शिव पुराण - रुद्र संहिता - युद्ध खण्ड - 17


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शिव पुराण संहिता लिंकविद्येश्वर | रुद्र संहिता | शतरुद्र | कोटिरुद्र | उमा | कैलास | वायवीय


श्रीकृष्णद्वारा बाणकी भुजाओंका काटा जाना, सिर काटनेके लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णको शिवका रोकना और उन्हें समझाना, श्रीकृष्णका परिवारसमेत द्वारकाको लौट जाना, बाणका ताण्डव नृत्यद्वारा शिवको प्रसन्न करना, शिवद्वारा उसे अन्यान्य वरदानोंके साथ महाकालत्वकी प्राप्ति

सनत्कुमारजी कहते हैं – महाप्राज्ञ व्यासजी! लोकलीलाका अनुसरण करनेवाले श्रीकृष्ण और शंकरकी उस परम अद्भुत कथाको श्रवण करो।

तात! जब भगवान् रुद्र लीलावश पुत्रों तथा गणोंसहित सो गये, तब दैत्यराज बाण श्रीकृष्णके साथ युद्ध करनेके लिये प्रस्थित हुआ।

उस समय कुम्भाण्ड उसके अश्वोंकी बागडोर सँभाले हुए था और वह नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे सज्जित था।

फिर वह महाबली बलिपुत्र भीषण युद्ध करने लगा।

इस प्रकार उन दोनोंमें चिरकालतक बड़ा घोर संग्राम होता रहा; क्योंकि विष्णुके अवतार श्रीकृष्ण शिवरूप ही थे और उधर बलवान् बाणासुर उत्तम शिवभक्त था।

मुनीश्वर! तदनन्तर वीर्यवान् श्रीकृष्ण, जिन्हें शिवकी आज्ञासे बल प्राप्त हो चुका था, चिरकालतक बाणके साथ यों युद्ध करके अत्यन्त कुपित हो उठे।

तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने शम्भुके आदेशसे शीघ्र ही सुदर्शन चक्रद्वारा बाणकी बहुत-सी भुजाओंको काट डाला।

अन्तमें उसकी अत्यन्त सुन्दर चार भुजाएँ ही अवशेष रह गयीं और शंकरकी कृपासे शीघ्र ही उसकी व्यथा भी मिट गयी।

जब बाणकी स्मृति लुप्त हो गयी और वीरभावको प्राप्त हुए श्रीकृष्ण उसका सिर काट लेनेके लिये उद्यत हुए, तब शंकरजी मोहनिद्राको त्यागकर उठ खड़े हुए और बोले।

रुद्रने कहा – देवकीनन्दन! आप तो सदासे मेरी आज्ञाका पालन करते आये हैं।

भगवन्! मैंने पहले आपको जिस कामके लिये आज्ञा दी थी, वह तो आपने पूरा कर दिया।

अब बाणका शिरश्छेदन मत कीजिये और सुदर्शन चक्रको लौटा लीजिये।

मेरी आज्ञासे यह चक्र सदा मेरे भक्तोंपर अमोघ रहा है।

गोविन्द! मैंने पहले ही आपको युद्धमें अनिवार्य चक्र और जय प्रदान की थी, अब आप इस युद्धसे निवृत्त हो जाइये।

लक्ष्मीश! पूर्वकालमें भी तो आपने मेरी आज्ञाके बिना दधीच, वीरवर रावण और तारकाक्ष आदिके पुरोंपर चक्रका प्रयोग नहीं किया था।

जनार्दन! आप तो योगीश्वर, साक्षात् परमात्मा और सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत रहनेवाले हैं।

आप स्वयं ही अपने मनसे विचार कीजिये।

मैंने इसे वर दे रखा है कि तुझे मृत्युका भय नहीं होगा।

मेरा वह वचन सदा सत्य होना चाहिये।

मैं आपपर परम प्रसन्न हूँ।

हरे! बहुत दिन पूर्व यह गर्वसे भरकर उन्मत्त हो उठा और अपने-आपको भूल गया था।

तब अपनी भुजाएँ खुजलाता हुआ यह मेरे पास पहुँचा और बोला – ‘मेरे साथ युद्ध कीजिये।’ तब मैंने इसे शाप देते हुए कहा – ‘थोड़े ही समयमें तेरी भुजाओंका छेदन करनेवाला आयेगा।

तब तेरा सारा गर्व गल जायगा।’ (बाणकी ओर देखकर) कहा – ‘मेरी ही आज्ञासे तेरी भुजाओंको काटनेवाले ये श्रीहरि आये हैं।’ (फिर श्रीकृष्णसे) ‘अब आप युद्ध बंद कर दीजिये और वर-वधूको साथ ले अपने घरको लौट जाइये।’ यों कहकर महेश्वरने उन दोनोंमें मित्रता करा दी और उनकी आज्ञा ले वे पुत्रों और गणोंके साथ अपने निवासस्थानको चले गये।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! शम्भुका कथन सुनकर अक्षत शरीरवाले श्रीकृष्णने सुदर्शनको लौटा लिया और विजयश्रीसे सुशोभित हो वे बाणासुरके अन्तःपुरमें पधारे।

वहाँ उन्होंने ऊषासहित अनिरुद्धको आश्वासन दिया और बाणद्वारा दिये गये अनेक प्रकारके रत्नसमूहोंको ग्रहण किया।

ऊषाकी सखी परम योगिनी चित्रलेखाको पाकर तो श्रीकृष्णको महान् हर्ष हुआ।

इस प्रकार शिवके आदेशानुसार जब उनका सारा कार्य पूर्ण हो गया, तब वे श्रीहरि हृदयसे शंकरको प्रणाम कर और बलिपुत्र बाणासुरकी आज्ञा ले परिवारसमेत अपनी पुरीको लौट गये।

द्वारकामें पहुँचकर उन्होंने गरुडको विदा कर दिया।

फिर हर्षपूर्वक मित्रोंसे मिले और स्वेच्छानुसार आचरण करने लगे।

इधर नन्दीश्वरने बाणासुरको समझाकर यह कहा – ‘भक्तशार्दूल! तुम बारंबार शिवजीका स्मरण करो।

वे भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाले हैं, अतः उन आदिगुरु शंकरमें मन समाहित करके नित्य उनका महोत्सव करो।’ तब द्वेषरहित हुआ महामनस्वी बाण नन्दीके कहनेसे धैर्य धारण करके तुरंत ही शिवस्थानको गया।

वहाँ पहुँचकर उसने नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा शिवजीकी स्तुति की और उन्हें प्रणाम किया।

फिर वह पादोंसे ठुमकी लगाते हुए और हाथोंको घुमाते हुए नाना प्रकारके आलीढ और प्रत्यालीढ आदि प्रमुख स्थानकोंद्वारा सुशोभित नृत्योंमें प्रधान ताण्डवनृत्य करने लगा।

उस समय वह हजारों प्रकारसे मुखद्वारा बाजा बजा रहा था और बीच-बीचमें भौंहोंको मटकाकर तथा सिरको कँपाकर सहस्रों प्रकारके भाव भी प्रकट करता जाता था।

इस प्रकार नृत्यमें मस्त हुए महाभक्त बाणासुरने महान् नृत्य करके नतमस्तक हो त्रिशूलधारी चन्द्रशेखर भगवान् रुद्रको प्रसन्न कर लिया।

तब नाच-गानके प्रेमी भक्तवत्सल भगवान् हर हर्षित होकर बाणसे बोले।

रुद्रने कहा – बलिपुत्र प्यारे बाण! तेरे नृत्यसे मैं संतुष्ट हो गया हूँ, अतः दैत्येन्द्र! तेरे मनमें जो अभिलाषा हो, उसके अनुरूप वर माँग ले।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! शम्भुकी बात सुनकर दैत्यराज बाणने इस प्रकार वर माँगा – ‘मेरे घाव भर जायँ, बाहुयुद्धकी क्षमता बनी रहे, मुझे अक्षय गणनायकत्व प्राप्त हो, शोणितपुरमें ऊषापुत्र अर्थात् मेरे दौहित्रका राज्य हो, देवताओंसे तथा विशेष करके विष्णुसे मेरा वैरभाव मिट जाय, मुझमें रजोगुण और तमोगुणसे युक्त दूषित दैत्यभावका पुनः उदय न हो, मुझमें सदा निर्विकार शम्भुभक्ति बनी रहे और शिवभक्तोंपर मेरा स्नेह और समस्त प्राणियोंपर दयाभाव रहे।’ यों शम्भुसे वरदान माँगकर बलिपुत्र महासुर बाण अंजलि बाँधे रुद्रकी स्तुति करने लगा।

उस समय उसके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू छलक आये थे।

तदनन्तर जिसके सारे अंग प्रेमसे प्रफुल्लित हो उठे थे, वह बलिनन्दन बाणासुर महेश्वरको प्रणाम करके मौन हो गया।

अपने भक्त बाणकी प्रार्थना सुनकर भगवान् शंकर ‘तुझे सब कुछ प्राप्त हो जायगा’ यों कहकर वहीं अन्तर्धान हो गये।

तब शम्भुकी कृपासे महाकालत्वको प्राप्त हुआ रुद्रका अनुचर बाण परमानन्दमें निमग्न हो गया।

व्यासजी! इस प्रकार मैंने सम्पूर्ण भुवनोंमें नित्य क्रीडा करनेवाले समस्त गुरुजनोंके भी सद् गुरु शूलपाणि भगवान् शंकरका बाणविषयक चरित, जो परमोत्तम है, कर्णप्रिय मधुर वचनोंद्वारा तुमसे वर्णन कर दिया।

(अध्याय ५५-५६)


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