Ram Raksha Stotra – Meaning – Hindi

चरितं रघुनाथस्य शतकोटि-प्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातक-नाशनम्॥1॥

Anuradha Paudwal

Suresh Wadkar

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Ram Raksha Stotra – Meaning – Hindi


विनियोग:

ऊँ अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्र-मन्त्रस्य
बुधकौशिक ऋषि:
श्रीसीता रामचन्द्रो देवता
अनुष्टुप् छन्द:
सीता शक्ति:
श्रीमान् हनुमान् कीलकं
श्रीरामचन्द्र प्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्र-जपे विनियोग:।
  • ऊँ अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्र-मन्त्रस्य – इस रामरक्षा स्तोत्र -मंत्र के
  • बुधकौशिक ऋषि: – बुधकौशिक ऋषि हैं,
  • श्रीसीता रामचन्द्रो देवता – सीता और रामचन्द्र देवता हैं,
  • अनुष्टुप् छन्द: – अनुष्टप् छन्द हैं
    • (अनुष्टुप् छन्द में चार पद होते हैं। प्रत्येक पद में आठ अक्षर/वर्ण होते हैं)
  • सीता शक्ति: – सीता शक्ति हैं,
  • श्रीमान् हनुमान् कीलकं – श्रीमान हनुमानजी कीलक हैं तथा
  • श्रीरामचन्द्र प्रीत्यर्थे – श्री रामचन्द्रजी की प्रसन्नता के लिए
  • रामरक्षास्तोत्र-जपे विनियोग: रामरक्षा स्तोत्र के जप में विनियोग किया जाता हैं
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अथ ध्यानम

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं
बद्धपद्मासनस्थं,
पीतं वासो वसानं
नवकमल दलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्।वामांकारूढ़ सीतामुखकमल मिलल्लोचनं
नीरदाभं नानालंकारदीप्तं
दधतमुरुजटा-मण्डलं रामचन्द्रम्।
  • ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं – जो धनुष -बाण धारण किए हुए हैं,
  • बद्धपद्मासनस्थं – बद्ध पद्मासन से विराजमान हैं,
  • पीतं वासो वसानंपीतांबर पहने हुए हैं,
  • नवकमल दलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् – जिनके प्रसन्न नयन नूतन कमल दल से स्पर्धा करते तथा
  • वामांकारूढ़ सीतामुखकमल मिलल्लोचनं – वामभाग में विराजमान श्री सीताजी के मुख कमल से मिले हुए हैं,
  • नीरदाभं नानालंकारदीप्तं – उन मेघश्याम, नाना प्रकार के अलंकारों से विभूषित तथा विशाल
  • दधतमुरुजटा-मण्डलं रामचन्द्रम् – जटाजूटधारी श्री रामचन्द्र जी का ध्यान करे
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Sri Rama Raksha Stotram

चरितं रघुनाथस्य शतकोटि-प्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥1॥
  • चरितं रघुनाथस्य – श्री रघुनाथ जी का चरित्र
  • शतकोटि-प्रविस्तरम् – सौ करोड़ विस्तारवाला हैं और
  • एकैकमक्षरं पुंसां – उसका एक -एक अक्षर भी
  • महापातकनाशनम् – महान पापो को नष्ट करने वाला हैं
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ध्यात्वा नीलोत्पलश्याम रामं राजीवलोचनम।
जानकी लक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम॥2॥
  • ध्यात्वा – प्रभु श्री राम का स्मरण करे
  • नीलोत्पलश्याम – जो नीलकमल के समान श्यामवर्ण
  • रामं राजीवलोचनम – कमलनयन
  • जानकी लक्ष्मणोपेतं – जानकीजी और लक्ष्मणजी के सहित
  • जटामुकुटमण्डितम – जटाओं के मुकुट से सुशोभित हैं

भगवान रामजी का जानकीजी और लक्ष्मणजी के सहित स्मरण करे, जो नीलकमल के समान श्यामवर्ण, कमलनयन, जटाओं के मुकुट से सुशोभित है

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सासितूण धनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम॥3॥
  • सासितूण धनुर्बाणपाणिं – हाथों में खड्ग, तूणीर, धनुष और बाण धारण करने वाले
  • नक्तंचरान्तकम – राक्षसों के संहारकरी तथा
  • स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं – संसार की रक्षा के लिए अपनी लीला से ही अवतीर्ण हुए हैं,
  • (अजं) विभुम – उन अजन्मा और सर्वव्यापक भगवान रामजी का स्मरण करे
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रामरक्षां पठेत प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम।
शिरो में राघवं पातु भालं दशरथात्मज:॥4॥
  • रामरक्षां पठेत प्राज्ञ: – मनुष्य (प्राज्ञ पुरुष) रामरक्षा का पाठ करे
  • पापघ्नीं सर्वकामदाम – इस पापविनाशिनी और सर्वकामप्रदा (रामरक्षा स्तोत्र का)
  • शिरो में राघवं पातु – मेरे सिर की राघव और
  • भालं दशरथात्मज: – ललाट की दशरथात्मज रक्षा करे

सर्वव्यापी भगवान रामजी का जानकीजी और लक्ष्मणजी के सहित स्मरण कर मनुष्य इस पापविनाशिनी (सभी पापो का नाश करने वाले) और सर्वकामप्रदा (सभी कामनाओ की पूर्ति करने वाले) रामरक्षा का पाठ करे।

मेरे सिर की राघव और ललाट की दशरथात्मज रक्षा करे।

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कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल:॥5॥
  • कौसल्येयो दृशौ पातु – कौसल्यानन्दन नेत्रों की रक्षा करें,
  • विश्वामित्रप्रिय: श्रुती – विश्वामित्र प्रिय कानों को सुरक्षित रखे तथा
  • घ्राणं पातु मखत्राता – यज्ञ रक्षक घ्राण की और
  • मुखं सौमित्रिवत्सल: – सौ मित्रिवत्सल मुख की रक्षा करें
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जिव्हां विद्यानिधि: पातु कण्ठं भरतवन्दित:।
स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक:॥6॥
  • जिव्हां विद्यानिधि: पातु – मेरी जिव्हा की विद्यानिधि,
  • कण्ठं भरतवन्दित: – कंठ की भरतवन्दित,
  • स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु – कंधो की दिव्यायुध और
  • भुजौ भग्नेशकार्मुक: – भुजाओं की महादेव जी का धनुष तोड़ने वाले (भग्नेशकार्मुक) रक्षा करें
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करौ सीतापति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय:॥7॥
  • करौ सीतापति: पातु – हाथों की सीतापति,
  • हृदयं जामदग्न्यजित – हृदय की परशुरामजी को जीतने वालें (जामदग्न्यजित),
  • मध्यं पातु खरध्वंसी – मध्यभाग की खर नाम के राक्षस का नाश करने वाले (खरध्वंसी) और
  • नाभिं जाम्बवदाश्रय: – नाभि की जाम्ब्वदाश्रय रक्षा करें
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सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुत्मप्रभु:।
ऊरू रघूत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत॥8॥
  • सुग्रीवेश: कटी पातु – कमर की सुग्रीवेश,
  • सक्थिनी हनुत्मप्रभु: – सक्थियों की हनुमत्प्रभुः और
  • ऊरू रघूत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत – उरुओं की राक्षसकुल विनाशक रघुश्रेष्ठ रक्षा करें
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जानुनी सेतकृत्पातु जंघे दशमुखान्तक:।
पादौ विभीषणश्रीद: पातु रामोsखिलं वपु:॥9॥
  • जानुनी सेतकृत्पातु – जानुओं की सेतुकृत्,
  • जंघे दशमुखान्तक: – जंघाओं की दशमुखान्तक (रावण को मारने वाले),
  • पादौ विभीषणश्रीद: – चरणों की विभीषण श्रीद (विभीषण को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले ) और
  • पातु रामोsखिलं वपु: – सम्पूर्ण शरीर की श्री राम रक्षा करें
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एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठेत।
स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत॥10॥
  • एतां रामबलोपेतां – जो पुण्यवान् पुरुष रामबल से सम्पन्न
  • रक्षां य: सुकृती पठेत – इस रक्षा का पाठ करता हैं,
  • स चिरायु: सुखी पुत्री – वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान,
  • विजयी विनयी भवेत – विजयी और विनयसम्पन्न हो जाता हैं
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पातालभूतल व्योमचारिण श्छद्मचारिण:।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि:॥11॥
  • पातालभूतल – जो जीव पाताल, पृथ्वी
  • व्योमचारिण – अथवा आकाश में विचरते हैं और
  • श्छद्मचारिण: – छद्मवेश से घूमते रहते हैं,
  • न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: – वे राम नाम से सुरक्षित पुरुष को देख भी नहीं सकते
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रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥12॥
  • रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति – “राम”, “रामभद्र”, “रामचन्द्र”
  • वा स्मरन – इन नामों का स्मरण करने से
  • नरो न लिप्यते – मनुष्य पापों में लिप्त नहीं होता तथा
  • पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति – भोग और मोक्ष प्राप्त कर लेता हैं
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जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम।
य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्धय:॥13॥
  • जगज्जैत्रैकमन्त्रेण – जो पुरुष जगत को विजय करने वाले
  • रामनाम्नाभिरक्षितम – एकमात्र मन्त्र राम नाम से सुरक्षित
  • य: कण्ठे धारयेत्तस्य – इस स्त्रोत को कंठ में धारण कर लेता हैं,
  • करस्था: सर्वसिद्धय: – सम्पूर्ण सिद्धियाँ उसके हस्तगत हो जाती हैं
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वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत।
अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम॥14॥
  • वज्रपंजरनामेदं यो – जो मनुष्य वज्रपंजर नामक
  • रामकवचं स्मरेत – इस राम कवच का स्मरण करता हैं,
  • अव्याहताज्ञ: सर्वत्र – उसकी आज्ञा का कहीं भी उल्लघन नहीं होता और
  • लभते जयमंगलम – उसे सर्वत्र जय और मंगल की प्राप्ति होती हैं
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आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर:।
तथा लिखितवान्प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक:॥15॥
  • आदिष्टवान्यथा स्वप्ने – श्री शंकरजी ने रात्रि के समय स्वप्न में
  • रामरक्षामिमां हर: – इस राम रक्षा का जिस प्रकार आदेश दिया था,
  • तथा लिखितवान्प्रात: – उसी प्रकार प्रातः काल जागने पर
  • प्रबुद्धो बुधकौशिक: – बुधकौशिक जी ने इसे लिख दिया
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आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम।
अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान्स न: प्रभु:॥16॥
  • आराम: कल्पवृक्षाणां – जो मानो कल्पवृक्ष के बगीचे हैं
  • विराम: सकलापदाम – तथा समस्त आपत्तियों का अंत करने वाले हैं,
  • अभिरामस्त्रिलोकानां राम: – जो तीनो लोक में परम सुंदर हैं,
  • श्रीमान्स न: प्रभु: – वे श्री राम हमारे प्रभु हैं
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चरितं रघुनाथस्य शतकोटि-प्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥1॥
जो नीलकमल के समान श्यामवर्ण, कमलनयन
उन अजन्मा और सर्वव्यापक भगवान रामजी का स्मरण करे

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चरितं रघुनाथस्य शतकोटि-प्रविस्तरम्। एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥1॥ जो नीलकमल के समान श्यामवर्ण, कमलनयन उन अजन्मा और सर्वव्यापक भगवान रामजी का स्मरण करे
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