शिव पुराण – कोटिरुद्र संहिता – 3


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ऋषिकापर भगवान् शिवकी कृपा, एक असुरसे उसके धर्मकी रक्षा करके उसके आश्रममें ‘नन्दिकेश’ नामसे निवास करना और वर्षमें एक दिन गंगाका भी वहाँ आना

तदनन्तर श्रीसूतजीने जब बहुत-से शिवलिंगोंके कथाप्रसंग सुना दिये, तब ऋषियोंने पूछा – ‘महामते सूतजी! वैशाख शुक्ला सप्तमीके दिन गंगाजी नर्मदामें कैसे आयीं? इसका विशेषरूपसे वर्णन कीजिये।

वहाँ महादेवजीका नाम नन्दिकेश्वर कैसे हुआ? इस बातको भी प्रसन्नतापूर्वक बताइये।’ सूतजीने कहा – महर्षियो! एक ब्राह्मणी थी, जिसका नाम ऋषिका था।

वह किसी ब्राह्मणकी पुत्री थी और एक ब्राह्मणको ही विधिपूर्वक ब्याही गयी थी।

विप्रवरो! यद्यपि वह द्विजपत्नी उत्तम व्रतका पालन करनेवाली थी, तथापि अपने पूर्वजन्मके किसी अशुभ कर्मके प्रभावसे ‘बालवैधव्य’-को प्राप्त हो गयी।

तब वह ब्राह्मणपत्नी ब्रह्मचर्यव्रतके पालनमें तत्पर हो पार्थिवपूजनपूर्वक अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगी।

उस समय अवसर पाकर मूढ़ नामसे प्रसिद्ध एक दुष्ट और बलवान् असुर, जो बड़ा मायावी था, कामबाणसे पीड़ित होकर वहाँ गया।

उस अत्यन्त सुन्दरी कामिनीको तपस्या करती देख वह असुर उसे नाना प्रकारके लोभ दिखाता हुआ उसके साथ सम्भोगकी याचना करने लगा।

मुनीश्वरो! परंतु उत्तम व्रतका पालन करने तथा शिवके ध्यानमें तत्पर रहनेवाली वह साध्वी नारी कामभावसे उसपर दृष्टि न डाल सकी।

तपस्यामें लगी हुई उस ब्राह्मणीने उस असुरका सम्मान नहीं किया; क्योंकि वह अत्यन्त तपोनिष्ठ और शिवध्यानपरायणा थी।

उस कृशांगी युवतीसे तिरस्कृत हो उस दैत्यराज मूढ़ने उसके ऊपर क्रोध प्रकट किया और फिर अपना विकट रूप उसे दिखाया।

इसके बाद उस दुष्टात्माने भयदायक दुर्वचन कहा और उस ब्राह्मणपत्नीको बारंबार त्रास देना आरम्भ किया।

उस समय वह उसके भयसे थर्रा उठी और अनेक बार स्नेहपूर्वक शिव-शिवकी पुकार करने लगी।

उस तन्वंगी द्विजपत्नीने भगवान् शिवका पूर्णतया आश्रय ले रखा था।

शिवका नाम जपनेवाली वह नारी अत्यन्त विह्वल हो अपने धर्मकी रक्षाके लिये भगवान् शम्भुकी ही शरणमें गयी।

तब शरणागतकी रक्षा, सदाचारकी प्रतिष्ठा तथा उस ब्राह्मणीको आनन्द प्रदान करनेके लिये भगवान् शिव वहाँ प्रकट हो गये।

भक्तवत्सल परमेश्वर शंकरने उस कामविह्वल दैत्यराज मूढ़को तत्काल भस्म कर दिया और ब्राह्मणीकी ओर कृपादृष्टिसे देखकर भक्तकी रक्षाके लिये दत्तचित्त हो कहा – ‘वर माँगो।’ महेश्वरका यह वचन सुनकर उस साध्वी ब्राह्मणपत्नीने उनके उस आनन्दजनक मंगलमय स्वरूपका दर्शन किया।

फिर सबको सुख देनेवाले परमेश्वर शम्भुको प्रणाम करके शुद्ध अन्तःकरणवाली उस साध्वीने हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर उनकी स्तुति की।

ऋषिका बोली – देवदेव महादेव! शरणागतवत्सल! आप दीनबन्धु हैं।

भक्तोंकी सदा रक्षा करनेवाले ईश्वर हैं।

आपने मूढ़ नामक असुरसे मेरे धर्मकी रक्षा की है; क्योंकि आपके द्वारा यह दुष्ट असुर मारा गया।

ऐसा करके आपने सम्पूर्ण जगत् की रक्षा की है।

अब आप मुझे अपने चरणोंकी परम उत्तम एवं अनन्य भक्ति प्रदान कीजिये।

नाथ! यही मेरे लिये वर है।

इससे अधिक और क्या हो सकता है? प्रभो! महेश्वर! मेरी दूसरी प्रार्थना भी सुनिये।

आप लोगोंके उपकारके लिये यहाँ सदा स्थित रहिये।

महादेवजीने कहा – ऋषिके! तुम सदाचारिणी और विशेषतः मुझमें भक्ति रखनेवाली हो।

तुमने मुझसे जो-जो वर माँगे हैं, वे सब मैंने तुम्हें दे दिये।

ब्राह्मणो! इसी बीचमें श्रीविष्णु और ब्रह्मा आदि देवता वहाँ भगवान् शिवका आविर्भाव हुआ जान हर्षसे भरे हुए आये और अत्यन्त प्रेमपूर्वक शिवको प्रणाम करके उन सबने उनका भलीभाँति पूजन किया।

फिर शुद्ध हृदयसे हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर उनकी स्तुति भी की।

इसी समय साध्वी देवनदी गंगा उस ऋषिकासे उसके भाग्यकी सराहना करती हुई प्रसन्नचित्त हो बोलीं।

गंगाने कहा – ऋषिके! वैशाखमासमें एक दिन यहाँ रहनेके लिये मुझे भी तुम्हें वचन देना चाहिये।

उस दिन मैं भी इस तीर्थमें निवास करना चाहती हूँ।

सूतजी कहते हैं – महर्षियो! गंगाजी-की यह बात सुनकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाली सती साध्वी ऋषिकाने लोकहितके लिये प्रसन्नतापूर्वक कहा – ‘बहुत अच्छा, ऐसा हो।’ भगवान् शिव ऋषिकाको आनन्द प्रदान करनेके लिये अत्यन्त प्रसन्न हो उस पार्थिवलिंगमें अपने पूर्ण अंशसे विलीन हो गये।

यह देख सब देवता आनन्दित हो शिव तथा ऋषिकाकी प्रशंसा करने लगे और अपने-अपने धामको चले गये।

उस दिनसे नर्मदाका वह तीर्थ ऐसा उत्तम और पावन हो गया तथा सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाले शिव वहाँ नन्दिकेशके नामसे विख्यात हुए।

गंगा भी प्रतिवर्ष वैशाखमासकी सप्तमीके दिन शुभकी इच्छासे अपने उस पापको धोनेके लिये वहाँ जाती हैं, जो मनुष्योंसे वे ग्रहण किया करती हैं।

(अध्याय ५ – ७)


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