शिव पुराण - रुद्र संहिता - युद्ध खण्ड - 4


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शिव पुराण संहिता लिंकविद्येश्वर | रुद्र संहिता | शतरुद्र | कोटिरुद्र | उमा | कैलास | वायवीय


सर्वदेवमय रथका वर्णन, शिवजीका उस रथपर चढ़कर युद्धके लिये प्रस्थान, उनका पशुपति नाम पड़नेका कारण, शिवजीद्वारा गणेशका पूजन और त्रिपुर-दाह, मयदानवका त्रिपुरसे जीवित बच निकलना

व्यासजीने कहा – शैवप्रवर सनत्कुमारजी! आपकी बुद्धि बड़ी उत्तम है, आप सर्वज्ञ हैं।

तात! आपने परमेश्वर शिवकी जो कथा सुनायी है, वह अत्यन्त अद्भुत है।

अब बुद्धिमान् विश्वकर्माने शिवजीके लिये जिस देवमय एवं परमोत्कृष्ट दिव्य रथका निर्माण किया था, उसका वर्णन कीजिये।

सूतजी कहते हैं – मुने! व्यासजीकी यह बात सुनकर मुनीश्वर सनत्कुमार शिवजीके चरणकमलोंका स्मरण करके बोले।

सनत्कुमारजीने कहा – महाबुद्धिमान् मुनिवर व्यासजी! मैं शिवजीके पाद-पद्मोंका स्मरण करके अपनी बुद्धिके अनुसार रथकी निर्माण-कथाका वर्णन करता हूँ, सुनो! तदनन्तर विश्वकर्माने रुद्रदेवके लिये बड़े यत्नसे आदरपूर्वक सर्वलोकमय दिव्य रथकी रचना की।

वह सर्वसम्मत तथा सर्वभूतमय रथ सुवर्णका बना हुआ था।

उसके दाहिने चक्रमें सूर्य और वामचक्रमें चन्द्रमा विराजमान थे।

दाहिने चक्रमें बारह अरे लगे हुए थे, जिनमें बारहों सूर्य प्रतिष्ठित थे और बायाँ पहिया सोलह अरोंसे युक्त था, जिनमें चन्द्रमाकी सोलह कलाएँ विराजमान थीं।

उत्तम व्रतका पालन करनेवाले विप्रेन्द्र! अश्विनी आदि सभी सत्ताईसों नक्षत्र भी उस वामचक्रकी ही शोभा बढ़ा रहे थे।

विप्रश्रेष्ठ! छहों ऋतुएँ उन दोनों पहियोंकी नेमि बनीं।

अन्तरिक्ष रथका अग्रभाग हुआ और मन्दराचलने रथकी बैठकका स्थान ग्रहण किया।

उदयाचल और अस्ताचल – ये दोनों उस रथके कूबर हुए।

महामेरु अधिष्ठान हुआ और शाखापर्वत उसके आश्रयस्थान हुए।

संवत्सर उस रथका वेग, उत्तरायण और दक्षिणायन – दोनों लोहधारक, मुहूर्त बन्धुर (रस्सा), कलाएँ उसकी कीलें हुईं।

काष्ठाएँ उसका घोणा (नासिकारूप अग्रभाग), क्षण अक्षदण्ड, निमेष अनुकर्ष (नीचेका काष्ठ) और लव ईषादण्ड हुए।

द्युलोक इस रथका वरूथ (ऊपरी पर्दा) तथा स्वर्ग और मोक्ष ध्वजाएँ हुईं।

अभ्रमु (ऐरावतकी पत्नी) और कामधेनु जुएके अन्तिम छोरपर स्थित हुए।

अव्यक्त (प्रकृति) उसका ईषादण्ड, बुद्धि नड्वल, अहंकार कोना और पंच महाभूत उसका बल थे।

मुनिश्रेष्ठ! इन्द्रियाँ उसे चारों ओरसे विभूषित कर रही थीं और श्रद्धा उस रथकी चाल थी।

उस समय वेदोंके छहों अंग ही उसके भूषण और पुराण, न्याय, मीमांसा तथा धर्मशास्त्र उपभूषण हुए।

सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे युक्त बलसम्पन्न श्रेष्ठ मन्त्र घण्टाके स्थानापन्न हुए और वर्ण तथा आश्रम उसके पाद बने।

सहस्र फणोंसे सुशोभित शेषनाग बन्धनरज्जु हुए और दिशाएँ तथा उपदिशाएँ उसके पाद बनीं।

पुष्कर आदि तीर्थोंने रत्नजटित स्वर्णमय पताकाओंका स्थान ग्रहण किया और चारों समुद्र उस रथके आच्छादन-वस्त्र बने।

गंगा आदि सभी श्रेष्ठ सरिताओंने सुन्दरी स्त्रियोंका रूप धारण किया और समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो हाथमें चँवर ले यत्र-तत्र स्थित होकर वे रथकी शोभा बढ़ाने लगीं।

आवह आदि सातों वायुओंने स्वर्णमय उत्तम सोपानका काम सँभाला।

लोकालोक पर्वत उसके चारों ओरका उपसोपान और मानस आदि सरोवर उसके सुन्दर बाहरी विषमस्थान हुए।

सारे वर्षाचल उसके चारों ओरके पाश बने और नीचेके लोकोंके निवासी उस रथका तलभाग हुए।

देवाधिदेव भगवान् ब्रह्मा लगाम पकड़नेवाले सारथि हुए और ब्रह्मदैवत ॐकार उन ब्रह्मदेवका चाबुक हुआ।

अकारने विशाल छत्रका रूप धारण किया।

मन्दराचल पार्श्वभागका दण्ड हुआ।

शैलराज हिमालय धनुष और स्वयं नागराज शेष उसकी प्रत्यंचा बने।

श्रुतिरूपिणी सरस्वती देवी उस धनुषकी घण्टा हुईं और महातेजस्वी विष्णु बाण तथा अग्नि उस बाणके नोक बने।

मुने! चारों वेद उस रथमें जुतनेवाले चार घोड़े कहे गये हैं।

इसके बाद शेष बची हुई ज्योतियाँ उन अश्वोंकी आभूषण हुईं।

विषसे उत्पन्न हुई वस्तुओंने सेनाका रूप धारण किया, वायु बाजा बजानेवाले और व्यास आदि मुख्य-मुख्य ऋषि वाहवाहक हुए।

मुनीश्वर! अधिक कहनेसे क्या लाभ, मैं संक्षेपमें ही बतलाता हूँ कि ब्रह्माण्डमें जो कुछ वस्तु थी, वह सब उस रथमें विद्यमान थी।

इस प्रकार बुद्धिमान् विश्वकर्माने ब्रह्मा और विष्णुकी आज्ञासे उस शुभ रथका तथा रथसामग्रीका निर्माण किया था।

सनत्कुमारजी कहते हैं – महर्षे! इस प्रकारके महान् दिव्य रथमें, जो अनेकविध आश्चर्योंसे युक्त था, वेदरूपी अश्वोंको जोतकर ब्रह्माने उसे शिवको समर्पित कर दिया।

शम्भुको निवेदित करनेके पश्चात् जो विष्णु आदि देवोंके सम्माननीय एवं त्रिशूल धारण करनेवाले हैं, उन देवेश्वरकी प्रार्थना करके ब्रह्माजी उन्हें उस रथपर चढ़ाने लगे।

तब महान् ऐश्वर्यशाली सर्वदेवमय शम्भु रथसामग्रीसे युक्त उस दिव्य रथपर आरूढ़ हुए।

उस समय ऋषि, देवता, गन्धर्व, नाग, लोकपाल और ब्रह्मा, विष्णु भी उनकी स्तुति कर रहे थे।

गानविद्याविशारद अप्सराओंके गण उन्हें घेरे हुए थे।

सारथिके स्थानपर ब्रह्माको देखकर उन वरदायक शम्भुकी विशेष शोभा हुई।

लोककी सारी वस्तुओंसे कल्पित उस रथपर शिवजी चढ़ ही रहे थे कि वेदसम्भूत वे घोड़े सिरके बल भूमिपर गिर पड़े।

पृथ्वीमें भूकम्प आ गया।

सारे पर्वत डगमगाने लगे।

सहसा शेषनाग शिवजीका भार न सह सकनेके कारण आतुर हो काँप उठे।

तब उसी क्षण भगवान् धरणीधरने उठकर नन्दीश्वरका रूप धारण किया और रथके नीचे जाकर उसे ऊपरको उठाया; परंतु नन्दीश्वर भी रथारूढ़ महेशके उस उत्तम तेजको सहन न कर सके, अतः उन्होंने तत्काल ही पृथ्वीपर घुटने टेक दिये।

तत्पश्चात् भगवान् ब्रह्माने शिवजीकी आज्ञासे हाथमें चाबुक ले घोड़ोंको उठाकर उस श्रेष्ठ रथको खड़ा किया।

तदनन्तर महेशद्वारा अधिष्ठित उस उत्तम रथमें बैठे हुए ब्रह्माजीने रथमें जुते हुए मन और वायुके समान वेगशाली वेदमय अश्वोंको उन तपस्वी दानवोंके आकाशस्थित तीनों पुरोंको लक्ष्य करके आगे बढ़ाया।

तत्पश्चात् लोकोंके कल्याणकर्ता भगवान् रुद्र देवोंकी ओर दृष्टिपात करके कहने लगे – ‘सुरश्रेष्ठो! यदि तुमलोग देवों तथा अन्य प्राणियोंके विषयमें पृथक्-पृथक् पशुत्वकी कल्पना करके उन पशुओंका आधिपत्य मुझे प्रदान करोगे, तभी मैं उन असुरोंका संहार करूँगा; क्योंकि वे दैत्यश्रेष्ठ तभी मारे जा सकते हैं, अन्यथा उनका वध असम्भव है।’ सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! अगाध बुद्धिसम्पन्न देवाधिदेव भगवान् शंकरकी यह बात सुनकर सभी देवता पशुत्वके प्रति सशंकित हो उठे, जिससे उनका मन खिन्न हो गया।

तब उनके भावको समझकर देवदेव अम्बिकापति शम्भु करुणार्द्र हो गये।

फिर वे हँसकर उन देवताओंसे इस प्रकार बोले।

शम्भुने कहा – देवश्रेष्ठो! पशुभाव प्राप्त होनेपर भी तुमलोगोंका पतन नहीं होगा।

मैं उस पशुभावसे विमुक्त होनेका उपाय बतलाता हूँ, सुनो और वैसा ही करो।

समाहित मनवाले देवताओ! मैं तुमलोगोंसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ कि जो इस दिव्य पाशुपतव्रतका पालन करेगा, वह पशुत्वसे मुक्त हो जायगा।

सुरश्रेष्ठो! तुम्हारे अतिरिक्त जो अन्य प्राणी भी मेरे पाशुपतव्रतको करेंगे, वे भी निस्संदेह पशुत्वसे छूट जायँगे।

जो नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए बारह वर्षतक, छः वर्षतक अथवा तीन वर्षतक मेरी सेवा करेगा अथवा करायेगा, वह पशुत्वसे विमुक्त हो जायगा।

इसलिये श्रेष्ठ देवताओ! तुमलोग भी जब इस परमोत्कृष्ट दिव्य व्रतका पालन करोगे तो उसी समय पशुत्वसे मुक्त हो जाओगे – इसमें कुछ भी संशय नहीं है।

सनत्कुमारजी कहते हैं – महर्षे! परमात्मा महेश्वरका वचन सुनकर विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओंने कहा – ‘तथेति’ – बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा।

इसीलिये बड़े-बड़े देवता तथा असुर भगवान् शंकरके पशु बने और पशुत्वरूपी पाशसे विमुक्त करनेवाले रुद्र पशुपति हुए।

तभीसे महेश्वरका ‘पशुपति’ यह नाम विश्वमें विख्यात हो गया।

यह नाम समस्त लोकोंमें कल्याण प्रदान करनेवाला है।

उस समय सम्पूर्ण देवता तथा ऋषि हर्षमग्न होकर जय-जयकार करने लगे और देवेश्वर ब्रह्मा, विष्णु तथा अन्यान्य प्राणी भी परमानन्दमग्न हो गये।

उस अवसरपर महात्मा शिवका जैसा रूप प्रकट हुआ था, उसका वर्णन सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं हो सकता।

तदनन्तर जो शिवा तथा सम्पूर्ण जगत् के स्वामी और समस्त प्राणियोंके सुख प्रदान करनेवाले हैं, वे महेश्वर यों सुसज्जित होकर त्रिपुरका संहार करनेके लिये प्रस्थित हुए।

जिस समय देवदेव महादेव त्रिपुरका विनाश करनेके लिये चले, उस अवसरपर देवराज आदि सभी प्रधान-प्रधान देवता भी उनके साथ प्रस्थित हुए।

पर्वतके समान विशालकाय उन सुरेश्वरोंका मन प्रसन्न था, वे सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे।

वे सभी हाथोंमें हल, शाल, मुसल, भुशुण्डि और नाना प्रकारके पर्वत-जैसे विशाल आयुधोंको धारण करके हाथी, घोड़े, सिंह, रथ और बैलोंपर सवार हो चल रहे थे।

उस समय जिनके शरीर परम प्रकाशमान थे और मन महान् उत्साहसे सम्पन्न थे तथा जो नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थे, वे इन्द्र, ब्रह्मा और विष्णु आदि देव शम्भुकी जय-जयकार बोलते हुए महेश्वरके आगे-आगे चले।

सभी दण्डी एवं जटाधारी मुनि हर्ष मनाने लगे और आकाशचारी सिद्ध तथा चारण पुष्पोंकी वृष्टि करने लगे।

विप्रेन्द्र! त्रिपुरकी यात्रा करते समय जितने गणेश्वर शिवजीके साथ थे, उनकी गणना करके कौन पार पा सकता है; तथापि मैं कुछका वर्णन करता हूँ।

योगिन्! समस्त गणराजोंमें श्रेष्ठ भृंगी गणेश्वरों तथा देवगणोंसे घिरकर विमानपर आरूढ़ हो महेन्द्रकी भाँति त्रिपुरका विनाश करनेके लिये चले।

उनके साथ-साथ केश, विगतवास, महाकेश, महाज्वर, सोमवल्ली-सवर्ण, सोमप, सनक, सोमधृक्, सूर्यवर्चा, सूर्यप्रेक्षणक, सूर्याक्ष, सूरिनामा, सुर, सुन्दर, प्रस्कन्द, कुन्दर, चण्ड, कम्पन, अतिकम्पन, इन्द्र, इन्द्रजय, यन्ता, हिमकर, शताक्ष, पंचाक्ष, सहस्राक्ष, महोदर, सतीजहु, शतास्य, रंक, कर्पूरपूतन, द्विशिख, त्रिशिख, अहंकार-कारक, अजवक्त्र, अष्टवक्त्र, हयवक्त्र, अर्धवक्त्र आदि बहुत-से अप्रमेय बलशाली वीर गणाध्यक्ष लक्ष्य-लक्षणकी परवाह न करते हुए महेश्वरको घेरकर चल रहे थे।

व्यासजी! तदनन्तर महादेव शम्भु सम्पूर्ण सामग्रियोंसहित उस रथपर स्थित हो उन सुरद्रोहियोंके तीनों पुरोंको पूर्णतया दग्ध करनेके लिये उद्यत हुए।

उन्होंने रथके शीर्ष-स्थानपर स्थित हो उस महान् अद्भुत धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ायी और उसपर उत्तम बाणका संधान करके वे रोषावेशसे होठको चाटने लगे।

फिर धनुषकी मूठको दृढ़ता-पूर्वक पकड़कर और दृष्टिमें दृष्टि मिलाकर वे वहाँ अचलभावसे खड़े हो गये।

परंतु उनके अँगूठेके अग्रभागमें स्थित होकर गणेश निरन्तर पीड़ा ही पहुँचाते रहे, जिससे वे तीनों पुर त्रिशूलधारी शंकरका लक्ष्य नहीं बन सके।

तब धनुष-बाणधारी मुंजकेश विरूपाक्ष शंकरने परम शोभन आकाश-वाणी सुनी।

(उस व्योमवाणीने कहा – ) ‘ऐश्वर्यशाली जगदीश्वर! जबतक आप इन गणेशकी अर्चना नहीं कर लेंगे, तबतक इन तीनों पुरोंका संहार नहीं कर सकेंगे।’ तब ऐसी बात सुनकर अन्धकासुरके निहन्ता भगवान् शिवने भद्रकालीको बुलाकर गजाननका पूजन किया।

जब हर्षपूर्वक विधि-विधानसहित अग्रभागमें स्थित उन विनायककी पूजा की गयी, तब वे प्रसन्न हो गये।

फिर तो भगवान् शंकरको उन तारकपुत्र महामनस्वी दैत्योंके तीनों नगर यथोक्तरूपसे आकाशमें स्थित दीख पड़े।

इस विषयमें कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि जब शिवजी स्वयं स्वतन्त्र, परब्रह्म, सगुण, निर्गुण, सबके द्वारा अलक्ष्य, स्वामी, परमात्मा, निरंजन, पंचदेवमय, पंचदेवोंके उपास्य और परात्पर प्रभु हैं, वे ही सबके उपास्य हैं, उनका उपास्य कोई नहीं है, तब सबके वन्दनीय परब्रह्मस्वरूप उन देवेश्वर महेश्वरके विषयमें यह बात उचित नहीं जान पड़ती कि उनकी कार्यसिद्धि अन्यकी कृपापर अवलम्बित हो।

परंतु मुने! उन देवाधिदेव वरदानी महेश्वरके चरित्रमें लीलावश सब कुछ घटित हो सकता है।

अस्तु! इस प्रकार जब गणाधिपका पूजन करके महादेवजी स्थित हुए, तब वे तीनों पुर कालवश शीघ्र ही एकताको प्राप्त हो गये।

मुने! उन त्रिपुरोंके परस्पर मिलकर एक हो जानेपर महान् आत्मबलसे सम्पन्न देवताओंको महान् हर्ष हुआ।

तब सम्पूर्ण देवगण, सिद्ध और परमर्षि अष्टमूर्तिधारी शिवकी स्तुति करके उच्चस्वरसे जय-जयकार करने लगे।

उस समय ब्रह्मा और जगदीश्वर विष्णुने कहा – ‘महेश्वर! तारकके पुत्र उन त्रिपुरनिवासी दैत्योंके वधका समय भी आ गया है।

विभो! इसीलिये ये पुर एकताको प्राप्त हो गये हैं।

अतः देवेश! जबतक ये त्रिपुर पुनः विलग हों उसके पहले ही आप बाण छोड़कर इन्हें भस्म कर डालिये और देवताओंका कार्य सिद्ध कीजिये।’ मुने! तदनन्तर शिवजीने धनुषकी डोरी चढ़ाकर उसपर पूज्य पाशुपतास्त्र नामक बाणका संधान किया और उसे वे त्रिपुरपर छोड़नेका विचार करने लगे।

शंकरजीने जिस समय अपने अद्भुत धनुषको खींचा था, उस समय अभिजित् मुहूर्त चल रहा था।

उन्होंने धनुषकी टंकार तथा दुस्सह सिंहनाद करके अपना नाम घोषित किया और उन महासुरोंको ललकारकर करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान उस भीषण बाणको उनपर छोड़ दिया।

तब जिसके नोकपर अग्निदेव प्रतिष्ठित थे और जो विशेषरूपसे पापका विनाशक तथा विष्णुमय था; उस महान् जाज्वल्यमान शीघ्रगामी बाणने उन त्रिपुरनिवासी दैत्योंको दग्ध कर दिया।

तत्पश्चात् वे तीनों पुर भी भस्म हो गये और एक साथ ही चारों समुद्रोंरूपी मेखलावाली भूमिपर गिर पड़े।

उस समय शिवजीकी पूजाका अतिक्रमण कर देनेके कारण सैकड़ों दैत्य उस बाणस्थित अग्निसे जलकर हाहाकार मचा रहे थे।

जब भाइयोंसहित तारकाक्ष जलने लगा, तब उसने अपने स्वामी भक्तवत्सल भगवान् शंकरका स्मरण किया और मन-ही-मन महादेवको देखकर परम भक्तिपूर्वक नाना प्रकारसे विलाप करता हुआ वह उनसे कहने लगा।

तारकाक्ष बोला – ‘भव! आप हमपर प्रसन्न हैं, यह हमें ज्ञात हो गया है।

इस सत्यके प्रभावसे आप फिर कब भाइयों-सहित हमको दग्ध करेंगे।

भगवन्! जो देवता और असुरोंके लिये अप्राप्य है, वह (आपके हाथसे मरणरूप) दुर्लभ लाभ हमें प्राप्त हो गया।

अब जिस-जिस योनिमें हम जन्म धारण करें, वहाँ हमारी बुद्धि आपकी भक्तिसे भावित रहे।’ मुने! यों वे दैत्य विलाप कर ही रहे थे कि शिवजीकी आज्ञासे उस अग्निने उन्हें अद्भुत रीतिसे जलाकर राखकी ढेरी बना दिया।

व्यासजी! और भी जो बालक और वृद्ध दानव थे, वे शिवाज्ञानुसार उस अग्निद्वारा शीघ्र ही जलकर भस्म हो गये।

यहाँतक कि उन त्रिपुरोंमें जितनी स्त्रियाँ और पुरुष थे, वे सब-के-सब उस अग्निसे उसी प्रकार दग्ध हो गये जैसे कल्पान्तमें जगत् भस्म हो जाता है।

उस समय उस भीषण अग्निसे कोई भी स्थावर-जंगम बिना जले नहीं बचा, किंतु असुरोंका विश्वकर्मा अविनाशी मय बच गया; क्योंकि वह देवोंका अविरोधी, शम्भुके तेजसे सुरक्षित और सद्भक्त था।

विपत्तिके अवसरपर भी वह महेश्वरका शरणागत बना रहता था।

जिन दैत्यों तथा अन्य प्राणियोंका भाव-अभाव अथवा कृत-अकृतके प्राप्त होनेपर नाशकारक पतन नहीं होता, वे विनाशसे बचे रहते हैं।

इसलिये सत्पुरुषोंको अत्यन्त सम्भावित – उत्तम कर्मके लिये ही प्रयत्न करना चाहिये; क्योंकि निन्दित कर्म करनेसे प्राणीका विनाश हो जाता है।

अतः गर्हित कर्मका आचरण भूलकर भी न करे*।

उस समय भी जो दैत्य बन्धु-बान्धवोंसहित शिवजीकी पूजामें तत्पर थे, वे सब-के-सब शिवपूजाके प्रभावसे (दूसरे जन्ममें) गणोंके अधिपति हो गये।

(अध्याय ९-१०) * तस्माद् यत्नः सुसम्भाव्यः सद्भिः कर्तव्य एव हि।

गर्हणात् क्षीयते लोको न तत्कर्म समाचरेत्।।

(शि० पु०, रु० सं०, युद्धखं० १०।४२)


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