Ram Raksha Stotra – Meaning – Hindi – 2

<<<< Continued from Ram Raksha Stotra – 1
_

Ram Raksha Stotra – Meaning – Hindi – 2


तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ॥17॥
  • तरुणौ – जो तरुण अवस्था वाले,
  • रूपसम्पन्नौ – रूपवान,
  • सुकुमारौ – सुकुमार,
  • महाबलौ – महाबली,
  • पुण्डरीकविशालाक्षौ – कमल के सामान विशाल नेत्रों वाले,
  • चीरकृष्णाजिनाम्बरौ – चीर वस्त्र और कृष्ण मृगचर्म धारी,
_
फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥18॥
  • फलमूलाशिनौ – फल व मूल आहार वाले,
  • दान्तौ – संयमी,
  • तापसौ – तपस्वी,
  • ब्रह्मचारिणौ – ब्रह्मचारी,
  • पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ – वे रघुश्रेष्ठ दसरथकुमार राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करे
_
शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम।
रक्ष: कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ॥19॥
  • शरण्यौ सर्वसत्त्वानां – सम्पूर्ण जीवो को शरण देने वाले,
  • श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम – समस्त धनुर्धारियों में श्रेष्ठ और
  • रक्ष: कुलनिहन्तारौ – राक्षस कुल का नाश करने वाले हैं,
  • त्रायेतां नो रघूत्तमौ – वे रघुश्रेष्ठ दसरथकुमार राम हमारी रक्षा करे
_
आत्तसज्ज-धनुषा-विषुस्पृशा-वक्षयाशुग-निषंग-संगिनौ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रत: पथि सदैव गच्छताम॥20॥
  • आत्तसज्ज-धनुषा – जिन्होंने संधान किया हुआ धनुष ले रखा हैं,
  • विषुस्पृशा – जो बाण का स्पर्श कर रहे हैं तथा
  • वक्षयाशुग-निषंग-संगिनौ – अक्षय बाणों से युक्त तूणीर लिए हुए हैं,
  • रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रत: – वे राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करने के लिए
  • पथि सदैव गच्छताम – मार्ग में सदा ही मेरे आगे चले
_
सन्नद्ध: कवची खड़्गी चापबाणधरो युवा।
गच्छन्मनोरथान्नश्च राम: पातु सलक्ष्मण:॥21॥
  • सन्नद्ध: – सर्वदा उद्यत,
  • कवची – कवचधारी,
  • खड़्गी – हाथ में खड्ग लिए,
  • चापबाणधरो – धनुष बाण धारण किये तथा
  • युवा – युवा अवस्था वाले
  • गच्छन्मनोरथान्नश्च – हमारे मनोरथों की रक्षा करें
  • राम: पातु सलक्ष्मण: – भगवान राम लक्ष्मण जी सहित आगे -आगे चलकर

(भगवान राम लक्ष्मण जी सहित आगे -आगे चलकर हमारे मनोरथों की रक्षा करें)

_
रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली।
काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्लेयो रघूत्तम:॥22॥
वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम:।
जानकीवल्ल्भ: श्रीमानप्रमेयपराक्रम:॥23॥
इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्त: श्रद्धयान्वित:।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशय:॥24॥

(भगवान का कथन हैं कि) राम, दशरथि, शूर, लक्ष्मणानुचर, बलि, काकुत्स्थ, पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघुत्तम, वेदान्तवेद्य,यज्ञेश,पुराण पुरुषोत्तम, जानकी वल्ल्भ, श्रीमान और अप्रमेयपराक्रम – इन नाम का नित्य प्रति श्रद्धा पूर्वक जप करने से मेरा भक्त अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक फल प्राप्त करता हैं, इसमें कोई संदेह नहीं हैं।

_
रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरा:॥25॥
  • रामं दूर्वादलश्यामं – जो लोग दूर्वादल के समान श्याम वर्ण,
  • पद्माक्षं – कमल नयन,
  • पीतवाससम – पीताम्बरधारी
  • स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न – भगवान राम का इन दिव्य नामों से स्तवन करते हैं,
  • ते संसारिणो नरा: – वे संसार चक्र में नहीं पड़ते
_
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरं।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम॥
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्ति।
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम॥26॥

लक्ष्मणजी के पूर्वज, रघुकुल में श्रेष्ठ, सीताजी के स्वामी, अतिसुन्दर, ककुत्स्थ कुलनन्दन, करुणा सागर, गुणनिधान, ब्राह्मणभक्त, परमधार्मिक, राजराजेश्वर, सत्यनिष्ठ, दशरथ पुत्र, श्याम और शांतिमूर्ति, सम्पूर्ण लोको में सुंदर, रघुकुल तिलक, राघव और रावणारी भगवा न राम की मैं वंदना करता /करती हूँ

_
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।
रघुनाथय नाथाय सीताया: पतये नम:॥27॥
  • रामाय रामभद्राय – राम, रामभद्र,
  • रामचन्द्राय वेधसे – रामचन्द्र, विधार्त स्वरूप,
  • रघुनाथय नाथाय – रघुनाथ,
  • सीताया: पतये नम: – प्रभु सीतापति को नमस्कार हैं
_
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम,
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम,
श्रीराम राम शरणं भव राम राम॥28॥
  • श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम – हे रघुनन्दन श्रीराम!
  • श्रीराम राम भरताग्रज राम राम – हे भरताग्रज भगवान राम!
  • श्रीराम राम रणकर्कश राम राम – हे रणधीर प्रभु राम!
  • श्रीराम राम शरणं भव राम राम – आप मेरे आश्रय होइये
_
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि,
श्रीरामचन्द्रवरणौ वचसा गृणामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि,
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥29॥
  • श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि – मैं श्री राम चन्द्र के चरणों का मन से स्मरण करता हूँ,
  • श्रीरामचन्द्रवरणौ वचसा गृणामि – श्री रामचन्द्र के चरणों का वाणी से कीर्तन करता हूँ,
  • श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि – श्री रामचन्द्र के चरणों को सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ तथा
  • श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये – श्री रामचन्द्र के चरणों की शरण लेता हूँ
_
माता रामो मत्पिता रामचन्द्र:,
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्र:।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर्नान्यं,
जाने नैव जाने न जाने॥30॥
  • माता रामो – राम मेरी माता हैं,
  • मत्पिता रामचन्द्र:, – राम मेरे पिता हैं,
  • स्वामी रामो – राम स्वामी हैं और
  • मत्सखा रामचन्द्र: – राम ही मेरे सखा हैं,
  • सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर्नान्यं – दयामय राम ही मेरे सर्वस्व हैं,
  • जाने नैव जाने न जाने – उनके सिवा और किसी को मैं नहीं जानटा
_
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य
वामे च जनकात्मजा।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं
वन्दे रघुनंदनम॥31॥
  • दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य – जिनकी दायीं और लक्ष्मणजी,
  • वामे च जनकात्मजा – बाएँ और जानकीजी और
  • पुरतो मारुतिर्यस्य तं – सामने हनुमानजी विराजमान हैं,
  • वन्दे रघुनंदनम – उन रघुनाथजी की मैं वंदना करता हूँ
_
लोकाभिरामं रनरङ्‌गधीरं
राजीवनेत्र रघुवंशनाथम।
कारुण्यरुपं करुणाकरं तं
श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥32॥
  • लोकाभिरामं – जो सम्पूर्ण लोकों में सुंदर,
  • रनरङ्‌गधीरं – रणक्रीडा में धीर,
  • राजीवनेत्र – कमलनयन,
  • रघुवंशनाथम – रघुवंश नायक,
  • कारुण्यरुपं – करुणामूर्ति और
  • करुणाकरं तं – करुणा के भंडार हैं,
  • श्रीरामचन्द्रं – उन श्री रामचन्द्र जी की
  • शरणं प्रपद्ये – मैं शरण लेता हूँ
_
मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥33॥
  • मनोजवं – जिनकी मन के सामान गति और
  • मारुततुल्यवेगं – वायु के सामान वेग हैं,
  • जितेन्द्रियं – जो परम जितेन्द्रिय और
  • बुद्धिमतां वरिष्ठम – बुद्धिमानो में श्रेष्ठ हैं।
  • वातात्मजं वानरयूथमुख्यं – उन पवननन्दन वानराग्रगण्य
  • श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये – श्री रामदूत की मैं शरण लेता हूँ
_
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम॥34॥
  • कूजन्तं रामरामेति – राम-राम इस मधुर नाम को कहने वाले
  • मधुरं मधुराक्षरम – मधुर अक्षरो वाले राम, राम मधुर नाम को कहने वाले
  • आरुह्य कविताशाखां – कवितामयी डाली पर बैठकर
  • वन्दे वाल्मीकिकोकिलम – वाल्मीकिरूप कोकिल को मैं वंदना करता हूँ

कवितामयी डाली पर बैठकर मधुर अक्षरो वाले राम – राम इस मधुर नाम को कूजते हुए वाल्मीकिरूप कोकिल की मैं वंदना करता हूँ

_
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम॥35॥
  • आपदामपहर्तारं – आपत्तियों को हरने वाले तथा
  • दातारं सर्वसम्पदाम – सब प्रकार की सम्पति प्रदान करने वाले
  • लोकाभिरामं श्रीरामं – लोकाभिराम भगवान राम को
  • भूयो भूयो नमाम्यहम – मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ
_
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम॥36॥
  • भर्जनं भवबीजानामर्जनं – सम्पूर्ण संसार बीजों को भून डालनेवाला,
  • सुखसम्पदाम – समस्त सुख-सम्पति की प्राप्ति कराने वाला तथा
  • तर्जनं यमदूतानां – यमदूतों को भयभीत करनेवाला हैं
  • रामरामेति गर्जनम – “राम-राम” ऐसा घोष करना

“राम-राम” ऐसा घोष करना सम्पूर्ण संसार बीजों को भून डालनेवाला, समस्त सुख-सम्पति की प्राप्ति कराने वाला तथा यमदूतों को भयभीत करनेवाला हैं

_
रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे,
रामेणाभिहता निशाचरचमू, रामाय तस्मै नम:।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोsस्म्यहं,
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर॥37॥
  • रामो राजमणि: – राजाओं में श्रेष्ठ श्रीरामजी
  • सदा विजयते – सदा विजय को प्राप्त होते हैं
  • रामं रमेशं भजे – मैं लक्ष्मीपति भगवान राम का भजन करता हूँ
  • रामेणाभिहता निशाचरचमू – जिन रामचन्द्रजी ने सम्पूर्ण राक्षस सेना का ध्वंस कर दिया था,
  • रामाय तस्मै नम: – मैं उनको प्रणाम करता हूँ।
  • रामान्नास्ति परायणं – राम से बड़ा और कोई आश्रय नहीं हैं।
  • परतरं रामस्य दासोsस्म्यहं – मैं उन रामचन्द्रजी का दास हूँ।
  • रामे चित्तलय: सदा भवतु – मेरा चित्त सदा राम में ही लीन रहें;
  • मे भो राम मामुद्धर – हे राम! आप मेरा उद्धार कीजिये
_
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्त्र नाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥38॥
  • राम रामेति रामेति – (श्री महादेवजी पार्वतीजी से कहते हैं -) मैं सर्वदा ‘राम राम, राम’
  • रमे रामे मनोरमे – इस प्रकार मनोरम रामनाम में ही रमण करता हूँ
  • सहस्त्र नाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने – रामनाम विष्णु सहस्त्रनाम के तुल्य हैं

(श्री महादेवजी पार्वतीजी से कहते हैं -) हे सुमुखि! रामनाम विष्णु सहस्त्रनाम के तुल्य हैं। मैं सर्वदा ‘राम-राम, राम ‘इस प्रकार मनोरम रामनाम में ही रमण करता हूँ

इति श्री बुधकौशिकमुनिविरचितं श्री राम रक्षास्तोत्रं सम्पुर्णम्।


For more bhajans from category, Click -

-
-

_

Ram Bhajan Bhakti Geet

_

Bhajan List

Krishna Bhajans
Ram Bhajan
Bhajan, Aarti, Chalisa, Dohe – List

_
_

Ram Bhajan Bhajan Lyrics

_
_

Bhajans and Aarti

_
_

Bhakti Song Lyrics

Ram Raksha Stotra – Meaning – Hindi

चरितं रघुनाथस्य शतकोटि-प्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥1॥
जो नीलकमल के समान श्यामवर्ण, कमलनयन
उन अजन्मा और सर्वव्यापक भगवान रामजी का स्मरण करे

_
Ram Raksha Stotra - Meaning
Bhajan:
Ram Raksha Stotra - Meaning
Bhajan Lyrics:
चरितं रघुनाथस्य शतकोटि-प्रविस्तरम्। एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥1॥ जो नीलकमल के समान श्यामवर्ण, कमलनयन उन अजन्मा और सर्वव्यापक भगवान रामजी का स्मरण करे
Category:
Website:
Bhajan Sandhya