संत कबीर के दोहे – भक्ति – अर्थ सहित


सच्ची भक्ति क्यों जरूरी है?

क्रोध, लालच और इच्छाएं – भक्ति के मार्ग में बाधक

कामी क्रोधी लालची,
इनसे भक्ति ना होय।
भक्ति करै कोई सूरमा,
जाति बरन कुल खोय॥

कामी क्रोधी लालची – जिन लोगों में काम, क्रोध और लालच रहता है. अर्थात जो लोग कामी, क्रोधी और लालची है,

  • कामी – सांसारिक चीजों में और विषय वासनाओ में लिप्त रहता है,
  • क्रोधी – दुसरो से द्वेष करता रहता है और
  • लालची – निरंतर संग्रह करने में व्यस्त रहता है

इनसे भक्ति न होय – उन लोगो से भक्ति नहीं हो सकती।

तो ईश्वर की भक्ति कौन कर सकता है?

भक्ति करै कोई सूरमा – भक्ति तो कोई पुरुषार्थी, शूरवीर ही कर सकता है, जो

जादि बरन कुल खोय – जाति, वर्ण, कुल और अहंकार का त्याग कर सकता है।


मुक्ति या मोक्ष के लिए – भक्ति और गुरु के वचन जरूरी

भक्ति बिन नहिं निस्तरे,
लाख करे जो कोय।
शब्द सनेही होय रहे,
घर को पहुँचे सोय॥

भक्ति बिन नहिं निस्तरे – भक्ति के बिना मुक्ति संभव नहीं है

लाख करे जो कोय – चाहे कोई लाख प्रयत्न कर ले।

शब्द सनेही होय रहे – जो सतगुरु के वचनों को (शब्दों को) ध्यान से सुनता है और उनके बताये मार्ग पर चलता है,

घर को पहुँचे सोय – वे ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते है।


सच्ची भक्ति के लिए, भक्ति का भेद जानना जरूरी

भक्ति भक्ति सब कोई कहै,
भक्ति न जाने भेद।
पूरण भक्ति जब मिलै,
कृपा करे गुरुदेव॥

भक्ति भक्ति सब कोई कहै – भक्ति भक्ति हर कोई कहता है, अर्थात सभी लोग भक्ति करना चाहते हैं,

भक्ति न जाने भेद – लेकिन, भक्ति कैसे की जाए, यह भेद नहीं जानते।

पूरण भक्ति जब मिलै – पूर्ण भक्ति अर्थात सच्ची भक्ति तभी हो सकती है,

कृपा करे गुरुदेव – जब सतगुरु की कृपा होती है।


भक्ति और मुक्ति से मिलनेवाला सुख, सिर्फ सच्चे भक्त को ही मिलता है

भक्ति जु सीढ़ी मुक्ति की,
चढ़े भक्त हरषाय।
और न कोई चढ़ि सकै,
निज मन समझो आय॥

भक्ति जु सिढी मुक्ति की – भक्ति, मुक्ति वह सीढी है,

चढ़े भक्त हरषाय – जिस पर चढ़कर भक्त को अपार ख़ुशी मिलती है।

और न कोई चढ़ी सकै – दूसरा कोई भी मनुष्य जो सच्ची भक्ति नहीं कर सकता, इस पर नहीं चढ़ सकता है,

निज मन समझो आय – यह समझ लेना चाहिए।


अहंकार, आसक्ति जैसे विकारों से भरा मन, सच्ची भक्ति नहीं कर सकता

बिना साँच सुमिरन नहीं,
बिन भेदी भक्ति न सोय।
पारस में परदा रहा,
कस लोहा कंचन होय॥

बिना सांच सुमिरन नहीं – बिना ज्ञान के प्रभु का स्मरण (सुमिरन) नहीं हो सकता और

बिन भेदी भक्ति न सोय – भक्ति का भेद जाने बिना सच्ची भक्ति नहीं हो सकती।

पारस में परदा रहा – जैसे पारस में थोडा सा भी खोट हो,

कस लोहा कंचन होय – तो वह लोहे को सोना नहीं बना सकता।

  • यदि मन में विकारों का खोट हो,
    जैसे अहंकार, आसक्ति, द्वेष, आदि
    तो सच्चे मन से भक्ति नहीं हो सकती

कबीर के दोहे – भक्ति

भक्ति महल बहु ऊँच है,
दूरहि ते दरशाय।
जो कोई जन भक्ति करे,
शोभा बरनि न जाय॥

जब लग नाता जगत का,
तब लग भक्ति न होय।
नाता तोड़े हरि भजे,
भगत कहावें सोय॥

भक्ति भक्ति सब कोइ कहै,
भक्ति न जाने मेव।
पूरण भक्ति जब मिलै,
कृपा करे गुरुदेव॥

और कर्म सब कर्म है,
भक्ति कर्म निहकर्म।
कहैं कबीर पुकारि के,
भक्ति करो तजि भर्म॥

भक्ति दुहेली गुरुन की,
नहिं कायर का काम।
सीस उतारे हाथ सों,
ताहि मिलै निज धाम॥

गुरु भक्ति अति कठिन है,
ज्यों खाड़े की धार।
बिना साँच पहुँचे नहीं,
महा कठिन व्यवहार॥

आरत है गुरु भक्ति करूँ,
सब कारज सिध होय।
करम जाल भौजाल में,
भक्त फँसे नहिं कोय॥

भाव बिना नहिं भक्ति जग,
भक्ति बिना नहीं भाव।
भक्ति भाव इक रूप है,
दोऊ एक सुभाव॥

भक्ति भाव भादौं नदी,
सबै चली घहराय।
सरिता सोई सराहिये,
जेठ मास ठहराय॥


Kabir Dohe – List