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कबीर के दोहे - सुमिरन + अर्थसहित

– दु:ख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय।
– कबीर सुमिरन सार है, और सकल जंजाल।
– सांस सांस सुमिरन करो, और जतन कछु नाहिं॥
– राम नाम सुमिरन करै, सतगुरु पद निज ध्यान।

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संगति - कबीर के दोहे

कबीर संगत साधु की, नित प्रति कीजै जाय।
कबीर संगत साधु की, जौ की भूसी खाय।
संगत कीजै साधु की, कभी न निष्फल होय।
संगति सों सुख्या ऊपजे, कुसंगति सो दुख होय।

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श्री राम आरती - श्रीरामचन्द्र कृपालु भज मन - अर्थ सहित

श्रीरामचन्द्र कृपालु भज मन
हरण भवभय दारुणम्।
नवकंज-लोचन कंज-मुख
कर-कंज पद-कंजारुणम्॥
श्रीरामचन्द्र कृपालु भज मन – हे मन, कृपालु (कृपा करनेवाले, दया करनेवाले) भगवान श्रीरामचंद्रजी का भजन कर

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सतगुरु - कबीर के दोहे

– सतगुरु सम कोई नहीं, सात दीप नौ खण्ड।
– सतगुरु तो सतभाव है, जो अस भेद बताय।
– तीरथ गये ते एक फल, सन्त मिले फल चार।
– सतगुरु खोजो सन्त, जोव काज को चाहहु।

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