शिव पुराण - रुद्र संहिता - कुमार खण्ड - 4


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शिव पुराण संहिता लिंकविद्येश्वर | रुद्र संहिता | शतरुद्र | कोटिरुद्र | उमा | कैलास | वायवीय


पार्वतीद्वारा गणेशजीको वरदान, देवोंद्वारा उन्हें अग्रपूज्य माना जाना, शिवजीद्वारा गणेशको सर्वाध्यक्ष-पद प्रदान और गणेशचतुर्थीव्रतका वर्णन, तत्पश्चात् सभी देवताओंका उनकी स्तुति करके हर्षपूर्वक अपने-अपने स्थानको लौट जाना

ब्रह्माजी कहते हैं – मुने! जब विकृत स्वरूपवाले गिरिजा-पुत्र गजानन व्यग्रतारहित होकर जीवित हो उठे, तब गणनायक देवोंने उनका अभिषेक किया।

अपने पुत्रको देखकर पार्वतीदेवी आनन्दमग्न हो गयीं और उन्होंने हर्षातिरेकसे उस बालकको दोनों हाथोंसे पकड़कर छातीसे लगा लिया।

फिर अम्बिकाने प्रसन्न होकर अपने पुत्र गणेशको अनेक प्रकारके वस्त्र और आभूषण प्रदान किये।

तदनन्तर सिद्धियोंने अनेकों विधि-विधानसे उनका पूजन किया और माताने अपने सर्वदुःखहारी हाथसे उनके अंगोंका स्पर्श किया।

इस प्रकार शिव-पत्नी पार्वतीदेवीने अपने पुत्रका सत्कार करके उसका मुख चूमा और प्रेमपूर्वक उसे वरदान देते हुए कहा – ‘बेटा! इस समय तुझे बड़ा कष्ट झेलना पड़ा है।

किंतु अब तू कृतकृत्य हो गया है।

तू धन्य है।

अबसे सम्पूर्ण देवताओंमें तेरी अग्रपूजा होती रहेगी और तुझे कभी दुःखका सामना नहीं करना पड़ेगा।

चूँकि इस समय तेरे मुखपर सिन्दूर दीख रहा है।

इसलिये मनुष्योंको सदा सिन्दूरसे तेरी पूजा करनी चाहिये।

जो मनुष्य पुष्प, चन्दन, सुन्दर गन्ध, नैवेद्य, रमणीय आरती, ताम्बूल और दानसे तथा परिक्रमा और नमस्कार करके विधिपूर्वक तेरी पूजा करेगा, उसे सारी सिद्धियाँ हस्तगत हो जायँगी और उसके सभी प्रकारके विघ्न नष्ट हो जायँगे – इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है।’ ब्रह्माजी कहते हैं – मुने! महेश्वरीदेवीने अपने पुत्र गणेशसे यों कहकर उसे नाना प्रकारकी वस्तुएँ प्रदान करके पुनः उसका अभिनन्दन किया।

विप्र! तब गिरिजाकी कृपासे उसी क्षण देवताओं और शिवगणोंका मन विशेषरूपसे शान्त हो गया।

तदनन्तर इन्द्र आदि देवताओंने हर्षातिरेकसे शिवाकी स्तुति की और उन्हें प्रसन्न करके वे भक्तिभावित चित्तसे गणेशदेवको लेकर शिवजीके समीप चले।

वहाँ पहुँचकर उन्होंने त्रिलोकीकी कल्याणकामनासे भवानीके उस बालकको शिवजीकी गोदमें बैठा दिया।

तब शिवजी भी उस बालकके मस्तकपर अपना करकमल फेरते हुए देवताओंसे बोले – ‘यह मेरा दूसरा पुत्र है।’ तत्पश्चात् गणेशने भी उठकर शिवजीके चरणोंमें अभिवादन किया।

फिर पार्वतीको, मुझको, विष्णुको और नारद आदि सभी ऋषियोंको प्रणाम करके आगे खड़े होकर उन्होंने कहा – ‘यों अभिमान करना मनुष्योंका स्वभाव ही है, अतः आपलोग मेरा अपराध क्षमा करें।’ तब मैं, शंकर और विष्णु – इन तीनों देवताओंने एक साथ ही प्रेमपूर्वक उन्हें उत्तम वर प्रदान करते हुए कहा – ‘सुरवरो! जैसे त्रिलोकीमें हम तीनों देवोंकी पूजा होती है, उसी तरह तुम सबको इन गणेशका भी पूजन करना चाहिये।

मनुष्योंको चाहिये कि पहले इनकी पूजा करके तत्पश्चात् हमलोगोंका पूजन करें।

ऐसा करनेसे हमलोगोंकी पूजा सम्पन्न हो जायगी।

देवगणो! यदि कहीं इनकी पूजा पहले न करके अन्य देवका पूजन किया गया तो उस पूजनका फल नष्ट हो जायगा – उसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।’ ब्रह्माजी कहते हैं – मुने! तदनन्तर ब्रह्मा, विष्णु और शंकर आदि सभी देवताओंने मिलकर पार्वतीको प्रसन्न करनेके लिये वहीं गणेशको ‘सर्वाध्यक्ष’ घोषित कर दिया।

उसी समय शिवजी परम प्रसन्न चित्तसे पुनः गणेशको लोकमें सर्वदा सुख देनेवाले अनेकों वर प्रदान करते हुए बोले – शिवजीने कहा – गिरिजानन्दन! निस्संदेह मैं तुझपर परम प्रसन्न हूँ।

मेरे प्रसन्न हो जानेपर अब तू सारे जगत् को ही प्रसन्न हुआ समझ।

अब कोई भी तेरा विरोध नहीं कर सकता।

तू शक्तिका पुत्र है, अतः अत्यन्त तेजस्वी है।

बालक होनेपर भी तूने महान् पराक्रम प्रकट किया है, इसलिये तू सदा सुखी रहेगा।

विघ्ननाशके कार्यमें तेरा नाम सबसे श्रेष्ठ होगा।

तू सबका पूज्य है, अतः अब मेरे सम्पूर्ण गणोंका अध्यक्ष हो जा।

इतना कहनेके पश्चात् महात्मा शंकर अत्यन्त प्रसन्नताके कारण गणेशको पुनः वरदान देते हुए बोले – ‘गणेश्वर! तू भाद्रपद मासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको चन्द्रमाका शुभोदय होनेपर उत्पन्न हुआ है।

जिस समय गिरिजाके सुन्दर चित्तसे तेरा रूप प्रकट हुआ, उस समय रात्रिका प्रथम प्रहर बीत रहा था।

इसलिये उसी दिनसे आरम्भ करके उसी तिथिमें तेरा उत्तम व्रत करना चाहिये।

यह व्रत परम शोभन तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंका प्रदाता है।

वर्षके अन्तमें जब पुनः वही चतुर्थी आ जाय तबतक मेरे कथनानुसार तेरे व्रतका पालन करना चाहिये।

जिन्हें संसारमें अनेकों प्रकारके अनुपम सुखोंकी कामना हो, उन्हें चतुर्थीके दिन भक्तिपूर्वक विधिसहित तेरा पूजन करना चाहिये।

जब मार्गशीर्षमासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी आये तब उस दिन प्रातःकाल स्नान करके व्रतके लिये ब्राह्मणोंसे निवेदन करे।

पूर्वोक्त विधिसे उपवास करे।

फिर धातुकी, मूँगेकी, श्वेत मदारकी अथवा मिट्टीकी मूर्ति बनाकर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा करे और भक्तिभावसे नाना प्रकारके दिव्य गन्धों, चन्दनों और पुष्पोंसे उसकी पूजा करे।

पुनः रात्रिका प्रथम प्रहर बीत जानेपर स्नान करके दूर्वादलोंसे पूजन करना चाहिये।

यह दूर्वा जड़रहित, बारह अंगुल लम्बी और तीन गाँठोंवाली होनी चाहिये।

ऐसी एक सौ एक अथवा इक्कीस दूर्वासे उस स्थापित प्रतिमाकी पूजा करे।

तत्पश्चात् धूप, दीप, अनेक प्रकारके नैवेद्य, ताम्बूल, अर्घ्य और उत्तम-उत्तम पदार्थोंद्वारा गणेशकी पूजा करे और स्तवन करके उसके आगे प्रणिपात करे।

यों गणेशकी पूजा करनेके पश्चात् बालचन्द्रमाका पूजन करे।

तत्पश्चात् हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें मिष्टान्नका भोजन कराये।

उनके भोजन कर लेनेके बाद स्वयं भी नमकरहित मिष्टान्नका ही प्रसाद पाये।

फिर गणेशका स्मरण करके अपने सभी नियमोंका विसर्जन कर दे।

इस प्रकार करनेसे यह शुभव्रत पूर्ण होता है।

‘बेटा! यों व्रत करते-करते जब वर्ष पूरा हो जाय, तब व्रती मनुष्यको चाहिये कि वह व्रतकी पूर्तिके लिये व्रतोद्यापनका कार्य भी सम्पन्न करे।

इसमें मेरे आज्ञानुसार बारह ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये।

व्रतीको चाहिये कि वह एक कलश स्थापित करके उसपर तेरी मूर्तिकी पूजा करे।

तत्पश्चात् वेदविधिके अनुसार वेदीका निर्माण करके उसपर अष्टदल कमल बनाये, फिर उसीपर धनकी कंजूसी छोड़कर हवन करे।

पुनः मूर्तिके सामने दो स्त्रियों और दो बालकोंको बिठाकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करे और सादर उन्हें भोजन कराये।

रातमें जागरण करे।

प्रातःकाल पुनः पूजन करके पुनरागमनके लिये विसर्जन कर दे।

बालकोंसे आशीर्वाद ग्रहण करे, स्वस्तिवाचन कराये और व्रतकी पूर्तिके लिये पुष्पांजलि निवेदित करे।

फिर नमस्कार करके नाना प्रकारके कार्योंकी कल्पना करे।

इस प्रकार जो इस व्रतको पूर्ण करता है, उसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है।

गणेश! जो श्रद्धासहित अपनी शक्तिके अनुसार नित्य तेरी पूजा करेगा, उसके सभी मनोरथ सफल हो जायँगे।

मनुष्योंको सिन्दूर, चन्दन, चावल, केतकी-पुष्प आदि अनेकों उपचारोंद्वारा गणेश्वरका पूजन करना चाहिये।

यों जो लोग नाना प्रकारके उपचारोंसे भक्तिपूर्वक तेरी पूजा करेंगे, उनके विघ्नोंका सदाके लिये नाश हो जायगा और उनकी कार्यसिद्धि होती रहेगी।

सभी वर्णके लोगोंको, विशेषकर स्त्रियोंको यह पूजा अवश्य करनी चाहिये तथा अभ्युदयकी कामना करनेवाले राजाओंके लिये भी यह व्रत अवश्यकर्तव्य है।

व्रती मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, उसे निश्चय वह वस्तु प्राप्त हो जाती है; अतः जिसे किसी वस्तुकी अभिलाषा हो, उसे अवश्य तेरी सेवा करनी चाहिये।

ब्रह्माजी कहते हैं – मुने! जब शिवजीने महात्मा गणेशको इस प्रकार वर प्रदान किया, तब सम्पूर्ण देवताओं, श्रेष्ठ ऋषियों और शिवके प्यारे समस्त गणोंने ‘तथास्तु’ कहकर उसका समर्थन किया और अत्यन्त विधिपूर्वक गणाधीशका पूजन किया।

तत्पश्चात् शिवगणोंने आदरपूर्वक नाना प्रकारकी पूजनसामग्रीसे गणेश्वरकी विशेष-रूपसे अर्चना की और उनके चरणोंमें प्रणाम किया।

मुनीश्वर! उस समय गिरिजादेवीको जो आनन्द प्राप्त हुआ, उसका वर्णन मेरे चारों मुखोंसे भी नहीं हो सकता; तब फिर मैं उसे कैसे बताऊँ।

उस अवसरपर देवताओं-की दुन्दुभियाँ बजने लगीं।

अप्सराएँ नृत्य करने लगीं।

गन्धर्वश्रेष्ठ गान करने लगे और पुष्पोंकी वर्षा होने लगी।

इस प्रकार गणेशके गणाधीशपदपर प्रतिष्ठित होनेपर वहाँ महान् उत्सव मनाया गया।

सारे जगत् में शान्ति स्थापित हो गयी और सारा दुःख जाता रहा।

नारद! शिव और पार्वतीको तो विशेष आनन्द प्राप्त हुआ और सर्वत्र अनेक प्रकारके सुखदायक मंगल होने लगे।

तदनन्तर सम्पूर्ण देवगण और ऋषिगण जो वहाँ पधारे हुए थे, वे सभी शिवकी आज्ञासे अपने-अपने स्थानको चले।

उस समय वे शिवजीकी स्तुति करके गणेश और पार्वतीकी बारंबार प्रशंसा कर रहे थे और ‘कैसा अद्भुत युद्ध हुआ’ यों परस्पर वार्तालाप करते हुए चले जा रहे थे।

इधर जब गिरिजादेवीका क्रोध शान्त हो गया, तब शिवजी भी, जो स्वात्माराम होते हुए भी सदा भक्तोंका कार्य सिद्ध करनेके लिये उद्यत रहते हैं, गिरिजाके संनिकट गये और लोकोंकी हितकामनासे पूर्ववत् नाना प्रकारके सुखदायक कार्य करने लगे।

तब मैं ब्रह्मा और विष्णु दोनों भक्तिपूर्वक शिव-शिवाकी सेवा करके शिवकी आज्ञा ले अपने-अपने धामको लौट आये।

जो मनुष्य जितेन्द्रिय होकर इस परम मांगलिक आख्यानको श्रवण करता है, वह सम्पूर्ण मंगलोंका भागी होकर मंगलभवन हो जाता है।

इसके श्रवणसे पुत्रहीनको पुत्रकी, निर्धनको धनकी, भार्यार्थीको भार्याकी, प्रजार्थीको प्रजाकी, रोगीको आरोग्यकी और अभागेको सौभाग्यकी प्राप्ति होती है।

जिस स्त्रीका पुत्र और धन नष्ट हो गया हो और पति परदेश चला गया हो, उसे उसका पति मिल जाता है।

जो शोक-सागरमें डूब रहा हो, वह इसके श्रवणसे निस्संदेह शोकरहित हो जाता है।

यह गणेश-चरित्रसम्बन्धी ग्रन्थ जिसके घरमें सदा वर्तमान रहता है, वह मंगलसम्पन्न होता है – इसमें तनिक भी संशयकी गुंजाइश नहीं है।

जो यात्राके अवसरपर अथवा किसी भी पुण्यपर्वपर इसे मन लगाकर सुनता है, वह श्रीगणेशजीकी कृपासे सम्पूर्ण अभीष्ट फल प्राप्त कर लेता है।

(अध्याय १९)


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