शिव पुराण - रुद्र संहिता - युद्ध खण्ड - 5


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शिव पुराण संहिता लिंकविद्येश्वर | रुद्र संहिता | शतरुद्र | कोटिरुद्र | उमा | कैलास | वायवीय


देवोंके स्तवनसे शिवजीका कोप शान्त होना और शिवजीका उन्हें वर देना, मय दानवका शिवजीके समीप आना और उनसे वर-याचना करना, शिवजीसे वर पाकर मयका वितललोकमें जाना

व्यासजीने पूछा – महाबुद्धिमान् सनत्कुमारजी! आप तो ब्रह्माके पुत्र और शिवभक्तोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, अतः आप धन्य हैं।

अब यह बतलाइये कि त्रिपुरके दग्ध हो जानेपर सम्पूर्ण देवताओंने क्या किया? मय कहाँ गया और उन त्रिपुराध्यक्षोंकी क्या गति हुई? यदि यह वृत्तान्त शम्भुकी कथासे सम्बन्ध रखनेवाला हो तो वह सब विस्तारपूर्वक मुझसे वर्णन कीजिये।

सूतजी कहते हैं – मुने! व्यासजीका प्रश्न सुनकर सृष्टिकर्ता ब्रह्माके पुत्र भगवान् सनत्कुमार शिवजीके युगल चरणोंका स्मरण करके बोले।

सनत्कुमारजीने कहा – महाबुद्धिमान् व्यासजी! जब महेश्वरने दैत्योंसे खचाखच भरे हुए सम्पूर्ण त्रिपुरको भस्म कर दिया, तब सभी देवताओंको महान् आश्चर्य हुआ।

उस समय शंकरजीके महान् भयंकर रौद्र रूपको, जो करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान और प्रलयकालीन अग्निकी भाँति तेजस्वी था तथा जिसके तेजसे दसों दिशाएँ प्रज्वलित-सी दीख रही थीं, देखकर साथ ही हिमाचलपुत्री पार्वतीदेवीकी ओर दृष्टिपात करके सम्पूर्ण देवता भयभीत हो गये।

तब मुख्य-मुख्य देवता विनम्र होकर सामने खड़े हो गये।

उस अवसरपर बड़े-बड़े ऋषि भी देवताओंकी वाहिनीको भयभीत देखकर खड़े ही रह गये, कुछ बोल न सके।

वे चारों ओरसे शम्भुको प्रणाम करने लगे।

तत्पश्चात् ब्रह्मा भी शिवजीके उस रूपको देखकर भयग्रस्त हो गये।

तब उन्होंने डरे हुए विष्णु तथा देवगणोंके साथ प्रसन्न मनसे सावधानीपूर्वक उन गिरिजासहित महेश्वरका, जो देवोंके भी देव, भव तथा हरनामसे प्रसिद्ध, भक्तोंके अधीन रहनेवाले और त्रिपुरहन्ता हैं, स्तवन किया।

तदनन्तर सभी प्रमुख देवताओंने भगवान् शिवकी स्तुति की।

यों स्तुति किये जानेपर लोकोंके कल्याणकर्ता शंकर प्रसन्न होकर बोले।

शंकरजीने कहा – ब्रह्मा, विष्णु तथा देवगण! मैं तुमलोगोंपर विशेषरूपसे प्रसन्न हूँ, अतः अब तुम सभी विचार करके अपना मनोवांछित वर माँग लो।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनिश्रेष्ठ! शिवद्वारा कहे हुए वचनको सुनकर सभी देवताओंका मन प्रसन्नतासे खिल उठा।

फिर तो वे बोल उठे।

देवताओंने कहा – भगवन्! देवदेवेश! यदि आप हमपर प्रसन्न हैं और हम देव-गणोंको अपना दास समझकर वर देना चाहते हैं तो देवसत्तम! जब-जब देवताओंपर दुःखकी सम्भावना हो, तब-तब आप प्रकट होकर सदा उनके दुःखोंका विनाश करते रहें।

सनत्कुमारजी कहते हैं – महर्षे! जब ब्रह्मा, विष्णु और देवताओंने भगवान् रुद्रसे ऐसी प्रार्थना की, तब वे शान्त तथा प्रसन्न होकर एक साथ ही सबसे बोले – ‘अच्छा, सदा ऐसा ही होगा।’ ऐसा कहकर शंकरजीने, जो सदा देवोंका दुःख हरण करनेवाले हैं, प्रसन्नतापूर्वक देवोंको जो कुछ अभीष्ट था, वह सारा-का-सारा उन्हें प्रदान कर दिया।

इसी समय मय दानव, जो शिवजीकी कृपाके बलसे जलनेसे बच गया था, शम्भुको प्रसन्न देखकर हर्षित मनसे वहाँ आया।

उसने विनीतभावसे हाथ जोड़कर प्रेमपूर्वक हर तथा अन्यान्य देवोंको भी प्रणाम किया।

फिर वह शिवजीके चरणोंमें लोट गया।

तत्पश्चात् दानवश्रेष्ठ मयने उठकर शिवजीकी ओर देखा।

उस समय प्रेमके कारण उसका गला भर आया और वह भक्तिपूर्ण चित्तसे उनकी स्तुति करने लगा।

द्विजश्रेष्ठ! मयद्वारा किये गये स्तवनको सुनकर परमेश्वर शिव प्रसन्न हो गये और आदरपूर्वक उससे बोले।

शिवजीने कहा – दानवश्रेष्ठ मय! मैं तुझपर प्रसन्न हूँ, अतः तू वर माँग ले।

इस समय जो कुछ भी तेरे मनकी अभिलाषा होगी, उसे मैं अवश्य पूर्ण करूँगा।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! शम्भुके इस मंगलमय वचनको सुनकर दानवश्रेष्ठ मयने अंजलि बाँधकर विनम्र हो उन प्रभुके चरणोंमें नमस्कार करके कहा।

मय बोला – देवाधिदेव महादेव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और मुझे वर पानेका अधिकारी समझते हैं तो अपनी शाश्वती भक्ति प्रदान कीजिये।

परमेश्वर! मैं सदा अपने भक्तोंसे मित्रता रखूँ, दीनोंपर सदा मेरा दयाभाव बना रहे और अन्यान्य दुष्ट प्राणियोंकी मैं उपेक्षा करता रहूँ।

महेश्वर! कभी भी मुझमें आसुर भावका उदय न हो।

नाथ! निरन्तर आपके शुभ भजनमें तल्लीन रहकर निर्भय बना रहूँ।

सनत्कुमारजी कहते हैं – व्यासजी! शंकर तो सबके स्वामी तथा भक्तवत्सल हैं।

मयने जब इस प्रकार उन परमेश्वरकी प्रार्थना की, तब वे प्रसन्न होकर मयसे बोले।

महेश्वरने कहा – दानवसत्तम! तू मेरा भक्त है, तुझमें कोई भी विकार नहीं है; अतः तू धन्य है।

अब मैं तेरा जो कुछ भी अभीष्ट वर है, वह सारा-का-सारा तुझे प्रदान करता हूँ।

अब तू मेरी आज्ञासे अपने परिवारसहित वितललोकको चला जा।

वह स्वर्गसे भी रमणीय है।

तू वहाँ प्रसन्न-चित्तसे मेरा भजन करते हुए निर्भय होकर निवास कर।

मेरी आज्ञासे कभी भी तुझमें आसुर भावका प्राकट्य नहीं होगा।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! मयने महात्मा शंकरकी उस आज्ञाको सिर झुकाकर स्वीकार किया और उन्हें तथा अन्यान्य देवोंको भी प्रणाम करके वह वितललोकको चला गया।

तदनन्तर महादेवजी देवताओंके उस महान् कार्यको पूर्ण करके देवी पार्वती, अपने पुत्र और सम्पूर्ण गणोंसहित अन्तर्धान हो गये।

जब परिवारसमेत भगवान् शंकर अन्तर्हित हो गये, तब वह धनुष, बाण, रथ आदि सारा उपकरण भी अदृश्य हो गया।

तत्पश्चात् ब्रह्मा, विष्णु तथा अन्यान्य देव, मुनि, गन्धर्व, किंनर, नाग, सर्प, अप्सरा और मनुष्योंको महान् हर्ष प्राप्त हुआ।

वे सभी शंकरजीके उत्तम यशका बखान करते हुए आनन्दपूर्वक अपने-अपने स्थानको चले गये।

वहाँ पहुँचकर उन्हें परम सुखकी प्राप्ति हुई।

महर्षे! इस प्रकार मैंने शशिमौलि शंकरजीका विशाल चरित, जो त्रिपुरविनाशको सूचित करनेवाला तथा परमोत्कृष्ट लीलासे युक्त है, सारा-का-सारा तुम्हें सुना दिया।

(अध्याय ११-१२)


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