शिव पुराण - रुद्र संहिता - युद्ध खण्ड - 13


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शिव पुराण संहिता लिंकविद्येश्वर | रुद्र संहिता | शतरुद्र | कोटिरुद्र | उमा | कैलास | वायवीय


भाइयोंके उपालम्भसे अन्धकका तप करना और वर पाकर त्रिलोकीको जीतकर स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त होना, उसके मन्त्रियोंद्वारा शिव-परिवारका वर्णन, पार्वतीके सौन्दर्यपर मोहित होकर अन्धकका वहाँ जाना और नन्दीश्वरके साथ युद्ध, अन्धकके प्रहारसे नन्दीश्वरकी मूर्च्छा, पार्वतीके आवाहनसे देवियोंका प्रकट होकर युद्ध करना, शिवका आगमन और युद्ध, शिवद्वारा शुक्राचार्यका निगला जाना, शिवकी प्रेरणासे विष्णुका कालीरूप धारण करके दानवोंके रक्तका पान करना, शिवका अन्धकको अपने त्रिशूलमें पिरोना और युद्धकी समाप्ति

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनिवर! एक समय हिरण्याक्षका पुत्र अन्धक अपने भाइयोंके साथ विहारमें संलग्न था।

उसी समय उसके कामासक्त मदान्ध भाइयोंने उससे कहा – ‘अरे अन्धे! तुम्हें तो अब राज्यसे क्या प्रयोजन है? हिरण्याक्ष तो मूर्ख था, जो उसने घोर तपद्वारा शंकरजीको प्रसन्न करके भी तुम-जैसे कुरूप, बेडौल, कलिप्रिय और नेत्रहीनको प्राप्त किया! ऐसे तुम राज्यके भागी तो हो नहीं सकते; क्योंकि भला, तुम्हीं विचार करो कि कहीं दूसरेसे उत्पन्न हुआ पुत्र भी राज्य पाता है? सच पूछो तो निश्चय ही इस राज्यके भागी हमींलोग हैं।’ सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! उन लोगोंकी वह बात सुनकर अन्धक दीन हो गया।

फिर उसने स्वयं ही बुद्धिपूर्वक विचार करके तरह-तरहकी बातोंसे उन्हें शान्त किया और रातके समय वह निर्जन वनमें चला गया।

वहाँ उसने हजारों वर्षोंतक घोर तप करके अपने शरीरको सुखा डाला और अन्तमें उस शरीरको अग्निमें होम देना चाहा।

तब ब्रह्माजीने उसे वैसा करनेसे रोककर कहा – ‘दानव! अब तू वर माँग ले।

सारे संसारमें जिस दुर्लभ वस्तुको प्राप्त करनेकी तेरी अभिलाषा हो, उसे तू मुझसे ले ले।’ पद्मयोनि ब्रह्माके वचनको सुनकर वह दैत्य दीनता एवं नम्रतापूर्वक कहने लगा – ‘भगवन्! जिन निष्ठुरोंने मेरा राज्य छीन लिया है, वे सब दैत्य आदि मेरे भृत्य हो जायँ, मुझ अंधेको दिव्य चक्षु प्राप्त हो जाय, इन्द्र आदि देवता मुझे कर दिया करें और देवता, दैत्य, गन्धर्व, यक्ष, नाग, मनुष्य, दैत्योंके शत्रु नारायण, सर्वमय शंकर तथा अन्यान्य किन्हीं भी प्राणियोंसे मेरी मृत्यु न हो।’ उसके उस अत्यन्त दारुण वचनको सुनकर ब्रह्माजी सशंकित हो उठे और उससे बोले।

ब्रह्माजीने कहा – दैत्येन्द्र! ये सारी बातें तो हो जायँगी, किन्तु तू अपने विनाशका कोई कारण भी तो स्वीकार कर ले; क्योंकि जगत् में कोई ऐसा प्राणी न हुआ है और न आगे होगा ही, जो कालके गालमें न गया हो।

फिर तुझ-जैसे सत्पुरुषोंको तो अत्यन्त लंबे जीवनका विचार त्याग ही देना चाहिये।

ब्रह्माके इस अनुनयभरे वचनको सुनकर वह दैत्य पुनः बोला।

अन्धकने कहा – प्रभो! तीनों कालोंमें जो उत्तम, मध्यम और नीच नारियाँ होती हैं, उन्हीं नारियोंमें कोई रत्नभूता नारी मेरी भी जननी होगी।

वह मनुष्यलोकके लिये दुर्लभ तथा शरीर, मन और वचनसे भी अगम्य है।

उसमें राक्षस-भावके कारण जब मेरी काम-भावना उत्पन्न हो जाय, तभी मेरा नाश हो।

उसकी बात सुनकर स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माको महान् आश्चर्य हुआ।

वे शंकरजीके चरणकमलोंका स्मरण करने लगे।

तब शम्भुकी आज्ञा पाकर वे उस अन्धकसे बोले।

ब्रह्माजीने कहा – दैत्यवर! तू जो कुछ चाहता है, तेरे वे सभी सकाम वचन पूर्ण होंगे।

दैत्येन्द्र! अब तू उठ, अपना अभीष्ट प्राप्त कर और सदा वीरोंके साथ युद्ध करता रह।

मुनीश! हिरण्याक्षपुत्र अन्धकके शरीरमें नसें और हड्डियाँ ही शेष रह गयी थीं।

वह ब्रह्माके ऐसे वचनको सुनकर शीघ्र ही भक्तिपूर्वक उन लोकेश्वरके चरणोंमें लोट गया और इस प्रकार बोला।

अन्धकने कहा – विभो! जब मेरे शरीरमें नसें और हड्डियाँमात्र ही शेष रह गयी हैं, तब भला इस देहसे शत्रुसेनामें प्रवेश करके मैं कैसे युद्ध कर सकूँगा; अतः अब आप अपने पवित्र हाथसे मेरा स्पर्श करके इस शरीरको मांसल बना दीजिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं – महर्षे! अन्धककी प्रार्थना सुनकर ब्रह्माजीने अपने हाथसे उसके शरीरका स्पर्श किया और फिर वे मुनिगणों तथा सिद्धसमूहोंसे भलीभाँति पूजित हो देवताओंके साथ अपने धामको चले गये।

ब्रह्माके स्पर्श करते ही उस दैत्यराजका शरीर भरा-पूरा हो गया, जिससे उसमें बलका संचार हो आया तथा नेत्रोंके प्राप्त हो जानेसे वह सुन्दर दीखने लगा।

तब उसने प्रसन्नतापूर्वक अपने नगरमें प्रवेश किया।

उस समय प्रह्लाद आदि श्रेष्ठ दानवोंने जब उसे वरदान प्राप्त करके आया हुआ जाना, तब वे सारा राज्य उसे समर्पित करके उसके वशवर्ती भृत्य हो गये।

तदनन्तर अन्धक सेना और भृत्य-वर्गको साथ ले स्वर्गको जीतनेके लिये गया।

वहाँ संग्राममें समस्त देवताओंको पराजित करके उसने वज्रधारी इन्द्रको अपना करद बना लिया।

उसने यत्र-तत्र बहुत-सी लड़ाइयाँ लड़कर नागों, सुपर्णों, श्रेष्ठ राक्षसों, गन्धर्वों, यक्षों, मनुष्यों, बड़े-बड़े पर्वतों, वृक्षों और सिंह आदि समस्त चौपायोंको भी जीत लिया।

यहाँतक कि उसने चराचर त्रिलोकीको अपने वशमें कर लिया।

तदनन्तर वह रसातलमें, भूतलपर तथा स्वर्गमें जितनी सुन्दर रूपवाली नारियाँ थीं, उनमेंसे हजारोंको, जो अत्यन्त दर्शनीय तथा अपने अनुकूल थीं, साथ लेकर विभिन्न पर्वतोंपर तथा नदियोंके रमणीय तटोंपर विहार करने लगा।

दैत्यराज अन्धक सदा दुष्टोंका ही संग करता था।

उसकी बुद्धि मदसे अन्धी हो गयी थी, जिससे उस मूढ़को इसका कुछ भी ज्ञान नहीं रह गया कि परलोकमें आत्माको सुख देनेवाला भी कोई कर्म करना चाहिये।

इस प्रकार वह महामनस्वी दैत्य उन्मत्त हो और अपने सारे प्रधान-प्रधान पुत्रोंको कुतर्कवादसे पराजित करके दैत्योंसहित सम्पूर्ण वैदिक धर्मोंका विनाश करता हुआ विचरण करने लगा।

वह धनके मदसे अभिभूत हो वेद, देवता, ब्राह्मण और गुरु आदि किसीको भी नहीं मानता था।

प्रारब्धवश उसकी आयु समाप्त हो चुकी थी, इसीसे वह स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त हो व्यर्थमें ही अपनी आयुके शेष दिन गँवाता हुआ रमण कर रहा था।

उस दानवश्रेष्ठके तीन मन्त्री थे, जिनका नाम था – दुर्योधन, वैधस और हस्ती।

एक समय उन तीनोंने उस पर्वतके किसी रमणीय स्थानपर एक परम रूपवती नारीको देखा।

उसे देखकर वे शीघ्रगामी श्रेष्ठ दैत्य हर्षमग्न हो तुरंत ही महादैत्यपति वीरवर अन्धकके पास पहुँचे और बड़े प्रेमसे उस देखी हुई घटनाका वर्णन करने लगे।

मन्त्रियोंने कहा – दैत्येन्द्र! यहाँ एक गुफाके भीतर हमने एक मुनिको देखा है।

ध्यानस्थ होनेके कारण उसके नेत्र बंद हैं।

वह बड़ा रूपवान् है।

उसके मस्तकपर अर्धचन्द्रकी कला अपनी छटा बिखेर रही है और कमरमें गजेन्द्रकी खाल बँधी हुई है।

बड़े-बड़े नाग उसके सारे शरीरमें लिपटे हुए हैं।

खोपड़ियोंकी माला ही उस जटाधारीका आभूषण है।

उसके हाथमें त्रिशूल है तथा एक विशाल धनुष, बाण और तूणीर भी वह धारण किये हुए है।

उसका अक्षसूत्र स्पष्ट दीख रहा है।

उसके चार भुजाएँ तथा लंबी-लंबी जटाएँ हैं।

वह खड्ग, त्रिशूल और लकुट धारण किये हुए है।

उसकी आकृति अत्यन्त गौर है और उसपर भस्मका अनुलेप लगा हुआ है।

वह अपने उत्कृष्ट तेजसे सुशोभित हो रहा है।

इस प्रकार उस श्रेष्ठ तपस्वीका सारा वेष ही अद् भुत है।

उससे थोड़ी ही दूरपर हमने एक और पुरुषको देखा है, जो विकराल वानर-सा है।

उसका मुख बड़ा भयंकर है।

वह सभी आयुध धारण किये हुए है, परंतु उसका हाथ रूक्ष है।

वह उस तपस्वीकी रक्षामें तत्पर है।

उसके पास ही एक बूढ़ा सफेद रंगका बैल भी बैठा है।

उस बैठे हुए तपस्वीके पार्श्वभागमें हमने एक शुभलक्षणसम्पन्ना नारीको भी देखा है।

वह भूतलपर रत्नस्वरूपा है।

उसका रूप बड़ा मनोरम है और तरुणी होनेके नाते वह मनको मोहे लेती है।

मूँगे, मोती, मणि, सुवर्ण, रत्न और उत्तम वस्त्रोंसे वह सुसज्जित है।

उसके गलेमें सुन्दर मालाएँ लटक रही हैं।

(कहाँतक कहें, वह इतनी सुन्दरी है कि) जिसने उसे एक बार देख लिया, उसीका नेत्र धारण करना सफल है।

उसे फिर इस लोकमें अन्य वस्तुओंके देखनेसे क्या प्रयोजन।

वह दिव्य नारी पुण्यात्मा मुनिवर महेशकी मान्या एवं प्रियतमा भार्या है।

दैत्येन्द्र! आप तो उत्तमोत्तम रत्नोंका उपभोग करनेवाले हैं।

अतः उसे यहाँ बुलवाकर देखिये।

वह आपके भी देखनेयोग्य है।

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनिश्रेष्ठ! मन्त्रियोंके उन वचनोंको सुनकर दैत्यराज अन्धक कामातुर हो उठा।

उसके सारे शरीरमें कम्प छा गया।

फिर तो उसने तुरंत ही दुर्योधन आदिको उस मुनिके पास भेजा।

मन्त्रियोंने वहाँ जाकर मुनीश्वरको प्रणाम करके उनसे अन्धकासुरका संदेश कहा तथा बदलेमें शिवजीका उत्तर सुनकर वे लौटकर अन्धकसे बोले।

मन्त्रियोंने कहा – राजन्! आप तो सम्पूर्ण दैत्योंके स्वामी हैं, फिर भी उस महान् पराक्रमी वीरवर तपस्वी मुनिने अपनी बुद्धिसे त्रिलोकीको तृणके समान समझकर हँसते हुए आपके लिये ऐसी बातें कही हैं – ‘उस निशाचरका शौर्य और धैर्य अस्थिर हैं।

वह दानव कृपण, सत्त्वहीन, क्रूर, कृतघ्न और सदा ही पापकर्म करनेवाला है।

क्या उसे सूर्यपुत्र यमका भय नहीं है? कहाँ तो मैं, मेरे दारुण शस्त्र और मृत्युको भी संत्रस्त कर देनेवाला युद्ध और कहाँ वह वानरका-सा मुखवाला डरपोक निशाचर, जिसके सारे अंग बुढ़ापेसे जर्जर हो गये हैं! कहाँ मेरा यह स्वरूप और कहाँ तेरी मन्दभाग्यता! तेरी सेना भी तो नहींके बराबर ही है।

फिर भी यदि तुझमें कुछ सामर्थ्य हो तो युद्धके लिये तैयार हो जा और आकर कुछ अपनी करतूत दिखा।

मेरे पास तुझ-जैसे पापियोंका विनाश करनेवाला वज्र-सरीखा भयंकर शस्त्र है और तेरा शरीर तो कमलके समान कोमल है।

ऐसी दशामें विचार करके तुझे जो रुचिकर प्रतीत हो, वह कर।’ सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनिवर! मन्त्रियोंकी बात सुनकर (माता) पार्वतीपर मोहित हुआ वह कामान्ध राक्षस विशाल सेना लेकर चल दिया और वहाँ पहुँचकर नन्दीश्वरसे युद्ध करने लगा।

बड़ा भयानक युद्ध हुआ।

उस समय युद्धस्थलमें चर्बी, मज्जा, मांस और रक्तकी कीच मच गयी।

वहाँ सिर कटे हुए धड़ नाच रहे थे और कच्चा मांस खानेवाले जानवर चारों ओर व्याप्त हो गये थे, जिससे वह बड़ा भयंकर लग रहा था।

थोड़ी ही देरमें दैत्य भाग खड़े हुए।

तब पिनाकधारी भगवान् शंकर दक्ष-कन्या सतीको भलीभाँति धीरज बँधाते हुए बोले – ‘प्रिये! मैंने जो पहले अत्यन्त भयंकर महान् पाशुपत-व्रतका अनुष्ठान किया था, उसमें रात-दिन तुम्हारे प्रसंगवश जो हमारी सेनाका विनाश हुआ है, यह विघ्न-सा आ पड़ा है।

देवि! मरणधर्मा प्राणियोंका जो अमरोंपर आक्रमण हुआ है, यह मानो पुण्यका विनाश करनेवाला कोई ग्रह प्रकट हो गया है।

अतः अब मैं पुनः किसी निर्जन वनमें जाकर उस परम अद्भुत दिव्य व्रतकी दीक्षा लूँगा और उस कठिन व्रतका अनुष्ठान करूँगा।

सुन्दरि! तुम्हारा शोक और भय दूर हो जाना चाहिये।’ सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने! इतना कहकर उग्र प्रभाशाली महात्मा शंकर धीरेसे अपना सिंगा बजाकर एक अत्यन्त भयंकर पावन वनमें चले गये।

वहाँ वे एक हजार वर्षोंके लिये पाशुपतव्रतके अनुष्ठानमें तत्पर हो गये।

इस व्रतका निभाना देवों और असुरोंकी शक्तिके बाहर है।

इधर शीलगुणसे सम्पन्न पतिव्रता देवी पार्वती मन्दराचलपर ही रहकर शिवजीके आगमनकी प्रतीक्षा करती रहती थीं।

यद्यपि पुत्रस्थानीय वीरकगण उनकी सुरक्षामें तत्पर थे, तथापि उस गुहाके भीतर अकेली रहनेके कारण वे सदा भयभीत रहती थीं, जिससे उन्हें बड़ा दुःख होता था।

इसी बीच वरदानके प्रभावसे उन्मत्त हुआ वह दैत्य अन्धक, जिसका धैर्य कामदेवके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हो गया था, अपने मुख्य-मुख्य योधाओंको साथ ले पुनः उस गुफापर चढ़ आया।

वहाँ सैनिकोंसहित उसने वीरकगणके साथ अत्यन्त अद्भुत युद्ध किया।

उस समय सभी वीरोंने अन्न, जल और नींदका परित्याग कर दिया था।

इस प्रकार वह युद्ध लगातार पाँच सौ पाँच दिन-राततक चलता रहा।

अन्तमें दैत्योंकी भुजाओंसे छूटे हुए आयुधोंके प्रहारसे नन्दीश्वरका शरीर घायल हो गया, जिससे वे गुहाद्वारपर ही गिर पड़े और मूर्च्छित हो गये।

उनके गिरनेसे गुहाका सारा दरवाजा ही ढक गया, जिससे उसका खोला जाना असम्भव था।

फिर दैत्योंने दो ही घड़ीमें सारे वीरकगणको अपने अस्त्रसमूहोंसे आच्छादित कर दिया।

तब पार्वतीने भगवान् विष्णु और ब्रह्माजीका स्मरण किया।

स्मरण करते ही ब्राह्मी, नारायणी, ऐन्द्री, वैश्वानरी, याम्या, नैर्ऋति, वारुणी, वायवी, कौबेरी, यक्षेश्वरी, गारुड़ी आदि देवियोंके रूपमें समस्त देवता, यक्ष, सिद्ध, गुह्यक आदि शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित होकर अपने-अपने वाहनोंपर सवार हो पार्वतीके पास आ पहुँचे और राक्षसोंके साथ भिड़ गये।

कुछ समय बाद भगवान् शिव भी आ गये।

फिर तो घोर युद्ध हुआ।

तदनन्तर शुक्राचार्यको संजीवनी विद्याके द्वारा दैत्योंको जीवित करते देखकर भूतनाथ शिवजी उनको निगल गये।

इससे दैत्य ढीले पड़ गये।

व्यासजी! अन्धक महान् पराक्रमी, वीर और त्रिपुरहन्ता शिवके समान बुद्धिमान् था।

सैकड़ों वरदान मिलनेके कारण वह उन्मादके वशीभूत हो रहा था।

यद्यपि बहुसंख्यक शस्त्रास्त्रोंकी चोटसे उसका शरीर जर्जर हो गया था, फिर भी शिवजीपर विजय पानेके लिये उसने दूसरी माया रची।

जब प्रलयकालीन अग्निके समान शरीर धारण करनेवाले भूतनाथ त्रिपुरारि शंकरने अपने त्रिशूलसे उसे बुरी तरह छेद डाला, तब भूतलपर गिरे हुए उसके रक्तकणोंसे यूथ-के-यूथ अन्धक प्रकट हो गये।

उनसे सारी रणभूमि व्याप्त हो गयी।

वे विकृत मुखवाले भयंकर राक्षस अन्धकके सदृश ही पराक्रमी थे।

इस प्रकार जब पशुपतिद्वारा मारे गये सैनिकोंके घावोंसे निकले हुए अत्यन्त गरम-गरम रक्तबिन्दुओंसे दूसरे सैनिक उत्पन्न होने लगे, तब बहुत-सी भुजारूपी लताओंद्वारा आक्रान्त होनेके कारण कुपित हुए बुद्धिमान् भगवान् विष्णुने प्रमथनाथ शिवको बुलाकर योगबलसे एक ऐसा अजेय स्त्रीरूप धारण किया, जिसका मुख विकृत था और रूप उग्र, विकराल और कंकालमात्र था।

वह स्त्रीरूप शम्भुके कानसे निकला था।

जब उन देवीने रणभूमिमें उपस्थित हो अपने युगल चरणोंसे पृथ्वीको अलंकृत किया, तब सभी देवता उनकी स्तुति करने लगे।

तत्पश्चात् भगवान् ने उनकी बुद्धिको प्रेरित किया।

फिर तो वे क्षुधार्त होकर रणके मुहानेपर उन सैनिकोंके तथा दैत्यराजके शरीरसे निकले हुए अत्यन्त गरम-गरम रुधिरका पान करने लगीं।

(जिससे राक्षसोंका उत्पन्न होना बंद हो गया।) तदनन्तर एकमात्र अन्धक ही बच रहा।

यद्यपि उसके शरीरका रक्त सूख गया था, तथापि वह अपने कुलोचित सनातन क्षात्रधर्मका स्मरण करके अविनाशी भगवान् शंकरके साथ भयंकर थप्पड़ोंसे, वज्र-सदृश जानुओं और चरणोंसे, वज्राकार नखोंसे, मुख, भुजा और सिरोंसे संग्राम करता रहा।

तब प्रमथनाथ शिवने रणभूमिमें उसका हृदय विदीर्ण करके उसे शान्त कर दिया।

फिर त्रिशूल भोंककर उसे स्थाणुके समान ऊपरको उठा लिया।

उसका जर्जर शरीर नीचेको लटक रहा था।

सूर्यकी किरणोंने उसे सुखा दिया।

पवनके झोंकोंसे युक्त मेघोंने मूसलाधार जल बरसाकर उसे गीला कर दिया।

हिमखण्डके समान शीतल चन्द्रमाकी किरणोंने उसे विशीर्ण कर दिया।

फिर भी उस दैत्यराजने अपने प्राणोंका परित्याग नहीं किया।

उसने विशेषरूपसे शिवजीका स्तवन किया।

तब करुणाके अगाध सागर शम्भु प्रसन्न हो गये और उन्होंने उसे प्रेमपूर्वक गणाध्यक्षका पद प्रदान कर दिया।

तत्पश्चात् युद्धके समाप्त हो जानेपर लोकपालोंने नाना प्रकारके सारगर्भित स्तोत्रोंद्वारा विधि-पूर्वक शिवजीकी अर्चना की और हर्षित हुए ब्रह्मा, विष्णु आदि देवोंने गर्दन झुकाकर उत्तमोत्तम स्तुतियोंद्वारा उनका स्तवन किया।

फिर जय-जयकार करते हुए वे आनन्द मनाने लगे।

तदनन्तर शिवजी उन सबको साथ लेकर आनन्दपूर्वक गिरिराजकी गुफाको लौट आये।

वहाँ उन्होंने अपने ही अंशभूत पूजनीय देवताओंको नाना प्रकारकी भेंट समर्पित करके उन्हें विदा किया और स्वयं प्रमुदित हुई गिरिराजकुमारीके साथ उत्तमोत्तम लीलाएँ करने लगे।

(अध्याय ४४ – ४६)


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