Maha Shivratri – Shiv Vivah Katha

Shiv Mantra Jaap (शिव मंत्र जाप)

ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय   ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय   ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
Shiv Bhajan
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महाशिवरात्रि – शिव विवाह कथा


महाशिवरात्रि (शिवरात्रि) हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है, इसे लेकर कई पौराणिक कथाएं हैं।

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि का प्रारंभ इसी दिन से हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ महादेव भगवान् शिव के स्वरूप के उदय से हुआ था।

अधिक तर लोग यह मान्यता रखते है कि इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वति के साथ हुआ था।

साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

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शिव विवाह


पार्वतीशैलपुत्री, उमा, हैमवती

माँ दुर्गा अपने पहले स्वरूप में ‘शैलपुत्री’ के नाम से जानी जाती हैं। देवी शैलपुत्री ही महादेव कि अर्धांगिनी पार्वती है। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण उनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा था।

पार्वती पिछले जन्म में भी शिव की पत्नी थी, तब उनका नाम सती था और वे प्रजापति दक्ष की बेटी थी।

देवी सती:

एक बार प्रजापति दक्षने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। यज्ञमें उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया। किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञमें निमंत्रित नहीं किया।

सती ने जब सुना कि उनके पिता एक विशाल यज्ञ कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा। अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकर जी को बतायी। शंकरजी ने कहा कि सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया है, उन्हें नहीं। ऐसे में वहां जाना उचित नहीं है। किन्तु सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी।

सती ने पिताके घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बात नहीं कर रहा है। केवल उनकी माता ने ही स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे।

उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ भगवान शंकर के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमान जनक वचन भी कहे। परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा। उनका हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से सन्तप्त हो उठा।

उन्होंने सोचा भगवान् शंकरजी की बात न मानकर, यहाँ आकर उन्होंने बहुत बड़ी गलती की है। वह अपने पति भगवान् शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया।

इस दारुण दुःखद घटना को सुनकर शंकर जी ने क्रुद्ध हो अपने गणोंको भेजकर दक्षके उस यज्ञका पूर्णतः विध्वंस करा दिया।

सती के वियोग में शिव में विरक्ति का भाव भर दिया और वे तपस्या में लीन हो गए


पार्वती:

शिव को फिर से हासिल करने के लिए सती ने पार्वती बनकर हिमालय के घर जन्म लिया। देवताओं ने शिवका ध्यान भंग करने के लिए कामदेव को भेजा तो शिव ने उन्हे भस्म कर दिया।

लेकिन पार्वती ने शिव को प्राप्त करने के लिए तप जारी रखा

आखिरकार भगवान शंकर प्रसन्न हुए और वे भभूत मलकर, नंदी पर सवार होकर बड़े ठाठ से बारात लेकर आए।

बारातियों की शक्ल में थे नाचते-गाते गण यानी अनगिनत भूत, पिशाच, शैतान, पशु और पक्षी। (पशुपतिनाथ यानी समस्त पशुओं के देवता शिव का विवाह जो था।)

शिवजी से विवाह करके पार्वती उनके साथ कैलाश पर चली गई।

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भगवान् शिव की महिमा

शिवजी को आशुतोष भगवान् भी कहते हैं अर्थात तुरंत प्रसन्न हो जाने वाले ईश्वर। भगवान शिव जैसी उदारता किसी और देवी-देवता में विरल है क्योंकि वरदान देने के मामले में शिव ने कभी भेद नहीं किया।

भक्त चाहे मनुष्य हो, देवता हो या राक्षस (जैसे भस्मासुर),  जिसने जो बाबा भोलेनाथ से मांगा उसे मिला।

भगवान् शंकर ने अमृत औरो में बांटा और देवो के हित के लिए खुद विष पी गये।

समुद्र मंथन

महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव ने कालकूट नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था। जो समुद्र मंथन के समय बाहर आया था।

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Shiv Bhajans

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