शिव पुराण – कोटिरुद्र संहिता – 16


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घुश्माकी शिवभक्तिसे उसके मरे हुए पुत्रका जीवित होना, घुश्मेश्वर शिवका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमाका वर्णन

सूतजी कहते हैं – अब मैं घुश्मेश नामक ज्योतिर्लिंगके प्रादुर्भावका और उसके माहात्म्यका वर्णन करूँगा।

मुनिवरो! ध्यान देकर सुनो।

दक्षिणदिशामें एक श्रेष्ठ पर्वत है, जिसका नाम देवगिरि है।

वह देखनेमें अद्भुत तथा नित्य परम शोभासे सम्पन्न है।

उसीके निकट कोई भरद्वाजकुलमें उत्पन्न सुधर्मा नामक ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण रहते थे।

उनकी प्रिय पत्नीका नाम सुदेहा था, वह सदा शिवधर्मके पालनमें तत्पर रहती थी, घरके काम-काजमें कुशल थी और सदा पतिकी सेवामें लगी रहती थी।

द्विजश्रेष्ठ सुधर्मा भी देवताओं और अतिथियोंके पूजक थे।

वे वेदवर्णित मार्गपर चलते और नित्य अग्निहोत्र किया करते थे।

तीनों कालकी संध्या करनेसे उनकी कान्ति सूर्यके समान उद्दीप्त थी।

वे वेद-शास्त्रके मर्मज्ञ थे और शिष्योंको पढ़ाया करते थे।

धनवान् होनेके साथ ही बड़े दाता थे।

सौजन्य आदि सद् गुणोंके भाजन थे।

शिवसम्बन्धी पूजनादि कार्यमें ही सदा लगे रहते थे।

वे स्वयं तो शिवभक्त थे ही, शिवभक्तोंसे बड़ा प्रेम रखते थे।

शिवभक्तोंको भी वे बहुत प्रिय थे।

यह सब कुछ होनेपर भी उनके पुत्र नहीं था।

इससे ब्राह्मणको तो दुःख नहीं होता था, परंतु उनकी पत्नी बहुत दुःखी रहती थी।

पड़ोसी और दूसरे लोग भी उसे ताना मारा करते थे।

वह पतिसे बार-बार पुत्रके लिये प्रार्थना करती थी।

पति उसको ज्ञानोपदेश देकर समझाते थे, परंतु उसका मन नहीं मानता था।

अन्ततोगत्वा ब्राह्मणने कुछ उपाय भी किया, परंतु वह सफल नहीं हुआ।

तब ब्राह्मणीने अत्यन्त दुःखी हो बहुत हठ करके अपनी बहिन घुश्मासे पतिका दूसरा विवाह करा दिया।

विवाहसे पहले सुधर्माने उसको समझाया कि ‘इस समय तो तुम बहिनसे प्यार कर रही हो; परंतु जब इसके पुत्र हो जायगा, तब इससे स्पर्धा करने लगोगी।’ उसने वचन दिया कि मैं बहिनसे कभी डाह नहीं करूँगी।

विवाह हो जानेपर घुश्मा दासीकी भाँति बड़ी बहिनकी सेवा करने लगी।

सुदेहा भी उसे बहुत प्यार करती रही।

घुश्मा अपनी शिवभक्ता बहिनकी आज्ञासे नित्य एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बनाकर विधिपूर्वक पूजा करने लगी।

पूजा करके वह निकटवर्ती तालाबमें उनका विसर्जन कर देती थी।

शंकरजीकी कृपासे उसके एक सुन्दर सौभाग्यवान् और सद् गुणसम्पन्न पुत्र हुआ।

घुश्माका कुछ मान बढ़ा।

इससे सुदेहाके मनमें डाह पैदा हो गयी।

समयपर उस पुत्रका विवाह हुआ।

पुत्रवधू घरमें आ गयी।

अब तो वह और भी जलने लगी।

उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी और एक दिन उसने रातमें सोते हुए पुत्रको छुरेसे उसके शरीरके टुकड़े-टुकड़े करके मार डाला और कटे हुए अंगोंको उसी तालाबमें ले जाकर डाल दिया, जहाँ घुश्मा प्रतिदिन पार्थिवलिंगोंका विसर्जन करती थी।

पुत्रके अंगोंको उस तालाबमें फेंककर वह लौट आयी और घरमें सुखपूर्वक सो गयी।

घुश्मा सबेरे उठकर प्रतिदिनका पूजनादि कर्म करने लगी।

श्रेष्ठ ब्राह्मण सुधर्मा स्वयं भी नित्यकर्ममें लग गये।

इसी समय उनकी ज्येष्ठ पत्नी सुदेहा भी उठी और बड़े आनन्दसे घरके काम-काज करने लगी; क्योंकि उसके हृदयमें पहले जो ईर्ष्याकी आग जलती थी, वह अब बुझ गयी थी।

प्रातःकाल जब बहूने उठकर पतिकी शय्याको देखा तो वह खूनसे भीगी दिखायी दी और उसपर शरीरके कुछ टुकड़े दृष्टिगोचर हुए, इससे उसको बड़ा दुःख हुआ।

उसने सास (घुश्मा)-के पास जाकर निवेदन किया – ‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाली आर्ये! आपके पुत्र कहाँ गये? उनकी शय्या रक्तसे भीगी हुई है और उसपर शरीरके कुछ टुकड़े दिखायी देते हैं।

हाय! मैं मारी गयी! किसने यह दुष्ट कर्म किया है?’ ऐसा कहकर वह बेटेकी प्रिय पत्नी भाँति-भाँतिसे करुण विलाप करती हुई रोने लगी।

सुधर्माकी बड़ी पत्नी सुदेहा भी उस समय ‘हाय! मैं मारी गयी।’ ऐसा कहकर दुःखमें डूब गयी।

उसने ऊपरसे तो दुःख किया, किंतु मन-ही-मन वह हर्षसे भरी हुई थी! घुश्मा भी उस समय उस वधूके दुःखको सुनकर अपने नित्य पार्थिव-पूजनके व्रतसे विचलित नहीं हुई।

उसका मन बेटेको देखनेके लिये तनिक भी उत्सुक नहीं हुआ।

उसके पतिकी भी ऐसी ही अवस्था थी।

जबतक नित्य-नियम पूरा नहीं हुआ, तबतक उन्हें दूसरी किसी बातकी चिन्ता नहीं हुई।

दोपहरको पूजन समाप्त होनेपर घुश्माने अपने पुत्रकी भयंकर शय्यापर दृष्टिपात किया, तथापि उसने मनमें किंचिन्मात्र भी दुःख नहीं माना।

वह सोचने लगी – ‘जिन्होंने यह बेटा दिया था, वे ही इसकी रक्षा करेंगे।

वे भक्तप्रिय कहलाते हैं, कालके भी काल हैं और सत्पुरुषोंके आश्रय हैं।

एकमात्र वे प्रभु सर्वेश्वर शम्भु ही हमारे रक्षक हैं।

वे माला गूँथनेवाले पुरुषकी भाँति जिनको जोड़ते हैं, उनको अलग भी करते हैं।

अतः अब मेरे चिन्ता करनेसे क्या होगा।’ इस तत्त्वका विचार करके उसने शिवके भरोसे धैर्य धारण किया और उस समय दुःखका अनुभव नहीं किया।

वह पूर्ववत् पार्थिव शिवलिंगोंको लेकर स्वस्थचित्तसे शिवके नामोंका उच्चारण करती हुई उस तालाबके किनारे गयी।

उन पार्थिव लिंगोंको तालाबमें डालकर जब वह लौटने लगी तो उसे अपना पुत्र उसी तालाबके किनारे खड़ा दिखायी दिया।

सूतजी कहते हैं – ब्राह्मणो! उस समय वहाँ अपने पुत्रको जीवित देखकर उसकी माता घुश्माको न तो हर्ष हुआ और न विषाद।

वह पूर्ववत् स्वस्थ बनी रही।

इसी समय उसपर संतुष्ट हुए ज्योतिःस्वरूप महेश्वर शिव शीघ्र उसके सामने प्रकट हो गये।

शिव बोले – सुमुखि! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ।

वर माँगो।

तेरी दुष्टा सौतने इस बच्चेको मार डाला था।

अतः मैं उसे त्रिशूलसे मारूँगा।

सूतजी कहते हैं – तब घुश्माने शिवको प्रणाम करके उस समय यह वर माँगा – ‘नाथ! यह सुदेहा मेरी बड़ी बहिन है, अतः आपको इसकी रक्षा करनी चाहिये।’ शिव बोले – उसने तो बड़ा भारी अपकार किया है, तुम उसपर उपकार क्यों करती हो? दुष्ट कर्म करनेवाली सुदेहा तो मार डालनेके ही योग्य है।

घुश्माने कहा – देव! आपके दर्शनमात्रसे पातक नहीं ठहरता।

इस समय आपका दर्शन करके उसका पाप भस्म हो जाय।

‘जो अपकार करनेवालोंपर भी उपकार करता है, उसके दर्शनमात्रसे पाप बहुत दूर भाग जाता है।’* प्रभो! यह अद्भुत भगवद् वाक्य मैंने सुन रखा है।

इसलिये सदाशिव! जिसने ऐसा कुकर्म किया है, वही करे; मैं ऐसा क्यों करूँ (मुझे तो बुरा करनेवालेका भी भला ही करना है)।

सूतजी कहते हैं – घुश्माके ऐसा कहनेपर दयासिन्धु भक्तवत्सल महेश्वर और भी प्रसन्न हुए तथा इस प्रकार बोले – ‘घुश्मे! तुम कोई और भी वर माँगो।

मैं तुम्हारे लिये हितकर वर अवश्य दूँगा; क्योंकि तुम्हारी इस भक्तिसे और विकारशून्य स्वभावसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ।’ भगवान् शिवकी बात सुनकर घुश्मा बोली – ‘प्रभो! यदि आप वर देना चाहते हैं तो लोगोंकी रक्षाके लिये सदा यहाँ निवास कीजिये और मेरे नामसे ही आपकी ख्याति हो।’ तब महेश्वर शिवने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा – ‘मैं तुम्हारे ही नामसे घुश्मेश्वर कहलाता हुआ सदा यहाँ निवास करूँगा और सबके लिये सुखदायक होऊँगा।

मेरा शुभ ज्योतिर्लिंग घुश्मेश नामसे प्रसिद्ध हो।

यह सरोवर शिवलिंगोंका आलय हो जाय और इसीलिये इसकी तीनों लोकोंमें शिवालय नामसे प्रसिद्धि हो।

यह सरोवर सदा दर्शनमात्रसे सम्पूर्ण अभीष्टोंका देनेवाला हो।

सुव्रते! तुम्हारे वंशमें होनेवाली एक सौ एक पीढ़ियोंतक ऐसे ही श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न होंगे, इसमें संशय नहीं है।

वे सब-के-सब सुन्दरी स्त्री, उत्तम धन और पूर्ण आयुसे सम्पन्न होंगे, चतुर और विद्वान् होंगे, उदार तथा भोग और मोक्षरूपी फल पानेके अधिकारी होंगे।

एक सौ एक पीढ़ियोंतक सभी पुत्र गुणोंमें बढ़े-चढ़े होंगे।

तुम्हारे वंशका ऐसा विस्तार बड़ा शोभादायक होगा।’ ऐसा कहकर भगवान् शिव वहाँ ज्योतिर्लिंगके रूपमें स्थित हो गये।

उनकी घुश्मेश नामसे प्रसिद्धि हुई और उस सरोवरका नाम शिवालय हो गया।

सुधर्मा, घुश्मा और सुदेहा – तीनोंने आकर तत्काल ही उस शिवलिंगकी एक सौ एक दक्षिणावर्त परिक्रमा की।

पूजा करके परस्पर मिलकर मनका मैल दूर करके वे सब वहाँ बड़े सुखका अनुभव करने लगे।

पुत्रको जीवित देख सुदेहा बहुत लज्जित हुई और पति तथा घुश्मासे क्षमा-प्रार्थना करके उसने अपने पापके निवारणके लिये प्रायश्चित्त किया।

मुनीश्वरो! इस प्रकार वह घुश्मेश्वर लिंग प्रकट हुआ।

उसका दर्शन और पूजन करनेसे सदा सुखकी वृद्धि होती है।

ब्राह्मणो! इस तरह मैंने तुमसे बारह ज्योतिर्लिंगोंकी महिमा बतायी।

ये सभी लिंग सम्पूर्ण कामनाओंके पूरक तथा भोग और मोक्ष देनेवाले हैं।

जो इन ज्योतिर्लिंगोंकी कथाको पढ़ता और सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता तथा भोग और मोक्ष पाता है।

(अध्याय ३२-३३)

द्वादश ज्योतिर्लिंगोंके माहात्म्यकी समाप्ति * अपकारेषु यश्चैव ह्युपकारं करोति वै।

तस्य दर्शनमात्रेण पापं दूरतरं व्रजेत्।।

(शि० पु० को० रु० सं० ३३।२९)


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