शिव पुराण - रुद्र संहिता - युद्ध खण्ड - 16


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शिव पुराण संहिता लिंकविद्येश्वर | रुद्र संहिता | शतरुद्र | कोटिरुद्र | उमा | कैलास | वायवीय


बाणासुरकी तपस्या और उसे शिवद्वारा वर-प्राप्ति, शिवका गणों और पुत्रोंसहित उसके नगरमें निवास करना, बाणपुत्री ऊषाका रातके समय स्वप्नमें अनिरुद्धके साथ मिलन, चित्रलेखाद्वारा अनिरुद्धका द्वारकासे अपहरण, बाणका अनिरुद्धको नागपाशमें बाँधना, दुर्गाके स्तवनसे अनिरुद्धका बन्धनमुक्त होना, नारदद्वारा समाचार पाकर श्रीकृष्णकी शोणितपुरपर चढ़ाई, शिवके साथ उनका घोर युद्ध, शिवकी आज्ञासे श्रीकृष्णका उन्हें जृम्भणास्त्रसे मोहित करके बाणकी सेनाका संहार करना

व्यासजी बोले – सर्वज्ञ सनत्कुमारजी! आपने अनुग्रह करके प्रेमपूर्वक ऐसी अद्भुत और सुन्दर कथा सुनायी है, जो शंकरकी कृपासे ओतप्रोत है।

अब मुझे शशिमौलिके उस उत्तम चरित्रके श्रवण करनेकी इच्छा है, जिसमें उन्होंने प्रसन्न होकर बाणासुरको गणाध्यक्षपद प्रदान किया था।

सनत्कुमारजीने कहा – व्यासजी! परमात्मा शम्भुकी उस कथाको, जिसमें उन्होंने प्रसन्न होकर बाणासुरको गणनायक बनाया था, आदरपूर्वक श्रवण करो।

इसी प्रसंगमें महाप्रभु शंकरका वह सुन्दर चरित्र भी आयेगा, जिसमें उन्होंने बाणासुरपर अनुग्रह करके श्रीकृष्णके साथ संग्राम किया था।

व्यासजी! दक्षप्रजापतिकी तेरह कन्याएँ कश्यप मुनिकी पत्नियाँ थीं।

वे सब-की-सब पतिव्रता तथा सुशीला थीं।

उनमें दिति सबसे बड़ी थी, जिसके लड़के दैत्य कहलाते हैं।

अन्य पत्नियोंसे भी देवता तथा चराचरसहित समस्त प्राणी पुत्ररूपसे उत्पन्न हुए थे।

ज्येष्ठ पत्नी दितिके गर्भसे सर्वप्रथम दो महाबली पुत्र पैदा हुए, उनमें हिरण्यकशिपु ज्येष्ठ था और उसके छोटे भाईका नाम हिरण्याक्ष था।

हिरण्यकशिपुके चार पुत्र हुए।

उन दैत्यश्रेष्ठोंका क्रमशः ह्राद, अनुह्राद, संह्राद और प्रह्राद नाम था।

उनमें प्रह्राद जितेन्द्रिय तथा महान् विष्णुभक्त हुए।

उनका नाश करनेके लिये कोई भी दैत्य समर्थ न हो सका।

प्रह्रादका पुत्र विरोचन हुआ, वह दानियोंमें सर्वश्रेष्ठ था।

उसने विप्ररूपसे याचना करनेवाले इन्द्रको अपना सिर ही दे डाला था।

उसका पुत्र बलि हुआ।

यह महादानी और शिवभक्त था।

इसने वामनरूपधारी विष्णुको सारी पृथ्वी दान कर दी थी।

बलिका औरस पुत्र बाण हुआ।

वह शिवभक्त, मानी, उदार, बुद्धिमान्, सत्यप्रतिज्ञ और सहस्रोंका दान करनेवाला था।

उस असुरराजने पूर्वकालमें त्रिलोकीको तथा त्रिलोकाधिपतियोंको बलपूर्वक जीतकर शोणितपुरमें अपनी राजधानी बनाया और वहीं रहकर राज्य करने लगा।

उस समय देवगण शंकरकी कृपासे उस शिवभक्त बाणासुरके किंकरके समान हो गये थे।

उसके राज्यमें देवताओंके अतिरिक्त और कोई प्रजा दुःखी नहीं थी।

शत्रुधर्मका बर्ताव करनेवाले देवता शत्रुतावश ही कष्ट झेल रहे थे।

एक समय वह महासुर अपनी सहस्रों भुजाओंसे ताली बजाता हुआ ताण्डवनृत्य करके महेश्वर शिवको प्रसन्न करनेकी चेष्टा करने लगा।

उसके उस नृत्यसे भक्तवत्सल शंकर संतुष्ट हो गये।

फिर उन्होंने परम प्रसन्न हो उसकी ओर कृपादृष्टिसे देखा।

भगवान् शंकर तो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी, शरणागतवत्सल और भक्तवांछा-कल्पतरु ही ठहरे।

उन्होंने बलिनन्दन महासुर बाणको वर देनेकी इच्छा प्रकट की।

मुने! बलिनन्दन महादैत्य बाण शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ और परम बुद्धिमान् था।

उसने परमेश्वर शंकरको प्रणाम करके उनकी स्तुति की (और कहा)।

बाणासुर बोला – प्रभो! आप मेरे रक्षक हो जाइये और पुत्रों तथा गणोंसहित मेरे नगरके अध्यक्ष बनकर सर्वथा प्रीतिका निर्वाह करते हुए मेरे पास ही निवास कीजिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं – महर्षे! वह बलिपुत्र बाण निश्चय ही शिवजीकी मायासे मोहमें पड़ गया था, इसीलिये उसने मुक्ति प्रदान करनेवाले दुराराध्य महेश्वरको पाकर भी ऐसा वर माँगा।

तब ऐश्वर्यशाली भक्तवत्सल शम्भु उसे वह वर देकर पुत्रों और गणोंके साथ प्रेमपूर्वक वहीं निवास करने लगे।

एक बार बाणासुरको बड़ा ही गर्व हो गया।

उसने ताण्डवनृत्य करके शंकरको संतुष्ट किया।

जब बाणासुरको यह ज्ञात हो गया कि पार्वतीवल्लभ शिव प्रसन्न हो गये हैं, तब वह हाथ जोड़कर सिर झुकाये हुए बोला।

बाणासुरने कहा – देवाधिदेव महादेव! आप समस्त देवताओंके शिरोमणि हैं।

आपकी ही कृपासे मैं बली हुआ हूँ।

अब आप मेरा उत्तम वचन सुनिये।

देव! आपने जो मुझे एक हजार भुजाएँ प्रदान की हैं, ये तो अब मुझे महान् भारस्वरूप लग रही हैं; क्योंकि इस त्रिलोकीमें मुझे आपके अतिरिक्त अपनी जोड़का और कोई योद्धा ही नहीं मिला।

इसलिये वृषध्वज! युद्धके बिना इन पर्वत-सरीखी सहस्रों भुजाओंको लेकर मैं क्या करूँ।

मैं अपनी इन परिपुष्ट भुजाओंकी खुजली मिटानेके लिये युद्धकी लालसासे नगरों तथा पर्वतोंको चूर्ण करता हुआ दिग्गजोंके पास गया; परंतु वे भी भयभीत होकर भाग खड़े हुए।

मैंने यमको योद्धा, अग्निको महान् कार्य करनेवाला, वरुणको गौओंका पालनकर्ता गोपाल, कुबेरको गजाध्यक्ष, निर्ऋतिको सैरन्ध्री और इन्द्रको जीतकर सदाके लिये करद बना लिया है।

महेश्वर! अब मुझे किसी ऐसे युद्धके प्राप्त होनेकी बात बताइये, जिसमें मेरी ये भुजाएँ या तो शत्रुओंके हाथोंसे छूटे हुए शस्त्रास्त्रोंसे जर्जर होकर गिर जायँ अथवा हजारों प्रकारसे शत्रुकी भुजाओंको ही गिरायें।

यही मेरी अभिलाषा है, इसे पूर्ण करनेकी कृपा करें।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनिश्रेष्ठ! उसकी बात सुनकर भक्तबाधापहारी तथा महामन्युस्वरूप रुद्रको कुछ क्रोध आ गया।

तब वे महान् अद्भुत अट्टहास करके बोले।

रुद्रने कहा – ‘अरे अभिमानी! सम्पूर्ण दैत्योंके कुलमें नीच! तुझे सर्वथा धिक्कार है, धिक्कार है।

तू बलिका पुत्र और मेरा भक्त है।

तेरे लिये ऐसी बात कहना उचित नहीं है।

अब तेरा दर्प चूर्ण होगा।

तुझे शीघ्र ही मेरे समान बलवान् के साथ अकस्मात् महान् भीषण युद्ध प्राप्त होगा।

उस संग्राममें तेरी ये पर्वत-सरीखी भुजाएँ जलौनी लकड़ीकी तरह शस्त्रास्त्रोंसे छिन्न-भिन्न होकर भूमिपर गिरेंगी।

दुष्टात्मन्! तेरे आयुधागारपर स्थापित तेरा जो यह मनुष्यके सिरवाला मयूरध्वज फहरा रहा है, इसका जब वायु-भयके बिना ही पतन हो जायगा, तब तू अपने चित्तमें समझ लेना कि वह महान् भयानक युद्ध आ पहुँचा है।

उस समय तू घोर संग्रामका निश्चय करके अपनी सारी सेनाके साथ वहाँ जाना।

इस समय तू अपने महलको लौट जा; क्योंकि इसीमें तेरा कल्याण है।

दुर्मते! वहाँ तुझे प्रसिद्ध बड़े-बड़े उत्पात दिखायी देंगे।’ यों कहकर गर्वहारी भक्तवत्सल भगवान् शंकर चुप हो गये।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! यह सुनकर बाणासुरने दिव्य पुष्पोंकी कलियोंसे अंजलि भरकर रुद्रकी अभ्यर्चना की और फिर उन महादेवको प्रणाम करके वह अपने घरको लौट गया।

तदनन्तर किसी समय दैववश उसका वह ध्वज अपने-आप टूटकर गिर गया।

यह देखकर बाणासुर हर्षित हो युद्धके लिये उद्यत हो गया।

वह अपने हृदयमें विचार करने लगा कि कौन-सा युद्धप्रेमी योद्धा किस देशसे आयेगा, जो नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंका पारगामी विद्वान् होगा और मेरी सहस्रों भुजाओंको ईंधनकी तरह काट डालेगा तथा मैं भी अपने अत्यन्त तीखे शस्त्रोंसे उसके सैकड़ों टुकड़े कर डालूँगा।

इसी समय शंकरकी प्रेरणासे वह काल आ गया।

एक दिन बाणासुरकी कन्या ऊषा वैशाखमासमें माधवकी पूजा करके मांगलिक शृंगारसे सुसज्जित हो रातके समय अपने गुप्त अन्तःपुरमें सो रही थी, उसी समय वह स्त्रीभाव (कामभाव)-प्राप्त हो गयी।

तब देवी पार्वतीकी शक्तिसे ऊषाको स्वप्नमें श्रीकृष्णके पौत्र अनिरुद्धका मिलन प्राप्त हुआ।

जागनेपर वह व्याकुल हो गयी और उसने अपनी सखी चित्रलेखासे स्वप्नमें मिले हुए उस पुरुषको ला देनेके लिये कहा।

तब चित्रलेखाने कहा – ‘देवि! तुमने स्वप्नमें जिस पुरुषको देखा है, उसे भला, मैं कैसे ला सकती हूँ, जब कि मैं उसे जानती ही नहीं।’ उसके यों कहनेपर दैत्यकन्या ऊषा प्रेमान्ध होकर मरनेपर उतारू हो गयी, तब उस दिन उसकी उस सखीने उसे बचाया।

मुनिश्रेष्ठ! कुम्भाण्डकी पुत्री चित्रलेखा बड़ी बुद्धिमती थी, वह बाणतनया ऊषासे पुनः बोली।

चित्रलेखाने कहा – सखी! जिस पुरुषने तुम्हारे मनका अपहरण किया है, उसे बताओ तो सही।

वह यदि त्रिलोकीमें कहीं भी होगा तो मैं उसे लाऊँगी और तुम्हारा कष्ट दूर करूँगी।

सनत्कुमारजी कहते हैं – महर्षे! यों कहकर चित्रलेखाने वस्त्रके परदेपर देवताओं, दैत्यों, दानवों, गन्धर्वों, सिद्धों, नागों और यक्ष आदिके चित्र अंकित किये।

फिर वह मनुष्योंका चित्र बनाने लगी।

उनमें वृष्णिवंशियोंका प्रकरण आरम्भ होनेपर उसने शूर, वसुदेव, राम, कृष्ण और नरश्रेष्ठ प्रद्युम्नका चित्र बनाया।

फिर जब उसने प्रद्युम्ननन्दन अनिरुद्धका चित्र खींचा, तब उसे देखकर ऊषा लज्जित हो गयी।

उसका मुख अवनत हो गया और हृदय हर्षसे परिपूर्ण हो गया।

ऊषाने कहा – ‘सखी! रातमें जो मेरे पास आया था और जिसने शीघ्र ही मेरे चित्तरूपी रत्नको चुरा लिया है, वह चोर पुरुष यही है।’ तदनन्तर ऊषाके अनुरोध करनेपर चित्रलेखा ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशीको तीसरे पहर द्वारकापुरी पहुँचकर क्षणमात्रमें ही पलंगपर बैठे हुए अनिरुद्धको महलमेंसे उठा लायी।

वह दिव्य योगिनी थी।

ऊषा अपने प्रियतमको पाकर प्रसन्न हो गयी।

इधर अन्तःपुरके द्वारकी रक्षा करनेवाले बेतधारी पहरेदारोंने चेष्टाओंसे तथा अनुमानसे इस बातको लक्ष्य कर लिया।

उन्होंने एक दिव्य शरीरधारी, दर्शनीय, साहसी तथा समरप्रिय नवयुवकको कन्याके साथ दुःशीलताका आचरण करते हुए देख भी लिया।

उसे देखकर कन्याके अन्तःपुरकी रक्षा करनेवाले उन महाबली पुरुषोंने बलिपुत्र बाणासुरके पास जाकर सारी बातें निवेदन करते हुए कहा।

द्वारपाल बोले – देव! पता नहीं, आपके अन्तःपुरमें बलपूर्वक प्रवेश करके कौन पुरुष छिपा हुआ है।

वह इन्द्र तो नहीं है, जो वेष बदलकर आपकी कन्याका उपभोग कर रहा है? महाबाहु दानवराज! उसे यहाँ देखिये, देखिये और जैसा उचित समझिये वैसा कीजिये।

इसमें हमलोगोंका कोई दोष नहीं है।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनिश्रेष्ठ! द्वारपालोंका वह वचन तथा कन्याके दूषित होनेका कथन सुनकर महाबली दानवराज बाण आश्चर्यचकित हो गया।

तदनन्तर वह कुपित होकर अन्तःपुरमें जा पहुँचा।

वहाँ उसने प्रथम अवस्थामें वर्तमान दिव्य शरीरधारी अनिरुद्धको देखा।

उसे महान् आश्चर्य हुआ।

फिर उसने उसका बल देखनेके लिये दस हजार सैनिकोंको भेजकर आज्ञा दी कि इसे मार डालो।

सेनाने अनिरुद्धपर आक्रमण किया।

तब अनिरुद्धने बात-की-बातमें दस हजार सैनिकोंको कालके हवाले कर दिया।

फिर तो असंख्य सेना-पर-सेना आने लगी और अनिरुद्ध उन्हें कालका ग्रास बनाने लगे।

तदनन्तर उन्होंने बाणासुरका वध करनेके लिये एक शक्ति हाथमें ली, जो कालाग्निके समान भयंकर थी।

फिर उसीसे रथकी बैठकमें बैठे हुए बाणासुरपर प्रहार किया।

उसकी गहरी चोट खाकर वीरवर बाण उसी क्षण घोड़ोंसहित वहीं अन्तर्धान हो गया।

फिर महावीर बलिपुत्र बाणासुरने, जो महान् बलसम्पन्न तथा शिवभक्त था, छलपूर्वक नागपाशसे अनिरुद्धको बाँध लिया।

इस प्रकार उन्हें बाँधकर और पिंजरेमें कैद करके वह युद्धसे उपराम हो गया।

तत्पश्चात् बाण कुपित होकर महाबली सूतपुत्रसे बोला।

बाणासुरने कहा – सूतपुत्र! घास-फूससे ढके हुए अगाध कुएँमें ढकेलकर इस पापीको मार डाल।

अधिक क्या कहूँ, इसे सर्वथा मार ही डालना चाहिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! उसकी यह बात सुनकर उत्तम मन्त्रियोंमें श्रेष्ठ धर्मबुद्धि निशाचर कुम्भाण्डने बाणासुरसे कहा।

कुम्भाण्ड बोला – देव! थोड़ा विचार तो कीजिये।

मेरी समझसे तो यह कर्म करना उचित नहीं प्रतीत होता; क्योंकि इसके मारे जानेपर अपना आत्मा ही आहत हो जायगा।

पराक्रममें तो यह विष्णुके समान दीख रहा है।

जान पड़ता है, आपपर कुपित होकर चन्द्रचूडने अपने उत्तम तेजसे इसे बढ़ा दिया है।

साहसमें यह शशिमौलिकी समानता कर रहा है; क्योंकि इस अवस्थाको पहुँच जानेपर भी यह पुरुषार्थपर ही डटा हुआ है।

यह ऐसा बली है कि यद्यपि नाग इसे बलपूर्वक डँस रहे हैं, तथापि यह हमलोगोंको तृणवत् ही समझ रहा है।

सनत्कुमारजी कहते हैं – व्यासजी! दानव कुम्भाण्ड राजनीतिके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ था।

वह बाणसे ऐसा कहकर फिर अनिरुद्धसे कहने लगा।

कुम्भाण्डने कहा – ‘नराधम! अब तू वीरवर दैत्यराजकी स्तुति कर और दीन वाणीसे ‘मैं हार गया’ यों बारंबार कहकर उन्हें हाथ जोड़कर नमस्कार कर।

ऐसा करनेपर ही तू मुक्त हो सकता है, अन्यथा तुझे बन्धन आदिका कष्ट भोगना पड़ेगा।’ उसकी बात सुनकर अनिरुद्ध उत्तर देते हुए बोले।

अनिरुद्धने कहा – दुराचारी निशाचर! तुझे क्षत्रिय-धर्मका ज्ञान नहीं है।

अरे! शूरवीरके लिये दीनता दिखाना और युद्धसे मुख मोड़कर भागना मरणसे भी बढ़कर कष्टदायक होता है।

मेरे विचारसे तो विरुद्धाचरण काँटेकी तरह चुभनेवाला होता है।

वीरमानी क्षत्रियके लिये रणभूमिमें सदा सम्मुख लड़ते हुए मरना ही श्रेयस्कर है, भूमिपर पड़कर हाथ जोड़े हुए दीनकी तरह मरना कदापि नहीं।* सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! इस प्रकार अनिरुद्धने बहुत-सी वीरताकी बातें कहीं, जिन्हें सुनकर बाणासुरको महान् विस्मय हुआ और उसे क्रोध भी आया।

उसी समय समस्त वीरोंके, अनिरुद्धके और मन्त्री कुम्भाण्डके सुनते-सुनते बाणासुरके आश्वासनार्थ आकाशवाणी हुई।

आकाशवाणीने कहा – महाबली बाण! तुम बलिके पुत्र हो, अतः थोड़ा विचार तो करो।

परम बुद्धिमान् शिवभक्त! तुम्हारे लिये क्रोध करना उचित नहीं है।

शिव समस्त प्राणियोंके ईश्वर, कर्मोंके साक्षी और परमेश्वर हैं।

यह सारा चराचर जगत् उन्हींके अधीन है।

वे ही सदा रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणका आश्रय लेकर ब्रह्मा, विष्णु और रुद्ररूपसे लोकोंकी सृष्टि, भरण-पोषण और संहार करते हैं।

वे सर्वान्तर्यामी, सर्वेश्वर, सबके प्रेरक, सर्वश्रेष्ठ, विकाररहित, अविनाशी, नित्य और मायाधीश होनेपर भी निर्गुण हैं।

बलिके श्रेष्ठ पुत्र! उनकी इच्छासे निर्बलको भी बलवान् समझना चाहिये।

महामते! मनमें यों विचारकर स्वस्थ हो जाओ।

नाना प्रकारकी लीलाओंके रचनेमें निपुण भक्तवत्सल भगवान् शंकर गर्वको मिटा देनेवाले हैं।

वे इस समय तुम्हारे गर्वको चूर कर देंगे।

सनत्कुमारजी कहते हैं – महामुने! इतना कहकर आकाशवाणी बंद हो गयी।

तब उसके वचनको मानकर बाणासुरने अनिरुद्ध-का वध करनेका विचार छोड़ दिया।

तदनन्तर विषैले नागोंके पाशसे बँधे हुए अनिरुद्ध उसी क्षण दुर्गाका स्मरण करने लगे।

अनिरुद्धने कहा – शरणागतवत्सले! आप यश प्रदान करनेवाली हैं, आपका रोष बड़ा उग्र होता है।

देवि! मैं नागपाशसे बँधा हुआ हूँ और नागोंकी विषज्वालासे संतप्त हो रहा हूँ; अतः शीघ्र पधारिये और मेरी रक्षा कीजिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनीश्वर! जब अनिरुद्धने पिसे हुए काले कोयलेके समान कृष्णवर्णवाली कालीको इस प्रकार संतुष्ट किया, तब ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशीकी महारात्रिमें वहाँ प्रकट हुईं।

उन्होंने उन सर्परूपी भयानक बाणोंको भस्मसात् करके अपने बलिष्ठ मुक्कोंके आघातसे उस नाग-पंजरको विदीर्ण कर दिया।

इस प्रकार दुर्गाने अनिरुद्धको बन्धनमुक्त करके उन्हें पुनः अन्तःपुरमें पहुँचा दिया और स्वयं वहीं अन्तर्धान हो गयीं।

इस प्रकार शिवकी शक्तिस्वरूपा देवीकी कृपासे अनिरुद्ध कष्टसे छूट गये, उनकी सारी व्यथा मिट गयी और वे सुखी हो गये।

तदनन्तर प्रद्युम्ननन्दन अनिरुद्ध शिवशक्तिके प्रतापसे विजयी हो अपनी प्रिया बाणतनयाको पाकर परम हर्षित हुए और अपनी प्रियतमा उस ऊषाके साथ पूर्ववत् सुखपूर्वक विहार करने लगे।

इधर पौत्र अनिरुद्धके अदृश्य हो जाने तथा नारदजीके मुखसे उसके बाणासुरके द्वारा नागपाशसे बाँधे जानेका समाचार सुनकर बारह अक्षौहिणी सेनाके साथ प्रद्युम्न आदि वीरोंको साथ ले भगवान् श्रीकृष्णने शोणितपुरपर चढ़ाई कर दी।

उधर भगवान् श्रीरुद्र भी अपने भक्तके पक्षमें सज-धजकर आ डटे।

फिर तो श्रीकृष्ण और श्रीशिवका बड़ा भयानक युद्ध हुआ।

दोनों ओरसे ज्वर छोड़े गये।

अन्तमें श्रीकृष्णने स्वयं श्रीरुद्रके पास आकर उनका स्तवन करके कहा – ‘सर्वव्यापी शंकर! आप गुणोंसे निर्लिप्त होकर भी गुणोंसे ही गुणोंको प्रकाशित करते हैं।

गिरिशायी भूमन्! आप स्वप्रकाश हैं।

जिनकी बुद्धि आपकी मायासे मोहित हो गयी है, वे स्त्री, पुत्र, गृह आदि विषयोंमें आसक्त होकर दुःखसागरमें डूबते-उतराते हैं।

जो अजितेन्द्रिय पुरुष प्रारब्धवश इस मनुष्य-जन्मको पाकर भी आपके चरणोंमें प्रेम नहीं करता, वह शोचनीय तथा आत्मवंचक है।

भगवन्! आप गर्वहारी हैं, आपने ही तो इस गर्वीले बाणको शाप दिया था; अतः आपकी ही आज्ञासे मैं बाणासुरकी भुजाओंका छेदन करनेके लिये यहाँ आया हूँ।

इसलिये महादेव! आप इस युद्धसे निवृत्त हो जाइये।

प्रभो! मुझे बाणकी भुजाओंको काटनेके लिये आज्ञा प्रदान कीजिये, जिससे आपका शाप व्यर्थ न हो।’ महेश्वरने कहा – तात! आपने ठीक ही कहा है कि मैंने ही इस दैत्यराजको शाप दिया है और मेरी ही आज्ञासे आप बाणासुरकी भुजाएँ काटनेके लिये यहाँ पधारे हैं; किन्तु रमानाथ! हरे! क्या करूँ, मैं तो सदा भक्तोंके ही अधीन रहता हूँ।

ऐसी दशामें वीर! मेरे देखते बाणकी भुजाएँ कैसे काटी जा सकती हैं? इसलिये मेरी आज्ञासे आप पहले जृम्भणास्त्रद्वारा मुझे जृम्भित कर दीजिये, तत्पश्चात् अपना अभीष्ट कार्य सम्पन्न कीजिये और सुखी होइये।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनीश्वर! शंकरजीके यों कहनेपर शार्ङ्गपाणि श्रीहरिको महान् विस्मय हुआ।

वे अपने युद्ध-स्थानपर आकर परम आनन्दित हुए।

व्यासजी! तदनन्तर नाना प्रकारके अस्त्रोंके संचालनमें निपुण श्रीहरिने तुरंत ही अपने धनुषपर जृम्भणास्त्रका संधान करके उसे पिनाकपाणि शंकरपर छोड़ दिया।

इस प्रकार श्रीकृष्ण जृम्भणास्त्रद्वारा जृम्भित हुए शंकरको मोहमें डालकर खड्ग, गदा और ऋष्टि आदिसे बाणकी सेनाका संहार करने लगे।

(अध्याय ५१ – ५४) * क्षत्रियस्य रणे श्रेयो मरणं सम्मुखे सदा।

न वीरमानिनी भूमौ दीनस्येव कृताञ्जलेः।।

(शि० पु० रु० सं० युद्धखण्ड ५३।३५)


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