भागवत पुराण – अष्टम स्कन्ध – अध्याय – 7


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समुद्रमन्थनका आरम्भ और भगवान् शंकरका विषपान

श्रीशुकदेवजी कहते हैं – परीक्षित्! देवता और असुरोंने नागराज वासुकिको यह वचन देकर कि समुद्रमन्थनसे प्राप्त होनेवाले अमृतमें तुम्हारा भी हिस्सा रहेगा, उन्हें भी सम्मिलित कर लिया।

इसके बाद उन लोगोंने वासुकि नागको नेतीके समान मन्दराचलमें लपेटकर भलीभाँति उद्यत हो बड़े उत्साह और आनन्दसे अमृतके लिये समुद्रमन्थन प्रारम्भ किया।

उस समय पहले-पहल अजितभगवान् वासुकिके मुखकी ओर लग गये, इसलिये देवता भी उधर ही आ जुटे।।१-२।।

परन्तु भगवान् की यह चेष्टा दैत्यसेनापतियोंको पसंद न आयी।

उन्होंने कहा कि ‘पूँछ तो साँपका अशुभ अंग है, हम उसे नहीं पकड़ेंगे।।३।।

हमने वेद-शास्त्रोंका विधिपूर्वक अध्ययन किया है, ऊँचे वंशमें हमारा जन्म हुआ है और वीरताके बड़े-बड़े काम हमने किये हैं।

हम देवताओंसे किस बातमें कम हैं?’ यह कहकर वे लोग चुपचाप एक ओर खड़े हो गये।

उनकी यह मनोवृत्ति देखकर भगवान् ने मुसकराकर वासुकिका मुँह छोड़ दिया और देवताओंके साथ उन्होंने पूँछ पकड़ ली।।४।।

इस प्रकार अपना-अपना स्थान निश्चित करके देवता और असुर अमृतप्राप्तिके लिये पूरी तैयारीसे समुद्रमन्थन करने लगे।।५।।

परीक्षित्! जब समुद्रमन्थन होने लगा, तब बड़े-बड़े बलवान् देवता और असुरोंके पकड़े रहनेपर भी अपने भारकी अधिकता और नीचे कोई आधार न होनेके कारण मन्दराचल समुद्रमें डूबने लगा।।६।।

इस प्रकार अत्यन्त बलवान् दैवके द्वारा अपना सब किया-कराया मिट्टीमें मिलते देख उनका मन टूट गया।

सबके मुँहपर उदासी छा गयी।।७।।

उस समय भगवान् ने देखा कि यह तो विघ्नराजकी करतूत है।

इसलिये उन्होंने उसके निवारणका उपाय सोचकर अत्यन्त विशाल एवं विचित्र कच्छपका रूप धारण किया और समुद्रके जलमें प्रवेश करके मन्दराचलको ऊपर उठा दिया।

भगवान् की शक्ति अनन्त है।

वे सत्यसंकल्प हैं।

उनके लिये यह कौन-सी बड़ी बात थी।।८।।

देवता और असुरोंने देखा कि मन्दराचल तो ऊपर उठ आया है, तब वे फिरसे समुद्र-मन्थनके लिये उठ खड़े हुए।

उस समय भगवान् ने जम्बूद्वीपके समान एक लाख योजन फैली हुई अपनी पीठपर मन्दराचलको धारण कर रखा था।।९।।

परीक्षित्! जब बड़े-बड़े देवता और असुरोंने अपने बाहुबलसे मन्दराचलको प्रेरित किया, तब वह भगवान् की पीठपर घूमने लगा।

अनन्त शक्तिशाली आदिकच्छप भगवान् को उस पर्वतका चक्कर लगाना ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई उनकी पीठ खुजला रहा हो।।१०।।

साथ ही समुद्रमन्थन सम्पन्न करनेके लिये भगवान् ने असुरोंमें उनकी शक्ति और बलको बढ़ाते हुए असुररूपसे प्रवेश किया।

वैसे ही उन्होंने देवताओंको उत्साहित करते हुए उनमें देवरूपसे प्रवेश किया और वासुकिनागमें निद्राके रूपसे।।११।।

इधर पर्वतके ऊपर दूसरे पर्वतके समान बनकर सहस्रबाहु भगवान् अपने हाथोंसे उसे दबाकर स्थिर हो गये।

उस समय आकाशमें ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र आदि उनकी स्तुति और उनके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा करने लगे।।१२।।

इस प्रकार भगवान् ने पर्वतके ऊपर उसको दबा रखनेवालेके रूपमें, नीचे उसके आधार कच्छपके रूपमें, देवता और असुरोंके शरीरमें उनकी शक्तिके रूपमें, पर्वतमें दृढ़ताके रूपमें और नेती बने हुए वासुकिनागमें निद्राके रूपमें – जिससे उसे कष्ट न हो – प्रवेश करके सब ओरसे सबको शक्तिसम्पन्न कर दिया।

अब वे अपने बलके मदसे उन्मत्त होकर मन्दराचलके द्वारा बड़े वेगसे समुद्रमन्थन करने लगे।

उस समय समुद्र और उसमें रहनेवाले मगर, मछली आदि जीव क्षुब्ध हो गये।।१३।।

नागराज वासुकिके हजारों कठोर नेत्र, मुख और श्वासोंसे विषकी आग निकलने लगी।

उनके धूएँसे पौलोम, कालेय, बलि, इल्वल आदि असुर निस्तेज हो गये।

उस समय वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो दावानलसे झुलसे हुए साखूके पेड़ खड़े हों।।१४।।

देवता भी उससे न बच सके।

वासुकिके श्वासकी लपटोंसे उनका भी तेज फीका पड़ गया।

वस्त्र, माला, कवच एवं मुख धूमिल हो गये।

उनकी यह दशा देखकर भगवान् की प्रेरणासे बादल देवताओंके ऊपर वर्षा करने लगे एवं वायु समुद्रकी तरंगोंका स्पर्श करके शीतलता और सुगन्धिका संचार करने लगी।।१५।।

इस प्रकार देवता और असुरोंके समुद्रमन्थन करनेपर भी जब अमृत न निकला, तब स्वयं अजितभगवान् समुद्रमन्थन करने लगे।।१६।।

मेघके समान साँवले शरीरपर सुनहला पीताम्बर, कानोंमें बिजलीके समान चमकते हुए कुण्डल, सिरपर लहराते हुए घुँघराले बाल, नेत्रोंमें लाल-लाल रेखाएँ और गलेमें वनमाला सुशोभित हो रही थी।

सम्पूर्ण जगत् को अभयदान करनेवाले अपने विश्वविजयी भुजदण्डोंसे वासुकिनागको पकड़कर तथा कूर्मरूपसे पर्वतको धारणकर जब भगवान् मन्दराचलकी मथानीसे समुद्रमन्थन करने लगे, उस समय वे दूसरे पर्वतराजके समान बड़े ही सुन्दर लग रहे थे।।१७।।

जब अजितभगवान् ने इस प्रकार समुद्र मन्थन किया, तब समुद्रमें बड़ी खलबली मच गयी।

मछली, मगर, साँप और कछुए भयभीत होकर ऊपर आ गये और इधर-उधर भागने लगे।

तिमि-तिमिंगिल आदि मच्छ, समुद्री हाथी और ग्राह व्याकुल हो गये।

उसी समय पहले-पहल हालाहल नामका अत्यन्त उग्र विष निकला।।१८।।

वह अत्यन्त उग्र विष दिशा-विदिशामें, ऊपर-नीचे सर्वत्र उड़ने और फैलने लगा।

इस असह्य विषसे बचनेका कोई उपाय भी तो न था।

भयभीत होकर सम्पूर्ण प्रजा और प्रजापति किसीके द्वारा त्राण न मिलनेपर भगवान् सदाशिवकी शरणमें गये।।१९।।

भगवान् शंकर सतीजीके साथ कैलास पर्वतपर विराजमान थे।

बड़े-बड़े ऋषि-मुनि उनकी सेवा कर रहे थे।

वे वहाँ तीनों लोकोंके अभ्युदय और मोक्षके लिये तपस्या कर रहे थे।

प्रजापतियोंने उनका दर्शन करके उनकी स्तुति करते हुए उन्हें प्रणाम किया।।२०।।

प्रजापतियोंने भगवान् शंकरकी स्तुति की – देवताओंके आराध्यदेव महादेव! आप समस्त प्राणियोंके आत्मा और उनके जीवनदाता हैं।

हमलोग आपकी शरणमें आये हैं।

त्रिलोकीको भस्म करनेवाले इस उग्र विषसे आप हमारी रक्षा कीजिये।।२१।।

सारे जगत् को बाँधने और मुक्त करनेमें एकमात्र आप ही समर्थ हैं।

इसलिये विवेकी पुरुष आपकी ही आराधना करते हैं।

क्योंकि आप शरणागतकी पीड़ा नष्ट करनेवाले एवं जगद् गुरु हैं।।२२।।

प्रभो! अपनी गुणमयी शक्तिसे इस जगत् की सृष्टि, स्थिति और प्रलय करनेके लिये आप अनन्त, एकरस होनेपर भी ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि नाम धारण कर लेते हैं।।२३।।

आप स्वयंप्रकाश हैं।

इसका कारण यह है कि आप परम रहस्यमय ब्रह्मतत्त्व हैं।

जितने भी देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि सत् अथवा असत् चराचर प्राणी हैं – उनको जीवनदान देनेवाले आप ही हैं।

आपके अतिरिक्त सृष्टि भी और कुछ नहीं है।

क्योंकि आप आत्मा हैं।

अनेक शक्तियोंके द्वारा आप ही जगत् रूपमें भी प्रतीत हो रहे हैं।

क्योंकि आप ईश्वर हैं, सर्वसमर्थ हैं।।२४।।

समस्त वेद आपसे ही प्रकट हुए हैं।

इसलिये आप समस्त ज्ञानोंके मूल स्रोत स्वतःसिद्ध ज्ञान हैं।

आप ही जगत् के आदिकारण महत्तत्त्व और त्रिविध अहंकार हैं एवं आप ही प्राण, इन्द्रिय, पंचमहाभूत तथा शब्दादि विषयोंके भिन्न-भिन्न स्वभाव और उनके मूल कारण हैं।

आप स्वयं ही प्राणियोंकी वृद्धि और ह्रास करनेवाले काल हैं, उनका कल्याण करनेवाले यज्ञ हैं एवं सत्य और मधुर वाणी हैं।

धर्म भी आपका ही स्वरूप है।

आप ही ‘अ, उ, म्’ इन तीनों अक्षरोंसे युक्त प्रणव हैं अथवा त्रिगुणात्मिका प्रकृति हैं – ऐसा वेदवादी महात्मा कहते हैं।।२५।।

सर्वदेवस्वरूप अग्नि आपका मुख है।

तीनों लोकोंके अभ्युदय करनेवाले शंकर! यह पृथ्वी आपका चरणकमल है।

आप अखिल देवस्वरूप हैं।

यह काल आपकी गति है, दिशाएँ कान हैं और वरुण रसनेन्द्रिय है।।२६।।

आकाश नाभि है, वायु श्वास है, सूर्य नेत्र हैं और जल वीर्य है।

आपका अहंकार नीचे-ऊँचे सभी जीवोंका आश्रय है।

चन्द्रमा मन है और प्रभो! स्वर्ग आपका सिर है।।२७।।

वेदस्वरूप भगवन्! समुद्र आपकी कोख हैं।

पर्वत हड्डियाँ हैं।

सब प्रकारकी ओषधियाँ और घास आपके रोम हैं।

गायत्री आदि छन्द आपकी सातों धातुएँ हैं और सभी प्रकारके धर्म आपके हृदय हैं।।२८।।

स्वामिन्! सद्योजातादि पाँच उपनिषद् ही आपके तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात, वामदेव और ईशान नामक पाँच मुख हैं।

उन्हींके पदच्छेदसे अड़तीस कलात्मक मन्त्र निकले हैं।

आप जब समस्त प्रपंचसे उपरत होकर अपने स्वरूपमें स्थित हो जाते हैं, तब उसी स्थितिका नाम होता है ‘शिव’।

वास्तवमें वही स्वयंप्रकाश परमार्थतत्त्व है।।२९।।

अधर्मकी दम्भ-लोभ आदि तरंगोंमें आपकी छाया है जिनसे विविध प्रकारकी सृष्टि होती है, वे सत्त्व, रज और तम – आपके तीन नेत्र हैं।

प्रभो! गायत्री आदि छन्दरूप सनातन वेद ही आपका विचार है।

क्योंकि आप ही सांख्य आदि समस्त शास्त्रोंके रूपमें स्थित हैं और उनके कर्ता भी हैं।।३०।।

भगवन्! आपका परम ज्योतिर्मय स्वरूप स्वयं ब्रह्म है।

उसमें न तो रजोगुण, तमोगुण एवं सत्त्वगुण हैं और न किसी प्रकारका भेदभाव ही।

आपके उस स्वरूपको सारे लोकपाल – यहाँतक कि ब्रह्मा, विष्णु और देवराज इन्द्र भी नहीं जान सकते।।३१।।

आपने कामदेव, दक्षके यज्ञ, त्रिपुरासुर और कालकूट विष (जिसको आप अभी-अभी अवश्य पी जायँगे) और अनेक जीवद्रोही असुरोंको नष्ट कर दिया है।

परन्तु यह कहनेसे आपकी कोई स्तुति नहीं होती।

क्योंकि प्रलयके समय आपका बनाया हुआ यह विश्व आपके ही नेत्रसे निकली हुई आगकी चिनगारी एवं लपटसे जलकर भस्म हो जाता है और आप इस प्रकार ध्यानमग्न रहते हैं कि आपको इसका पता ही नहीं चलता।।३२।।

जीवन्मुक्त आत्माराम पुरुष अपने हृदयमें आपके युगल चरणोंका ध्यान करते रहते हैं तथा आप स्वयं भी निरन्तर ज्ञान और तपस्यामें ही लीन रहते हैं।

फिर भी सतीके साथ रहते देखकर जो आपको आसक्त एवं श्मशानवासी होनेके कारण उग्र अथवा निष्ठुर बतलाते हैं – वे मूर्ख आपकी लीलाओंका रहस्य भला क्या जानें।

उनका वैसा कहना निर्लज्जतासे भरा है।।३३।।

इस कार्य और कारणरूप जगत् से परे माया है और मायासे भी अत्यन्त परे आप हैं।

इसलिये प्रभो! आपके अनन्त स्वरूपका साक्षात् ज्ञान प्राप्त करनेमें सहसा ब्रह्मा आदि भी समर्थ नहीं होते, फिर स्तुति तो कर ही कैसे सकते हैं।

ऐसी अवस्थामें उनके पुत्रोंके पुत्र हमलोग कह ही क्या सकते हैं।

फिर भी अपनी शक्तिके अनुसार हमने आपका कुछ गुणगान किया है।।३४।।

हमलोग तो केवल आपके इसी लीलाविहारी रूपको देख रहे हैं।

आपके परम स्वरूपको हम नहीं जानते।

महेश्वर! यद्यपि आपकी लीलाएँ अव्यक्त हैं, फिर भी संसारका कल्याण करनेके लिये आप व्यक्तरूपसे भी रहते हैं।।३५।।

श्रीशुकदेवजी कहते हैं – परीक्षित्! प्रजाका यह संकट देखकर समस्त प्राणियोंके अकारण बन्धु देवाधिदेव भगवान् शंकरके हृदयमें कृपावश बड़ी व्यथा हुई।

उन्होंने अपनी प्रिया सतीसे यह बात कही।।३६।।

शिवजीने कहा – देवि! यह बड़े खेदकी बात है।

देखो तो सही, समुद्रमन्थनसे निकले हुए कालकूट विषके कारण प्रजापर कितना बड़ा दुःख आ पड़ा है।।३७।।

ये बेचारे किसी प्रकार अपने प्राणोंकी रक्षा करना चाहते हैं।

इस समय मेरा यह कर्तव्य है कि मैं इन्हें निर्भय कर दूँ।

जिनके पास शक्ति-सामर्थ्य है, उनके जीवनकी सफलता इसीमें है कि वे दीन-दुःखियोंकी रक्षा करें।।३८।।

सज्जन पुरुष अपने क्षणभंगुर प्राणोंकी बलि देकर भी दूसरे प्राणियोंके प्राणकी रक्षा करते हैं।

कल्याणि! अपने ही मोहकी मायामें फँसकर संसारके प्राणी मोहित हो रहे हैं और एक-दूसरेसे वैरकी गाँठ बाँधे बैठे हैं।।३९।।

उनके ऊपर जो कृपा करता है, उसपर सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और जब भगवान् प्रसन्न हो जाते हैं, तब चराचर जगत् के साथ मैं भी प्रसन्न हो जाता हूँ।

इसलिये अभी-अभी मैं इस विषको भक्षण करता हूँ, जिससे मेरी प्रजाका कल्याण हो।।४०।।

श्रीशुकदेवजी कहते हैं – विश्वके जीवनदाता भगवान् शंकर इस प्रकार सती देवीसे प्रस्ताव करके उस विषको खानेके लिये तैयार हो गये।

देवी तो उनका प्रभाव जानती ही थीं, उन्होंने हृदयसे इस बातका अनुमोदन किया।।४१।।

भगवान् शंकर बड़े कृपालु हैं।

उन्हींकी शक्तिसे समस्त प्राणी जीवित रहते हैं।

उन्होंने उस तीक्ष्ण हालाहल विषको अपनी हथेलीपर उठाया और भक्षण कर गये।।४२।।

वह विष जलका पाप – मल था।

उसने शंकरजीपर भी अपना प्रभाव प्रकट कर दिया, उससे उनका कण्ठ नीला पड़ गया, परन्तु वह तो प्रजाका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरके लिये भूषणरूप हो गया।।४३।।

परोपकारी सज्जन प्रायः प्रजाका दुःख टालनेके लिये स्वयं दुःख झेला ही करते हैं।

परन्तु यह दुःख नहीं है, यह तो सबके हृदयमें विराजमान भगवान् की परम आराधना है।।४४।।

देवाधिदेव भगवान् शंकर सबकी कामना पूर्ण करनेवाले हैं।

उनका यह कल्याणकारी अद् भुत कर्म सुनकर सम्पूर्ण प्रजा, दक्षकन्या सती, ब्रह्माजी और स्वयं विष्णुभगवान् भी उनकी प्रशंसा करने लगे।।४५।।

जिस समय भगवान् शंकर विषपान कर रहे थे, उस समय उनके हाथसे थोड़ा-सा विष टपक पड़ा था।

उसे बिच्छू, साँप तथा अन्य विषैले जीवोंने एवं विषैली ओषधियोंने ग्रहण कर लिया।।४६।।

इति श्रीमद् भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां
अष्टमस्कन्धेऽमृतमथने सप्तमोऽध्यायः।।७।।


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