शिव पुराण - रुद्र संहिता - युद्ध खण्ड - 3


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शिव पुराण संहिता लिंकविद्येश्वर | रुद्र संहिता | शतरुद्र | कोटिरुद्र | उमा | कैलास | वायवीय


देवोंका शिवजीके पास जाकर उनका स्तवन करना, शिवजीके त्रिपुरवधके लिये उद्यत न होनेपर ब्रह्मा और विष्णुका उन्हें समझाना, विष्णुके बतलाये हुए शिव-मन्त्रका देवोंद्वारा तथा विष्णुद्वारा जप, शिवजीकी प्रसन्नता और उनके लिये विश्वकर्माद्वारा सर्वदेवमय रथका निर्माण

व्यासजीने पूछा – सनत्कुमारजी! जब भाइयों तथा पुरवासियोंसहित उस दैत्यराजकी बुद्धि विशेषरूपसे मोहाच्छन्न हो गयी, तब उसके बाद कौन-सी घटना घटी? विभो! वह सारा वृत्तान्त वर्णन कीजिये।

सनत्कुमारजीने कहा – महर्षे! जब तीनों पुरोंकी पूर्वोक्त दशा हो गयी, दैत्योंने शिवार्चनका परित्याग कर दिया, सम्पूर्ण स्त्री-धर्म नष्ट हो गया और चारों ओर दुराचार फैल गया, तब भगवान् विष्णु और ब्रह्माके साथ सब देवता कैलास पर्वतपर गये और सुन्दर शब्दोंमें शिवकी स्तुति करने लगे – ‘महेश्वर देव! आप परमोत्कृष्ट आत्मबलसे सम्पन्न हैं; आप ही सृष्टिके कर्ता ब्रह्मा, पालक विष्णु और संहर्ता रुद्र हैं; परब्रह्मस्वरूप आपको नमस्कार है।’ यों महादेवजीका स्तवन करके देवोंने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया।

फिर भगवान् विष्णुने जलमें खड़े होकर अपने स्वामी परमेश्वर शिवका मन-ही-मन स्मरण करके तन्मय हो दक्षिणामूर्तिके द्वारा प्रकटित रुद्रमन्त्रका डेढ़ करोड़की संख्यातक जप किया।

तबतक सभी देवता उन महेश्वरमें मन लगाकर यों उनकी स्तुति करते रहे।

देवोंने कहा – प्रभो! आप समस्त प्राणियोंके आत्मस्वरूप, कल्याणकर्ता और भक्तोंकी पीड़ा हरनेवाले हैं।

आपके गलेमें नीला चिह्न है, जिससे आप नीलकण्ठ कहलाते हैं।

आप चिद्रूप एवं प्रचेता हैं, आप रुद्रको हमारा प्रणाम है।

असुरनिकन्दन! आप ही हमारी सारी आपत्तियोंके निवारण करनेवाले हैं, अतः सदासे आप ही हमारी गति हैं और आप ही सर्वदा हमलोगोंके वन्दनीय हैं।

आप सबके आदि हैं और आप ही अनादि भी हैं।

आप ही आनन्दस्वरूप, अव्यय, प्रभु, प्रकृति-पुरुषके भी साक्षात् स्रष्टा और जगदीश्वर हैं।

आप ही रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणके आश्रयसे ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र होकर जगत् के कर्ता, भर्ता और संहारक बनते हैं।

आप ही इस भवसागरसे तारनेवाले हैं।

आप समस्त प्राणियोंके स्वामी, अविनाशी, वरदाता, वाङ् मयस्वरूप, वेदप्रतिपाद्य और वाच्य-वाचकतासे रहित हैं।

योगवेत्ता योगी आप ईशानसे मुक्तिकी याचना करते हैं।

आप योगियोंके हृदयकमलकी कर्णिकापर विराजमान रहते हैं।

वेद और संतजन कहते हैं कि आप परब्रह्मस्वरूप, तत्त्वरूप, तेजोराशि और परात्पर हैं।

शर्व! आप सर्वव्यापी, सर्वात्मा और त्रिलोकीके अधिपति हैं।

भव! इस जगत् में जिसे परमात्मा कहा जाता है, वह आप ही हैं।

जगद् गुरो! इस जगत् में जिसे देखने, सुनने, स्तवन करने तथा जाननेयोग्य बताया जाता है और जो अणुसे भी सूक्ष्म तथा महान् से भी महान् है, वह आप ही हैं।

आप चारों ओर हाथ, पैर, नेत्र, सिर, मुख, कान और नाकवाले हैं; अतः आपको चारों ओरसे नमस्कार है।

सर्वव्यापिन्! आप सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, अनावृत और विश्वरूप हैं; आप विरूपाक्षको सब ओरसे अभिवादन है।

आप सर्वेश्वर, भवाध्यक्ष, सत्यमय, कल्याणकर्ता, अनुपमेय और करोड़ों सूर्योंके समान प्रभावशाली हैं; आपको हम चारों ओरसे दण्डवत्-प्रणाम करते हैं।

विश्वाराध्य, आदि-अन्तशून्य, छब्बीसवें तत्त्व, नियामकरहित तथा समस्त प्राणियोंको अपने-अपने कार्योंमें प्रवृत्त करनेवाले आपको हमारा सब ओरसे प्रणाम है।

आप प्रकृतिके भी प्रवर्तक, सबके प्रपितामह और समस्त शरीरोंमें व्याप्त हैं; आप परमेश्वरको हमारा नमस्कार है।

श्रुतियाँ तथा श्रुतितत्त्वके ज्ञाता विज्ञजन आपको वरदायक, समस्त भूतोंमें निवास करनेवाला, स्वयम्भू और श्रुतितत्त्वज्ञ बतलाते हैं।

नाथ! आपने जगत् में अनेकों ऐसे कार्य किये हैं, जो हमारी समझसे परे हैं; इसीलिये देवता, असुर, ब्राह्मण और अन्यान्य स्थावर-जंगम भी आपकी ही स्तुति करते हैं।

शम्भो! त्रिपुरवासी दैत्योंने हमें प्रायः नष्ट-सा कर डाला है, अतः आप शीघ्र ही उन असुरोंका विनाश करके हमारी रक्षा कीजिये; क्योंकि देववल्लभ! हम देवोंके एकमात्र आप ही गति हैं।

परमेश्वर! इस समय वे आपकी मायासे मोहित हो गये हैं, अतः प्रभो! वे भगवान् विष्णुद्वारा बतायी हुई युक्तिके चक्रमें फँसकर सारा धर्म-कर्म छोड़ बैठे हैं।

भक्तवत्सल! हमारे सौभाग्यवश इस समय उन दैत्योंने सम्पूर्ण धर्मोंका परित्याग कर दिया है और नास्तिक शास्त्रका आश्रय ले रखा है।

शरणदाता! आप सदासे देवताओंका कार्य करते आये हैं, इसीलिये आज भी हमलोग आपके शरणापन्न हुए हैं।

अब आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा कीजिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनिवर! इस प्रकार महेश्वरका स्तवन करके देवगण दीनभावसे अंजलि बाँधकर सामने खड़े हो गये।

उस समय उनके मस्तक झुके हुए थे।

इस प्रकार जब सुरेन्द्र आदि देवोंने महेश्वरकी स्तुति की और विष्णुने ईशान-सम्बन्धी मन्त्रका जप किया, तब सर्वेश्वर भगवान् शिव प्रसन्न हो गये और वृषपर सवार हो वहीं प्रकट हो गये।

उस समय पार्वतीपति शिवका मन प्रसन्न था।

उन्होंने नन्दीश्वरकी पीठसे उतरकर विष्णुका आलिंगन किया और फिर वे नन्दीपर हाथ टेककर खड़े हो गये और सम्पूर्ण देवताओंकी ओर कृपाभरी दृष्टिसे देखकर गम्भीर वाणीमें श्रीहरिसे बोले।

शिवजीने कहा – देवश्रेष्ठ! उन अधर्मनिष्ठ दैत्योंके तीनों पुरोंको मैं नष्ट कर डालूँगा – इसमें संशय नहीं है; परंतु वे महादैत्य मेरे भक्त थे और उनका मन सुदृढ़ रूपसे मुझमें लगा रहता था; अतः यद्यपि इस समय उन्होंने व्याजवश उत्तम धर्मका परित्याग कर दिया है, तथापि क्या वे मेरे ही द्वारा मारनेयोग्य हैं? इसलिये जिन्होंने त्रिपुरवासी सारे दैत्योंको धर्मभ्रष्ट करके मेरी भक्तिसे विमुख कर दिया है, वे विष्णु अथवा अन्य कोई ही उन्हें क्यों नहीं मारते? मुनीश्वर! शम्भुके ये वचन सुनकर उन समस्त देवताओंका तथा श्रीहरिका भी मन उदास हो गया।

जब सृष्टिकर्ता ब्रह्माने देखा कि देवताओं और विष्णुके मुखपर उदासी छा गयी है, तब उन्होंने हाथ जोड़कर शम्भुसे कहना आरम्भ किया।

ब्रह्माजी बोले – परमेश्वर! आप योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, परब्रह्म तथा सदासे देवों और ऋषियोंकी रक्षामें तत्पर हैं; अतः पाप आपका स्पर्श नहीं कर सकता।

साथ ही आपके आदेशसे ही तो उन्हें मोहमें डाला गया है।

इसके प्रेरक तो आप ही हैं।

इस समय अवश्य ही उन्होंने अपने धर्मका परित्याग कर दिया है और वे आपकी भक्तिसे विमुख हो गये हैं; तथापि आपके सिवा दूसरा कोई उनका वध नहीं कर सकता।

देवों और ऋषियोंके प्राणरक्षक महादेव! साधुओंकी रक्षाके लिये आपके द्वारा उन म्लेच्छोंका वध उचित है।

आप तो राजा हैं, अतः राजाको धर्मानुसार पापियोंका वध करनेसे पाप नहीं लगता; इसलिये इस काँटेको उखाड़कर साधु-ब्राह्मणोंकी रक्षा कीजिये।

राजा यदि अपने राज्य तथा सर्वलोकाधिपत्यको स्थिर रखना चाहता हो तो उसे अपने राज्यमें एवं अन्यत्र भी ऐसा ही व्यवहार करना चाहिये।

इसलिये आप देवगणोंकी रक्षाके लिये उद्यत हो जाइये, विलम्ब मत कीजिये।

देवदेवेश! बड़े-बड़े मुनीश्वर, यज्ञ, सम्पूर्ण वेद, शास्त्र, मैं और विष्णु भी निश्चय ही आपकी प्रजा हैं।

प्रभो! आप देवताओंके सार्वभौम सम्राट् हैं।

ये श्रीहरि आदि देवगण तथा सारा जगत् आपका ही कुटुम्ब है।

अजन्मा देव! श्रीहरि आपके युवराज हैं और मैं ब्रह्मा आपका पुरोहित हूँ तथा आपकी आज्ञाका पालन करनेवाले शक्र राजकार्य सँभालनेवाले मन्त्री हैं।

सर्वेश! अन्य देवता भी आपके शासनके नियन्त्रणमें रहकर सदा अपने-अपने कार्यमें तत्पर रहते हैं।

यह बिलकुल सत्य है।

सनत्कुमारजी कहते हैं – व्यासजी! ब्रह्माकी यह बात सुनकर सुरपालक परमेश्वर शिवका मन प्रसन्न हो गया।

तब उन्होंने ब्रह्माजीसे कहा।

शिवजी बोले – ब्रह्मन्! यदि आप मुझे देवताओंका सम्राट् बतला रहे हैं तो मेरे पास उस पदके योग्य कोई ऐसी सामग्री तो है नहीं, जिससे मैं उस पदको ग्रहण कर सकूँ; क्योंकि न तो मेरे पास कोई महान् दिव्य रथ है, न उसके उपयुक्त सारथि है और न संग्राममें विजय दिलानेवाले वैसे धनुष-बाण ही हैं कि जिन्हें लेकर मैं मनोयोगपूर्वक संग्राममें उन प्रबल दैत्योंका वध कर सकूँ।

यों कहकर वे चुप हो गये।

परंतु शिवजीको शीघ्र प्रस्तुत होते न देखकर समस्त देवता, कश्यप आदि ऋषि अत्यन्त व्याकुल तथा दुःखी हो गये।

तब भगवान् हरिने उनसे कहा।

भगवान् विष्णु बोले – “देवो तथा मुनियो! तुमलोग क्यों दुःखी हो रहे हो? तुम्हें अपने सारे दुःखका परित्याग कर देना चाहिये।

अब तुम सब लोग आदरपूर्वक मेरी बात सुनो।

देवगण! तुम्हीं लोग विचार करो कि महान् पुरुषोंकी आराधना सुखसाध्य नहीं होती।

मैंने ऐसा सुना है कि महदाराधनमें पहले महान् कष्ट झेलना पड़ता है।

पीछे भक्तकी दृढ़ता देखकर इष्टदेव अवश्य प्रसन्न होते हैं।

परंतु शिव तो समस्त गणोंके अध्यक्ष तथा परमेश्वर हैं।

ये तो आशुतोष ही ठहरे।

अतः पहले ‘ॐ’-का उच्चारण करके फिर ‘नमः’ का प्रयोग करे।

फिर ‘शिवाय’ कहकर दो बार ‘शुभम्’ का उच्चारण करे।

उसके बाद दो बार ‘कुरु’ का प्रयोग करके फिर ‘शिवाय नमः’ ‘ॐ’ जोड़ दे।

(ऐसा करनेसे ‘ॐ नमः शिवाय शुभं शुभं कुरु कुरु शिवाय नमः ॐ’ यह मन्त्र बनता है।) बुद्धिविशारदो! यदि तुमलोग शिवकी प्रसन्नताके लिये इस मन्त्रका पुनः एक करोड़ जप करोगे तो शिवजी अवश्य तुम्हारा कार्य पूर्ण करेंगे।” मुने! प्रभावशाली श्रीहरिने जब यों कहा, तब सभी देवता पुनः शिवाराधनमें लग गये।

तत्पश्चात् श्रीहरि भी देवों तथा मुनियोंके कार्यकी सिद्धिके हेतु शिवमें मन लगाकर विशेषरूपसे विधिपूर्वक जपमें तत्पर हो गये।

मुनिश्रेष्ठ! इधर देवगण धैर्यसम्पन्न हो बारंबार ‘शिव’-‘शिव’ यों उच्चारण करते हुए एक करोड़ जप करके सामने खड़े हो गये।

इसी समय स्वयं साक्षात् शिव पूर्वोक्त स्वरूप धारण करके प्रकट हो गये और यों कहने लगे।

श्रीशिवजी बोले – हरे! ब्रह्मन्! देवगण तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनियो! मैं तुमलोगोंके इस जपसे प्रसन्न हो गया हूँ, अतः अब तुमलोग अपना मनोवांछित वर माँग लो।

देवताओंने कहा – देवाधिदेव! कल्याण-कर्ता जगदीश्वर! यदि आप हमपर प्रसन्न हैं तो देवोंकी विकलताका विचार करके शीघ्र ही त्रिपुरका संहार कर दीजिये।

परमेश्वर! आप दीनबन्धु तथा कृपाकी खान हैं।

आपने ही सदासे हम देवताओंकी बारंबार विपत्तियोंसे रक्षा की है, अतः इस समय भी आप हमारी रक्षा कीजिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं – ब्रह्मन्! तब ब्रह्मा और विष्णुसहित देवोंकी वह बात सुनकर शिवजी मन-ही-मन प्रसन्न हुए और पुनः इस प्रकार बोले।

महेश्वरने कहा – हरे! ब्रह्मन्! देवगण! तथा मुनियो! अब त्रिपुरको नष्ट हुआ ही समझो।

तुमलोग आदरपूर्वक मेरी बात सुनो (और उसके अनुसार कार्य करो)।

मैंने पहले जिस दिव्य रथ, सारथि, धनुष और उत्तम बाणको अंगीकार किया है, वह सब शीघ्र ही तैयार करो।

विष्णो तथा विधे! निश्चय ही तुम दोनों त्रिलोकीके अधिपति हो; इसलिये तुम्हें चाहिये कि मेरे लिये प्रयत्नपूर्वक सम्राट्के योग्य सारा उपकरण प्रस्तुत कर दो।

तुम दोनों सृष्टिके सृजन और पालन-कार्यमें नियुक्त हो, अतः त्रिपुरको नष्ट हुआ समझकर देवताओंकी सहायताके लिये यह कार्य अवश्य करो।

यह शुभ मन्त्र (जिसका तुमलोगोंने जप किया है) महान् पुण्यमय तथा मुझे प्रसन्न करनेवाला है।

यह भुक्ति-मुक्तिका दाता, सम्पूर्ण कामनाओंका पूरक और शिव-भक्तोंके लिये आनन्दप्रद है।

यह स्वर्गकामी पुरुषोंके लिये धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला है।

यह निष्कामके लिये मोक्ष तथा साधन करनेवाले पुरुषोंके लिये भुक्ति-मुक्तिका साधक है।

जो मनुष्य पवित्र होकर सदा इस मन्त्रका कीर्तन करता है, सुनता है अथवा दूसरेको सुनाता है, उसकी सारी अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाती हैं।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! परमात्मा शिवकी यह बात सुनकर सभी देवता परम प्रसन्न हुए और ब्रह्मा तथा विष्णुको तो विशेष आनन्द प्राप्त हुआ।

उस समय विश्वकर्माने शिवके आज्ञानुसार विश्वके हितके लिये एक सर्वदेवमय तथा परम शोभन दिव्य रथका निर्माण किया।

(अध्याय ६ – ८)


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