शिव पुराण - रुद्र संहिता - युद्ध खण्ड - 18


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गजासुरकी तपस्या, वर-प्राप्ति और उसका अत्याचार, शिवद्वारा उसका वध, उसकी प्रार्थनासे शिवका उसका चर्म धारण करना और ‘कृत्तिवासा’ नामसे विख्यात होना तथा कृत्तिवासेश्वरलिंगकी स्थापना करना

सनत्कुमारजी कहते हैं – व्यासजी! अब परम प्रेमपूर्वक शशिमौलि शिवके उस चरित्रको श्रवण करो, जिसमें उन्होंने त्रिशूलद्वारा दानवराज गजासुरका वध किया था।

गजासुर महिषासुरका पुत्र था।

जब उसने सुना कि देवताओंसे प्रेरित होकर देवीने मेरे पिताको मार दिया था, तब उसका बदला लेनेकी भावनासे उसने घोर तप किया।

उसके तपकी ज्वालासे सब जलने लगे।

देवताओंने जाकर ब्रह्माजीसे अपना दुःख कहा, तब ब्रह्माजीने उसके सामने प्रकट होकर उसके प्रार्थनानुसार उसे वरदान दे दिया कि वह कामके वश होनेवाले किसी भी स्त्री या पुरुषसे नहीं मरेगा, महाबली और सबसे अजेय होगा।

वर पाकर वह गर्वमें भर गया।

सब दिशाओं तथा सब लोकपालोंके स्थानोंपर उसने अधिकार कर लिया।

अन्तमें भगवान् शंकरकी राजधानी आनन्दवन काशीमें जाकर वह सबको सताने लगा।

देवताओंने भगवान् शंकरसे प्रार्थना की।

शंकर कामविजयी हैं ही।

उन्होंने घोर युद्धमें उसे हराकर त्रिशूलमें पिरो लिया।

तब उसने भगवान् शंकरका स्तवन किया! शंकरने उसपर प्रसन्न होकर इच्छित वर माँगनेको कहा।

तब गजासुरने कहा – दिगम्बरस्वरूप महेशान! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो अपने त्रिशूलकी अग्निसे पवित्र हुए मेरे इस चर्मको आप सदा धारण किये रहें।

विभो! मैं पुण्य गन्धोंकी निधि हूँ, इसीलिये मेरा यह चर्म चिरकालतक उग्र तपरूपी अग्निकी ज्वालामें पड़कर भी दग्ध नहीं हुआ है।

दिगम्बर! यदि मेरा यह चर्म पुण्यवान् न होता तो रणांगणमें इसे आपके अंगोंका संग कैसे प्राप्त होता।

शंकर! यदि आप तुष्ट हैं तो मुझे एक दूसरा वर और दीजिये।

(वह यह कि) आजसे आपका नाम ‘कृत्तिवासा’ विख्यात हो जाय।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! गजासुरकी बात सुनकर भक्तवत्सल शंकरने परम प्रसन्नतापूर्वक महिषासुरनन्दन गजसे कहा – ‘तथास्तु’ – अच्छा, ऐसा ही होगा।

तदनन्तर प्रसन्नात्मा भक्तप्रिय महेशान उस दानवराज गजसे, जिसका मन भक्तिके कारण निर्मल हो गया था, पुनः बोले।

ईश्वरने कहा – दानवराज! तेरा यह पावन शरीर मेरे इस मुक्तिसाधक क्षेत्र काशीमें मेरे लिंगके रूपमें स्थित हो जाय! इसका नाम कृत्तिवासेश्वर होगा।

यह समस्त प्राणियोंके लिये मुक्तिदाता, महान् पातकोंका विनाशक, सम्पूर्ण लिंगोंमें शिरोमणि और मोक्षप्रद होगा।

यों कहकर देवेश्वर दिगम्बर शिवने गजासुरके उस विशाल चर्मको लेकर ओढ़ लिया।

मुनीश्वर! उस दिन बहुत बड़ा उत्सव मनाया गया।

काशीनिवासी सारी जनता तथा प्रमथगण हर्षमग्न हो गये।

विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओंका मन हर्षसे परिपूर्ण हो गया।

वे हाथ जोड़कर महेश्वरको नमस्कार करके उनकी स्तुति करने लगे।

(अध्याय ५७)


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