शिव पुराण - रुद्र संहिता - युद्ध खण्ड - 8


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शिव पुराण संहिता लिंकविद्येश्वर | रुद्र संहिता | शतरुद्र | कोटिरुद्र | उमा | कैलास | वायवीय


देवताओंका रुद्रके पास जाकर अपना दुःख निवेदन करना, रुद्रद्वारा उन्हें आश्वासन और चित्ररथको शंखचूडके पास भेजना, चित्ररथके लौटनेपर रुद्रका गणों, पुत्रों और भद्रकालीसहित युद्धके लिये प्रस्थान, उधर शंखचूडका सेनासहित पुष्पभद्राके तटपर पड़ाव डालना तथा दानवराजके दूत और शिवकी बातचीत

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! तदनन्तर जो अत्यन्त दीनताको प्राप्त हो गये थे, उन ब्रह्मा और विष्णुका वचन सुनकर शिवजी मुसकराये और मेघगर्जनाके समान गम्भीर वाणीमें बोले।

शिवजीने कहा – हे हरे! हे ब्रह्मन्! तुमलोग शंखचूडद्वारा उत्पन्न हुए भयको सर्वथा त्याग दो।

निस्संदेह तुम्हारा कल्याण होगा।

मैं शंखचूडका सारा वृत्तान्त यथार्थ रूपसे जानता हूँ।

यह पूर्वजन्ममें एक गोप था, जो ऐश्वर्यशाली भगवान् श्रीकृष्णका भक्त था।

इसका नाम सुदामा था।

वही सुदामा राधाजीके शापसे शंखचूड नामक दानवराज होकर उत्पन्न हुआ है।

यह परम धर्मज्ञ और देवताओंसे द्रोह करनेवाला है।

यह दुर्बुद्धिवश अपने उत्कृष्ट बलके भरोसे सम्पूर्ण देवगणोंको क्लेश दे रहा है।

अब तुमलोग प्रेमपूर्वक मेरी बात सुनो और देवोंको आनन्दित करनेके लिये शीघ्र ही कैलासवासी रुद्रके समीप जाओ।

वह रुद्ररूप मेरा ही उत्तम पूर्णरूप है।

मैं ही देव-कार्यकी सिद्धिके हेतु पृथक् स्वरूप धारण करके वहाँ प्रकट हुआ हूँ।

मेरा वह रूप ऐश्वर्यशाली तथा परिपूर्णतम है।

हरे! इसीलिये मैं भक्तोंके वशीभूत हो कैलास पर्वतपर सदा निवास करता हूँ।

तदनन्तर कैलास पहुँचकर देवताओंने भगवान् महेशकी स्तुति की और अन्तमें कहा – ‘महेशान! आप तो कृपाके आकर हैं।

दीनोंका उद्धार करना तो आपका बाना ही है।

प्रभो! दानवराज शंखचूडका वध करके इन्द्रको उसके भयसे मुक्त कीजिये और देवोंको इस विपत्तिसे उबारिये।’ तब भक्तवत्सल शम्भु देवताओंकी इस प्रार्थनाको सुनकर हँसे और मेघगर्जनकी-सी गम्भीर वाणीमें बोले।

श्रीशंकरने कहा – हे हरे! हे ब्रह्मन्! हे देवगण! तुमलोग अपने-अपने स्थानको लौट जाओ।

मैं निश्चय ही सैनिकोंसहित शंखचूडका वध कर डालूँगा।

इसमें तनिक भी संशय नहीं है।

सनत्कुमारजी कहते हैं – व्यासजी! महेश्वरके उस अमृतस्रावी वचनको सुनकर सम्पूर्ण देवताओंको परम आनन्द प्राप्त हुआ।

उस समय उन्होंने समझ लिया कि अब दानव शंखचूड मरा हुआ ही है।

तब महेश्वरके चरणोंमें प्रणिपात करके विष्णु वैकुण्ठको और ब्रह्मा सत्यलोकको चले गये तथा सम्पूर्ण देवता भी अपने-अपने स्थानको प्रस्थित हुए।

इधर उन महारुद्रने, जो परमेश्वर, दुष्टोंके लिये कालरूप और सत्पुरुषोंकी गति हैं, देवताओंकी इच्छासे अपने मनमें शंखचूडके वधका निश्चय किया।

तब उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक अपने प्रेमी गन्धर्वराज चित्ररथको दूत बनाकर शीघ्र ही शंखचूडके पास भेजा।

चित्ररथने वहाँ जाकर शंखचूडको खूब समझाकर कहा, परंतु उसने बिना युद्ध किये देवताओंको राज्य लौटाना स्वीकार नहीं किया और कहा – ‘मैंने ऐसा दृढ़ निश्चय कर लिया है कि महेश्वरके साथ युद्ध किये बिना न तो मैं राज्य ही वापस दूँगा और न अधिकारोंको ही लौटाऊँगा।

तू कल्याणकर्ता रुद्रके पास लौट जा और मेरी कही हुई बात यथार्थरूपसे उनसे कह दे।

वे जैसा उचित समझेंगे, वैसा करेंगे।

तू व्यर्थ बकवाद मत कर।’ सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनिश्रेष्ठ! यों कहे जानेपर वह शिवदूत पुष्पदन्त (चित्ररथ) अपने स्वामी महेश्वरके पास लौट गया और उसने सारी बातें ठीक-ठीक कह दीं।

तब उस दूतके वचनको सुनकर देवताओंके स्वामी भगवान् शंकरको क्रोध आ गया।

उन्होंने अपने वीरभद्र आदि गणोंसे कहा।

रुद्र बोले – हे वीरभद्र! हे नन्दिन्! क्षेत्रपाल! आठों भैरव! मैं आज शीघ्र ही शंखचूडका वध करनेके निमित्त चलता हूँ, अतः मेरी आज्ञासे मेरे सभी बलशाली गण आयुधोंसे लैस होकर तैयार हो जायँ और अभी-अभी कुमारों (स्वामिकार्तिक और गणेश)-के साथ रणयात्रा करें।

भद्रकाली भी अपनी सेनाके साथ युद्धके लिये प्रस्थान करें।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! ऐसी आज्ञा देकर शिवजी अपनी सेनाके साथ चल पड़े।

फिर तो सभी वीरगण हर्षमग्न होकर उनके पीछे-पीछे चलने लगे।

इसी समय सम्पूर्ण सेनाओंके अध्यक्ष स्कन्द और गणेश भी हर्षसे भरे हुए कवच धारण करके सशस्त्र शिवजीके निकट आ पहुँचे।

फिर वीरभद्र, नन्दी, महाकाल, सुभद्रक, विशालाक्ष, बाण, पिंगलाक्ष, विकम्पन, विरूप, विकृति, मणिभद्र, बाष्कल, कपिल, दीर्घदंष्ट्र, विकार, ताम्रलोचन, कालंकर, बलीभद्र, कालजिह्व, कुटीचर, बलोन्मत्त, रणश्लाघ्य, दुर्जय तथा दुर्गम आदि गणनायक जो प्रधान-प्रधान सेनापति थे, शिवजीके साथ चले।

उनके गणोंकी संख्या करोड़ों करोड़ थी।

आठों भैरव, एकादश भयंकर रुद्र, आठों वसु, इन्द्र, बारहों आदित्य, अग्नि, चन्द्रमा, विश्वकर्मा, दोनों अश्विनी-कुमार, कुबेर, यम, निर्ऋति, नलकूबर, वायु, वरुण, बुध, मंगल तथा अन्यान्य ग्रह, पराक्रमी कामदेव, उग्रदंष्ट्र, उग्रदण्ड, कोरट तथा कोटभ आदिने भी शीघ्र ही महेश्वरका अनुगमन किया।

स्वयं महेश्वरीदेवी भद्रकाली भी सौ भुजा धारण करके शिवजीके साथ चलीं।

वे उत्तमोत्तम रत्नोंसे बने हुए विमानपर आरूढ़ थीं।

उनके शरीरपर लाल चन्दनका अनुलेप लगा था और लाल वस्त्र शोभा पा रहा था।

वे हर्षमग्न होकर हँसती, नाचती और उत्तम स्वरसे गान करती हुई अपने भक्तोंको अभय तथा शत्रुओंको भय प्रदान कर रही थीं।

उनकी एक योजन लंबी भीषणाकार जिह्वा लपलपा रही थी।

वे अपने हाथोंमें शंख, चक्र, गदा, पद्म, ढाल, तलवार, धनुष, बाण, एक योजन विस्तारवाला गहरा गोलाकार खप्पर, गगनचुम्बी त्रिशूल, एक योजन लंबी शक्ति, मुद् गर, मुसल, वज्र, खड्ग, तीखा फलक, वैष्णवास्त्र, वारुणास्त्र, वायव्यास्त्र, नागपाश, नारायणास्त्र, गन्धर्वास्त्र, ब्रह्मास्त्र, गारुडास्त्र, पर्जन्यास्त्र, पाशुपतास्त्र, जृम्भणास्त्र, पर्वतास्त्र, महान् पराक्रमी सूर्यास्त्र, कालकाल, महानल, महेश्वरास्त्र, यमदण्डास्त्र, सम्मोहनास्त्र तथा समर्थ दिव्य अस्त्र और अन्यान्य सैकड़ों दिव्यास्त्र धारण किये हुए थीं।

करोड़ों योगिनियाँ तथा डाकिनियाँ उनके साथ थीं।

फिर भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, वेताल, राक्षस, यक्ष और किंनर आदिसे घिरे हुए स्कन्दने पिताके पास आकर उन चन्द्रशेखरको प्रणाम किया और उनकी आज्ञासे पार्श्वभागमें स्थित होकर सहायकका स्थान ग्रहण किया।

तदनन्तर रुद्ररूपधारी शम्भु अपनी सारी सेनाको एकत्रित करके शंखचूडके साथ लोहा लेनेके लिये निर्भयतापूर्वक आगे बढ़े और देवताओंका उद्धार करनेके लिये चन्द्रभागा नदीके तटपर मनोहर वटवृक्षके नीचे खड़े हो गये।

व्यासजी! उधर जब शिवदूत चला गया, तब प्रतापी शंखचूडने महलके भीतर जाकर तुलसीसे वह सारी वार्ता कह सुनायी।

शंखचूडने कहा – ‘देवि! शम्भुके दूतके मुखसे (रणनिमन्त्रण सुनकर) मैं युद्धके लिये उद्यत हुआ हूँ और उनसे जूझनेके लिये मैं निश्चय ही जाऊँगा।

तुम इसके लिये मुझे आज्ञा दो।’ यों कहकर उस ज्ञानीने अपनी प्रियाको नाना प्रकारसे समझाया।

फिर ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर प्रातः-कृत्य समाप्त किया और पहले नित्यकर्म पूरा करके बहुत-सा दान दिया।

तत्पश्चात् अपने पुत्रको सम्पूर्ण दानवोंके राज्यपर अभिषिक्त करके उसे अपनी भार्या, राज्य और सारी सम्पत्ति समर्पित कर दी।

पुनः जब उसकी प्रिया तुलसी रोती हुई उसकी रणयात्राका निषेध करने लगी, तब राजा शंखचूडने नाना प्रकारकी कथाएँ कहकर उसे ढाढ़स बँधाया।

तदनन्तर उस समादृत दानवराजने कवच धारण करके युद्ध करनेके लिये उद्यत हो अपने वीर सेनापतिको बुलाकर उसे आदेश देते हुए कहा।

शंखचूड बोला – सेनापते! मेरे सभी वीर, जो सम्पूर्ण कार्योंमें कुशल और समरमें शोभा पानेवाले हैं, आज कवच धारण करके युद्धके लिये प्रस्थान करें।

शूरवीर दानवों और दैत्योंकी छियासी टुकड़ियाँ तथा बलशाली कंकोंकी निर्भीक सेनाएँ अस्त्र-शस्त्रसे सुसज्जित होकर नगरसे बाहर निकलें।

करोड़ों प्रकारसे पराक्रम प्रकट करनेवाले जो असुरोंके पचास कुल हैं, वे भी देवोंके पक्षपाती शम्भुसे युद्ध करनेके लिये प्रस्थित हों, मेरी आज्ञासे धौम्रोंके सौ कुल भी कवचसे विभूषित हो शम्भुके साथ लोहा लेनेके लिये शीघ्र ही निकलें।

कालकेयों, मौर्यों, दौर्हृदों तथा कालकोंको भी मेरी यह आज्ञा सुना दो कि वे रुद्रके साथ संग्राम करनेके लिये रण-सामग्रीसे सुसज्जित हो चलें।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! सेनापतिको यों आदेश देकर असुरोंका राजा महाबली दानवेन्द्र शंखचूड सहस्रों प्रकारकी बहुत बड़ी सेनाओंसे घिरा हुआ नगरसे बाहर निकला।

उसका सेनापति भी युद्धशास्त्रमें निपुण, महारथी, महान् शूरवीर और रणभूमिमें रथियोंमें अग्रगण्य था।

इस प्रकार युद्धस्थलमें वीरोंको भयभीत कर देनेवाला वह दानवराज तीन लाख अक्षौहिणी सेनाओंपर शासन करता हुआ शिबिरसे बाहर निकला और उत्तमोत्तम रत्नोंद्वारा निर्मित विमानपर आरूढ़ हो गुरुजनोंको आगे करके युद्धके लिये चल पड़ा।

आगे बढ़नेपर वह पुष्पभद्रा नदीके तटपर सिद्धाश्रममें जा पहुँचा।

वहाँ एक मनोहर वटवृक्ष विराजमान था।

वह सिद्धिक्षेत्र सिद्धोंको उत्तम सिद्धि प्रदान करनेवाला था।

पुण्यक्षेत्र भारतमें वह कपिलका तपःस्थान कहलाता था।

वह भूभाग पश्चिम समुद्रसे पूर्व, मलयपर्वतसे पश्चिम, श्रीशैलसे उत्तर और गन्धमादनसे दक्षिण था।

उसकी चौड़ाई पाँच योजन और लंबाई पाँच सौ योजन थी।

भारतके उस भागमें उत्तम पुण्य प्रदान करनेवाली तथा शुद्ध स्फटिकके समान स्वच्छ जलसे परिपूर्ण पुष्पभद्रा और सरस्वती नामकी दो रमणीय नदियाँ बहती हैं।

सदा सौभाग्यसे संयुक्त रहनेवाली लवणसागरकी प्रिया भार्या पुष्पभद्रा सरस्वतीके साथ हिमालयसे निकली है और गोमन्तपर्वतको बायें करके पश्चिम समुद्रमें जा मिली है।

वहाँ पहुँचकर शंखचूडने शिवजीकी सेनाको देखा।

मुने! उसने पहले शिवजीके पास एक दानवेश्वरको दूतके रूपमें भेजा।

उसने शिवजीसे युद्ध न करनेके लिये कहा और शिवजीने उसे देवताओंका राज्य लौटा देनेकी बात कही।

अन्तमें महेश्वरने कहा – ‘दूत! हम किसीका भी पक्ष नहीं लेते; क्योंकि हम तो कभी स्वतन्त्र रहते ही नहीं, सदा भक्तोंके अधीन रहते हैं और उनकी इच्छासे उन्हींका कार्य करते रहते हैं।

देखो, पूर्वकालमें ब्रह्माकी प्रार्थनासे पहले-पहल प्रलय-समुद्रमें श्रीहरि और दैत्यश्रेष्ठ मधु-कैटभका भी युद्ध हुआ था।

पुनः भक्तोंके हितकारी उन्हीं श्रीविष्णुने देवताओंके प्रार्थना करनेपर प्रह्लादके कारण हिरण्यकशिपुका वध किया था।

तुमने यह भी सुना होगा कि पहले जो मैंने त्रिपुरोंके साथ युद्ध करके उन्हें भस्म कर डाला था, वह भी देवोंकी प्रार्थनापर ही हुआ था।

पूर्वकालमें सर्वेश्वरी जगज्जननीका जो शुम्भ आदिके साथ युद्ध हुआ था और जिसमें उन्होंने उन दैत्योंका वध कर डाला था, वह भी देवताओंके प्रार्थना करनेपर ही घटित हुआ था।

वे ही सभी देवगण आज भी ब्रह्माके शरणापन्न हुए थे।

तब वे उन देवताओं और श्रीहरिके साथ मेरी शरणमें आये थे।

दूत! इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और देवगणोंकी प्रार्थनाके वशीभूत हो देवोंका अधीश्वर होनेके कारण मैं भी युद्धके लिये आया हूँ।

तुम भी तो महात्मा श्रीकृष्णके श्रेष्ठ पार्षद हो।

अबतक जो-जो दैत्य मारे गये हैं, उनमेंसे कोई भी तुम्हारी समानता नहीं कर सकता।

इसलिये राजन्! देवकार्यकी सिद्धिके लिये तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें मुझे कौन-सी बड़ी लज्जा होगी।

अर्थात् कुछ नहीं; क्योंकि मैं ईश्वर हूँ और देवताओंने मुझे विनयपूर्वक भेजा है।

अतः तुम जाओ और शंखचूडसे मेरी बात कह दो।

वह जैसा उचित समझेगा, वैसा करेगा।

मुझे तो देवताओंका कार्य करना ही है।’ यों कहकर कल्याणकर्ता महेश्वर चुप हो गये।

तब शंखचूडका वह दूत उठा और उसके पास चल दिया।

(अध्याय ३१ – ३५)


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