शिव पुराण - रुद्र संहिता - युद्ध खण्ड - 7


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शिव पुराण संहिता लिंकविद्येश्वर | रुद्र संहिता | शतरुद्र | कोटिरुद्र | उमा | कैलास | वायवीय


शंखचूडका असुरराज्यपर अभिषेक और उसके द्वारा देवोंका अधिकार छीना जाना, देवोंका ब्रह्माकी शरणमें जाना, ब्रह्माका उन्हें साथ लेकर विष्णुके पास जाना, विष्णुद्वारा शंखचूडके जन्मका रहस्योद् घाटन और फिर सबका शिवके पास जाना और शिवसभामें उनकी झाँकी करना तथा अपना अभिप्राय प्रकट करना

सनत्कुमारजी कहते हैं – महर्षे! जब शंखचूडने तप करके वर प्राप्त कर लिया और वह विवाहित होकर अपने घर लौट आया, तब दानवों और दैत्योंको बड़ी प्रसन्नता हुई।

वे सभी असुर तुरंत ही अपने लोकसे निकलकर अपने गुरु शुक्राचार्यको साथ ले दल बनाकर उसके निकट आये और विनयपूर्वक उसे प्रणाम करके अनेकों प्रकारसे आदर प्रदर्शित करते हुए उसका स्तवन करने लगे।

फिर उसे अपना तेजस्वी स्वामी मानकर अत्यन्त प्रेमभावसे उसके पास ही खड़े हो गये।

उधर दम्भकुमार शंखचूडने भी अपने कुलगुरु शुक्राचार्यको आया हुआ देखकर बड़े आदर और भक्तिके साथ उन्हें साष्टांग प्रणाम किया।

तदनन्तर गुरु शुक्राचार्यने समस्त असुरोंके साथ सलाह करके उनकी सम्मतिसे शंखचूडको दानवों तथा असुरोंका अधिपति बना दिया।

दम्भपुत्र शंखचूड प्रतापी एवं वीर तो था ही, उस समय असुर-राज्यपरअभिषिक्त होनेके कारण वह असुरराज विशेष-रूपसे शोभा पाने लगा।

तब उसने सहसा देवताओंपर आक्रमण करके वेगपूर्वक उनका संहार करना आरम्भ किया।

सम्पूर्ण देवता मिलकर भी उसके उत्कृष्ट तेजको सहन न कर सके, अतः वे समरभूमिसे भाग चले और दीन होकर यत्र-तत्र पर्वतोंकी खोहोंमें जा छिपे।

उनकी स्वतन्त्रता जाती रही।

वे शंखचूडके वशवर्ती होनेके कारण प्रभाहीन हो गये।

इधर शूरवीर प्रतापी दम्भकुमार दानवराज शंखचूडने भी सम्पूर्ण लोकोंको जीतकर देवताओंका सारा अधिकार छीन लिया।

वह त्रिलोकीको अपने अधीन करके सम्पूर्ण लोकोंपर शासन करने लगा और स्वयं इन्द्र बनकर सारे यज्ञभागोंको भी हड़पने लगा तथा अपनी शक्तिसे कुबेर, सोम, सूर्य, अग्नि, यम और वायु आदिके अधिकारोंका भी पालन कराने लगा।

उस समय महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न महावीर शंखचूड समस्त देवताओं, असुरों, दानवों, राक्षसों, गन्धर्वों, नागों, किंनरों, मनुष्यों तथा त्रिलोकीके अन्यान्य प्राणियोंका एकच्छत्र सम्राट् था।

इस प्रकार महान् राजराजेश्वर शंखचूड बहुत वर्षोंतक सम्पूर्ण भुवनोंके राज्यका उपभोग करता रहा।

उसके राज्यमें न अकाल पड़ता था न महामारी और न अशुभ ग्रहोंका ही प्रकोप होता था; आधि-व्याधियाँ भी अपना प्रभाव नहीं डाल पाती थीं।

यों सारी प्रजा सदा सुखी रहती थी।

पृथ्वी बिना जोते ही अनेक प्रकारके धान्य उत्पन्न करती थी।

नाना प्रकारकी ओषधियाँ उत्तम-उत्तम फलों और रसोंसे युक्त थीं।

उत्तम-उत्तम मणियोंकी खदानें थीं।

समुद्र अपने तटोंपर निरन्तर ढेर-के-ढेर रत्न बिखेरते रहते थे।

वृक्षोंमें सदा पुष्प-फल लगे रहते थे।

सरिताओंमें सुस्वादु नीर बहता रहता था।

देवताओंके अतिरिक्त सभी जीव सुखी थे।

उनमें किसी प्रकारका विकार नहीं उत्पन्न होता था।

चारों वर्णों और आश्रमोंके सभी लोग अपने-अपने धर्ममें स्थित रहते थे।

इस प्रकार जब वह त्रिलोकीका शासन कर रहा था, उस समय कोई भी दुःखी नहीं था; केवल देवता भ्रातृ-द्रोहवश दुःख उठा रहे थे।

मुने! महाबली शंखचूड गोलोकनिवासी श्रीकृष्णका परम मित्र था।

साधुस्वभाववाला वह सदा श्रीकृष्णकी भक्तिमें निरत रहता था।

पूर्वशापवश उसे दानवकी योनिमें जन्म लेना पड़ा था, परंतु दानव होनेपर भी उसकी बुद्धि दानवकी-सी नहीं थी।

प्रिय व्यासजी! तदनन्तर जो पराजित होकर राज्यसे हाथ धो बैठे थे, वे सभी सुरगण तथा ऋषि परस्पर मन्त्रणा करके ब्रह्माजीकी सभाको चले।

वहाँ पहुँचकर उन्होंने ब्रह्माजीका दर्शन किया और उनके चरणोंमें अभिवादन करके विशेषरूपसे उनकी स्तुति की।

फिर आकुलतापूर्वक अपना सारा वृत्तान्त उन्हें कह सुनाया।

तब ब्रह्मा उन सभी देवताओं तथा मुनियोंको ढाढ़स बँधाकर उन्हें साथ ले सत्पुरुषोंको सुख प्रदान करनेवाले वैकुण्ठलोकको चल पड़े।

वहाँ पहुँचकर देवगणोंसहित ब्रह्माने रमापतिका दर्शन किया।

उनके मस्तकपर किरीट सुशोभित था, कानोंमें कुण्डल झलमला रहे थे और कण्ठ वनमालासे विभूषित था।

वे चतुर्भुज देव अपनी चारों भुजाओंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए थे।

श्रीविग्रहपर पीताम्बर शोभा दे रहा था और सनन्दनादि सिद्ध उनकी सेवामें नियुक्त थे।

ऐसे सर्वव्यापी विष्णुकी झाँकी करके ब्रह्मा आदि देवताओं तथा मुनीश्वरोंने उन्हें प्रणाम किया और फिर भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर वे उनकी स्तुति करने लगे।

देवता बोले – सामर्थ्यशाली वैकुण्ठाधिपते! आप देवोंके भी देव और लोकोंके स्वामी हैं।

आप त्रिलोकीके गुरु हैं।

श्रीहरे! हम सब आपके शरणापन्न हुए हैं, आप हमारी रक्षा कीजिये।

अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले ऐश्वर्यशाली त्रिलोकेश! आप ही लोकोंके पालक हैं।

गोविन्द! लक्ष्मी आपमें ही निवास करती हैं और आप अपने भक्तोंके प्राणस्वरूप हैं, आपको हमारा नमस्कार है।

इस प्रकार स्तुति करके सभी देवता श्रीहरिके आगे रो पड़े।

उनकी बात सुनकर भगवान् विष्णुने ब्रह्मासे कहा।

विष्णु बोले – ब्रह्मन्! यह वैकुण्ठ योगियोंके लिये भी दुर्लभ है।

तुम यहाँ किसलिये आये हो? तुमपर कौन-सा कष्ट आ पड़ा है? वह यथार्थरूपसे मेरे सामने वर्णन करो।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! श्रीहरिका वचन सुनकर ब्रह्माजीने विनम्रभावसे सिर झुकाकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया और अंजलि बाँधकर परमात्मा विष्णुके समक्ष स्थित हो देवताओंके कष्टसे भरी हुई शंखचूडकी सारी करतूत कह सुनायी।

तब समस्त प्राणियोंके भावोंके ज्ञाता भगवान् श्रीहरि उस बातको सुनकर हँस पड़े और ब्रह्मासे उस रहस्यका उद् घाटन करते हुए बोले।

श्रीभगवान् ने कहा – कमलयोनि! मैं शंखचूडका सारा वृत्तान्त जानता हूँ।

पूर्वजन्ममें वह महातेजस्वी गोप था, जो मेरा भक्त था।

मैं उसके वृत्तान्तसे सम्बन्ध रखनेवाले इस पुरातन इतिहासका वर्णन करता हूँ, सुनो।

इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं करना चाहिये।

भगवान् शंकर सब कल्याण करेंगे।

गोलोकमें मेरे ही रूप श्रीकृष्ण रहते हैं।

उनकी स्त्री श्रीराधा नामसे विख्यात है।

वह जगज्जननी तथा प्रकृतिकी परमोत्कृष्ट पाँचवीं मूर्ति है।

वही वहाँ सुन्दररूपसे विहार करनेवाली है।

उनके अंगसे उद् भूत बहुत-से गोप और गोपियाँ भी वहाँ निवास करती हैं।

वे नित्य राधा-कृष्णका अनुवर्तन करते हुए उत्तम-उत्तम क्रीड़ाओंमें तत्पर रहते हैं।

वही गोप इस समय शम्भुकी इस लीलासे मोहित होकर शापवश अपनेको दुःख देनेवाली दानवी योनिको प्राप्त हो गया है।

श्रीकृष्णने पहलेसे ही रुद्रके त्रिशूलसे उसकी मृत्यु निर्धारित कर दी है।

इस प्रकार वह दानव-देहका परित्याग करके पुनः कृष्ण-पार्षद हो जायगा।

देवेश! ऐसा जानकर तुम्हें भय नहीं करना चाहिये।

चलो, हम दोनों शंकरकी शरणमें चलें; वे शीघ्र ही कल्याणका विधान करेंगे।

अब हमें, तुम्हें तथा समस्त देवोंको निर्भय हो जाना चाहिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! यों कहकर ब्रह्मासहित विष्णु शिवलोकको चले।

मार्गमें वे मन-ही-मन भक्तवत्सल सर्वेश्वर शम्भुका स्मरण करते जा रहे थे।

व्यासजी! इस प्रकार वे रमापति विष्णु ब्रह्माके साथ उसी समय उस शिवलोकमें जा पहुँचे, जो महान् दिव्य, निराधार तथा भौतिकतासे रहित है।

वहाँ पहुँचकर उन्होंने शिवजीकी सभाका दर्शन किया।

वह ऊँची एवं उत्कृष्ट प्रभाववाली सभा प्रकाशयुक्त शरीरोंवाले शिव-पार्षदोंसे घिरी होनेके कारण विशेष-रूपसे शोभित हो रही थी।

उन पार्षदोंका रूप सुन्दर कान्तिसे युक्त महेश्वरके रूपके सदृश था।

उनके दस भुजाएँ थीं।

पाँच मुख और तीन नेत्र थे।

गलेमें नील चिह्न तथा शरीरका वर्ण अत्यन्त गौर था।

वे सभी श्रेष्ठ रत्नोंसे युक्त रुद्राक्ष और भस्मके आभरणसे विभूषित थे।

वह मनोहर सभा नवीन चन्द्रमण्डलके समान आकारवाली और चौकोर थी।

उत्तम-उत्तम मणियों तथा हीरोंके हारोंसे वह सजायी गयी थी।

अमूल्य रत्नोंके बने हुए कमलपत्रोंसे सुशोभित थी।

उसमें मणियोंकी जालियोंसे युक्त गवाक्ष बने थे, जिससे वह चित्र-विचित्र दीख रही थी।

शंकरकी इच्छासे उसमें पद्मरागमणि जड़ी हुई थी, जिससे वह अद्भुत-सी लग रही थी।

वह स्यमन्तकमणिकी बनी हुई सैकड़ों सीढ़ियोंसे युक्त थी।

उसमें चारों ओर इन्द्रनीलमणिके खंभे लगे थे, जिनपर स्वर्णसूत्रसे ग्रथित चन्दनके सुन्दर पल्लव लटक रहे थे, जिससे वह मनको मोहे लेती थी।

वह भलीभाँति संस्कृत तथा सुगन्धित वायुसे सुवासित थी।

एक सहस्र योजन विस्तारवाली वह सभा बहुत-से किंकरोंसे खचाखच भरी थी।

उसके मध्यभागमें अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित एक विचित्र सिंहासन था, उसीपर उमासहित शंकर विराजमान थे।

उन्हें सुरेश्वर विष्णुने देखा।

वे तारकाओंसे घिरे हुए चन्द्रमाके समान लग रहे थे।

वे किरीट, कुण्डल और रत्नोंकी मालाओंसे विभूषित थे।

उनके सारे अंगमें भस्म रमायी हुई थी और वे लीला-कमल धारण किये हुए थे।

महान् उल्लाससे भरे हुए उमाकान्तका मन शान्त तथा प्रसन्न था।

देवी पार्वतीने उन्हें सुवासित ताम्बूल प्रदान किया था, जिसे वे चबा रहे थे।

शिवगण हाथमें श्वेत चँवर लेकर परमभक्तिके साथ उनकी सेवा कर रहे थे और सिद्ध भक्तिवश सिर झुकाकर उनके स्तवनमें लगे थे।

वे गुणातीत, परेशान, त्रिदेवोंके जनक, सर्वव्यापी, निर्विकल्प, निराकार, स्वेच्छानुसार साकार, कल्याण-स्वरूप, मायारहित, अजन्मा, आद्य, मायाके अधीश्वर, प्रकृति और पुरुषसे भी परात्पर, सर्वसमर्थ, परिपूर्णतम और समतायुक्त हैं।

ऐसे विशिष्ट गुणोंसे युक्त शिवको देखकर ब्रह्मा और विष्णुने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और फिर वे स्तुति करने लगे।

विविध प्रकारसे स्तुति करके अन्तमें वे बोले – ‘भगवन्! आप दीनों और अनाथोंके सहायक, दीनोंके प्रतिपालक, दीनबन्धु, त्रिलोकीके अधीश्वर और शरणागतवत्सल हैं।

गौरीश! हमारा उद्धार कीजिये! परमेश्वर! हमपर कृपा कीजिये।

नाथ! हम आपके ही अधीन हैं; अब आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा करें।’
(अध्याय २९-३०)


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