शिव पुराण - रुद्र संहिता - युद्ध खण्ड - 15


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शिव पुराण संहिता लिंकविद्येश्वर | रुद्र संहिता | शतरुद्र | कोटिरुद्र | उमा | कैलास | वायवीय


शुक्राचार्यकी घोर तपस्या और इनका शिवजीको चित्तरत्न अर्पण करना तथा अष्टमूर्त्यष्टक-स्तोत्रद्वारा उनका स्तवन करना, शिवजीका प्रसन्न होकर उन्हें मृतसंजीवनी विद्या तथा अन्यान्य वर प्रदान करना

सनत्कुमारजी कहते हैं – व्यासजी! मुनिवर शुक्राचार्यको शिवसे मृत्युंजय नामक मृत्युका प्रशमन करनेवाली परा विद्या किस प्रकार प्राप्त हुई थी, अब उसका वर्णन करता हूँ; सुनो।

पूर्वकालकी बात है, इन भृगुनन्दनने वाराणसीपुरीमें जाकर प्रभावशाली विश्वनाथका ध्यान करते हुए बहुत कालतक घोर तप किया था।

वेदव्यासजी! उस समय उन्होंने वहीं एक शिवलिंगकी स्थापना की और उसके सामने ही एक परम रमणीय कूप तैयार कराया।

फिर प्रयत्नपूर्वक उन देवेश्वरको एक लाख बार द्रोणभर पंचामृतसे तथा बहुत-से सुगन्धित द्रव्योंसे स्नान कराया।

फिर एक हजार बार परम प्रीतिपूर्वक चन्दन, यक्षकर्दम* और सुगन्धित उबटनका उस लिंगपर अनुलेप किया।

तत्पश्चात् सावधानीके साथ परम प्रेमपूर्वक राजचम्पक (अमलतास), धतूर, कनेर, कमल, मालती, कर्णिकार, कदम्ब, मौलसिरी, उत्पल, मल्लिका (चमेली), शतपत्री, सिन्धुवार, ढाक, बन्धूकपुष्प (गुलदुपहरी), पुंनाग, नागकेसर, केसर, नवमल्लिक (बेलमोगरा), चिबिलिक (रक्तदला), कुन्द (माघपुष्प), मुचुकुन्द (मोतिया), मन्दार, बिल्वपत्र, गूमा, मरुवृक (मरुआ), वृक (धूप), गँठिवन, दौना, अत्यन्त सुन्दर आमके पल्लव, तुलसी, देवजवासा, बृहत्पत्री, कुशांकु, नन्दावर्त (नाँदरूख), अगस्त्य, साल, देवदारु, कचनार, कुरबक (गुलखेरा), दुर्वांकुर, कुरंटक (करसैला) – इनमेंसे प्रत्येकके पुष्पों और अन्य पल्लवोंसे तथा नाना प्रकारके रमणीय पत्रों और सुन्दर कमलोंसे शंकरजीकी विधिवत् अर्चना की।

उन्हें बहुत-से उपहार समर्पित किये तथा शिवलिंगके आगे नाचते हुए शिवसहस्रनाम एवं अन्यान्य स्तोत्रोंका गान करके शंकरजीका स्तवन किया।

इस प्रकार शुक्राचार्य पाँच हजार वर्षोंतक नाना प्रकारके विधि-विधानसे महेश्वरका पूजन करते रहे; परंतु जब उन्हें थोड़ा-सा भी वर देनेके लिये उद्यत होते नहीं देखा, तब उन्होंने एक-दूसरे अत्यन्त दुस्सह एवं घोर नियमका आश्रय लिया।

उस समय शुक्रने इन्द्रियोंसहित मनके अत्यन्त चंचलतारूपी महान् दोषको बारंबार भावनारूपी जलसे प्रक्षालित किया।

इस प्रकार चित्तरत्नको निर्मल करके उसे पिनाकधारी शिवके अर्पण कर दिया और स्वयं धूमकणका पान करते हुए तप करने लगे।

इस प्रकार उनके एक सहस्र वर्ष और बीत गये।

तब भृगुनन्दन शुक्रको यों दृढ़चित्तसे घोर तप करते देखकर महेश्वर उनपर प्रसन्न हो गये।

फिर तो दक्षकन्या पार्वतीके स्वामी साक्षात् विरूपाक्ष शंकर, जिनके शरीरकी कान्ति सहस्रों सूर्योंसे भी बढ़कर थी, उस लिंगसे निकलकर शुक्रसे बोले।

महेश्वरने कहा – महाभाग भृगुनन्दन! तुम तो तपस्याकी निधि हो।

महामुने! मैं तुम्हारे इस अविच्छिन्न तपसे विशेष प्रसन्न हूँ।

भार्गव! तुम अपना सारा मनोवांछित वर माँग लो।

मैं प्रीतिपूर्वक तुम्हारा सारा मनोरथ पूर्ण कर दूँगा।

अब मेरे पास तुम्हारे लिये कोई वस्तु अदेय नहीं रह गयी है।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! शम्भुके इस परम सुखदायक एवं उत्कृष्ट वचनको सुनकर शुक्र प्रसन्न हो आनन्द-समुद्रमें निमग्न हो गये।

उन कमलनयन द्विजवर शुक्रका शरीर परमानन्दजनित रोमांचके कारण पुलकायमान हो गया।

तब उन्होंने हर्षपूर्वक शम्भुके चरणोंमें प्रणाम किया।

उस समय उनके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे।

फिर वे मस्तकपर अंजलि रखकर जय-जयकार करते हुए अष्टमूर्तिधारी* वरदायक शिवकी स्तुति करने लगे।

भार्गवने कहा – सूर्यस्वरूप भगवन्! आप त्रिलोकीका हित करनेके लिये आकाशमें प्रकाशित होते हैं और अपनी इन किरणोंसे समस्त अन्धकारको अभिभूत करके रातमें विचरनेवाले असुरोंका मनोरथ नष्ट कर देते हैं।

जगदीश्वर! आपको नमस्कार है।

घोर अन्धकारके लिये चन्द्र-स्वरूप शंकर! आप अमृतके प्रवाहसे परिपूर्ण तथा जगत् के सभी प्राणियोंके नेत्र हैं।

आप अपनी अमर्याद तेजोमय किरणोंसे आकाशमें और भूतलपर अपार प्रकाश फैलाते हैं, जिससे सारा अंधकार दूर हो जाता है; आपको प्रणाम है।

सर्वव्यापिन्! आप पावन पथ – योगमार्गका आश्रय लेनेवालोंकी सदा गति तथा उपास्यदेव हैं।

भुवनजीवन! आपके बिना भला, इस लोकमें कौन जीवित रह सकता है।

सर्पकुलके संतोषदाता! आप निश्चल वायुरूपसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी वृद्धि करनेवाले हैं, आपको अभिवादन है।

विश्वके एकमात्र पावनकर्ता! आप शरणागतरक्षक और अग्निकी एकमात्र शक्ति हैं।

पावक आपका ही स्वरूप है।

आपके बिना मृतकोंका वास्तविक दिव्य कार्य दाह आदि नहीं हो सकता।

जगत् के अन्तरात्मा! आप प्राणशक्तिके दाता, जगत्स्वरूप और पद-पदपर शान्ति प्रदान करनेवाले हैं; आपके चरणोंमें मैं सिर झुकाता हूँ।

जलस्वरूप परमेश्वर! आप निश्चय ही जगत् के पवित्रकर्ता और चित्र-विचित्र सुन्दर चरित्र करनेवाले हैं।

विश्वनाथ! जलमें अवगाहन करनेसे आप विश्वको निर्मल एवं पवित्र बना देते हैं, इसलिये आपको नमस्कार है।

आकाशरूप ईश्वर! आपसे अवकाश प्राप्त करनेके कारण यह विश्व बाहर और भीतर विकसित होकर सदा स्वभाववश श्वास लेता है अर्थात् इसकी परम्परा चलती रहती है तथा आपके द्वारा यह संकुचित भी होता है अर्थात् नष्ट हो जाता है; इसलिये दयालु भगवन्! मैं आपके आगे नतमस्तक होता हूँ।

विश्वम्भरात्मक! आप ही इस विश्वका भरण-पोषण करते हैं।

सर्वव्यापिन्! आपके अतिरिक्त दूसरा कौन अज्ञानान्धकारको दूर करनेमें समर्थ हो सकता है।

अतः विश्वनाथ! आप मेरे अज्ञानरूपी तमका विनाश कर दीजिये।

नागभूषण! आप स्तवनीय पुरुषोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं।

इसलिये आप परात्पर प्रभुको मैं बारंबार प्रणाम करता हूँ।

आत्मस्वरूप शंकर! आप समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मामें निवास करनेवाले, प्रत्येक रूपमें व्याप्त हैं और मैं आप परमात्माका जन हूँ।

अष्टमूर्ते! आपकी इन रूप-परम्पराओंसे यह चराचर विश्व विस्तारको प्राप्त हुआ है, अतः मैं सदासे आपको नमस्कार करता हूँ।

मुक्तपुरुषोंके बन्धो! आप विश्वके समस्त प्राणियोंके स्वरूप, प्रणतजनोंके सम्पूर्ण योगक्षेमका निर्वाह करनेवाले और परमार्थस्वरूप हैं।

आप अपनी इन अष्टमूर्तियोंसे युक्त होकर इस फैले हुए विश्वको भलीभाँति विस्तृत करते हैं, अतः आपको मेरा अभिवादन है।* सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनिवर! भृगुनन्दन शुक्रने इस प्रकार अष्टमूर्त्यष्टक-स्तोत्रद्वारा शिवजीका स्तवन करके भूमिपर मस्तक रखकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया।

जब अमित तेजस्वी भार्गवने महादेवकी इस प्रकार स्तुति की, तब शिवजीने चरणोंमें पड़े हुए उन द्विजवरको अपनी दोनों भुजाओंसे पकड़कर उठा लिया और परम प्रेमपूर्वक मेघगर्जनकी-सी गम्भीर एवं मधुर वाणीमें कहा।

उस समय शंकरजीके दाँतोंकी चमकसे सारी दिशाएँ प्रकाशित हो उठी थीं।

महादेवजी बोले – विप्रवर कवे! तुम मेरे पावन भक्त हो।

तात! तुम्हारे इस उग्र तपसे, उत्तम आचरणसे, लिंगस्थापनजन्य पुण्यसे, लिंगकी आराधना करनेसे, चित्तका उपहार प्रदान करनेसे, पवित्र अटलभावसे, अविमुक्त महाक्षेत्र काशीमें पावन आचरण करनेसे मैं तुम्हें पुत्ररूपसे देखता हूँ; अतः तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है।

तुम अपने इसी शरीरसे मेरी उदरदरीमें प्रवेश करोगे और मेरे श्रेष्ठ इन्द्रियमार्गसे निकलकर पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण करोगे।

महाशुचे! मेरे पास जो मृतसंजीवनी नामकी निर्मल विद्या है, जिसका मैंने ही अपने महान् तपोबलसे निर्माण किया है, उस महामन्त्ररूपा विद्याको आज मैं तुम्हें प्रदान करूँगा; क्योंकि तुम पवित्र तपकी निधि हो, अतः तुममें उस विद्याको धारण करनेकी योग्यता वर्तमान है।

तुम नियमपूर्वक जिस-जिसके उद्देश्यसे विद्येश्वरकी इस श्रेष्ठ विद्याका प्रयोग करोगे, वह निश्चय ही जीवित हो जायगा – यह सर्वथा सत्य है।

तुम आकाशमें अत्यन्त दीप्तिमान् तारारूपसे स्थित होओगे।

तुम्हारा तेज सूर्य और अग्निके तेजका भी अतिक्रमण कर जायगा।

तुम ग्रहोंमें प्रधान माने जाओगे।

जो स्त्री अथवा पुरुष तुम्हारे सम्मुख रहनेपर यात्रा करेंगे, उनका सारा कार्य तुम्हारी दृष्टि पड़नेसे नष्ट हो जायगा।

सुव्रत! तुम्हारे उदय होनेपर जगत् में मनुष्योंके विवाह आदि समस्त धर्मकार्य सफल होंगे।

सभी नन्दा (प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी) तिथियाँ तुम्हारे संयोगसे शुभ हो जायँगी और तुम्हारे भक्त वीर्यसम्पन्न तथा बहुत-सी संतानवाले होंगे।

तुम्हारे द्वारा स्थापित किया हुआ यह शिवलिंग ‘शुक्रेश’ के नामसे विख्यात होगा।

जो मनुष्य इस लिंगकी अर्चना करेंगे, उन्हें सिद्धि प्राप्त हो जायगी।

जो लोग वर्षपर्यन्त नक्तव्रतपरायण होकर शुक्रवारके दिन शुक्रकूपके जलसे सारी क्रियाएँ सम्पन्न करके शुक्रेशकी अर्चना करेंगे, उन्हें जिस फलकी प्राप्ति होगी, वह मुझसे श्रवण करो।

उन मनुष्योंमें वीर्यकी अधिकता होगी, उनका वीर्य कभी निष्फल नहीं होगा; वे पुत्रवान् तथा पुरुषत्वके सौभाग्यसे सम्पन्न होंगे।

इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

वे सभी मनुष्य बहुत-सी विद्याओंके ज्ञाता और सुखके भागी होंगे।

यों वरदान देकर महादेव उसी लिंगमें समा गये।

तब भृगुनन्दन शुक्र भी प्रसन्नमनसे अपने धामको चले गये।

व्यासजी! यों शुक्राचार्यको जिस प्रकार अपने तपोबलसे मृत्युंजय नामक विद्याकी प्राप्ति हुई थी, वह वृत्तान्त मैंने तुमसे वर्णन कर दिया।

अब और क्या सुनना चाहते हो?
(अध्याय ५०) * एक प्रकारका अंग-लेप जो कपूर, अगुरु, कस्तूरी और कंकोलको मिलाकर बनाया जाता है।

* पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, यजमान, चन्द्रमा और सूर्य – इन आठोंमें अधिष्ठित शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, महादेव और ईशान – ये अष्टमूर्तियोंके नाम हैं।

* त्वं भाभिराभिरभिभूय तमस्समस्तमस्तं नयस्यभिमतानि निशाचराणाम्।

   देदीप्यसे दिवमणे गगने हिताय लोकत्रयस्य जगदीश्वर तन्नमस्ते।।

लोकेऽतिवेलमतिवेलमहामहोभिर्निर्भासि कौ च गगनेऽखिललोकनेत्रः।

   विद्राविताखिलतमास्सुतमो हिमांशो पीयूषपूरपरिपूरित तन्नमस्ते।।

त्वं पावने पथि सदा गतिरप्युपास्यः कस्त्वां विना भुवनजीवन जीवतीह।

   स्तब्धप्रभञ्जनविवर्धितसर्वजन्तो संतोषिताहिकुल सर्वग वै नमस्ते।।

विश्वैकपावक नतावक पावकैक शक्ते ऋते मृतवतामृतदिव्यकार्यम्।

   प्राणिष्यदो जगदहो जगदान्तरात्मंस्त्वं पावकः प्रतिपदं शमदो नमस्ते।।

पानीयरूप परमेश जगत्पवित्र चित्रातिचित्रसुचरित्रकरोऽसि नूनम्।

   विश्वं पवित्रममलं किल विश्वनाथ पानीयगाहनत एतदतो नतोऽस्मि।।

आकाशरूपबहिरन्तरुतावकाशदानाद् विकस्वरमिहेश्वर विश्वमेतत्।

   त्वत्तस्सदा सदय संश्वसिति स्वभावात् संकोचमेति भवतोऽस्मि नतस्ततस्त्वाम्।।

विश्वम्भरात्मक बिभर्षि विभोऽत्र विश्वं को विश्वनाथ भवतोऽन्यतमस्तमोऽरिः।

   स त्वं विनाशय तमो मम चाहिभूष स्तव्यात्परः परपरं प्रणतस्ततस्त्वाम्।।

  आत्मस्वरूप तव रूपपरम्पराभिराभिस्ततं हर चराचररूपमेतत्।

  सर्वान्तरात्मनिलय प्रतिरूपरूप नित्यं नतोऽस्मि परमात्मजनोऽष्टमूर्ते।।

  इत्यष्टमूर्तिभिरिमाभिरबन्धबन्धो युक्तः करोषि खलु विश्वजनीनमूर्ते।

  एतत्ततं सुविततं प्रणतप्रणीत सर्वार्थसार्थपरमार्थ ततो नतोऽस्मि।।

(शि० पु० रु० सं० युद्धखण्ड ५०।२४ – ३२)


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