शिव पुराण – कोटिरुद्र संहिता – 19


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शिव पुराण संहिता लिंकविद्येश्वर | रुद्र संहिता | शतरुद्र | कोटिरुद्र | उमा | कैलास | वायवीय


भगवान् शिवको संतुष्ट करनेवाले व्रतोंका वर्णन, शिवरात्रि-व्रतकी विधि एवं महिमाका कथन

तदनन्तर ऋषियोंके पूछनेपर सूतजीने शिवजीकी आराधनाके द्वारा उत्तम एवं मनोवांछित फल प्राप्त करनेवाले बहुत-से महान् स्त्री-पुरुषोंके नाम बताये।

इसके बाद ऋषियोंने फिर पूछा – ‘व्यासशिष्य! किस व्रतसे संतुष्ट होकर भगवान् शिव उत्तम सुख प्रदान करते हैं? जिस व्रतके अनुष्ठानसे भक्तजनोंको भोग और मोक्षकी प्राप्ति हो सके, उसका आप विशेषरूपसे वर्णन कीजिये।’ सूतजीने कहा – महर्षियो! तुमने जो कुछ पूछा है, वही बात किसी समय ब्रह्मा, विष्णु तथा पार्वतीजीने भगवान् शिवसे पूछी थी।

इसके उत्तरमें शिवजीने जो कुछ कहा, वह मैं तुमलोगोंको बता रहा हूँ।

भगवान् शिव बोले – मेरे बहुत-से व्रत हैं, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं।

उनमें मुख्य दस व्रत हैं, जिन्हें जाबालश्रुतिके विद्वान् ‘दश शैवव्रत’ कहते हैं।

द्विजोंको सदा यत्नपूर्वक इन व्रतोंका पालन करना चाहिये।

हरे! प्रत्येक अष्टमीको केवल रातमें ही भोजन करे।

विशेषतः कृष्ण-पक्षकी अष्टमीको भोजनका सर्वथा त्याग कर दे।

शुक्लपक्षकी एकादशीको भी भोजन छोड़ दे।

किंतु कृष्णपक्षकी एकादशीको रातमें मेरा पूजन करनेके पश्चात् भोजन किया जा सकता है।

शुक्लपक्षकी त्रयोदशी-को तो रातमें भोजन करना चाहिये; परंतु कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको शिवव्रतधारी पुरुषोंके लिये भोजनका सर्वथा निषेध है।

दोनों पक्षोंमें प्रत्येक सोमवारको प्रयत्नपूर्वक केवल रातमें ही भोजन करना चाहिये।

शिवके व्रतमें तत्पर रहनेवाले लोगोंके लिये यह अनिवार्य नियम है।

इन सभी व्रतोंमें व्रतकी पूर्तिके लिये अपनी शक्तिके अनुसार शिवभक्त ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये।

द्विजोंको इन सब व्रतोंका नियमपूर्वक पालन करना चाहिये।

जो द्विज इनका त्याग करते हैं, वे चोर होते हैं।

मुक्तिमार्गमें प्रवीण पुरुषोंको मोक्षकी प्राप्ति करानेवाले चार व्रतोंका नियमपूर्वक पालन करना चाहिये।

वे चार व्रत इस प्रकार हैं – भगवान् शिवकी पूजा, रुद्रमन्त्रोंका जप, शिवमन्दिरमें उपवास तथा काशीमें मरण।

ये मोक्षके सनातन मार्ग हैं।

सोमवारकी अष्टमी और कृष्णपक्षकी चतुर्दशी – इन दो तिथियोंको उपवासपूर्वक व्रत रखा जाय तो वह भगवान् शिवको संतुष्ट करनेवाला होता है, इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।

हरे! इन चारोंमें भी शिवरात्रिका व्रत ही सबसे अधिक बलवान् है।

इसलिये भोग और मोक्षरूपी फलकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको मुख्यतः उसीका पालन करना चाहिये।

इस व्रतको छोड़कर दूसरा कोई मनुष्योंके लिये हितकारक व्रत नहीं है।

यह व्रत सबके लिये धर्मका उत्तम साधन है।

निष्काम अथवा सकामभाव रखनेवाले सभी मनुष्यों, वर्णों, आश्रमों, स्त्रियों, बालकों, दासों, दासियों तथा देवता आदि सभी देहधारियोंके लिये यह श्रेष्ठ व्रत हितकारक बताया गया है।

माघमासके* कृष्णपक्षमें शिवरात्रि तिथिका विशेष माहात्म्य बताया गया है।

जिस दिन आधी रातके समयतक वह तिथि विद्यमान हो, उसी दिन उसे व्रतके लिये ग्रहण करना चाहिये।

शिवरात्रि करोड़ों हत्याओंके पापका नाश करनेवाली है।

केशव! उस दिन सबेरेसे लेकर जो कार्य करना आवश्यक है, उसे प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें बता रहा हूँ; तुम ध्यान देकर सुनो।

बुद्धिमान् पुरुष सबेरे उठकर बड़े आनन्दके साथ स्नान आदि नित्यकर्म करे।

आलस्यको पास न आने दे।

फिर शिवालयमें जाकर शिवलिंगका विधिवत् पूजन करके मुझ शिवको नमस्कार करनेके पश्चात् उत्तम रीतिसे संकल्प करे – संकल्प देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोऽस्तु ते।

कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव।।

तव प्रभावाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति।

कामाद्याः शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि।।

‘देवदेव! महादेव! नीलकण्ठ! आपको नमस्कार है।

देव! मैं आपके शिवरात्रि-व्रतका अनुष्ठान करना चाहता हूँ।

देवेश्वर! आपके प्रभावसे यह व्रत बिना किसी विघ्न-बाधाके पूर्ण हो और काम आदि शत्रु मुझे पीड़ा न दें।’ ऐसा संकल्प करके पूजन-सामग्रीका संग्रह करे और उत्तम स्थानमें जो शास्त्रप्रसिद्ध शिवलिंग हो, उसके पास रातमें जाकर स्वयं उत्तम विधि-विधानका सम्पादन करे; फिर शिवके दक्षिण या पश्चिमभागमें सुन्दर स्थानपर उनके निकट ही पूजाके लिये संचित सामग्रीको रखे।

तदनन्तर श्रेष्ठ पुरुष वहाँ फिर स्नान करे।

स्नानके बाद सुन्दर वस्त्र और उपवस्त्र धारण करके तीन बार आचमन करनेके पश्चात् पूजन आरम्भ करे।

जिस मन्त्रके लिये जो द्रव्य नियत हो, उस मन्त्रको पढ़कर उसी द्रव्यके द्वारा पूजा करनी चाहिये।

बिना मन्त्रके महादेवजीकी पूजा नहीं करनी चाहिये।

गीत, वाद्य, नृत्य आदिके साथ भक्तिभावसे सम्पन्न हो रात्रिके प्रथम पहरमें पूजन करके विद्वान् पुरुष मन्त्रका जप करे।

यदि मन्त्रज्ञ पुरुष उस समय श्रेष्ठ पार्थिवलिंगका निर्माण करे तो नित्यकर्म करनेके पश्चात् पार्थिव लिंगका ही पूजन करे।

पहले पार्थिव बनाकर पीछे उसकी विधिवत् स्थापना करे।

फिर पूजनके पश्चात् नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा भगवान् वृषभध्वजको संतुष्ट करे।

बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि उस समय शिवरात्रि-व्रतके माहात्म्यका पाठ करे।

श्रेष्ठ भक्त अपने व्रतकी पूर्तिके लिये उस माहात्म्यको श्रद्धापूर्वक सुने।

रात्रिके चारों पहरोंमें चार पार्थिव लिंगोंका निर्माण करके आवाहनसे लेकर विसर्जनतक क्रमशः उनकी पूजा करे और बड़े उत्सवके साथ प्रसन्नतापूर्वक जागरण करे।

प्रातःकाल स्नान करके पुनः वहाँ पार्थिव शिवका स्थापन और पूजन करे।

इस तरह व्रतको पूरा करके हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर बारंबार नमस्कारपूर्वक भगवान् शम्भुसे इस प्रकार प्रार्थना करे।

प्रार्थना एवं विसर्जन नियमो यो महादेव कृतश्चैव त्वदाज्ञया।

विसृज्यते मया स्वामिन् व्रतं जातमनुत्तमम्।।

व्रतेनानेन देवेश यथाशक्तिकृतेन च।

संतुष्टो भव शर्वाद्य कृपां कुरु ममोपरि।।

‘महादेव! आपकी आज्ञासे मैंने जो व्रत ग्रहण किया था, स्वामिन्! वह परम उत्तम व्रत पूर्ण हो गया।

अतः अब उसका विसर्जन करता हूँ।

देवेश्वर शर्व! यथाशक्ति किये गये इस व्रतसे आप आज मुझपर कृपा करके संतुष्ट हों।’ तत्पश्चात् शिवको पुष्पांजलि समर्पित करके विधिपूर्वक दान दे।

फिर शिवको नमस्कार करके व्रतसम्बन्धी नियमका विसर्जन कर दे।

अपनी शक्तिके अनुसार शिवभक्त ब्राह्मणों, विशेषतः संन्यासियोंको भोजन कराकर पूर्णतया संतुष्ट करके स्वयं भी भोजन करे।

हरे! शिवरात्रिको प्रत्येक प्रहरमें श्रेष्ठ शिवभक्तोंको जिस प्रकार विशेष पूजा करनी चाहिये, उसे मैं बताता हूँ; सुनो! प्रथम प्रहरमें पार्थिव लिंगकी स्थापना करके अनेक सुन्दर उपचारोंद्वारा उत्तम भक्तिभावसे पूजा करे।

पहले गन्ध, पुष्प आदि पाँच द्रव्योंद्वारा सदा महादेवजीकी पूजा करनी चाहिये।

उस-उस द्रव्यसे सम्बन्ध रखनेवाले मन्त्रका उच्चारण करके पृथक्-पृथक् वह द्रव्य समर्पित करे।

इस प्रकार द्रव्य समर्पणके पश्चात् भगवान् शिवको जलधारा अर्पित करे।

विद्वान् पुरुष चढ़े हुए द्रव्योंको जलधारासे ही उतारे।

जलधाराके साथ-साथ एक सौ आठ मन्त्रका जप करके वहाँ निर्गुण-सगुणरूप शिवका पूजन करे।

गुरुसे प्राप्त हुए मन्त्रद्वारा भगवान् शिवकी पूजा करे।

अन्यथा नाममन्त्रद्वारा सदाशिवका पूजन करना चाहिये।

विचित्र चन्दन, अखण्ड चावल और काले तिलोंसे परमात्मा शिवकी पूजा करनी चाहिये।

कमल और कनेरके फूल चढ़ाने चाहिये।

आठ नाम-मन्त्रोंद्वारा शंकरजीको पुष्प समर्पित करे।

वे आठ नाम इस प्रकार हैं – भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान्, भीम और ईशान।

इनके आरम्भमें श्री और अन्तमें चतुर्थी विभक्ति जोड़कर ‘श्रीभवाय नमः’ इत्यादि नाममन्त्रोंद्वारा शिवका पूजन करे।

पुष्प-समर्पणके पश्चात् धूप, दीप और नैवेद्य निवेदन करे।

पहले प्रहरमें विद्वान् पुरुष नैवेद्यके लिये पकवान बनवा ले।

फिर श्रीफलयुक्त विशेषार्घ्य देकर ताम्बूल समर्पित करे।

तदनन्तर नमस्कार और ध्यान करके गुरुके दिये हुए मन्त्रका जप करे।

गुरुदत्त मन्त्र न हो तो पंचाक्षर (नमः शिवाय)-मन्त्रके जपसे भगवान् शंकरको संतुष्ट करे, धेनुमुद्रा* दिखाकर उत्तम जलसे तर्पण करे।

पश्चात् अपनी शक्तिके अनुसार पाँच ब्राह्मणोंको भोजन करानेका संकल्प करे।

फिर जबतक पहला प्रहर पूरा न हो जाय, तबतक महान् उत्सव करता रहे।

दूसरा प्रहर आरम्भ होनेपर पुनः पूजनके लिये संकल्प करे।

अथवा एक ही समय चारों प्रहरोंके लिये संकल्प करके पहले प्रहरकी भाँति पूजा करता रहे।

पहले पूर्वोक्त द्रव्योंसे पूजन करके फिर जलधारा समर्पित करे।

प्रथम प्रहरकी अपेक्षा दुगुने मन्त्रोंका जप करके शिवकी पूजा करे।

पूर्वोक्त तिल, जौ तथा कमल-पुष्पोंसे शिवकी अर्चना करे।

विशेषतः बिल्वपत्रोंसे परमेश्वर शिवका पूजन करना चाहिये।

दूसरे प्रहरमें बिजौरा नीबूके साथ अर्घ्य देकर खीरका नैवेद्य निवेदन करे।

जनार्दन! इसमें पहलेकी अपेक्षा मन्त्रोंकी दुगुनी आवृत्ति करनी चाहिये।

फिर ब्राह्मणोंको भोजन करानेका संकल्प करे।

शेष सब बातें पहलेकी ही भाँति तबतक करता रहे, जबतक दूसरा प्रहर पूरा न हो जाय।

तीसरे प्रहरके आनेपर पूजन तो पहलेके समान ही करे; किंतु जौके स्थानमें गेहूँका उपयोग करे और आकके फूल चढ़ाये।

उसके बाद नाना प्रकारके धूप एवं दीप देकर पूएका नैवेद्य भोग लगाये।

उसके साथ भाँति-भाँतिके शाक भी अर्पित करे।

इस प्रकार पूजन करके कपूरसे आरती उतारे।

अनारके फलके साथ अर्घ्य दे और दूसरे प्रहरकी अपेक्षा दुगुना मन्त्रजप करे।

तदनन्तर दक्षिणासहित ब्राह्मण-भोजनका संकल्प करे और तीसरे प्रहरके पूरे होनेतक पूर्ववत् उत्सव करता रहे।

चौथा प्रहर आनेपर तीसरे प्रहरकी पूजाका विसर्जन कर दे।

पुनः आवाहन आदि करके विधिवत् पूजा करे।

उड़द, कँगनी, मूँग, सप्तधान्य, शंखीपुष्प तथा बिल्वपत्रोंसे परमेश्वर शंकरका पूजन करे।

उस प्रहरमें भाँति-भाँतिकी मिठाइयोंका नैवेद्य लगाये अथवा उड़दके बड़े आदि बनाकर उनके द्वारा सदाशिवको संतुष्ट करे।

केलेके फलके साथ अथवा अन्य विविध फलोंके साथ शिवको अर्घ्य दे।

तीसरे प्रहरकी अपेक्षा दूना मन्त्रजप करे और यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजनका संकल्प करे।

गीत, वाद्य तथा नृत्यसे शिवकी आराधनापूर्वक समय बिताये।

भक्तजनोंको तबतक महान् उत्सव करते रहना चाहिये, जबतक अरुणोदय न हो जाय।

अरुणोदय होनेपर पुनः स्नान करके भाँति-भाँतिके पूजनोपचारों और उपहारोंद्वारा शिवकी अर्चना करे।

तत्पश्चात् अपना अभिषेक कराये, नाना प्रकारके दान दे और प्रहरकी संख्याके अनुसार ब्राह्मणों तथा संन्यासियोंको अनेक प्रकारके भोज्य-पदार्थोंका भोजन कराये।

फिर शंकरको नमस्कार करके पुष्पांजलि दे और बुद्धिमान् पुरुष उत्तम स्तुति करके निम्नांकित मन्त्रोंसे प्रार्थना करे – तावकस्त्वद् गतप्राणस्त्वच्चित्तोऽहं सदा मृड।

कृपानिधे इति ज्ञात्वा यथा योग्यं तथा कुरु।।

अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाज्जपपूजादिकं मया।

कृपानिधित्वाज्ज्ञात्वैव भूतनाथ प्रसीद मे।।

अनेनैवोपवासेन यज्जातं फलमेव च।

तेनैव प्रीयतां देवः शङ्करः सुखदायकः।।

कुले मम महादेव भजनं तेऽस्तु सर्वदा।

माभूत्तस्य कुले जन्म यत्र त्वं नहि देवता।।

‘सुखदायक कृपानिधान शिव! मैं आपका हूँ।

मेरे प्राण आपमें ही लगे हैं और मेरा चित्त सदा आपका ही चिन्तन करता है।

यह जानकर आप जैसा उचित समझें, वैसा करें।

भूतनाथ! मैंने जानकर या अनजानमें जो जप और पूजन आदि किया है, उसे समझकर दयासागर होनेके नाते ही आप मुझपर प्रसन्न हों।

उस उपवासव्रतसे जो फल हुआ हो, उसीसे सुखदायक भगवान् शंकर मुझपर प्रसन्न हों।

महादेव! मेरे कुलमें सदा आपका भजन होता रहे।

जहाँके आप इष्टदेवता न हों, उस कुलमें मेरा कभी जन्म न हो।’ इस प्रकार प्रार्थना करनेके पश्चात् भगवान् शिवको पुष्पांजलि समर्पित करके ब्राह्मणोंसे तिलक और आशीर्वाद ग्रहण करे।

तदनन्तर शम्भुका विसर्जन करे।

जिसने इस प्रकार व्रत किया हो, उससे मैं दूर नहीं रहता।

इस व्रतके फलका वर्णन नहीं किया जा सकता।

मेरे पास ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे शिवरात्रि-व्रत करनेवालेके लिये मैं दे न डालूँ।

जिसके द्वारा अनायास ही इस व्रतका पालन हो गया, उसके लिये भी अवश्य ही मुक्तिका बीज बो दिया गया।

मनुष्योंको प्रतिमास भक्तिपूर्वक शिवरात्रि-व्रत करना चाहिये।

तत्पश्चात् इसका उद्यापन करके मनुष्य सांगोपांग फल लाभ करता है।

इस व्रतका पालन करनेमें मैं शिव निश्चय ही उपासकके समस्त दुःखोंका नाश कर देता हूँ और उसे भोग-मोक्ष आदि सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्रदान करता हूँ।

सूतजी कहते हैं – महर्षियो! भगवान् शिवका यह अत्यन्त हितकारक और अद्भुत वचन सुनकर श्रीविष्णु अपने धामको लौट आये।

उसके बाद इस उत्तम व्रतका अपना हित चाहनेवाले लोगोंमें प्रचार हुआ।

किसी समय केशवने नारदजीसे भोग और मोक्ष देनेवाले इस दिव्य शिवरात्रि-व्रतका वर्णन किया था।

(अध्याय ३७-३८) * शुक्लपक्षसे मासका आरम्भ माननेसे फाल्गुन मासकी कृष्ण त्रयोदशी माघ मासकी कही गयी है।

जहाँ कृष्णपक्षसे मासका आरम्भ मानते हैं, उनके अनुसार यहाँ माघका अर्थ फाल्गुन समझना चाहिये।

* धेनुमुद्राका लक्षण इस प्रकार है – वामाङ् गुलीनां मध्येषु दक्षिणाङ् गुलिकास्तथा।

संयोज्य तर्जनीं दक्षां मध्यमानामयोस्तथा।।

दक्षमध्यमयोर्वामां तर्जनीं च नियोजयेत्।

वामयानामया दक्षकनिष्ठां च नियोजयेत्।।

दक्षयानामया वामां कनिष्ठां च नियोजयेत्।

विहिताधोमुखी चैषा धेनुमुद्रा प्रकीर्तिता।।

‘बायें हाथकी अँगुलियोंके बीचमें दाहिने हाथकी अँगुलियोंको संयुक्त करके दाहिनी तर्जनीको मध्यमामें लगाये।

दाहिने हाथकी मध्यमामें बायें हाथकी तर्जनीको मिलावे।

फिर बायें हाथकी अनामिकासे दाहिने हाथकी कनिष्ठिका और दाहिने हाथकी अनामिकाके साथ बायें हाथकी कनिष्ठिकाको संयुक्त करे।

फिर इन सबका मुख नीचेकी ओर करे।

यही धेनुमुद्रा कही गयी है।’


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