शिव पुराण – कोटिरुद्र संहिता – 17


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शंकरजीकी आराधनासे भगवान् विष्णुको सुदर्शन चक्रकी प्राप्ति तथा उसके द्वारा दैत्योंका संहार

व्यासजी कहते हैं – सूतका यह वचन सुनकर उन मुनीश्वरोंने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके लोकहितकी कामनासे इस प्रकार कहा।

ऋषि बोले – सूतजी! आप सब जानते हैं।

इसलिये हम आपसे पूछते हैं।

प्रभो! हरीश्वरलिंगकी महिमाका वर्णन कीजिये।

तात! हमने पहलेसे सुन रखा है कि भगवान् विष्णुने शिवकी आराधनासे सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था।

अतः उस कथापर भी विशेषरूपसे प्रकाश डालिये।

सूतजीने कहा – मुनिवरो! हरीश्वर-लिंगकी शुभ कथा सुनो! भगवान् विष्णुने पूर्वकालमें हरीश्वर शिवसे ही सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था।

एक समयकी बात है, दैत्य अत्यन्त प्रबल होकर लोगोंको पीड़ा देने और धर्मका लोप करने लगे।

उन महाबली और पराक्रमी दैत्योंसे पीड़ित हो देवताओंने देवरक्षक भगवान् विष्णुसे अपना सारा दुःख कहा।

तब श्रीहरि कैलासपर जाकर भगवान् शिवकी विधिपूर्वक आराधना करने लगे।

वे हजार नामोंसे शिवकी स्तुति करते तथा प्रत्येक नामपर एक कमल चढ़ाते थे।

तब भगवान् शंकरने विष्णुके भक्तिभावकी परीक्षा करनेके लिये उनके लाये हुए एक हजार कमलोंमेंसे एकको छिपा दिया।

शिवकी मायाके कारण घटित हुई इस अद्भुत घटनाका भगवान् विष्णुको पता नहीं लगा।

उन्होंने एक फूल कम जानकर उसकी खोज आरम्भ की।

दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले श्रीहरिने भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये उस एक फूलकी प्राप्तिके उद्देश्यसे सारी पृथ्वीपर भ्रमण किया, परंतु कहीं भी उन्हें वह फूल नहीं मिला।

तब विशुद्धचेता विष्णुने एक फूलकी पूर्तिके लिये अपने कमलसदृश एक नेत्रको ही निकालकर चढ़ा दिया।

यह देख सबका दुःख दूर करनेवाले भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए और वहीं उनके सामने प्रकट हो गये।

प्रकट होकर वे श्रीहरिसे बोले – ‘हरे! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ।

तुम इच्छानुसार वर माँगो।

मैं तुम्हें मनोवांछित वस्तु दूँगा।

तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है।’ विष्णु बोले – नाथ! आपके सामने मुझे क्या कहना है।

आप अन्तर्यामी हैं, अतः सब कुछ जानते हैं, तथापि आपके आदेशका गौरव रखनेके लिये कहता हूँ।

दैत्योंने सारे जगत् को पीड़ित कर रखा है।

सदाशिव! हमलोगोंको सुख नहीं मिलता।

स्वामिन्! मेरा अपना अस्त्र-शस्त्र दैत्योंके वधमें काम नहीं देता।

परमेश्वर! इसीलिये मैं आपकी शरणमें आया हूँ।

सूतजी कहते हैं – श्रीविष्णुका यह वचन सुनकर देवाधिदेव महेश्वरने तेजोराशिमय अपना सुदर्शन चक्र उन्हें दे दिया।

उसको पाकर भगवान् विष्णुने उन समस्त प्रबल दैत्योंका उस चक्रके द्वारा बिना परिश्रमके ही संहार कर डाला।

इससे सारा जगत् स्वस्थ हो गया।

देवताओंको भी सुख मिला और अपने लिये उस आयुधको पाकर भगवान् विष्णु भी अत्यन्त प्रसन्न एवं परम सुखी हो गये।

ऋषियोंने पूछा – शिवके वे सहस्र नाम कौन-कौन हैं, बताइये, जिनसे संतुष्ट होकर महेश्वरने श्रीहरिको चक्र प्रदान किया था? उन नामोंके माहात्म्यका भी वर्णन कीजिये।

श्रीविष्णुके ऊपर शंकरजीकी जैसी कृपा हुई थी, उसका यथार्थरूपसे प्रतिपादन कीजिये।

शुद्ध अन्तःकरणवाले उन मुनियोंकी वैसी बात सुनकर सूतने शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करके इस प्रकार कहना आरम्भ किया।

(अध्याय ३४)


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