शिव पुराण - शतरुद्र संहिता - 12


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भगवान् शिवके द्विजेश्वरावतारकी कथा – राजा भद्रायु तथा रानी कीर्तिमालिनीकी धार्मिक दृढ़ताकी परीक्षा

तदनन्तर वैश्यनाथ अवतारका वर्णन करके नन्दीश्वरने द्विजेश्वरावतारका प्रसंग चलाया।

वे बोले – तात! पहले जिन नृपश्रेष्ठ भद्रायुका परिचय दिया गया था और जिनपर भगवान् शिवने ऋषभरूपसे अनुग्रह किया था, उन्हीं नरेशके धर्मकी परीक्षा लेनेके लिये वे भगवान् फिर द्विजेश्वररूपसे प्रकट हुए थे।

ऋषभके प्रभावसे रणभूमिमें शत्रुओंपर विजय पाकर शक्तिशाली राजकुमार भद्रायु जब राज्य-सिंहासनपर आरूढ़ हुए, तब राजा चन्द्रांगद तथा रानी सीमन्तिनीकी बेटी सती-साध्वी कीर्तिमालिनीके साथ उनका विवाह हुआ।

किसी समय राजा भद्रायुने अपनी धर्मपत्नीके साथ वसन्त-ऋतुमें वन-विहार करनेके लिये एक गहन वनमें प्रवेश किया।

उनकी पत्नी शरणागतजनोंका पालन करनेवाली थी।

राजाका भी ऐसा ही नियम था।

उन राजदम्पतिकी धर्ममें कितनी दृढ़ता है, इसकी परीक्षाके लिये पार्वतीसहित भगवान् शिवने एक लीला रची।

शिवा और शिव उस वनमें ब्राह्मणी और ब्राह्मणके रूपमें प्रकट हुए।

उन दोनोंने लीलापूर्वक एक मायामय व्याघ्रका निर्माण किया।

वे दोनों भयसे विह्वल हो व्याघ्रसे थोड़ी ही दूर आगे रोते-चिल्लाते भागने लगे और व्याघ्र उनका पीछा करने लगा।

राजाने उन्हें इस अवस्थामें देखा।

वे ब्राह्मण-दम्पति भी भयसे विह्वल हो महाराजकी शरणमें गये और इस प्रकार बोले।

ब्राह्मण-दम्पतिने कहा – महाराज! हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।

वह व्याघ्र हम दोनोंको खा जानेके लिये आ रहा है।

समस्त प्राणियोंको कालके समान भय देनेवाला यह हिंसक प्राणी हमें अपना आहार बनाये, इसके पूर्व ही आप हम दोनोंको बचा लीजिये।

उन दोनोंका यह करुणक्रन्दन सुनकर महावीर राजाने ज्यों ही धनुष उठाया, त्यों ही वह व्याघ्र उनके निकट आ पहुँचा।

उसने ब्राह्मणीको पकड़ लिया।

वह बेचारी ‘हा नाथ! हा नाथ! हा प्राणवल्लभ! हा शम्भो! हा जगद् गुरो!’ इत्यादि कहकर रोने और विलाप करने लगी।

व्याघ्र बड़ा भयानक था।

उसने ज्यों ही ब्राह्मणीको अपना ग्रास बनानेकी चेष्टा की, त्यों ही भद्रायुने तीखे बाणोंसे उसके मर्ममें आघात किया; परंतु उन बाणोंसे उस महाबली व्याघ्रको तनिक भी व्यथा नहीं हुई।

वह ब्राह्मणीको बलपूर्वक घसीटता हुआ तत्काल दूर निकल गया।

अपनी पत्नीको बाघके पंजेमें पड़ी देख ब्राह्मणको बड़ा दुःख हुआ और वह बारंबार रोने लगा।

देरतक रोकर उसने राजा भद्रायुसे कहा – ‘राजन्! तुम्हारे वे बड़े-बड़े अस्त्र कहाँ हैं? दुःखियोंकी रक्षा करनेवाला तुम्हारा विशाल धनुष कहाँ है? सुना था तुममें बारह हजार बड़े-बड़े हाथियोंका बल है।

वह क्या हुआ? तुम्हारे शंख, खड् ग तथा मन्त्रास्त्र-विद्यासे क्या लाभ हुआ? दूसरोंको क्षीण होनेसे बचाना क्षत्रियका परम धर्म है।

धर्मज्ञ राजा अपना धन और प्राण देकर भी शरणमें आये हुए दीन-दुःखियोंकी रक्षा करते हैं।

जो पीड़ितोंकी प्राणरक्षा नहीं कर सकते, ऐसे लोगोंके लिये तो जीनेकी अपेक्षा मर जाना ही अच्छा है।’ इस प्रकार ब्राह्मणका विलाप और उसके मुखसे अपने पराक्रमकी निन्दा सुनकर राजाने शोकसे मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया – ‘अहो! आज भाग्यके उलट-फेरसे मेरा पराक्रम नष्ट हो गया।

मेरे धर्मका भी नाश हो गया।

अतः अब मेरी सम्पदा, राज्य और आयुका भी निश्चय ही नाश हो जायगा।’ यों विचारकर राजा भद्रायु ब्राह्मणके चरणोंमें गिर पड़े और उसे धीरज बँधाते हुए बोले – ‘ब्रह्मन्! मेरा पराक्रम नष्ट हो गया है।

महामते! मुझ क्षत्रियाधमपर कृपा करके शोक छोड़ दीजिये।

मैं आपको मनोवांछित पदार्थ दूँगा।

यह राज्य, यह रानी और मेरा यह शरीर सब कुछ आपके अधीन है।

बोलिये, आप क्या चाहते हैं?’ ब्राह्मण बोले – राजन्! अंधेको दर्पणसे क्या काम? जो भिक्षा माँगकर जीवन-निर्वाह करता हो, वह बहुत-से घर लेकर क्या करेगा।

जो मूर्ख है, उसे पुस्तकसे क्या काम तथा जिसके पास स्त्री नहीं है, वह धन लेकर क्या करेगा? मेरी पत्नी चली गयी, मैंने कभी काम-सुखका उपभोग नहीं किया।

अतः कामभोगके लिये आप अपनी इस बड़ी रानीको मुझे दे दीजिये।

राजाने कहा – ब्रह्मन्! क्या यही तुम्हारा धर्म है? क्या तुम्हें गुरुने यही उपदेश किया है? क्या तुम नहीं जानते कि परायी स्त्रीका स्पर्श स्वर्ग एवं सुयशकी हानि करनेवाला है? परस्त्रीके उपभोगसे जो पाप कमाया जाता है, उसे सैकड़ों प्रायश्चित्तोंद्वारा भी धोया नहीं जा सकता।

ब्राह्मण बोले – राजन्! मैं अपनी तपस्यासे भयंकर ब्रह्महत्या और मदिरापान-जैसे पापका भी नाश कर डालूँगा।

फिर परस्त्री-संगम किस गिनतीमें है।

अतः आप अपनी इस भार्याको मुझे अवश्य दे दीजिये अन्यथा आप निश्चय ही नरकमें पड़ेंगे।

ब्राह्मणकी इस बातपर राजाने मन-ही-मन विचार किया कि ब्राह्मणके प्राणोंकी रक्षा न करनेसे महापाप होगा, अतः इससे बचनेके लिये पत्नीको दे डालना ही श्रेष्ठ है।

इस श्रेष्ठ ब्राह्मणको अपनी पत्नी देकर मैं पापसे मुक्त हो शीघ्र ही अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा।

मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके राजाने आग जलायी और ब्राह्मणको बुलाकर उसे अपनी पत्नीको दे दिया।

तत्पश्चात् स्नान करके पवित्र हो देवताओंको प्रणाम करके उन्होंने अग्निकी दो बार परिक्रमा की और एकाग्रचित्त होकर भगवान् शिवका ध्यान किया।

इस प्रकार राजाको अग्निमें गिरनेके लिये उद्यत देख जगत्पति भगवान् विश्वनाथ सहसा वहाँ प्रकट हो गये।

उनके पाँच मुख थे।

मस्तकपर चन्द्रकला आभूषणका काम दे रही थी।

कुछ-कुछ पीले रंगकी जटा लटकी हुई थी।

वे कोटि-कोटि सूर्योंके समान तेजस्वी थे।

हाथोंमें त्रिशूल, खट् वांग, कुठार, ढाल, मृग, अभय, वरद और पिनाक धारण किये, बैलकी पीठपर बैठे हुए भगवान् नीलकण्ठको राजाने अपने सामने प्रत्यक्ष देखा।

उनके दर्शनजनित आनन्दसे युक्त हो राजा भद्रायुने हाथ जोड़कर स्तवन किया।

राजाके स्तुति करनेपर पार्वतीके साथ प्रसन्न हुए महेश्वरने कहा – राजन्! तुमने किसी अन्यका चिन्तन न करके जो सदा-सर्वदा मेरा पूजन किया है, तुम्हारी इस भक्तिके कारण और तुम्हारे द्वारा की हुई इस पवित्र स्तुतिको सुनकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ।

तुम्हारे भक्तिभावकी परीक्षाके लिये मैं स्वयं ब्राह्मण बनकर आया था।

जिसे व्याघ्रने ग्रस लिया था, वह ब्राह्मणी और कोई नहीं, ये गिरिराज-नन्दिनी उमादेवी ही थीं।

तुम्हारे बाण मारनेसे भी जिसके शरीरको चोट नहीं पहुँची, वह व्याघ्र मायानिर्मित था।

तुम्हारे धैर्यको देखनेके लिये ही मैंने तुम्हारी पत्नीको माँगा था, इस कीर्तिमालिनीकी और तुम्हारी भक्तिसे मैं संतुष्ट हूँ।

तुम कोई दुर्लभ वर माँगो, मैं उसे दूँगा।

राजा बोले – देव! आप साक्षात् परमेश्वर हैं।

आपने सांसारिक तापसे घिरे हुए मुझ अधमको जो प्रत्यक्ष दर्शन दिया है, यही मेरे लिये महान् वर है।

देव! आप वरदाताओंमें श्रेष्ठ हैं।

आपसे मैं दूसरा कोई वर नहीं माँगता।

मेरी यही इच्छा है कि मैं, मेरी रानी, मेरे माता-पिता, पद्माकर वैश्य और उसके पुत्र सुनय – इन सबको आप अपना पार्श्ववर्ती सेवक बना लीजिये।

तत्पश्चात् रानी कीर्तिमालिनीने प्रणाम करके अपनी भक्तिसे भगवान् शंकरको प्रसन्न किया और यह उत्तम वर माँगा – ‘महादेव! मेरे पिता चन्द्रांगद और माता सीमन्तिनी इन दोनोंको भी आपके समीप निवास प्राप्त हो।’ भक्तवत्सल भगवान् गौरीपतिने प्रसन्न होकर ‘एवमस्तु’ कहा और उन दोनों पति-पत्नीको इच्छानुसार वर देकर वे क्षणभरमें अन्तर्धान हो गये।

इधर राजाने भगवान् शंकरका प्रसाद प्राप्त करके रानी कीर्तिमालिनीके साथ प्रिय विषयोंका उपभोग किया और दस हजार वर्षोंतक राज्य करनेके पश्चात् अपने पुत्रोंको राज्य देकर उन्होंने शिवजीके परमपदको प्राप्त किया।

राजा और रानी दोनों ही भक्तिपूर्वक महादेवजीकी पूजा करके भगवान् शिवके धामको प्राप्त हुए।

यह परम पवित्र, पाप-नाशक एवं अत्यन्त गोपनीय भगवान् शिवका विचित्र गुणानुवाद जो विद्वानोंको सुनाता है अथवा स्वयं भी शुद्धचित्त होकर पढ़ता है, वह इस लोकमें भोग-ऐश्वर्यको प्राप्तकर अन्तमें भगवान् शिवको प्राप्त होता है।

(अध्याय २६-२७)


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