन है, जिसने राजा नभगको ज्ञान प्रदान किया था।

उसका वर्णन करता हूँ, सुनो।

श्राद्धदेव नामक मनुके जो इक्ष्वाकु आदि पुत्र थे, उनमें नवमका नाम नभग था, जिनका पुत्र नाभाग नामसे प्रसिद्ध हुआ।

नाभागके ही पुत्र अम्बरीष हुए, जो भगवान् विष्णुके भक्त थे तथा जिनकी ब्राह्मणभक्ति देखकर उनके ऊपर महर्षि दुर्वासा प्रसन्न हुए थे।

मुने! अम्बरीषके पितामह जो नभग कहे गये हैं, उनके चरित्रका वर्णन सुनो।

उन्हींको भगवान् शिवने ज्ञान प्रदान किया था।

मनुपुत्र नभग बड़े बुद्धिमान् थे।

उन्होंने विद्याध्ययनके लिये दीर्घकालतक इन्द्रिय-संयमपूर्वक गुरुकुलमें निवास किया।

इसी बीचमें इक्ष्वाकु आदि भाइयोंने नभगके लिये कोई भाग न देकर पिताकी सम्पत्ति आपसमें बाँट ली और अपना-अपना भाग लेकर वे उत्तम रीतिसे राज्यका पालन करने लगे।

उन सबने पिताकी आज्ञासे ही धनका बँटवारा किया था।

कुछ कालके पश्चात् ब्रह्मचारी नभग गुरुकुलसे सांगोपांग वेदोंका अध्ययन करके वहाँ आये।

उन्होंने देखा सब भाई सारी सम्पत्तिका बँटवारा करके अपना-अपना भाग ले चुके हैं।

तब उन्होंने भी बड़े स्नेहसे दायभाग पानेकी इच्छा रखकर अपने इक्ष्वाकु आदि बन्धुओंसे कहा – ‘भाइयो! मेरे लिये भाग दिये बिना ही आपलोगोंने आपसमें सारी सम्पत्तिका बँटवारा कर लिया।

अतः अब प्रसन्नतापूर्वक मुझे भी हिस्सा दीजिये।

मैं अपना दायभाग लेनेके लिये ही यहाँ आया हूँ।’ भाई बोले – जब सम्पत्तिका बँटवारा हो रहा था, उस समय हम तुम्हारे लिये भाग देना भूल गये थे।

अब इस समय पिताजीको ही तुम्हारे हिस्सेमें देते हैं।

तुम उन्हींको ले लो, इसमें संशय नहीं है।

भाइयोंका यह वचन सुनकर नभगको बड़ा विस्मय हुआ।

वे पिताके पास जाकर बोले – ‘तात! मैं विद्याध्ययनके लिये गुरुकुलमें गया था और वहाँ अबतक ब्रह्मचारी रहा हूँ।

इसी बीचमें भाइयोंने मुझे छोड़कर आपसमें धनका बँटवारा कर लिया।

वहाँसे लौटकर जब मैंने अपने हिस्सेके बारेमें उनसे पूछा, तब उन्होंने आपको मेरा हिस्सा बता दिया।

अतः उसके लिये मैं आपकी सेवामें आया हूँ।’ नभगकी वह बात सुनकर पिताको बड़ा विस्मय हुआ।

श्राद्धदेवने पुत्रको आश्वासन देते हुए कहा – ‘बेटा! भाइयोंकी उस बातपर विश्वास न करो।

वह उन्होंने तुम्हें ठगनेके लिये कही है।

मैं तुम्हारे लिये भोगसाधक उत्तम दाय नहीं बन सकता, तथापि उन वंचकोंने यदि मुझे ही दायके रूपमें तुम्हें दिया है तो मैं तुम्हारी जीविकाका एक उपाय बताता हूँ, सुनो।

इन दिनों उत्तम बुद्धिवाले आंगिरसगोत्रीय ब्राह्मण एक बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे हैं, उस कर्ममें प्रत्येक छठे दिनका कार्य वे ठीक-ठीक नहीं समझ पाते – उसमें उनसे भूल हो जाती है।

तुम वहाँ जाओ और उन ब्राह्मणोंको विश्वेदेवसम्बन्धी दो सूक्त बतला दिया करो।

इससे वह यज्ञ शुद्धरूपसे सम्पादित होगा।

वह यज्ञ समाप्त होनेपर वे ब्राह्मण जब स्वर्गको जाने लगेंगे, उस समय संतुष्ट होकर अपने यज्ञसे बचा हुआ सारा धन तुम्हें दे देंगे।’ पिताकी यह बात सुनकर सत्यवादी नभग बड़ी प्रसन्नताके साथ उस उत्तम यज्ञमें गये।

मुने! वहाँ छठे दिनके कर्ममें बुद्धिमान् मनुपुत्रने वैश्वदेवसम्बन्धी दोनों सूक्तोंका स्पष्टरूपसे उच्चारण किया।

यज्ञकर्म समाप्त होनेपर वे आंगिरस ब्राह्मण यज्ञसे बचा हुआ अपना-अपना धन नभगको देकर स्वर्गलोकको चले गये।

उस यज्ञशिष्ट धनको जब ये ग्रहण करने लगे, उस समय सुन्दर लीला करनेवाले भगवान् शिव तत्काल वहाँ प्रकट हो गये।

उनके सारे अंग बड़े सुन्दर थे, परंतु नेत्र काले थे।

उन्होंने नभगसे पूछा – ‘तुम कौन हो? जो इस धनको ले रहे हो।

यह तो मेरी सम्पत्ति है।

तुम्हें किसने यहाँ भेजा है।

सब बातें ठीक-ठीक बताओ।’ नभगने कहा – यह तो यज्ञसे बचा हुआ धन है, जिसे ऋषियोंने मुझे दिया है।

अब यह मेरी ही सम्पत्ति है।

इसको लेनेसे तुम मुझे कैसे रोक रहे हो? कृष्णदर्शनने कहा – ‘तात! हम दोनोंके इस झगड़ेमें तुम्हारे पिता ही पंच रहेंगे।

जाकर उनसे पूछो और वे जो निर्णय दें, उसे ठीक-ठीक यहाँ आकर बताओ।’ उनकी बात सुनकर नभगने पिताके पास जाकर उक्त प्रश्नको उनके सामने रखा।

श्राद्धदेवको कोई पुरानी बात याद आ गयी और उन्होंने भगवान् शिवके चरणकमलोंका चिन्तन करते हुए कहा।

मनु बोले – ‘तात! वे पुरुष जो तुम्हें वह धन लेनेसे रोक रहे हैं, साक्षात् भगवान् शिव हैं।

यों तो संसारकी सारी वस्तु ही उन्हींकी है।

परंतु यज्ञसे प्राप्त हुए धनपर उनका विशेष अधिकार है।

यज्ञ करनेसे जो धन बच जाता है, उसे भगवान् रुद्रका भाग निश्चित किया गया है।

अतः यज्ञावशिष्ट सारी वस्तु ग्रहण करनेके अधिकारी सर्वेश्वर महादेवजी ही हैं।

उनकी इच्छासे ही दूसरे लोग उस वस्तुको ले सकते हैं।

भगवान् शिव तुमपर कृपा करनेके लिये ही वहाँ वैसा रूप धारण करके आये हैं।

तुम वहीं जाओ और उन्हें प्रसन्न करो।

अपने अपराधके लिये क्षमा माँगो और प्रणाम-पूर्वक उनकी स्तुति करो।’ नभग पिताकी आज्ञासे वहाँ गये और भगवान् को प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले – ‘महेश्वर! यह सारी त्रिलोकी ही आपकी है।

फिर यज्ञसे बचे हुए धनके लिये तो कहना ही क्या है।

निश्चय ही इसपर आपका अधिकार है, यही मेरे पिताने निर्णय दिया है।

नाथ! मैंने यथार्थ बात न जाननेके कारण भ्रमवश जो कुछ कहा है मेरे उस अपराधको क्षमा कीजिये।

मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर यह प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझपर प्रसन्न हों।’ ऐसा कहकर नभगने अत्यन्त दीनतापूर्ण हृदयसे दोनों हाथ जोड़ महेश्वर कृष्णदर्शनका स्तवन किया।

उधर श्राद्धदेवने भी अपने अपराधके लिये क्षमा माँगते हुए भगवान् शिवकी स्तुति की।

तदनन्तर भगवान् रुद्रने मन-ही-मन प्रसन्न हो नभगको कृपादृष्टिसे देखा और मुस्कराते हुए कहा।

कृष्णदर्शन बोले – ‘नभग! तुम्हारे पिताने जो धर्मानुकूल बात कही है, वह ठीक ही है।

तुमने भी साधु-स्वभावके कारण सत्य ही कहा है।

इसलिये मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ और कृपापूर्वक तुम्हें सनातन ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान प्रदान करता हूँ।

इस समय यह सारा धन मैंने तुम्हें दे दिया।

अब तुम इसे ग्रहण करो।

इस लोकमें निर्विकार रहकर सुख भोगो।

अन्तमें मेरी कृपासे तुम्हें सद् गति प्राप्त होगी।’ ऐसा कहकर भगवान् रुद्र सबके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये।

साथ ही श्राद्धदेव भी अपने पुत्र नभगके साथ अपने स्थानको लौट आये।

इस लोकमें विपुल भोगोंका उपभोग करके अन्तमें वे भगवान् शिवके धाममें चले गये।

ब्रह्मन्! इस प्रकार तुमसे मैंने भगवान् शिवके कृष्णदर्शन नामक अवतारका वर्णन किया।

जो इस आख्यानको पढ़ता और सुनता है, उसे सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्राप्त हो जाते हैं।

(अध्याय २९)


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