शिव पुराण – कोटिरुद्र संहिता – 15


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रामेश्वर नामक ज्योतिर्लिंगके आविर्भाव तथा माहात्म्यका वर्णन

सूतजी कहते हैं – ऋषियो! अब मैं यह बता रहा हूँ कि रामेश्वर नामक ज्योतिर्लिंग पहले किस प्रकार प्रकट हुआ।

इस प्रसंगको तुम आदरपूर्वक सुनो।

भगवान् विष्णुके रामावतारमें जब रावण सीताजीको हरकर लंकामें ले गया, तब सुग्रीवके साथ अठारह पद्म वानरसेना लेकर श्रीराम समुद्रतटपर आये।

वहाँ वे विचार करने लगे कि कैसे हम समुद्रको पार करेंगे और किस प्रकार रावणको जीतेंगे।

इतनेमें ही श्रीरामको प्यास लगी।

उन्होंने जल माँगा और वानर मीठा जल ले आये।

श्रीरामने प्रसन्न होकर वह जल ले लिया।

तबतक उन्हें स्मरण हो आया कि ‘मैंने अपने स्वामी भगवान् शंकरका दर्शन तो किया ही नहीं।

फिर यह जल कैसे ग्रहण कर सकता हूँ?’ ऐसा कहकर उन्होंने उस जलको नहीं पिया।

जल रख देनेके पश्चात् रघुनन्दनने पार्थिव-पूजन किया।

आवाहन आदि सोलह उपचारोंको प्रस्तुत करके विधिपूर्वक बड़े प्रेमसे शंकरजीकी अर्चना की।

प्रणाम तथा दिव्य स्तोत्रोंद्वारा यत्न-पूर्वक शंकरजीको संतुष्ट करके श्रीरामने भक्तिभावसे उनसे प्रार्थना की।

श्रीराम बोले – उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मेरे स्वामी देव महेश्वर! आपको मेरी सहायता करनी चाहिये।

आपके सहयोगके बिना मेरे कार्यकी सिद्धि अत्यन्त कठिन है।

रावण भी आपका ही भक्त है।

वह सबके लिये सर्वथा दुर्जय है, परंतु आपके दिये हुए वरदानसे वह सदा दर्पमें भरा रहता है।

वह त्रिभुवनविजयी महावीर है।

इधर मैं भी आपका दास हूँ, सर्वथा आपके अधीन रहनेवाला हूँ।

सदाशिव! यह विचारकर आपको मेरे प्रति पक्षपात करना चाहिये।

सूतजी कहते हैं – इस प्रकार प्रार्थना और बारंबार नमस्कार करके उन्होंने उच्चस्वरसे ‘जय शंकर, जय शिव!’ इत्यादिका उद् घोष करते हुए शिवका स्तवन किया।

फिर उनके मन्त्रके जप और ध्यानमें तत्पर हो गये।

तत्पश्चात् पुनः पूजन करके वे स्वामीके आगे नाचने लगे।

उस समय उनका हृदय प्रेमसे द्रवित हो रहा था, फिर उन्होंने शिवके संतोषके लिये गाल बजाकर अव्यक्त शब्द किया।

उस समय भगवान् शंकर उनपर बहुत प्रसन्न हुए और वे ज्योतिर्मय महेश्वर वामांगभूता पार्वती तथा पार्षदगणोंके साथ शास्त्रोक्त निर्मल रूप धारण करके तत्काल वहाँ प्रकट हो गये।

श्रीरामकी भक्तिसे संतुष्टचित होकर महेश्वरने उनसे कहा – ‘श्रीराम! तुम्हारा कल्याण हो, वर माँगो।’ उस समय उनका रूप देखकर वहाँ उपस्थित हुए सब लोग पवित्र हो गये।

शिवधर्मपरायण श्रीरामजीने स्वयं उनका पूजन किया।

फिर भाँति-भाँतिकी स्तुति एवं प्रणाम करके उन्होंने भगवान् शिवसे लंकामें रावणके साथ होनेवाले युद्धमें अपने लिये विजयकी प्रार्थना की।

तब रामभक्तिसे प्रसन्न हुए महेश्वरने कहा – ‘महाराज! तुम्हारी जय हो।’ भगवान् शिवके दिये हुए विजयसूचक वर एवं युद्धकी आज्ञाको पाकर श्रीरामने नतमस्तक हो हाथ जोड़कर उनसे पुनः प्रार्थना की।

श्रीराम बोले – मेरे स्वामी शंकर! यदि आप संतुष्ट हैं तो जगत् के लोगोंको पवित्र करने तथा दूसरोंकी भलाई करनेके लिये सदा यहाँ निवास करें।

सूतजी कहते हैं – श्रीरामके ऐसा कहनेपर भगवान् शिव वहाँ ज्योतिर्लिंगके रूपमें स्थित हो गये।

तीनों लोकोंमें रामेश्वरके नामसे उनकी प्रसिद्धि हुई।

उनके प्रभावसे ही अपार समुद्रको अनायास पार करके श्रीरामने रावण आदि राक्षसोंका शीघ्र ही संहार किया और अपनी प्रिया सीताको प्राप्त कर लिया।

तबसे इस भूतलपर रामेश्वरकी अद्भुत महिमाका प्रसार हुआ।

भगवान् रामेश्वर सदा भोग और मोक्ष देनेवाले तथा भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करनेवाले हैं।

जो दिव्य गंगाजलसे रामेश्वर शिवको भक्तिपूर्वक स्नान कराता है, वह जीवन्मुक्त ही है।

इस संसारमें देवदुर्लभ समस्त भोगोंका उपभोग करके अन्तमें उत्तम ज्ञान पाकर वह निश्चय ही कैवल्य मोक्षको प्राप्त कर लेता है।

इस प्रकार मैंने तुमलोगोंसे भगवान् शिवके रामेश्वर नामक दिव्य ज्योतिर्लिंगका वर्णन किया, जो अपनी महिमा सुननेवालोंके समस्त पापोंका अपहरण करनेवाला है।

(अध्याय ३१)


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